आजकल वेलनेस की दुनिया में माइंडफुल ईटिंग काफी पॉपुलर हो रहा है सोशल मीडिया पर लोग का इसके फायदों पर चर्चा कर रहे हैं न्यूट्रिशन खाना धीरे-धीरे खाने की सलाह देते हैं और वेलनेस एक्सपोर्ट कहते हैं कि मतलब टाइम्स प्रति लेना चाहिए और फोन साइड में रखना चाहिए|
लेकिन अगर हम अपने यूट्यूब को देखें तो क्या हम सच में ध्यान से खाना खाते हैं?कभी लैपटॉप पर काम करते हुए लंच फिनिश कर लेते हैं कभी फोन स्क्रॉल करते हुए पता ही नहीं चलता कितना खा लिया और कभी इतनी जल्दी होती है कि सिर्फ करने का टाइम ठीक से एन्जॉय करो नहीं मिलता|
ऐसे में माइंडफुल ईटिंग एक मॉडर्न वेलनेस और लग सकता है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इसका कोर आइडिया आयुर्वेदिक कि पारंपरिक आहार पद्धतियों में भी मिलता है पर बस इतना है कि ऐसी माइंडफुलनेस और खाने के व्यवहार के साथ नजरिया समझ जरूरी है और आयुर्वेद का इसके पीछे का कारण जनना भी जरूरी है और पाचन स्वास्थ्य से जुड़कर देखता है |
माइंडफुल रीडिंग असल में क्या है?
सरल शब्दों में माइंडफुल ईटिंग का मतलब है खाना खाते वक्त प्रेजेंट रहना और अपना ईटिंग एक्सपीरियंस प्रति ध्यान देना |
इसमें मतलब धीरे-धीरे खाना नहीं है, इसमें खाने का टेस्ट, बनावट और मिल दौरन, अपनी भूख पूरी होने की वजह से नोटिस करना भी शामिल होता है।
उदाहरण के लिए, जब आप बिना अपना फोन देखे लंच करते हों तो आपके खाने का टेस्ट पैटर्न नोटिस हो सकता है, आप यह भी समझ पाते हैं कि आपकी किताब अभी मिट्टी है या आप आरामदायक महसूस कर रहे हैं।
माइंडफुल ईटिंग का मतलब अपने पसंदीदा भोजन से बचना नहीं होता, कैलोरी गिनती में ध्यान रखना भी नहीं होता, हर काट को पूरी तरह से अनुभव करना भी नहीं होता। यह भोजन के साथ एक अधिक आरामदायक और जागरूक संबंध बनाने में मदद करता है।
माइंडफुल ईटिंग इतनी पावरफुल क्यों बन गई है?
आधुनिक स्टाइल में हम अक्सर मल्टीटास्किंग को एक्टिविटी समझते हैं, वर्क कॉल्स के बीच लॉन्च करना, क्लास के टाइम स्नैक्स खाना या रियूनियन्स की बोलती करते हुए डिनर खत्म करना नार्मल लग गया है |
ऐसा होता है कि जब ध्यान बार-बार बंटता है तो हम अपने माइंडफुल ईटिंग के अनुभव पर कम ध्यान दे पाते हैं |
बार बार डिवाइड होता है तो हम अपने खाने की आदत और अनुभव पर कम ध्यान दे पाते हैं |
मन बोलने की आदत इसी आदत को बदलने की कोशिश करती है, इसका ध्यान ज़्यादा जटिल डाइट या सख्त खाने पर नहीं रहता, बल्कि रोज़मर्रा की खाने की आदतों पर रहता है।
इस पार्टिकल का फायदा ये है कि आपको अपने मज़े के लिए एक्स्ट्रा इंग्रेडिएंट्स या महंगे मटीरियल्स लगाने की ज़रूरत नहीं है, आप अपनी मौजूदा खाने की रूटीन में भी छोटे छोटे बदलाव कर सकते हो।
आयुर्वेद ध्यानपूर्वक पढ़ने के बारे में क्या कहता है?
