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दवा और इनहेलर के बावजूद सॉंस फूलना क्यों नहीं रुकता?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अस्थमा और सॉंस की बीमारियों से जूझ रहे बहुत से लोगों की सबसे बड़ी शिकायत यही होती है कि वे बरसों से इनहेलर और दवाइयाँ ले रहे हैं, फिर भी उनकी सॉंस फूलना बंद नहीं होती। दरअसल, इनहेलर केवल उस वक़्त के लिए सॉंस की नलियों को चौड़ा करता है, लेकिन वह उस जड़ पर काम नहीं करता जिसकी वजह से फेफड़ों में सूजन या कफ बार-बार बन रहा है। समय पर सही और जड़ से इलाज करना इसलिएबेहद ज़रूरी है क्योंकि केवल लक्षणों को दबाने से फेफड़े धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगते हैं और व्यक्ति पूरी तरह दवाओं पर निर्भर हो जाता है। आयुर्वेद हमें बताता है कि जब तक शरीर के भीतर जमा 'विषाक्त तत्व' साफ़ नहीं होंगे, तब तक सॉंसों की आज़ादी मुमकिन नहीं है।

बार-बार होने वाली सॉंस की तक़लीफ़ क्या है?

इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो, हमारे शरीर में फेफड़े वह पंप हैं जो ऑक्सीजन को खून तक पहुँचाते हैं। जब इन फेफड़ों की नलियों में धूल, प्रदूषण या गलत खान-पान की वजह से कचरा कफ जमा हो जाता है, तो शरीर को ऑक्सीजन खींचने के लिए बहुतज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। यही मेहनत 'सॉंस फूलने' के रूप में दिखाई देती है। दवा और इनहेलर उस कचरे को साफ़ नहीं करते, वे बस अस्थायी रूप से रास्ते को थोड़ा फैला देते हैं, जिससे कुछ वक़्त के लिए राहत महसूस होती है।

श्वसन रोगों के विभिन्न प्रकार और अवस्थाएं

सॉंस फूलने की समस्या को उसकी प्रकृति के आधार पर इन पाँच श्रेणियों में समझा जा सकता है

क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस इसमें सॉंस की नलियों में लंबेवक़्त तक सूजन बनी रहती है और लगातार कफ आता है।

एलर्जिक अस्थमा धूल, मिट्टी या जानवरों की रूसी के संपर्क में आते ही सॉंस का बुरी तरह उखड़ जाना।

इन्फिसीमा Emphysema फेफड़ों की वायु थैलियों का खराब हो जाना, जिससे गहरी सॉंस लेनामुश्किल हो जाता है।

सीओपीडी COPD यह फेफड़ों की एक गंभीर स्थिति है जिसमें हवा का प्रवाह पूरी तरह बाधित होने लगता है।

हृदय-जन्य सॉंस फूलना कभी-कभी फेफड़े नहीं, बल्कि दिल की कमज़ोरी की वजह से भी सॉंस फूलने लगती है।

शरीर में दिखने वाले मुख्य लक्षण

लगातार घरघराहट सॉंस लेते समय छाती से सीटी जैसी साफ़ आवाज़ आना।

छाती में भारीपन ऐसा अहसास होना जैसे सीने पर कोई पत्थर रखा हो या छाती जकड़ गई हो।

थोड़ा चलने पर थकान महज़ 10-12 कदम चलने या सीढ़ियाँ चढ़ने पर ही ज़ोर-ज़ोर से सॉंस लेना।

रात में खाँसी  का बढ़ना सोते समय अचानक खाँसी  का दौरा पड़ना जिससे साँस लेना मुश्किल हो जाए।

बोलने में मशक़्क़त बात करते समय बीच-बीच में रुककर साँस लेने की ज़रूरत महसूस होना।

दवा के बावजूद समस्या बढ़ने के मुख्य कारण

जड़ का इलाज न होना दवाइयाँ केवल लक्षणों पर काम करती हैं, फेफड़ों की संवेदनशीलता को कम नहीं करतीं।

