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Cataract Surgery कब Avoid करें? आयुर्वेदिक रोकथाम का सच

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 26 May, 2026
  • category-iconUpdated on 13 Jun, 2026
  • category-iconENT
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बढ़ती उम्र के साथ मोतियाबिंद (Cataract) होना आज के समय में बहुत आम बात हो गई है। जब आंखों के लेंस पर धुंध छाने लगती है, तो रोज़ के छोटे-छोटे काम भी पहाड़ जैसे लगने लगते हैं। ऐसे में सबसे पहली सलाह 'ऑपरेशन' की ही मिलती है। लेकिन हर कोई जानना चाहता है कि क्या हर हाल में सर्जरी ज़रूरी है? या आयुर्वेद की मदद से इसे शुरू में ही रोका जा सकता है?

सच तो ये है कि हमारी आंखों की सेहत पूरे शरीर के बैलेंस से जुड़ी है। अगर हम सही समय पर अपना खान-पान सुधार लें और लाइफस्टाइल बदल लें, तो कई बार इस दिक्कत को बिगड़ने से काफी हद तक टाला जा सकता है।

मोतियाबिंद (Cataract) आखिर है क्या? 

हमारी आंखों का लेंस एक साफ कांच की तरह होता है। जब इस कांच पर धीरे-धीरे जाला या धुंध जमने लगे, तो बाहर की चीज़ें साफ दिखना बंद हो जाती हैं। इसी धुंध को मोतियाबिंद कहते हैं। पहले यह सिर्फ बुढ़ापे की बीमारी थी, लेकिन आज खराब लाइफस्टाइल, शुगर (डायबिटीज़) और आंखों का ध्यान न रखने की वजह से जवानी में ही लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं।

शुरुआती लक्षण: कैसे पहचानें कि मोतियाबिंद हो रहा है? 

शुरू में यह इतनी धीरे बढ़ता है कि लोग इसे बस 'आंखों की थकान' मानकर छोड़ देते हैं। लेकिन शरीर कुछ इशारे ज़रूर देता है:

  • धुंधला दिखना: चीज़ें एकदम साफ नहीं दिखतीं, ऐसा लगता है जैसे आंखों के आगे हल्का सा कोहरा या फॉग छाया हुआ है।
  • रात के अंधेरे में दिक्कत: कम रोशनी में देखने या रात को गाड़ी चलाने में बहुत परेशानी होने लगती है।
  • लाइट के चारों तरफ घेरा (Halos): बल्ब या गाड़ी की हेडलाइट के चारों ओर एक चमकदार गोल घेरा (छल्ला) सा दिखने लगता है।
  • चश्मे का नंबर बार-बार बदलना: नज़र टिकती ही नहीं है, जिसकी वजह से बार-बार चश्मे का नंबर बदलवाना पड़ता है।
  • पढ़ने में ज़ोर पड़ना: न्यूज़पेपर या फोन के छोटे अक्षर पढ़ने में आंखों पर बहुत प्रेशर पड़ता है।
  • रंगों का फीका पड़ना: चीज़ों के रंग पहले जितने ब्राइट और चमकदार नहीं लगते, सब कुछ हल्का और डल लगने लगता है।

मोतियाबिंद किन कारणों से होता है? 

यह कोई रातों-रात होने वाली दिक्कत नहीं है। इसके पीछे कई वजहें होती हैं:

  • बढ़ती उम्र: उम्र के साथ आंखों का लेंस पुराना और कमज़ोर पड़ने लगता है। यह सबसे बड़ा कारण है।
  • शुगर (डायबिटीज़): शरीर में शुगर का लेवल हाई रहने से आंखों के लेंस पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
  • तेज़ धूप (UV Rays): बिना चश्मे के सीधे चिलचिलाती धूप में ज्यादा रहने से आंखों को गहरा नुकसान पहुंचता है।
  • शरीर की गंदगी: शरीर में जब टॉक्सिन्स (ज़हरीले तत्व) बढ़ जाते हैं, तो आंखों की नसें कमज़ोर पड़ जाती हैं।
  • लंबी दवाइयां: कुछ खास तरह की स्टेरॉयड या भारी दवाइयों का लंबे समय तक इस्तेमाल भी मोतियाबिंद को न्योता देता है।

क्या हर मोतियाबिंद में तुरंत ऑपरेशन ज़रूरी है? 

