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किडनी से जुड़ी समस्याओं का आयुर्वेदिक उपचार: कारण, लक्षण और इलाज

जीवा आयुर्वेद में आपकी जांच रिपोर्ट, लक्षण और शारीरिक प्रकृति को ध्यान में रखकर व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार की जाती है। इस योजना में शामिल होते हैं उपयुक्त आयुर्वेदिक औषधियाँ, चयनित जड़ी-बूटियाँ, आहार संबंधी मार्गदर्शन और जीवनशैली में आवश्यक सुधार। अगर सूजन, पेशाब में बदलाव, थकान या किडनी से जुड़ी अन्य परेशानियाँ महसूस हो रही हैं, तो उन्हें अनदेखा न करें। आज ही जीवा के अनुभवी आयुर्वेदिक विशेषज्ञों से निःशुल्क परामर्श बुक करें और अपनी किडनी स्वास्थ्य की सही दिशा में कदम बढ़ाएँ।

शरीर के भीतर कुछ अंग ऐसे होते हैं जिनकी अहमियत हमें तब समझ आती है, जब वे ठीक से काम करना कम कर देते हैं। किडनी भी उन्हीं में से एक है। जब तक सब सामान्य रहता है, हम उसके बारे में सोचते भी नहीं। लेकिन जैसे ही पेशाब में बदलाव दिखे, शरीर में सूजन आए या बिना वजह थकान बढ़ने लगे, तब चिंता शुरू होती है। कई लोग शुरुआत में इन संकेतों को हल्के में ले लेते हैं, जबकि यही संकेत आगे चलकर गंभीर किडनी रोग का रूप ले सकते हैं। किडनी रोग वह स्थिति है जिसमें किडनी शरीर से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त पानी को सही तरीके से बाहर नहीं निकाल पाती। इससे सूजन, थकान, पेशाब में बदलाव और रक्त में क्रिएटिनिन बढ़ सकता है।

इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि किडनी रोग क्यों होता है, इसके मुख्य कारण और लक्षण क्या हैं, क्रिएटिनिन और जांच की क्या भूमिका है, और आयुर्वेदिक उपचार किस तरह संतुलन बहाल करने में मदद कर सकता है।

किडनी रोग क्या है? 

किडनी रोग तब होता है जब किडनी शरीर से विषैले पदार्थ, अतिरिक्त पानी और अपशिष्ट तत्वों को सही तरीके से बाहर नहीं निकाल पाती। इससे शरीर में सूजन, थकान, पेशाब में बदलाव और रक्त में क्रिएटिनिन बढ़ सकता है। आयुर्वेदिक उपचार का उद्देश्य दोष संतुलन, पाचन सुधार और प्राकृतिक रूप से विषाक्त पदार्थों की सफाई करना है। किडनी हमारे शरीर का महत्वपूर्ण अंग है, जो रक्त को फिल्टर करके गंदगी और अतिरिक्त तरल को मूत्र के माध्यम से बाहर निकालती है। जब यह प्रक्रिया प्रभावित होती है, तो पूरे शरीर पर असर पड़ता है। भारत में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के बढ़ते मामलों के कारण किडनी रोग के मरीजों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। यह लेख आपको किडनी रोग के प्रकार, कारण, लक्षण, जांच, आयुर्वेदिक दृष्टिकोण, जड़ी-बूटियां, डाइट और सावधानियों के बारे में विस्तार से जानकारी देगा।

किडनी शरीर में क्या काम करती है?

किडनी का मुख्य काम शरीर से गंदगी और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालना है। यह खून को साफ करती है और बेकार पदार्थों को पेशाब के जरिए बाहर भेजती है। इसके साथ ही यह शरीर में पानी और नमक का संतुलन बनाए रखती है। जब किडनी ठीक से काम करती है, तो शरीर हल्का और संतुलित महसूस करता है। लेकिन अगर इसका काम धीमा पड़ जाए, तो गंदगी शरीर में जमा होने लगती है। इसका असर सिर्फ पेशाब तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे शरीर पर पड़ता है।

जब किडनी कमजोर होने लगती है, तो शरीर में सूजन आ सकती है, खासकर पैरों और चेहरे पर। कई बार व्यक्ति को भूख कम लगती है, मितली होती है या थकान बढ़ जाती है। कुछ लोगों को पेशाब की मात्रा में बदलाव महसूस होता है। ये सभी संकेत बताते हैं कि शरीर के भीतर सफाई की प्रक्रिया सही नहीं चल रही। इसलिए किडनी की सेहत को नज़रअंदाज़ करना आगे चलकर बड़ी समस्या का कारण बन सकता है।

