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अस्थमा के मरीजों में इम्युनिटी कमजोर क्यों होती है? क्या यह शरीर की गहरी असंतुलन स्थिति है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अस्थमा केवल फेफड़ों की बीमारी नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि आपके शरीर का रक्षा तंत्र बाहरी तत्वों के प्रति ज़रूरत से ज़्यादा संवेदनशील हो गया है। जब हमारी सॉँस लेने वाली नलियों में सूजन आ जाती है, तो शरीर की पूरी ऊर्जा उस सूजन से लड़ने में लग जाती है, जिससे व्यक्ति की सामान्य प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होने लगती है। समय पर इसका इलाज करना इसलिए बेहद ज़रूरी है क्योंकि बार-बार होने वाले अस्थमा के हमले फेफड़ों की कार्यक्षमता को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकते हैं, जिससे सामान्य ज़िंदगी जीना मुश्किल हो जाता है।

अस्थमा या दमा क्या होता है?

इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो, हमारे फेफड़ों तक हवा पहुँचाने वाली नलियाँ बहुत कोमल होती हैं। अस्थमा की स्थिति में, ये नलियाँ किसी एलर्जी या ठंडी हवा के संपर्क में आते ही सिकुड़ जाती हैं और उनके भीतर बलगम जमा होने लगता है। इसके कारण हवा के आने-जाने का रास्ता संकरा हो जाता है, जिससे मरीज़ को सॉँस लेने में बहुत ज़्यादा मशक़्क़त करनी पड़ती है। सरल शब्दों में, यह आपके श्वसन मार्ग में होने वाली एक 'अति-संवेदनशीलता' है।

अस्थमा के विभिन्न प्रकार और चरण

अस्थमा को उसके लक्षणों और ट्रिगर्स के आधार पर इन पाँच श्रेणियों में समझा जा सकता है

एलर्जिक अस्थमा यह धूल, मिट्टी, परागकणों या पालतू जानवरों के बालों से होने वाली एलर्जी के कारण होता है।

नॉन-एलर्जिक अस्थमा यह अत्यधिक ठंड, तनाव, धुआं या वायरल संक्रमण की वजह से भड़कता है।

व्यायाम-प्रेरित अस्थमा शारीरिक मेहनत या दौड़-भाग करने के दौरान सॉँस का फूलना।

व्यावसायिक अस्थमा कारखानों में काम करने वाले लोगों को केमिकल या धूल के लगातार संपर्क में रहने से होने वाला दमा।

रात का अस्थमा Nocturnal Asthma इसमें लक्षण रात के वक़्त या सुबह जल्दी ज़्यादा गंभीर हो जाते हैं।

शरीर में दिखने वाले मुख्य लक्षण

सॉँस फूलना मामूली चलने या बात करने पर भी सॉँस का तेज़ी से उखड़ना।

घरघराहट की आवाज़ सॉँस लेते या छोड़ते समय छाती से सीटी जैसी आवाज़ आना।

छाती में जकड़न ऐसा महसूस होना जैसे किसी ने सीने को ज़ोर से जकड़ लिया हो।

लगातार खाँसी विशेष रूप से रात में या ठंडी हवा के संपर्क में आने पर सूखी या बलगम वाली खाँसी होना।

सोने में दिक़्क़त सॉँस की तक़लीफ़ के कारण नींद बार-बार टूटना और थकान महसूस होना।

 अस्थमा होने के मुख्य कारण

अनुवांशिक कारण यदि परिवार में माता-पिता को अस्थमा है, तो बच्चों में इसका ख़तरा बढ़ जाता है।

वायु प्रदूषण धुआं, धूल और रासायनिक गैसें सॉँस की नलियों में पुरानी सूजन पैदा करती हैं।

कमज़ोर पाचन आयुर्वेद के अनुसार, पेट में बनने वाला 'आम' Toxins जब फेफड़ों में जमा होता है, तो अस्थमा पैदा करता है।

