Diseases Search
Close Button

आईबीएस से राहत के लिए आयुर्वेदिक दवा

भारत में पेट से जुड़ी परेशानियाँ अब केवल खान-पान की समस्या नहीं रहीं, बल्कि एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही हैं। अलग-अलग भारतीय अध्ययनों के अनुसार देश की लगभग 4% से 7.9% आबादी चिड़चिड़ा आँत्र सिंड्रोम (आईबीएस) से प्रभावित है। यह संख्या बताती है कि आईबीएस कोई दुर्लभ बीमारी नहीं, बल्कि लाखों लोगों की रोज़मर्रा की तकलीफ़ बन चुका है।

आईबीएस आपके रोज़मर्रा के जीवन को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकता है, जैसे पेट में दर्द, गैस, कब्ज़ या दस्त का बार-बार होना, पेट फूलना या मल त्याग में बदलाव, जो न केवल शारीरिक असुविधा देता है बल्कि मानसिक तनाव भी बढ़ा सकता है। ऐसे लक्षण अक्सर दैनिक काम, नींद और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर देते हैं।

जब आप लगातार ऐसी समस्याओं से जूझ रहे हों, तो सही दिशा में इलाज और समर्थन लेना बहुत ज़रूरी हो जाता है। आयुर्वेद इस स्थिति को सिर्फ लक्षणों के स्तर पर नहीं बल्कि शरीर के मूल दोष संतुलन को समझकर समग्र रूप से देखता है।

आईबीएस क्या है और यह आपको बार-बार क्यों परेशान करता है?

आईबीएस यानी चिड़चिड़ा आँत्र सिंड्रोम पाचन तंत्र से जुड़ी एक ऐसी समस्या है, जिसमें आँतें ठीक से काम नहीं कर पातीं। इसमें आपकी आँतों में कोई घाव या सूजन साफ़ दिखाई नहीं देती, लेकिन फिर भी पेट से जुड़ी परेशानियाँ बार-बार सामने आती हैं। यही कारण है कि कई लोग लंबे समय तक इलाज कराने के बाद भी पूरी तरह राहत महसूस नहीं कर पाते।

आईबीएस में आपको पेट दर्द, गैस, पेट फूलना, कभी-कभी कब्ज़ और कभी दस्त जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। कई बार मल त्याग के बाद भी पेट पूरी तरह साफ़ नहीं लगता। ये लक्षण कभी हल्के होते हैं और कभी अचानक बढ़ जाते हैं, जिससे आप परेशान और असहज महसूस करते हैं।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर

जब पेट बार-बार खराब रहता है, तो उसका असर सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रहता।

धीरे-धीरे आपको लगने लगता है कि पेट की यह समस्या आपकी पूरी दिनचर्या को नियंत्रित करने लगी है।

यह समस्या लंबे समय तक क्यों चलती है?

आईबीएस इसलिए लंबे समय तक चलता है क्योंकि अक्सर इसका इलाज सिर्फ लक्षणों तक सीमित रह जाता है। जब तक पाचन की जड़ में मौजूद गड़बड़ी ठीक नहीं होती, तब तक समस्या बार-बार लौटती रहती है। तनाव, अनियमित खान-पान, देर से खाना और गलत जीवनशैली इस परेशानी को और बढ़ा देती हैं।

आईबीएस के लिए कौन-सी आयुर्वेदिक दवाएँ फायदेमंद मानी जाती हैं?

आईबीएस में आयुर्वेदिक दवाओं का चयन लक्षणों के आधार पर किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल तुरंत राहत देना नहीं, बल्कि पाचन तंत्र को धीरे-धीरे संतुलित और मज़बूत बनाना होता है। नीचे बताई गई जड़ी-बूटियाँ परंपरागत रूप से आईबीएस के लक्षणों में सहायक मानी जाती हैं।

  • हिंग: पेट में बनने वाली गैस, ऐंठन और अचानक होने वाले दर्द को कम करने में मदद करती है। जिन लोगों को खाने के बाद भारीपन रहता है, उनके लिए उपयोगी मानी जाती है।

  • जीरा: पाचन शक्ति को बेहतर करता है और भोजन को सही तरह से पचाने में सहायता करता है। इससे पेट फूलना और असहजता कम हो सकती है।

  • सौंठ: पाचन को सक्रिय करती है और आँतों की सुस्ती को दूर करने में मदद करती है। कब्ज़ और गैस की स्थिति में लाभकारी मानी जाती है।

  • बिल्व: बार-बार दस्त होने पर आँतों को स्थिरता देता है और मल त्याग की आवृत्ति को नियंत्रित करने में सहायक होता है।

  • धनिया: पेट की जलन, बेचैनी और गर्मी को शांत करता है। यह पाचन तंत्र को ठंडक और संतुलन देता है।

  • नागकेसर: आँतों की अधिक संवेदनशीलता को कम करने में मदद करता है और आईबीएस में होने वाली असहजता को घटाता है।

यह समझना ज़रूरी है कि हर व्यक्ति की समस्या अलग होती है, इसलिए आयुर्वेदिक दवा भी व्यक्तिगत रूप से तय की जानी चाहिए। बिना डॉक्टर की सलाह स्वयं दवा लेना सही नहीं माना जाता।

आयुर्वेदिक इलाज से आईबीएस में आपको क्या-क्या फायदे मिल सकते हैं?