बिल्कुल नहीं! हर केस में तुरंत सर्जरी की ज़रूरत नहीं होती। अगर आपकी नज़र इतनी कमज़ोर नहीं हुई है और आप अपने रोज़मर्रा के काम आसानी से कर पा रहे हैं, तो डॉक्टर सिर्फ रेगुलर चेकअप की सलाह देते हैं। शुरुआती स्टेज में सही चश्मे के नंबर, आई-ड्रॉप्स और लाइफस्टाइल सुधार कर इसे काफी लंबे समय तक टाला जा सकता है।

किन हालात में मोतियाबिंद की सर्जरी टाल दी जाती है? 

कई बार डॉक्टर खुद ही ऑपरेशन करने से मना कर देते हैं या डेट आगे बढ़ा देते हैं, जैसे:

  • आंख में इंफेक्शन: अगर आंख लाल है, सूजी हुई है या कोई इंफेक्शन चल रहा है, तो पहले उसे ठीक किया जाएगा।
  • शुगर या बीपी का बढ़ना: अगर आपका ब्लड प्रेशर या शुगर कंट्रोल में नहीं है, तो ऑपरेशन का रिस्क नहीं लिया जाता।
  • शुरुआती स्टेज: अगर मोतियाबिंद बहुत छोटा है और नज़र पर खास फर्क नहीं पड़ रहा, तो डॉक्टर इसे अभी न छेड़ने की ही सलाह देते हैं।
  • आंख की कोई और बीमारी: अगर आंख के पर्दे (रेटिना) या नसों में कोई और दिक्कत है, तो पहले उस बड़ी समस्या को सुलझाया जाता है।

हम रोज़ाना क्या गलतियां कर रहे हैं जो इसे बढ़ा रही हैं? 

हमारी भागदौड़ भरी ज़िंदगी सीधे आंखों पर भारी पड़ रही है। हम रोज़ कुछ ऐसी गलतियां करते हैं जो मोतियाबिंद की रफ्तार बढ़ा देती हैं:

  • हर वक्त स्क्रीन से चिपके रहना: मोबाइल और लैपटॉप से निकलने वाली रोशनी आंखों को बुरी तरह थका देती है।
  • नींद पूरी न होना: आंखें दिनभर काम करती हैं, उन्हें रिपेयर होने के लिए पूरी नींद चाहिए जो हम अक्सर नहीं लेते।
  • धूप में लापरवाही: तेज़ धूप में निकलते वक्त सनग्लासेस (धूप का चश्मा) न लगाना।
  • नशा करना: सिगरेट और शराब शरीर में गंदगी बढ़ाते हैं, जिसका सीधा असर आंखों की रोशनी पर पड़ता है।

आयुर्वेद में मोतियाबिंद को कैसे समझा जाता है? 

आयुर्वेद इसे सिर्फ आंखों की कोई अलग सी बीमारी नहीं मानता, बल्कि यह शरीर में वात और पित्त के बिगड़ने का सीधा नतीजा है। जब शरीर का बैलेंस बिगड़ता है, तो आंखों की नसों की ताकत कम होने लगती है और नज़र धुंधली पड़ जाती है।

इसके अलावा, हर वक्त कुछ भी उल्टा-सीधा खाना, लगातार स्क्रीन पर आंखें गड़ाए रखना, रातों की नींद खराब करना और बहुत ज्यादा टेंशन लेना ये सब आदतें इस बीमारी को और तेज़ी से बढ़ाती हैं। आयुर्वेद का सीधा फंडा है कि आंखों की सेहत आपके पूरे शरीर से जुड़ी है। इसलिए इलाज भी सिर्फ आंख का नहीं, पूरे शरीर को ठीक करके किया जाता है।

