Diseases Search
Close Button
 
 

गर्मियों में बार-बार डिहाइड्रेशन क्यों होता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

तुरंत राहत देने वाले ओआरएस (ORS), ग्लूकोज़ और एनर्जी ड्रिंक्स का इस्तेमाल गर्मियों में बार-बार होने वाले डिहाइड्रेशन, थकान और कमज़ोरी जैसी बीमारियों में काफी आम है। ये ड्रिंक्स शरीर के अंदर इलेक्ट्रोलाइट्स और पानी की कमी को कुछ समय के लिए पूरा कर देते हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह पूरी तरह ठीक हो गया है और उसकी परेशानी खत्म हो गई है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि ड्रिंक का असर खत्म होते ही या धूप में निकलते ही फिर से भयंकर थकान होने लगती है और चक्कर आना व मुँह सूखने की समस्या पहले से भी बड़े रूप में वापस आ जाती है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार कैफीन पीने से नसों का कमज़ोर होना, बीमारी कितनी गंभीर है, बाहरी ड्रिंक्स पर शरीर की निर्भरता, या सबसे महत्वपूर्ण शरीर में मौजूद अशुद्धियाँ और अंदर जमा टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं और पित्त दोष का असंतुलन। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और शरीर की सेहत प्राकृतिक रूप से बनी रहे।

डिहाइड्रेशन क्या है?

डिहाइड्रेशन एक ऐसी स्थिति है, जहाँ शरीर से पसीने या मल-मूत्र के ज़रिए बाहर निकलने वाले तरल पदार्थों की मात्रा, अंदर जाने वाले पानी से बहुत ज़्यादा हो जाती है। आमतौर पर लोग इसका शिकार चिलचिलाती धूप, कम पानी पीने, गलत खान-पान या बहुत ज़्यादा पसीना आने के कारण होते हैं। जब शरीर में पानी कम होता है, तो खून गाढ़ा हो जाता है और अंगों तक ऑक्सीजन सही से नहीं पहुँच पाती, जिससे चक्कर आना, तेज़ प्यास और भयंकर कमज़ोरी जैसी दिक्कतें होने लगती हैं। तुरंत ग्लूकोज़ पीने पर कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है, लेकिन ये तरीके सिर्फ ऊपरी स्तर पर काम करते हैं, शरीर के अंदर मौजूद उस बढ़े हुए 'पित्त' को शांत नहीं करते जो शरीर का पानी सोख रहा है। इसे बिना डॉक्टर की सलाह के नज़रअंदाज़ करना किडनी और लिवर पर बुरा असर डालता है।

डिहाइड्रेशन की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

तरल पदार्थों की कमी से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये स्थितियाँ देखी जाती हैं

  • माइल्ड डिहाइड्रेशन (Mild Dehydration) यह शुरुआती स्थिति है जिसमें हल्की प्यास लगती है और मुँह सूखने लगता है।
  • मॉडरेट डिहाइड्रेशन (Moderate Dehydration) इसमें शरीर का काफी पानी निकल जाता है, जिससे पेशाब का रंग पीला हो जाता है, सिरदर्द होता है और माँसपेशियों में ऐंठन होती है।
  • सीवियर डिहाइड्रेशन (Severe Dehydration) यह जानलेवा हो सकता है। इसमें चक्कर आना, धड़कनें बहुत तेज़ होना, भ्रम की स्थिति और बेहोशी शामिल है।
  • क्रॉनिक डिहाइड्रेशन (Chronic Dehydration) जो लोग रोज़ाना कम पानी पीते हैं, उनके शरीर की कोशिकाएँ हर समय सूखी रहती हैं, जिससे किडनी और पाचन हमेशा खराब रहता है।

डिहाइड्रेशन के लक्षण और संकेत

बार-बार प्यास लगना या शरीर में भयंकर थकान होना कई स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं

  • अत्यधिक प्यास और सूखा मुँह हर समय गला सूखना और पानी पीने के बाद भी प्यास न बुझना।
  • पेशाब का रंग गहरा होना पेशाब की मात्रा बहुत कम हो जाना और उसका रंग गहरा पीला या बदबूदार होना।
  • भयंकर थकान और सिरदर्द शरीर में बिल्कुल ऊर्जा न रहना और सिर में लगातार भारीपन या दर्द मचना।
  • त्वचा का रूखापन त्वचा का एकदम सूख जाना और चुटकी से खींचने पर तुरंत अपनी जगह पर वापस न जाना।
  • चक्कर आना और बेहोशी अचानक खड़े होने पर आँखों के सामने अँधेरा छा जाना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार डिहाइड्रेशन होने के मुख्य कारण क्या हैं?