कमज़ोर पाचन अग्नि आयुर्वेद के अनुसार, पेट की खराबी से 'आम' टॉक्सिन्स बनता है, जो फेफड़ों के मार्ग कोअवरुद्ध कर देता है।

बढ़ता वायु प्रदूषण हवा में मौजूद ज़हरीले कण इनहेलर के असर को कम कर देते हैं और सूजन को बढ़ाते हैं।

इम्युनिटी का गिरना बार-बार एंटी-बायोटिक्स लेने से शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो जाती है।

गलत आहार बहुत ज़्यादा ठंडी और कफ बढ़ाने वाली चीज़ों का सेवन दवाओं के असर को खत्म कर देता है।

जोखिम बढ़ाने वाले कारण और जटिलताएं

जोखिम बढ़ाने वाले 5 प्रमुख कारण

धूम्रपान एक्टिव या पैसिव स्मोकिंग फेफड़ों की नसों को हमेशा के लिए नुकसान पहुँचाती है।

मोटापा पेट की चर्बी फेफड़ों पर दबाव डालती है, जिससे उन्हें फैलने की जगह नहीं मिलती।

पुरानी एलर्जी जिन लोगों को बचपन से ही जुकाम या साइनस की समस्या रही हो।

प्रदूषित कार्यक्षेत्र कारखानों या धूल भरी जगहों पर काम करना जहाँ सुरक्षा के इंतज़ाम न हों।

मानसिक तनाव बहुत ज़्यादा चिंता फेफड़ों की मांसपेशियों में खिंचाव पैदा करती है।

होने वाली 5 गंभीर जटिलताएं

फेफड़ों का फेल होना यदि सूजन का इलाज न किया जाए, तो फेफड़े ऑक्सीजन सोखने की क्षमता खो देते हैं।

दिल की बीमारियाँ ऑक्सीजन की कमी को पूरा करने के लिए दिल को बहुतज़्यादा काम करना पड़ता है, जिससे वह थक जाता है।

चिंता सॉंस न आने का डर व्यक्ति को मानसिक रूप से कमज़ोर बना देता है।

नींद के विकार रात भर सॉंस की तक़लीफ़ होने से गहरी नींद नहीं आती, जो सेहत के लिएख़तरा है।

दवाओं की निर्भरता शरीर इस कदर दवाओं का आदी हो जाता है कि उनके बिना सामान्य काम करना भी मुश्किल हो जाता है।

बीमारी की गहराई को मापने वाली जाँच

पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट यह फेफड़ों की हवा रोकने और छोड़ने की पूरी क्षमता कीजाँच करता है।

चेस्ट एक्स-रे और सीटी स्कैन फेफड़ों की संरचना और उनमें मौजूद किसी भी रुकावट या इन्फेक्शन को देखने के लिए।

ऑक्सीजन सैचुरेशन SPO2 खून में ऑक्सीजन की मात्रा कितनी है, इसे मापने के लिए।

एलर्जी पैनल टेस्ट उन विशिष्ट चीज़ों की पहचान करने के लिए जिनसे आपकी सॉंस फूलती है।

नाड़ी और कोष्ठ परीक्षण आयुर्वेदिक डॉक्टर यह देखते हैं कि शरीर में वात और कफ का असंतुलन कितना गहरा है।

आयुर्वेद की दृष्टि वात-कफ का मार्ग और 'तमक श्वास'

आयुर्वेद में सॉंस की बीमारियों विशेषकर अस्थमा जिसे 'तमक श्वास' कहा जाता है को केवल फेफड़ों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शरीर के असंतुलन के रूप में देखा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार इसके पीछे की मुख्य समझ इस प्रकार है

वात और कफ का घातक मेल

आयुर्वेद के अनुसार, अस्थमा मुख्य रूप से वात वायु और कफ बलगम दोषों के बिगड़ने से होता है।