आयुर्वेद का इलाज करने का तरीका 

आयुर्वेद सिर्फ धुंधलेपन को ठीक करने पर काम नहीं करता, बल्कि आंखों की कुदरती ताकत को लंबे समय तक बचाए रखने पर ज़ोर देता है:

  • असली वजह का इलाज: सिर्फ आंखों में ड्रॉप डालने के बजाय, यह देखा जाता है कि मोतियाबिंद हुआ क्यों है। क्या आपकी डाइट खराब है? शुगर बढ़ी है? या स्ट्रेस ज्यादा है? पहले इन गलतियों को सुधारा जाता है।
  • वात और पित्त को कंट्रोल करना: वात (हवा/रूखापन) बढ़ने से आंखों में सूखापन आता है और पित्त (गर्मी) बढ़ने से आंखों में जलन होती है। इन दोनों को शांत करके ही आंखों को बचाया जाता है।
  • आंखों को असली खुराक: आंखों की नसों और लेंस को अंदर से ताक़त दी जाती है ताकि नज़र और ज्यादा कमज़ोर न पड़े।
  • शरीर की कमज़ोरी मिटाना: अगर आपका शरीर अंदर से कमज़ोर है या पेट खराब रहता है, तो उसका सीधा असर आंखों पर पड़ेगा। इसलिए पूरे शरीर की एनर्जी को वापस लाया जाता है।
  • रूटीन सुधारना: जब तक आप फोन में घुसे रहना, धूप में बिना चश्मे के जाना और बेवक्त सोना नहीं छोड़ेंगे, कोई दवा काम नहीं करेगी। अपनी लाइफस्टाइल सुधारना सबसे ज़रूरी है।

इलाज में काम आने वाली आयुर्वेदिक औषधियाँ 

ये औषधियाँये बस ऊपर से लक्षण नहीं दबती बल्कि जड़ से ठीक करती है: 

  • त्रिफला: इसे आप शरीर का सबसे बेहतरीन 'क्लींजर' कह सकते हैं। यह पेट और शरीर की सारी गंदगी को बाहर का रास्ता दिखा देता है, जिससे आंखों की बहुत अच्छी सफाई हो जाती है।
  • आंवला: आंखों के लिए इससे बढ़िया कोई डाइट है ही नहीं। यह नज़र को तेज़ तो करता ही है, साथ ही आंखों को सूखने भी नहीं देता।
  • गुग्गुलु: शरीर में कहीं भी सूजन आ गई हो या वात-पित्त का बैलेंस बिगड़ गया हो, गुग्गुलु उसे बहुत तेज़ी से अपनी जगह पर वापस ले आता है।
  • ब्राह्मी: इसका मेन काम है दिमाग की गर्मी और टेंशन को सोखना। जब दिमाग ठंडा रहता है, तो आंखों की नसों को अपने आप तगड़ा आराम मिल जाता है।
  • शंखपुष्पी: यह दिमाग और आंखों के बीच का तालमेल सुधारती है। स्ट्रेस और बेचैनी दूर करने में इसका रिजल्ट बहुत शानदार है।

आंखों को सुकून देने वाली खास आयुर्वेदिक थेरेपी 

इन पुराने और आज़माए हुए देसी तरीकों का बस एक ही टारगेट है थकी-हारी आंखों को रिलैक्स करना और शरीर की रुकी हुई एनर्जी को दोबारा चालू करना:

  • नेत्र तर्पण: इसमें आंखों के चारों ओर उड़द की दाल का आटा लगाकर एक बाउंड्री बनाते हैं और फिर उसमें शुद्ध औषधीय देसी घी भर देते हैं। दिनभर मोबाइल या लैपटॉप घूरने से जो आंखें सूखकर बेजान हो जाती हैं, उन्हें इससे गज़ब की नमी और ठंडक मिलती है।
  • शिरोधारा: माथे के ठीक बीचों-बीच जब लगातार औषधीय तेल की धार गिरती है, तो ऐसा लगता है मानो दिमाग का सारा स्ट्रेस पानी के साथ बह गया हो। दिमाग के रिलैक्स होते ही आंखों की नसों पर पड़ा फालतू प्रेशर एकदम खत्म हो जाता है।
  • अभ्यंग (तेल मालिश): हल्के गुनगुने तेल से पूरे बदन की मालिश करने पर शरीर का सारा रूखापन और जकड़न खुल जाती है। इससे ब्लड सर्कुलेशन इतना तेज़ हो जाता है कि आंखों तक न्यूट्रिशन तुरंत और आसानी से पहुंचने लगता है।
  • स्वेदन (भाप से सिकाई): हल्की गर्माहट वाली भाप से शरीर का सारा भारीपन मिनटों में पिघल जाता है। इंसान खुद को एकदम हल्का फील करता है, जिसका सीधा असर आंखों के सुकून पर दिखता है।

सहायक आहार: क्या खाएं / क्या न खाएं

क्या खाएं

  • ताजा और हल्का भोजन
  • आंवला, घी और मौसमी फल
  • मूंग दाल और सुपाच्य आहार
  • हल्दी, सोंठ और त्रिकटु
  • गुनगुना पानी

क्या न खाएं

  • बहुत ज्यादा ठंडी चीजें
  • पैकेट बंद और प्रोसेस्ड फूड
  • ज्यादा तला हुआ भोजन
  • अनियमित खान-पान
  • देर रात खाना

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम रोहित सक्सेना है, मेरी उम्र 47 वर्ष है और मैं कानपुर से हूँ। साल 2010 में मुझे आँखों से जुड़ी समस्या शुरू हुई, जिसमें आँखों में रेडनेस, खुजली, ड्रायनेस और दर्द लगातार बना रहता था। मैंने कई डॉक्टरों को दिखाया और आँखों की जांच भी करवाई, लेकिन कोई गंभीर समस्या नहीं बताई गई। मुझे आई ड्रॉप्स दी गईं, जिससे थोड़ी देर आराम मिलता था, लेकिन कोई स्थायी राहत नहीं मिली। फिर मैंने टीवी पर जीवा आयुर्वेद का कार्यक्रम देखा और इसके बारे में जाना। इसके बाद मैंने जीवा आयुर्वेद में कंसल्ट किया। यहाँ डॉक्टरों ने मेरी पूरी स्थिति को समझकर मुझे आयुर्वेदिक उपचार, डाइट और लाइफस्टाइल से जुड़ी सलाह दी। धीरे-धीरे मेरी आँखों की समस्या में सुधार आने लगा और अब मुझे काफी राहत महसूस होती है।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

मोतियाबिंद हमेशा तुरंत गंभीर समस्या नहीं होता, लेकिन कुछ संकेतों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

  • जब नज़र लगातार धुंधली होने लगे
  • रात में देखने में काफी दिक्कत हो
  • चश्मे का नंबर बार-बार बदलने लगे
  • रोशनी के चारों ओर चमक या halos दिखें
  • पढ़ने और दैनिक कामों में परेशानी होने लगे
  • आंखों से जुड़ी कोई अन्य बीमारी हो
  • अचानक नज़र में तेजी से गिरावट आए

ऐसी स्थिति में आंखों के विशेषज्ञ से जांच कराना ज़रूरी होता है ताकि सही समय पर सही निर्णय लिया जा सके।

निष्कर्ष

मोतियाबिंद एक धीरे-धीरे बढ़ने वाली आंखों की समस्या है, जिसे आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों अलग-अलग तरीके से समझते हैं। आधुनिक चिकित्सा इसे मुख्य रूप से लेंस के धुंधलेपन और उम्र से जोड़ती है, जबकि आयुर्वेद इसे शरीर में वात और पित्त असंतुलन तथा जीवनशैली की गड़बड़ी से जुड़ा मानता है।