गर्मियों में शरीर का पानी बार-बार सूखने के पीछे सिर्फ तेज़ धूप नहीं, बल्कि कई अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं

  • पित्त दोष का बढ़ना आयुर्वेद के अनुसार गर्मियों में शरीर का पित्त (गर्मी) भड़क जाता है। यह बढ़ी हुई अग्नि शरीर के जलीय अंश (रस धातु) को तेज़ी से सुखा देती है।
  • कैफीन और शराब का सेवन चाय, कॉफी और शराब मूत्रल (Diuretic) होते हैं, जो शरीर से पानी को तेज़ी से पेशाब के रास्ते बाहर निकाल देते हैं।
  • गलत खान-पान बहुत ज़्यादा मसालेदार, तीखा और नमकीन खाना खाने से शरीर में भयंकर गर्मी पैदा होती है और प्यास बढ़ती है।
  • कमज़ोर पाचन अग्नि पाचन खराब होने से शरीर खाये हुए भोजन और पानी से ज़रूरी इलेक्ट्रोलाइट्स सोख नहीं पाता।
  • पसीना ज़्यादा आना चिलचिलाती धूप में बहुत ज़्यादा काम करने या कसरत करने से शरीर का नमक और पानी पसीने से बह जाता है।

इसके जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

इस समस्या को अगर अनदेखा किया जाए या सिर्फ बाहरी ग्लूकोज़ पर निर्भर रहा जाए, तो यह कई जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं

  • हीटस्ट्रोक (Heatstroke) यह एक जानलेवा स्थिति है जहाँ शरीर अपना तापमान नियंत्रित नहीं कर पाता और अंगों को नुकसान पहुँचता है।
  • किडनी स्टोन और यूरिन इन्फेक्शन पानी की कमी से मूत्र गाढ़ा हो जाता है, जिससे किडनी में पथरी और मूत्र मार्ग में भयंकर इन्फेक्शन (UTI) होता है।
  • लो ब्लड प्रेशर खून में पानी की कमी से ब्लड प्रेशर अचानक गिर जाता है, जिससे बेहोशी आ सकती है।
  • दिमागी दौरे (Seizures) इलेक्ट्रोलाइट्स (सोडियम, पोटैशियम) के भयंकर असंतुलन से दिमाग के सिग्नल बिगड़ जाते हैं और दौरे पड़ सकते हैं।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से गर्मियों में बार-बार होने वाला डिहाइड्रेशन सिर्फ पानी की कमी नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'रस धातु क्षय' और 'पित्त दोष' का भयंकर असंतुलन कहा जाता है और यह माना जाता है कि जब शरीर में गर्मी बहुत बढ़ जाती है, तब ऐसी परेशानी आती है। डॉक्टर नाड़ी और जीभ देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं शरीर में टॉक्सिन्स (आम) तो नहीं जमा हो गए हैं, जिसने शरीर की पानी सोखने की क्षमता को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया है। जब तक यह बढ़ा हुआ पित्त और दूषित 'आम' शरीर में रहेगा, शरीर बार-बार सूखता रहेगा। आयुर्वेद में बस कुछ समय के लिए पानी चढ़ाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, शरीर की अंदरूनी गर्मी शांत हो और रस धातु प्राकृतिक रूप से पुष्ट बने।

डिहाइड्रेशन के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में शरीर की गर्मी को शांत करने, प्यास बुझाने और रस धातु को ताकत देने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं

  • उशीर (खस) यह प्रकृति का सबसे बेहतरीन प्राकृतिक कूलेंट (Coolant) है। यह शरीर की भयंकर गर्मी को तुरंत शांत करता है और प्यास मिटाता है।
  • चंदन आयुर्वेद में इसे पित्त दोष को शांत करने के लिए बहुत शक्तिशाली माना गया है। यह शरीर को अंदर से शीतलता देता है।
  • आमलकी (आँवला) यह विटामिन सी से भरपूर होता है, जो रस धातु को पुष्ट करता है और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाता है।
  • गिलोय (गुडूची) यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Ojas) को मज़बूत करती है और गर्मियों में होने वाले बुखार व कमज़ोरी से बचाती है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, दूषित पित्त को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया

  • गहरी सफाई और शरीर शोधन जब गर्मियों में थकान और शरीर की गर्मी की समस्या सालों पुरानी हो, तो जीवा आयुर्वेद में शरीर के दोषों को संतुलित करने के लिए विशेष पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • विरेचन कर्म यह पित्त दोष को जड़ से खत्म करने का सबसे असरदार तरीका है। इसमें औषधीय जड़ी-बूटियों के माध्यम से दस्त कराए जाते हैं, जिससे लिवर और शरीर में जमा भयंकर गर्मी मल के ज़रिए बाहर निकल जाती है।
  • स्थायी राहत के लिए औषधियाँ अंदरूनी सफाई के साथ शीतवीर्य (ठंडी तासीर वाली) जड़ी-बूटियों का सेवन कराया जाता है। इससे सालों पुरानी भयंकर थकान में राहत मिलती है और रस धातु मज़बूत होने लगती है।

रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, डिहाइड्रेशन को दूर करने के लिए पानी वाले फल, पचने में आसान और शरीर के पित्त दोष को संतुलित करने वाला आहार चुनना महत्वपूर्ण है

क्या खाएँ?

  • पानी वाले फल और सब्ज़ियाँ तरबूज़, खरबूजा, खीरा, ककड़ी और लौकी भरपूर मात्रा में खाएँ, ये शरीर को प्राकृतिक पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स देते हैं।
  • नारियल पानी और जौ का पानी दिन में पर्याप्त मात्रा में ताज़ा नारियल पानी और जौ का पानी पिएँ, यह शरीर की भयंकर गर्मी को शांत करते हैं।
  • पुदीना और धनिया अपनी डाइट में पुदीने की चटनी या धनिये का पानी शामिल करें, यह पाचन को ठंडा रखते हैं।

क्या न खाएँ?

  • चाय, कॉफी और कैफीन कैफीन वाली चीज़ें बिल्कुल बंद कर दें, ये शरीर का सारा पानी सोखकर पेशाब के रास्ते बाहर कर देती हैं।
  • ज़्यादा नमक और जंक फूड बहुत ज़्यादा नमक और मैदे से बनी चीज़ों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, क्योंकि ये टॉक्सिन्स बढ़ाते हैं और प्यास भड़काते हैं।
  • मसालेदार और तीखा आहार लाल मिर्च, अचार और भारी मसाले गर्मियों में पित्त दोष को भयंकर रूप से बढ़ाते हैं, इनसे दूर रहें।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में रोगों का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है

  • बीमारी और शरीर की स्थिति ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे शरीर में पानी की कितनी कमी है, और मरीज़ का पित्त कितना बिगड़ा हुआ है।
  • हल्की समस्या में सुधार अगर समस्या नई है और सिर्फ कम पानी पीने से है, तो आमतौर पर 1 से 2 हफ्तों में ही शरीर की कमज़ोरी मिटने लगती है और ऊर्जा वापस आ जाती है।
  • पुरानी बीमारी का समय अगर हर गर्मी में बीमारी बहुत भयंकर रूप लेती है और 'रस धातु' पूरी तरह सूख चुकी है, तो शरीर को पूरी तरह शुद्ध होने और अंदर से ताकतवर बनने में 2 से 3 महीने भी लग सकते हैं।
  • उपचार का तरीका इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से पित्त शामक जड़ी-बूटियाँ, सही खानपान और हाइड्रेशन का ध्यान रखना शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम मरीज़ अगर अपनी डाइट का कड़ाई से पालन करता है, तो दोष संतुलित हो जाते हैं और भविष्य में भयंकर कमज़ोरी और चक्कर आने की संभावना खत्म हो जाती है।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

डिहाइड्रेशन की बीमारी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है

तुलना का आधार आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
उपचार का दृष्टिकोण लक्षणों को तुरंत नियंत्रित करना बीमारी की जड़ पर काम करना
कार्य करने का तरीका ORS/IV fluids से शरीर में पानी की कमी पूरी करना शरीर को अंदर से ठंडा और संतुलित करना
मूल कारण पर प्रभाव पित्त की बढ़ी हुई गर्मी को ठीक नहीं करता पित्त असंतुलन और रस धातु को संतुलित करता है
उपचार विधियाँ ORS, IV fluids चंदन, खस जैसी जड़ी-बूटियाँ और संतुलित आहार
दुष्प्रभाव अस्थायी राहत, धूप में फिर समस्या लौटना सामान्यतः सुरक्षित, प्राकृतिक सुधार
परिणाम कुछ समय के लिए हाइड्रेशन शरीर की प्राकृतिक जल संतुलन क्षमता में सुधार
समय तुरंत असर थोड़ा समय लगता है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