जब शरीर में कफ दोष बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है, तो वह सांस की नलियों प्राण वह स्रोत में जमा होकर उन्हें अवरुद्ध Block कर देता है।

जब रास्ता रुक जाता है, तो प्राण वायु वात का प्रवाह भटक जाता है। वह हवा बाहर निकलने की कोशिश करती है, जिससे मरीज़ को सांस लेने में मशक़्क़त करनी पड़ती है और सीने से घरघराहट की आवाज़ आती है।

पेट और फेफड़ों का गहरा संबंध

एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात जो आयुर्वेद समझाता है, वह यह है कि श्वास रोग की जड़ पेट आमाशय में होती है।" जब आपकी पाचन अग्नि Metabolism कमज़ोर होती है, तो भोजन सही से नहीं पचता और शरीर में 'आम' टॉक्सिन्स बनने लगते हैं।

यही 'आम' कफ का रूप लेकर फेफड़ों में जाकर जमा हो जाता है। इसलिए, जब तक आपका पाचन ठीक नहीं होगा, फेफड़ों में बलगम बनता रहेगा।

स्रोतों में अवरोध Blockage in Channels

आयुर्वेद शरीर के सूक्ष्म मार्गों को 'स्रोत' कहता है। अस्थमा में 'प्राण वह स्रोत' Respiratory channels और 'अन्न वह स्रोत' Digestive channels दोनों ही विषाक्त पदार्थों से भर जाते हैं। इलाज का मुख्य उद्देश्य इन रास्तों को 

दोबारा साफ़ करना और खोलना होता है।

ओजस प्रतिरोधक क्षमता की कमी

आयुर्वेद मानता है कि लंबे वक़्त तक बीमारी रहने से शरीर का 'ओजस' सबसे शुद्ध ऊर्जा कम हो जाता है। यही कारण है कि अस्थमा के मरीज़ों को धूल, धुएं या ठंडी हवा से तुरंत एलर्जी हो जाती है, क्योंकि उनका रक्षा तंत्र उन्हें बचाने के काबिल नहीं रहता।

क्या खाएं और क्या न खाएं सही पोषण

क्या खाएं

पुराना अनाज पुराना गेहूं या चावल जो हल्का और सुपाच्य हो।

गर्म तासीर वाली चीज़ें सोंठ, लहसुन और काली मिर्च जो कफ को सुखाती हैं।

गुनगुना पानी पूरे दिन घूँट-घूँट कर गुनगुना पानी पीना फेफड़ों के लिए फ़ायदा पहुँचाता है।

क्या न खाएं

ठंडा और कच्चा भोजन फ्रिज का पानी, सलाद और ठंडी तासीर वाले फल जैसे केला या संतरा।

भारी डेयरी उत्पाद दही, चीज़ और बहुत ज़्यादा दूध कफ को बढ़ाकर सॉंस की तक़लीफ़ पैदा करते हैं।

फर्मेंटेड और जंक फूड ब्रेड, पिज्जा और बासी खाना पाचन बिगाड़कर 'आम' बनाते हैं।

मरीज़ो का अनुभव 

मैं मोनिका दीक्षित हूँ और मुझे अस्थमा की गंभीर समस्या थी। मैंने इसके लिए कई एलोपैथिक डॉक्टरों को दिखाया और बहुत से अस्पतालों के चक्कर काटे। डॉक्टरों ने मुझे नेबुलाइजर और नेजल स्प्रे का उपयोग करने की सलाह दी थी। लेकिन इन सबके बावजूद मेरी परेशानी कम नहीं हुई, बल्कि दिन-ब-दिन बढ़ती ही गई।

उसके बाद मैंने टीवी पर डॉक्टर प्रताप चौहान का शो देखा और जीवा क्लीनिक आई। पिछले 3 सालों से मैं यहाँ अपना इलाज करा रही हूँ और आज स्थिति यह है कि मेरा नेबुलाइजर और नेजल स्प्रे दोनों छूट गए हैं। मुझे अपनी समस्या में 80% तक राहत मिली है और मेरी दवाइयां भी अब धीरे-धीरे कम हो रही हैं। इसके लिए मैं जीवा आयुर्वेद का बहुत धन्यवाद करना चाहती हूँ।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