बदलते मौसम का प्रभाव सर्दी और उमस भरा मौसम कफ दोष को बढ़ाता है, जो सॉँस मार्ग को अवरुद्ध करता है।

मानसिक तनाव बहुत ज़्यादा चिंता और घबराहट श्वसन दर को बिगाड़ देती है, जिससे अस्थमा का हमला हो सकता है।

जोखिम बढ़ाने वाले कारण और जटिलताएं

खाँसी जोखिम बढ़ाने वाले 5 प्रमुख कारण

मोटापा अधिक वज़न फेफड़ों पर दबाव डालता है और शरीर में सूजन बढ़ाता है।

धूम्रपान एक्टिव या पैसिव स्मोकिंग सॉँस की नलियों को बुरी तरह नुकसान पहुँचाती है।

एलर्जी का इतिहास जिन लोगों को स्किन एलर्जी या साइनस की समस्या है।

केमिकल एक्सपोज़र हेयरड्रेसर, किसान या पेंटर्स जो रसायनों के बीच रहते हैं।

कमज़ोर इम्युनिटी बार-बार सर्दी-जुकाम होने से श्वसन तंत्र कमज़ोर हो जाता है।

खाँसी होने वाली 5 गंभीर जटिलताएं

फेफड़ों की स्थायी क्षति बार-बार सूजन आने से नलियाँ हमेशा के लिए संकरी हो सकती हैं।

नींद की कमी रात भर खाँसी और सॉँस की तक़लीफ़ से मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ सकता है।

दवाओं के दुष्प्रभाव लंबे समय तक इनहेलर्स या स्टेरॉयड्स लेने से शरीर की अन्य प्रणालियाँ प्रभावित हो सकती हैं।

निमोनिया का ख़तरा अस्थमा के मरीज़ों में फेफड़ों का संक्रमण होने की संभावना ज़्यादा होती है।

दैनिक कार्यों में बाधा सीढ़ियाँ चढ़ना या सामान्य पैदल चलना भी मुश्किल हो सकता है।

अस्थमा की जाँच कैसे की जाती है?

स्पाइरोमेट्री यह फेफड़ों की क्षमता मापने का सबसे मुख्य टेस्ट है कि आप कितनी हवा बाहर छोड़ सकते हैं।

पीक फ्लो टेस्ट यह एक छोटा उपकरण है जो बताता है कि आपके फेफड़े कितनी तेज़ी से हवा बाहर निकाल रहे हैं।

एलर्जी स्किन टेस्ट यह पता लगाने के लिए कि किन बाहरी चीज़ों से आपको अस्थमा का हमला होता है।

चेस्ट एक्स-रे फेफड़ों के भीतर किसी अन्य संक्रमण या असामान्यता को देखने के लिए।

नाइट्रिक ऑक्साइड टेस्ट यह सॉँस की नलियों में मौजूद सूजन के स्तर को मापने के लिए किया जाता है।

आयुर्वेद में अस्थमा 'तमक श्वास' और दोषों का असंतुलन

आयुर्वेद में अस्थमा को 'तमक श्वास' कहा जाता है। यह शरीर की एक गहरी असंतुलन स्थिति है

वात और कफ का मेल आयुर्वेद मानता है कि जब बढ़ा हुआ 'कफ' श्वसन मार्ग को रोक देता है, तो 'वात' वायु का रास्ता भटक जाता है। यह भटका हुआ वात सॉँस लेने में दिक़्क़त पैदा करता है।

पाचन और ओजस अस्थमा के मरीज़ों में 'अग्नि' पाचन शक्ति मंद होती है, जिससे 'आम' विषाक्त तत्व बनते हैं। ये तत्व ओजस Immunity को कमज़ोर कर देते हैं, जिससे शरीर एलर्जी से लड़ नहीं पाता।

जड़ से कारण आयुर्वेद केवल फेफड़ों का नहीं, बल्कि पेट का भी इलाज करता है क्योंकि फेफड़ों की गंदगी का मूल कारण अक्सर खराब पाचन होता है।