डिहाइड्रेशन होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि

  • मुँह पूरी तरह सूख जाए और पानी पीने के बाद भी लगातार उल्टियाँ होती रहें।
  • पेशाब आना पूरी तरह से बंद हो जाए या पेशाब का रंग बहुत गहरा भूरा हो।
  • तेज़ बुखार आ जाए और शरीर में पसीना आना बिल्कुल बंद हो जाए (हीटस्ट्रोक का संकेत)।
  • चक्कर आकर बेहोशी छाने लगे या दिमाग भ्रमित (Confusion) होने लगे।
  • धड़कनें बहुत ज़्यादा तेज़ हो जाएँ और साँस लेने में तकलीफ महसूस हो।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और किडनी फेलियर जैसी जानलेवा आपात स्थिति से बचा जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से गर्मियों में बार-बार होने वाला डिहाइड्रेशन मुख्य रूप से पित्त दोष के भयंकर रूप से बिगड़ने तथा शरीर में 'रस धातु' के सूखने से जुड़ा होता है। कम पानी पीने, ज़्यादा कैफीन लेने, मसालेदार भोजन खाने और कमज़ोर पाचन से शरीर अंदर से भट्टी की तरह तपने लगता है। सिर्फ बाहर से ग्लूकोज़ पीने से कमी कुछ समय के लिए छिप जाती है लेकिन बीमारी जड़ से खत्म नहीं होती। इलाज में शरीर की अंदरूनी गर्मी को शांत करना और रस धातु को पुष्ट करना सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें दोषों को संतुलित करना, पानी वाले फल खाना, उशीर-चंदन जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना और धूप से बचने वाली दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, अगर शरीर की गर्मी (पित्त) शांत करने के लिए सही आयुर्वेदिक औषधियाँ खाई जाएँ और ठंडी तासीर वाली डाइट का पालन किया जाए, तो इसे जड़ से खत्म किया जा सकता है।

नहीं, यह सिर्फ उस समय के लिए इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी पूरी करता है। अंदरूनी तौर पर पित्त को शांत किए बिना शरीर का पानी बार-बार सूखता है।

हाँ, कैफीन वाली चीज़ें मूत्रल (Diuretic) होती हैं, जो शरीर के ज़रूरी पानी को पेशाब के ज़रिए तेज़ी से बाहर निकाल देती हैं।

हाँ, नारियल पानी सबसे अच्छा प्राकृतिक इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक है जो शरीर को अंदर से ठंडा करता है और पानी की कमी को बहुत तेज़ी से पूरा करता है।

हाँ, आयुर्वेद में खस को बहुत ही बेहतरीन कूलेंट माना गया है, जो भयंकर पित्त को शांत कर प्यास और जलन मिटाता है।

हाँ, ज़्यादा नमक खाने से कोशिकाओं के अंदर का पानी बाहर आ जाता है, जिससे शरीर में डिहाइड्रेशन और प्यास तेज़ी से बढ़ती है।

पसीना आना शरीर को ठंडा रखने की प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन पसीने से निकले पानी की पूर्ति न करने से डिहाइड्रेशन होता है।

फ्रिज का बर्फ वाला पानी तुरंत गला ठंडा करता है लेकिन पेट की अग्नि बिगाड़ता है। इसकी जगह मटके का पानी या नींबू पानी पीना ज़्यादा फायदेमंद है।

हाँ, पानी कम होने से पेशाब गाढ़ा हो जाता है, जिससे उसमें मौजूद खनिज आपस में जुड़कर पथरी (Stone) का रूप ले लेते हैं।

हाँ, कब्ज़ और खराब पाचन से शरीर में टॉक्सिन्स जमा होते हैं जो अंदरूनी गर्मी बढ़ाते हैं और इलेक्ट्रोलाइट्स के संतुलन को बिगाड़ते हैं।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us