आयुर्वेद में सिर्फ बॉडी को एनर्जी देने का सोच नहीं माना गया है। ट्रेडिशनल आयुर्वेदिक प्रिंसिपल्स में फूड की क्वालिटी, क्वांटिटी, टाइमिंग और उसे कंज्यूम करने के तरीकों को भी इम्पॉर्टेंस दी गई है। इस कॉन्टेक्स्ट में एक इम्पॉर्टेंट कॉन्सेप्ट है आहार विदा विधाना, जिसका मतलब है फूड कंज्यूम करने से जुड़े ट्रेडिशनल गाइडलाइंस। चारक संहिता में ऐसे प्रैक्टिसेस डिस्क्राइब किए गए हैं जो खाने के तरीके पर फोकस करते हैं। इनमें अप्रोप्रियेट क्वांटिटी शामिल है।
लेकिन ये नहीं है कि मॉडर्न माइंडफुलनेस रिसर्च और आयुर्वेद के सारे कॉन्सेप्ट्स बिल्कुल एक जैसे हैं, दोनों की फ्रेमवर्क अलग हैं और ट्रेडिशनल हेल्थ क्लेम्स को साइंटिफिक सबूत के आधार पर एवैल्युएट करना जरूरी है।
खाने और जागरूकता के बीच का संबंध
क्या आप महसूस कर रहे हैं कि अग्नि को पंजीकृत आग के रूप में वर्णित किया जाता है? पारंपरिक समझ के अनुसार पाचन और भोजन को प्रोसेस करने की क्षमता समग्र स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आयुर्वेद में भोजन की मात्रा, भूख और पिछले भोजन जैसे कारकों पर ध्यान देना भी जरूरी कहा गया है।
न्यूट्रिशन केवल खाने की आदतों को सिर्फ खाने के चयन तक सीमित नहीं रखता, खाने की गति, खाने का माहौल, भूख को शांत करना और खाने के साथ जुड़े अन्य कारक भी इसका असर डालते हैं।
उदाहरण के लिए, अगर आप बिजी हैं और अपने नियमित भोजन को स्किप करते हैं, आप अपने खाने को अनियमित समय पर ले रहे हैं और जब आपको समय मिलता है तो आप टीवी या लैपटॉप के सामने जल्दी-जल्दी खाना खाने की कोशिश करते हैं।
उदाहरण के लिए, अगर आप बिजी हैं और अपने नियमित भोजन को स्किप करते हैं, आप अपने खाने को अनियमित समय पर ले रहे हैं और जब आपको समय मिलता है तो आप टीवी या लैपटॉप के सामने जल्दी-जल्दी खाना खाने की कोशिश करते हैं।
आप रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सजग खाने की प्रैक्टिस कैसे कर सकते हैं?
- कम से कम एक खाने के दौरान नोटिफिकेशन से बचने की कोशिश करें।
- नोटिस करें, स्वाद, गंध और बनावट पर ध्यान दें
- गहराई से खाइए, इतनी जल्दी मत खाइए कि भोजन का आनंद लेने का समय भी न मिले
- माइंडफुल ईटिंग के लिए फ्री अप्रोच रखें। अपने पसंदीदा खाने का मतलब यह नहीं है कि खुद को रोकें और हमेशा परफेक्ट बनने की कोशिश न करें।
निष्कर्ष
मार्केटिंग आज वेलनेस ट्रेंड के रूप में पॉपुलर हो रहा है लेकिन इसके पीछे कुछ आइडियाज आयुर्वेद के ट्रेडिशनल डाइटरी प्रैक्टिसेज़ से भी आते हैं। आयुर्वेद फूड की क्वांटिटी, पेट की भूख और मील के टाइम पर ध्यान देने की इम्पॉर्टेंस देता है। मॉडर्न न्यूट्रिशन और माइंडफुल बेसिस की अप्रोचेस में ईटिंग बिहेवियर या हंगर-फुलनेस को नोटिस करने का एक्सप्लोर कर सकते हैं।
दोनों अपनी चीज़ें समझना नहीं होगा लेकिन एक सामान्य प्रैक्टिस है जो बहुत ज़रूरी है, सिर्फ यह कि क्या खा रहे हैं नहीं, कैसे खा रहे हैं यह भी मायने रखता है। कभी-कभी हेली एप्पल से शुरुआत नए फूड ट्रेंड से नहीं बल्कि अपनी प्रायः रूटीन को थोड़ा ज्यादा सचेत रूप से फॉलो करने से होती है।