समय पर जांच, सही जीवनशैली, संतुलित आहार और डॉक्टर की सलाह से आंखों की सेहत को लंबे समय तक बेहतर बनाए रखा जा सकता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

मोतियाबिंद ज्यादातर उम्र बढ़ने के साथ देखा जाता है, लेकिन यह सिर्फ बुजुर्गों की समस्या नहीं है। गलत जीवनशैली, डायबिटीज़ और लंबे समय तक आंखों पर तनाव भी इसे जल्दी बढ़ा सकते हैं। इसलिए यह समस्या कम उम्र में भी देखने को मिल सकती है। समय रहते देखभाल करना बहुत ज़रूरी होता है।

हाँ, कई मामलों में मोतियाबिंद शुरुआत में केवल एक आंख में ही होता है। धीरे धीरे यह दूसरी आंख को भी प्रभावित कर सकता है। शुरुआत में फर्क कम महसूस होता है, इसलिए लोग इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। नियमित आंखों की जांच से इसे समय पर पहचाना जा सकता है।

चश्मा मोतियाबिंद को ठीक नहीं करता, लेकिन शुरुआती समय में देखने में थोड़ी मदद कर सकता है। यह केवल नज़र को सपोर्ट करता है, बीमारी को खत्म नहीं करता। जैसे जैसे स्थिति बढ़ती है, चश्मा भी कम असरदार हो जाता है। तब डॉक्टर अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं।

सीधा कारण नहीं माना जाता, लेकिन लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों पर तनाव बढ़ता है। इससे आंखें जल्दी थक सकती हैं और समस्याएं बढ़ने की संभावना रहती है। खासकर बिना ब्रेक के लगातार स्क्रीन देखना नुकसानदायक हो सकता है। आंखों को समय-समय पर आराम देना ज़रूरी है।

सर्जरी के बाद दोबारा मोतियाबिंद नहीं बनता, लेकिन कुछ मामलों में आंखों में हल्का धुंधलापन आ सकता है। इसे अलग स्थिति माना जाता है और इसका इलाज भी अलग होता है। इसलिए नियमित जांच ज़रूरी होती है। सही देखभाल से समस्या को नियंत्रित रखा जा सकता है।

लंबे समय तक तेज़ धूप या चमकदार रोशनी में रहने से आंखों पर असर पड़ सकता है। इससे आंखों में थकान और संवेदनशीलता बढ़ सकती है। बाहर जाते समय आंखों की सुरक्षा करना ज़रूरी माना जाता है। यह आदत आंखों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करती है।

आमतौर पर मोतियाबिंद में दर्द नहीं होता। यह धीरे धीरे नज़र को धुंधला करता है बिना किसी तेज़ दर्द के। इसी वजह से लोग इसे शुरुआती समय में गंभीरता से नहीं लेते। जब नज़र काफी कमज़ोर हो जाती है तब समस्या समझ में आती है।

 हाँ, डायबिटीज़ वाले लोगों में मोतियाबिंद जल्दी और तेजी से बढ़ सकता है। ब्लड शुगर का असंतुलन आंखों के लेंस को प्रभावित करता है। इसलिए ऐसे मरीजों को नियमित जांच करानी चाहिए। शुगर नियंत्रण में रखना बहुत ज़रूरी होता है।

धूम्रपान शरीर में टॉक्सिन बढ़ाता है, जो आंखों की सेहत को प्रभावित कर सकता है। इससे आंखों की उम्र जल्दी बढ़ने लगती है। लंबे समय तक यह आदत मोतियाबिंद के जोखिम को बढ़ा सकती है। इसलिए इसे आंखों के लिए हानिकारक माना जाता है।

पूरी तरह रोकना हमेशा संभव नहीं होता, खासकर उम्र बढ़ने के साथ। लेकिन सही जीवनशैली और आंखों की देखभाल से इसे देर से आने में मदद मिल सकती है। संतुलित आहार और नियमित जांच बहुत उपयोगी होती है। इससे आंखों की सेहत लंबे समय तक बेहतर रखी जा सकती है।

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