जब आप आईबीएस से लंबे समय से परेशान रहते हैं, तो सबसे बड़ी चाह यही होती है कि पेट की दिक्कतें रोज़-रोज़ की ज़िंदगी पर हावी न हों। आयुर्वेदिक इलाज इसी सोच के साथ काम करता है। इसका उद्देश्य केवल लक्षणों को दबाना नहीं, बल्कि आपके पाचन तंत्र को भीतर से संतुलित करना होता है।

मल त्याग में सुधार 

आयुर्वेदिक दवाएँ और उपचार आँतों की कार्यक्षमता को धीरे-धीरे बेहतर करते हैं। इससे आपको बार-बार शौच जाने की जल्दी नहीं लगती और न ही कई दिनों तक कब्ज़ बनी रहती है। मल त्याग अधिक नियमित और सहज होने लगता है, जिससे पेट हल्का महसूस होता है और दिन की शुरुआत बेहतर होती है।

पेट दर्द और बेचैनी में कमी 

आईबीएस में पेट दर्द, ऐंठन और गैस सबसे ज़्यादा परेशान करती है। आयुर्वेदिक इलाज वात दोष को संतुलित करने पर काम करता है, जिससे आँतों की ऐंठन और सूखापन कम होता है। जैसे-जैसे पाचन शांत होता है, वैसे-वैसे पेट दर्द और लगातार बनी रहने वाली बेचैनी में भी कमी आने लगती है।

जीवन की गुणवत्ता में बदलाव 

जब पेट की समस्या नियंत्रण में आने लगती है, तो उसका असर आपके पूरे जीवन पर दिखाई देता है। आप बिना डर के बाहर जा पाते हैं, काम पर ध्यान बेहतर लगता है और नींद भी सुधरती है। मानसिक तनाव कम होने लगता है और आप खुद को ज़्यादा ऊर्जावान महसूस करते हैं।

निष्कर्ष

आईबीएस के साथ जीना आसान नहीं होता। बार-बार पेट खराब होना, दर्द, गैस या शौच की परेशानी आपको थका देती है और मन में यह डर बैठा देती है कि पता नहीं अगला दिन कैसा होगा। लेकिन अच्छी बात यह है कि इस समस्या के साथ समझदारी से निपटा जा सकता है। आयुर्वेद आपको यह समझने में मदद करता है कि आपका शरीर क्या संकेत दे रहा है और पाचन की गड़बड़ी कहाँ से शुरू हो रही है।

जब इलाज आपके शरीर के स्वभाव, खान-पान और जीवनशैली के अनुसार तय किया जाता है, तो राहत सिर्फ कुछ दिनों के लिए नहीं बल्कि लंबे समय तक मिल सकती है। धीरे-धीरे पाचन सुधरता है, पेट शांत रहता है और आप फिर से अपने रोज़मर्रा के काम बिना झिझक कर पाते हैं।

अगर आप आईबीएस या पाचन संबंधी किसी भी पाचन समस्या से परेशान हैं, तो आज ही जीवा के प्रमाणित डॉक्टरों से व्यक्तिगत परामर्श लें। कॉल करें: 0129-4264323

FAQs

  1. क्या आईबीएस में आयुर्वेदिक दवा लंबे समय तक ली जा सकती है?

हाँ, जीवा के डॉक्टर की निगरानी में ली गई आयुर्वेदिक दवा लंबे समय तक सुरक्षित मानी जाती है, क्योंकि यह धीरे-धीरे पाचन तंत्र को संतुलित करने पर काम करती है।

  1. क्या आईबीएस की आयुर्वेदिक दवा से कोई साइड इफेक्ट होता है?

सही मात्रा और सही मार्गदर्शन में ली गई आयुर्वेदिक दवा आमतौर पर सुरक्षित होती है। बिना सलाह दवा लेने से परेशानी हो सकती है।

  1. क्या आईबीएस में दवा बंद करते ही समस्या वापस आ जाती है?

अगर दवा के साथ आहार और जीवनशैली में सुधार किया जाए, तो समस्या दोबारा लौटने की संभावना कम हो जाती है। अधूरा इलाज नुकसानदायक हो सकता है।

  1. क्या आईबीएस में आयुर्वेदिक दवा बच्चों या बुज़ुर्गों के लिए सुरक्षित है?

हाँ, लेकिन बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए दवा अलग मात्रा और स्थिति देखकर दी जाती है। स्वयं दवा देना ठीक नहीं माना जाता।

  1. क्या आयुर्वेदिक दवा लेते समय एलोपैथिक दवा छोड़ी जा सकती है?

बिना डॉक्टर की सलाह किसी भी दवा को अचानक बंद नहीं करना चाहिए। दोनों इलाजों के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी होता है।

Our Happy Patients

Social Timeline

Book Free Consultation Call Us