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स्वाद - आयुर्वेदिक भोजन पकाने का एक महत्वपूर्ण अंग

क्या आप जानते हैं कि जिस तरह से हम अपने भोजन को पकाते हैं, वह हमारे स्वास्थ्य पर एक बड़ा असर डालता है? अगर आप आयुर्वेद में बताए गए सिद्धांतों की बात करें तो भोजन पकाने की प्रक्रिया उतनी ही जटिल है जितनी भोजन पचाने की जिससे भोजन की पौष्टिकता बनी रहे।

कोई भी भोजन संतुलित और सेहतमंद तभी माना जा सकता है जब उसमें छह आयुर्वेदिक स्वाद का संयोजन हो, भोजन करने वाले के शरीर के अनुकूल हो और हर किसी के द्वारा आसानी से पचाया जा सके, आज हम स्वाद के बारे में चर्चा करेंगे जो आयुर्वेदिक खाना बनाने में सबसे महत्वपूर्ण कारक है।

छह रस:

जैसे कि रोग के इलाज के लिए रोगों की समझ जरूरी होती है उसी तरह बीमारी को ठीक करनेके लिए स्वाद की समझ जरूरी है। प्रत्येक पदार्थ पांच तत्वों - वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, और अंतरिक्ष से मिलकर बना है। इन तत्वों के विभिन्न प्रकार के संयोजन से आयुर्वेद में बताए गए छह रसों (स्वादों) का निर्माण होता है। - मधुरा (मीठा), आमला (खट्टा), लवाना (नमकीन), कटू (तेज), टिकता (कड़वा), और कश्यय (अस्थिर)। इन छः स्वादों में कुछ गुण होते हैं जिन्हें उनके दो प्राथमिक तत्वों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। उदाहरण के लिए, मीठा स्वाद पृथ्वी और पानी से बना होता है, जो कि इसे भारी, गाढ़ा और नम बनाता है। इन् रसों या तत्वों के बढ़ने से हमारे शरीर में रोग होते हैं, मीठे स्वाद वाले खाने की चीजों के ज्यादा सेवन से कफ दोष में वृद्धि होगी क्योंकि इसमें पृथ्वी और पानी के समान तत्व होते है।

इसलिए, संतुलित भोजन वह होता है जिसमें खाने वाले के रोग या दोष के अनुसार सभी स्वादों का संतुलित संयोजन होता है। एक संतुलित आहार को पकाने के लिए यह जरुरी है कि हम सभी स्वादों को ठीक से समझें ।

मधुरा:

यह स्वाद में भारी, तैलिक और ठंडा होता है। जब यह संतुलित मात्रा में प्रयोग किया जाता है तो यह शरीर को ऊर्जा और जीवनशक्ति देता है, जलन के प्रभाव को कम करता है और त्वचा बालों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। ज्यादा मीठा खाने पीने से

कफ दोष की वृद्धि होती है, जो कि खांसी कफ का जमाव और भारीपन का कारण बन सकती है यह हमारे शरीर में वात को संतुलित रखता है और पित्त के लिए सुखद होता है। पदार्थ जिनमें ये पाया जाता है: दूध और दूध उत्पाद (मक्खन, घी और क्रीम), अनाज (गेहूं, चावल और जौ), फलियां (सेम और मसूर), मीठे फल (केले और आम,) और सब्जियां (गाजर, मीठे आलू और चुकंदर) आदि।

अमला:

यह स्वाद भूख को बढ़ाता है, पाचन को बढ़ावा देता है और शरीर पर अच्छा प्रभाव डालता है । इसके शरीर में अधिक मात्रा में होने में , यह अपचन, अतिसंवेदनशीलता और अल्सर पैदा कर सकता है। यह स्वाद वात को कम करता है और पित्त और कफ को बढ़ाता है। पदार्थ जिनमें ये पाया जाता है: खट्टे फल (जैसे नींबू और नींबू), खट्टा दूध उत्पाद (जैसे दही, पनीर और खट्टा क्रीम), और किण्वित पदार्थ (सिरका, अचार और सोया सॉस सहित)।

लवण:

नमकीन स्वाद प्रकृति में गर्म और भारी है। जब यह संयम और संतुलित मात्रा में लिया जाता है तब यह ऊर्जा प्रदान करता है, विकास को बढ़ावा देता है और जल धारण करने की छमता को बढ़ता है।हालांकि, आहार में बहुत अधिक नमक उच्च रक्तचाप, एडीमा, अल्सर, और अतिसंवेदनशीलता का कारण बन सकता है।नमक शरीर में पित्त और कफ को बढ़ता है और वात को काम करता है। पाचन को बढ़ाने की इसकी क्षमता के कारण वात के रोगियों को इसके सेवन की सलाह दी जाती है।

पदार्थ जिनमें ये पाया जाता है: कोई भी नमक (समुद्री नमक और चट्टान नमक), समुद्री सब्जियां (समुद्री शैवाल और केल्प की तरह), और खाद्य पदार्थ जिनमें बड़ी मात्रा में नमक पाया जाता है (जैसे चिप्स और अचार)।

कटु:

यह प्रकृति में गर्म, हल्का और नमीविहीन होता है, पाचन और परिसंचरण में मदद करता है और शरीर से अतिरिक्त वसा को कम करता है। जब यह अत्यधिक मात्रा में उपयोग किया जाता है, तो यह सूजन, जलन, दस्त, दिल की धड़कन और मतली का कारण बन सकता है। तीखा स्वाद वात और पित्त को बढ़ाता है। शरीर में जमा अतिरिक्त वसा को ख़त्म करने की इसकी क्षमता के कारण कफ के रोगियों को इसके सेवन की सलाह दी जाती है।

पदार्थ जिनमें ये पाया जाता है: कुछ सब्जियां (जैसे मिर्च, लहसुन, और प्याज), और मसालों में (जैसे काली मिर्च, एसाफेटिडा, अदरक, और केयेन)। टिकता

यह स्वाद प्रकृति में ठंडा, हल्का और सूखा होता है । शरीर में इसके अत्यधिक मात्रा में होने से दुर्बलता, थकान और चक्कर आ सकता है । कड़वा स्वाद वात को बढ़ाता है । पित्त और कफ को कम करता है। यह हमारे शरीर में पित्त को संतुलित रखने में मदद करता है क्योंकि यह शरीर की अतिरिक्त गर्मी को ठंडा करता है , पाचन बढ़ाने और यकृत की क्रिया को सुधरने में मदद करता है। पदार्थ जिनमें ये पाया जाता है: हरी पत्तेदार सब्जियां (जैसे पालक और हरी गोभी), अन्य सब्ज़ियां (उबचिनी और बैंगन सहित), कॉफी, चाय और फल (जैसे अंगूर, जैतून और कड़वे तरबूज)।

कसैला:

कसैला स्वाद के शीतल, नमीविहीन और भारी प्रकृति के कारण यह शोषण में सुधार करने में मदद करता है और इसमें जलनशीतला को कम करने का गुण होता है । अत्यधिक मात्रा में होने से यह शरीर में परिसंचरण और कब्ज रोग को जन्म देता है । कसैला स्वाद वात को बढ़ाता है और पित्त और कफ को कम करता है ।

पदार्थ जिनमें ये पाया जाता है: फल (जैसे सेम और मसूर), फल (अनार, नाशपाती, और सूखे फल सहित), सब्जियां (जैसे ब्रोकोली, फूलगोभी, शतावरी और सलिप), अनाज (जैसे राई, अनाज, और क्विनोआ), कॉफ़ी और चाय।

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