किडनी रोग के प्रकार

1. अचानक किडनी खराब होना

यह समस्या अचानक होती है। कुछ घंटों या दिनों में किडनी का काम कम हो जाता है।
कारण: शरीर में पानी की कमी, तेज संक्रमण, ज्यादा खून बहना या कुछ दवाइयों का असर।
समय पर इलाज मिलने पर यह ठीक भी हो सकती है।

2. लंबे समय की किडनी बीमारी

यह धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है। महीनों या सालों में किडनी की क्षमता कम होती जाती है।
मुख्य कारण: डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर।
शुरुआत में लक्षण कम दिखते हैं, इसलिए नियमित जांच जरूरी है।

3. किडनी की पथरी

किडनी में छोटे-छोटे कठोर कण बन जाते हैं, जिन्हें पथरी कहते हैं।
लक्षण: तेज कमर दर्द, पेशाब में जलन, कभी-कभी खून।
पानी कम पीने और गलत खानपान से यह समस्या बढ़ सकती है।

4. किडनी संक्रमण

यह किडनी में होने वाला बैक्टीरियल संक्रमण है।
लक्षण: बुखार, कमर दर्द, पेशाब में जलन।
समय पर इलाज जरूरी है।

किडनी खराब होने के मुख्य कारण

लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर रहना

जब रक्तचाप लगातार बढ़ा रहता है, तो खून की नलियों पर दबाव बढ़ जाता है। किडनी के अंदर बहुत महीन नसें होती हैं जो खून को छानने का काम करती हैं। लगातार दबाव के कारण ये नसें कमजोर होने लगती हैं और धीरे-धीरे उनकी कार्यक्षमता घट सकती है।

मधुमेह का सही नियंत्रण न होना

शुगर का स्तर लंबे समय तक अधिक रहने से खून गाढ़ा और भारी हो जाता है। इससे किडनी को खून साफ करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। समय के साथ यह अतिरिक्त मेहनत किडनी की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचा सकती है।

दर्द निवारक दवाओं का अधिक सेवन

कई लोग सिरदर्द, बदन दर्द या जोड़ों के दर्द में बार-बार पेनकिलर लेते हैं। इन दवाओं का लगातार उपयोग किडनी के लिए सुरक्षित नहीं होता। लंबे समय में ये दवाएँ खून के प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे किडनी पर असर पड़ता है।

पानी बहुत कम पीना

 शरीर में पानी की कमी होने पर गंदगी सही तरह बाहर नहीं निकल पाती। पेशाब गाढ़ा हो जाता है और किडनी को अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है। लंबे समय तक ऐसा होने पर पथरी या अन्य दिक्कतों की संभावना बढ़ सकती है।

बार-बार पेशाब रोककर रखना

पेशाब रोकने की आदत से मूत्राशय पर दबाव पड़ता है और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। अगर संक्रमण बार-बार हो, तो उसका असर ऊपर की ओर बढ़कर किडनी तक पहुँच सकता है। यह आदत छोटी लगती है, लेकिन असर गंभीर हो सकता है।

बहुत अधिक नमक और प्रोसेस्ड भोजन का सेवन

पैक्ड और प्रोसेस्ड खाने में नमक और केमिकल ज्यादा होते हैं। इससे शरीर में पानी रुक सकता है और रक्तचाप बढ़ सकता है। दोनों ही स्थितियाँ किडनी के लिए अनुकूल नहीं हैं।

शराब और धूम्रपान की आदत

शराब शरीर में पानी की कमी कर सकती है और धूम्रपान खून की नलियों को नुकसान पहुँचाता है। जब रक्त प्रवाह प्रभावित होता है, तो किडनी को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। यह धीरे-धीरे उसकी क्षमता को कम कर सकता है।

बार-बार पेशाब में संक्रमण

अगर मूत्र मार्ग में संक्रमण बार-बार हो रहा है और उसका सही इलाज नहीं हो रहा, तो बैक्टीरिया ऊपर की ओर फैल सकते हैं। इससे किडनी में सूजन या गंभीर संक्रमण की स्थिति बन सकती है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

बढ़ती उम्र 

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर के कई अंगों की कार्यक्षमता स्वाभाविक रूप से कम होने लगती है। 60 वर्ष के बाद किडनी की फिल्टर करने की क्षमता (GFR) धीरे-धीरे घट सकती है। यदि साथ में हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या अन्य रोग मौजूद हों, तो जोखिम और बढ़ जाता है। इसलिए बढ़ती उम्र में नियमित जांच कराना बेहद जरूरी होता है।