काम आने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

वसाका अडूसा यह जड़ी-बूटी श्वसन मार्ग को चौड़ा करने और कफ को बाहर निकालने में बहुत फ़ायदा पहुँचाती है।

कंटकारी यह फेफड़ों की जकड़न को खत्म करने और पुरानी खाँसी को दूर करने के लिए बेहतरीन है।

हरिद्रा हल्दी इसमें मौजूद करक्यूमिन प्राकृतिक रूप से सूजन को कम करता है और इम्युनिटी बढ़ाता है।

यष्टिमधु मुलेठी यह गले की खराश और सॉँस की नलियों की जलन को शांत करती है।

क्या खाएं और क्या न खाएं

खाँसी क्या खाएं

  • गर्म और ताज़ा भोजन हमेशा गुनगुना खाना खाएं जिससे कफ न बने।
  • अदरक और तुलसी इनका काढ़ा या चाय फेफड़ों की इम्युनिटी के लिए बेहद ज़रूरी है।
  •  चावल और मूंग दाल ये पचाने में हल्के होते हैं और शरीर में गंदगी जमा नहीं होने देते।

खाँसी क्या न खाएं

  • ठंडी चीज़ें आइसक्रीम, ठंडे पेय और फ्रिज का पानी कफ को तुरंत भड़काते हैं।
  • भारी और तली-भुनी चीज़ें चीज़, पनीर और ज़्यादा तेल वाला खाना पाचन बिगाड़कर अस्थमा बढ़ाता है।
  • दही और केला आयुर्वेद के अनुसार रात के वक़्त इनका सेवन कफ को बढ़ाकर सॉँस की तक़लीफ़ दे सकता है।

इलाज से क्या फ़ायदा मिल सकता है?

जीवा आयुर्वेद के उपचार से आप इन 5 मुख्य फायदों की उम्मीद रख सकते हैं

जड़ से समाधान यह बीमारी के लक्षणों को छिपाने के बजाय उस कारण को खत्म करता है जिससे बीमारी शुरू हुई थी।

प्रतिरोधक क्षमता Immunity में सुधार आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ आपके शरीर के रक्षा तंत्र को इतना मज़बूत बना देती हैं कि आप बार-बार बीमार नहीं पड़ते।

दुष्प्रभावों से सुरक्षा चूँकि दवाइयाँ पूरी तरह प्राकृतिक और आपकी प्रकृति के अनुसार होती हैं, इसलिए शरीर के अन्य अंगों पर कोई नुकसानदेह असर नहीं होता।

ऊर्जा और ताज़गी शरीर से विषाक्त तत्व Toxins बाहर निकलने के कारण आप पहले से ज़्यादा सक्रिय और ऊर्जावान महसूस करते हैं।

मानसिक शांति वात-पित्त के संतुलित होने से नींद बेहतर आती है और तनाव व चिड़चिड़ापन कम होता है, जिससे ज़िंदगी की गुणवत्ता सुधरती है।

मरीज़ो का अनुभव 

मैं मोनिका दीक्षित हूँ और मुझे अस्थमा की गंभीर समस्या थी। मैंने इसके लिए कई एलोपैथिक डॉक्टरों को दिखाया और बहुत से अस्पतालों के चक्कर काटे। डॉक्टरों ने मुझे नेबुलाइजर और नेजल स्प्रे का उपयोग करने की सलाह दी थी। लेकिन इन सबके बावजूद मेरी परेशानी कम नहीं हुई, बल्कि दिन-ब-दिन बढ़ती ही गई।

उसके बाद मैंने टीवी पर डॉक्टर प्रताप चौहान का शो देखा और जीवा क्लीनिक आई। पिछले 3 सालों से मैं यहाँ अपना इलाज करा रही हूँ और आज स्थिति यह है कि मेरा नेबुलाइजर और नेजल स्प्रे दोनों छूट गए हैं। मुझे अपनी समस्या में 80% तक राहत मिली है और मेरी दवाइयां भी अब धीरे-धीरे कम हो रही हैं। इसके लिए मैं जीवा आयुर्वेद का बहुत धन्यवाद करना चाहती हूँ।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