विशेषता आधुनिक इलाज  आयुर्वेदिक इलाज
तरीका मुख्य रूप से इनहेलर्स और ब्रोंकोडायलेटर्स का उपयोग, जो तुरंत राहत देते हैं। यह शरीर की इम्युनिटी बढ़ाकर और दोषों को संतुलित कर जड़ से इलाज करने पर ज़ोर देता है।
नतीजे असर तेज़ होता है, लेकिन यह केवल लक्षणों को दबाता है; बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं होती। यह फेफड़ों को भीतर से मज़बूत बनाता है, जिससे इनहेलर्स पर निर्भरता कम होने में मदद मिलती है।
दृष्टिकोण यह बीमारी को मैनेज करने पर ध्यान देता है। यह शरीर को 'होलिस्टिक हीलिंग' के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य प्रदान करने पर ज़ोर देता है।

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?

  •  यदि इनहेलर लेने के 15-20 मिनट बाद भी सॉंस की तक़लीफ़ कम न हो रही हो।
  •  यदि नाखूनों या होठों का रंग ऑक्सीजन की कमी से नीला पड़ने लगे।
  •  यदि सॉंस लेते समय छाती के नीचे की हड्डियाँ Ribs अंदर की ओर धंस रही हों।
  •  यदि बिना किसी मेहनत के, केवल बैठे रहने पर भी सॉंस तेज़ी से फूल रही हो।
  •  यदि खाँसी  के साथ खून या बहुत गाढ़ा दुर्गंधयुक्त बलगम आए।

निष्कर्ष

दवा और इनहेलर के बावजूद सॉंस का फूलना एक चेतावनी है कि आपका शरीर भीतर से कमज़ोर हो चुका है। केवल लक्षणों को दबाना समाधान नहीं है। आयुर्वेद काहोलीस्टिक हीलिंग नज़रिया आपको न केवल सॉंस की तक़लीफ़ से मुक्ति दिलाता है, बल्कि आपकी पूरीज़िंदगी में नई ऊर्जा भर देता है। अपनीप्रकृति को समझें, सही खान-पान अपनाएं और आज ही अपनी सॉंसों को सुरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ाएं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेदिक उपचार और अनुशासन से अस्थमा के लक्षणों को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है और इनहेलर्स से छुटकारा मिल सकता है।

हाँ, 'अनुलोम-विलोम' और 'भ्रामरी' प्राणायाम फेफड़ों की ताक़त बढ़ाने के लिए बेहतरीन हैं।

हाँ, जानवरों के बाल और रूसी (Dander) कुछ लोगों के लिए ट्रिगर का काम करते हैं।

कुछ बच्चों में इम्युनिटी बढ़ने पर सुधार होता है, लेकिन सही आयुर्वेदिक देखभाल इसे जल्दी ठीक कर सकती है।

हाँ, लेकिन डॉक्टर की सलाह पर हल्के व्यायाम और योग करना बेहतर है।

हाँ, यह मिश्रण कफ को काटने और इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करता है।

   हाँ, मास्क ठंडी हवा को सीधे फेफड़ों में जाने से रोकता है, जो ट्रिगर से बचाता है।

बिल्कुल, पेट की गैस और एसिड ऊपर की ओर दबाव डालकर सॉँस की तक़लीफ़ बढ़ा सकते हैं।

एलोपैथिक इनहेलर्स पर निर्भरता बढ़ सकती है, इसलिए आयुर्वेद के साथ उनकी ज़रूरत कम करने का प्रयास करें।

जीवा आपको व्यक्तिगत डाइट प्लान और विशेष पंचकर्म थेरेपी देता है जो फेफड़ों को जड़ से साफ़ करती हैं।

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