विशेषता आधुनिक इलाज  आयुर्वेदिक इलाज 
तरीका मुख्य रूप से इनहेलर्स और ब्रोंकोडायलेटर्स का उपयोग, जो तुरंत राहत देते हैं। यह शरीर की इम्युनिटी बढ़ाकर और दोषों को संतुलित कर जड़ से इलाज करने पर ज़ोर देता है।
नतीजे असर तेज़ होता है, लेकिन यह केवल लक्षणों को दबाता है; बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं होती। यह फेफड़ों को भीतर से मज़बूत बनाता है, जिससे इनहेलर्स पर निर्भरता कम होने में मदद मिलती है।
दृष्टिकोण यह बीमारी को मैनेज करने पर ध्यान देता है। यह शरीर को 'होलिस्टिक हीलिंग' के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य प्रदान करने पर ज़ोर देता है।

 डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?

  •   यदि इनहेलर लेने के बाद भी सॉँस की तक़लीफ़ कम न हो रही हो।
  •   यदि बात करते समय भी आपकी सॉँस बुरी तरह फूलने लगे।
  •   यदि नाखूनों या होठों का रंग नीला पड़ना शुरू हो जाए ऑक्सीजन की कमी।
  •   यदि आपको छाती में बहुत ज़्यादा दर्द और बेचैनी महसूस हो।
  •   यदि आपको रात में लगातार खाँसी आ रही हो जिससे सोना मुश्किल हो जाए।

 निष्कर्ष

अस्थमा के मरीज़ों में इम्युनिटी का कमज़ोर होना केवल एक लक्षण नहीं, बल्कि शरीर के भीतर का गहरा असंतुलन है। जब तक आप केवल लक्षणों का इलाज करेंगे, यह समस्या बनी रहेगी। आयुर्वेद हमें सिखाता है कि सही आहार, जीवनशैली और जड़ी-बूटियों के माध्यम से हम अपनी सॉँसों को दोबारा आज़ाद कर सकते हैं। अपनी सेहत के प्रति ज़िम्मेदार बनें और आज ही अपनी 'प्रकृति' के अनुसार उपचार शुरू करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेदिक उपचार और अनुशासन से अस्थमा के लक्षणों को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है और इनहेलर्स से छुटकारा मिल सकता है।

हाँ, 'अनुलोम-विलोम' और 'भ्रामरी' प्राणायाम फेफड़ों की ताक़त बढ़ाने के लिए बेहतरीन हैं।

हाँ, जानवरों के बाल और रूसी (Dander) कुछ लोगों के लिए ट्रिगर का काम करते हैं।

कुछ बच्चों में इम्युनिटी बढ़ने पर सुधार होता है, लेकिन सही आयुर्वेदिक देखभाल इसे जल्दी ठीक कर सकती है।

हाँ, लेकिन डॉक्टर की सलाह पर हल्के व्यायाम और योग करना बेहतर है।

हाँ, यह मिश्रण कफ को काटने और इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करता है।

 हाँ, मास्क ठंडी हवा को सीधे फेफड़ों में जाने से रोकता है, जो ट्रिगर से बचाता है।

बिल्कुल, पेट की गैस और एसिड ऊपर की ओर दबाव डालकर सॉँस की तक़लीफ़ बढ़ा सकते हैं।

एलोपैथिक इनहेलर्स पर निर्भरता बढ़ सकती है, इसलिए आयुर्वेद के साथ उनकी ज़रूरत कम करने का प्रयास करें।

जीवा आपको व्यक्तिगत डाइट प्लान और विशेष पंचकर्म थेरेपी देता है जो फेफड़ों को जड़ से साफ़ करती हैं।

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