मोटापा 

अत्यधिक वजन होने से शरीर को अधिक मेहनत करनी पड़ती है, जिससे रक्तचाप और ब्लड शुगर बढ़ने की संभावना रहती है। मोटापा डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर दोनों का जोखिम बढ़ाता है, जो किडनी रोग के प्रमुख कारण माने जाते हैं। लंबे समय तक अतिरिक्त वजन किडनी पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।

पारिवारिक इतिहास

यदि परिवार में किसी सदस्य को किडनी रोग, डायबिटीज या उच्च रक्तचाप रहा है, तो अन्य सदस्यों में भी जोखिम बढ़ सकता है। कुछ किडनी संबंधी समस्याएँ आनुवंशिक भी हो सकती हैं। ऐसे लोगों को समय-समय पर जांच कराते रहना चाहिए ताकि शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज न किया जाए।

Symptoms

बार-बार या बहुत कम पेशाब आना

पेशाब की मात्रा या आवृत्ति में असामान्य बदलाव किडनी के कार्य में गड़बड़ी का संकेत हो सकता है।

पेशाब में जलन या झाग दिखना

जलन संक्रमण का संकेत हो सकती है, जबकि ज्यादा झाग प्रोटीन लीक होने की ओर इशारा करता है।

पैरों, टखनों या चेहरे पर सूजन

शरीर में अतिरिक्त पानी जमा होने से सूजन दिखाई दे सकती है, जो किडनी की कमजोरी से जुड़ी हो सकती है।

बिना वजह थकान और कमजोरी

किडनी ठीक से काम न करने पर शरीर में विषैले तत्व बढ़ जाते हैं, जिससे ऊर्जा कम हो सकती है।

भूख कम लगना

पाचन प्रभावित होने और शरीर में टॉक्सिन बढ़ने से भूख में कमी आ सकती है।

पीठ के निचले हिस्से में दर्द

कमर के दोनों ओर दर्द किडनी से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है।

त्वचा पर खुजली या रूखापन

खून में अपशिष्ट पदार्थ बढ़ने से त्वचा में खुजली और सूखापन हो सकता है।

रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना

रात के समय पेशाब की ज्यादा जरूरत महसूस होना किडनी या ब्लैडर की समस्या से जुड़ा हो सकता है।

क्या आप इनमें से किसी लक्षण से जूझ रहे हैं?

बार-बार या बहुत कम पेशाब आना
पेशाब में जलन या झाग दिखना
पैरों, टखनों या चेहरे पर सूजन
बिना वजह थकान और कमजोरी
भूख कम लगना
पीठ के निचले हिस्से में दर्द
त्वचा पर खुजली या रूखापन
रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना
 

किडनी रोग की जांच

 1. सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट

यह रक्त में क्रिएटिनिन की मात्रा मापता है। सामान्यतः:

  • पुरुष: 0.7–1.3 mg/dL
  • महिलाएं: 0.6–1.1 mg/dL

 2. GFR (Glomerular Filtration Rate)

यह बताता है कि किडनी कितने प्रभावी तरीके से रक्त को फिल्टर कर रही है।

 3. यूरिन टेस्ट

  • प्रोटीन
  • खून की उपस्थिति
  • संक्रमण के संकेत

 4. अल्ट्रासाउंड

किडनी का आकार और संरचना जांचने के लिए।

किडनी फेलियर के स्टेज

क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) को GFR के आधार पर 5 चरणों में विभाजित किया जाता है:

स्टेज

GFR स्तर

स्थिति

स्टेज 1

90+

हल्की क्षति, लक्षण नहीं

स्टेज 2

60–89

हल्की गिरावट

स्टेज 3

30–59

मध्यम क्षति

स्टेज 4

15–29

गंभीर स्थिति

स्टेज 5

<15

किडनी फेलियर

स्टेज 4 और 5 में डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है। 

आयुर्वेद किडनी की समस्या को किस तरह समझता है?

आयुर्वेद किडनी को केवल एक अंग के रूप में नहीं देखता, बल्कि शरीर की पूरी सफाई और संतुलन की प्रक्रिया से जोड़कर समझता है। आयुर्वेद में मूत्र से जुड़ी समस्याओं को अलग-अलग नामों से बताया गया है। इसका मुख्य आधार यह है कि शरीर में जमा गंदगी सही समय पर बाहर नहीं निकल रही। जब पाचन कमजोर होता है और शरीर में अपचित पदार्थ जमा होते हैं, तो वे धीरे-धीरे अलग-अलग अंगों पर असर डालते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार किडनी से जुड़ी समस्या तब बढ़ती है जब शरीर में जल तत्व का संतुलन बिगड़ता है। गलत खान-पान, बहुत नमकीन और भारी भोजन, तनाव और अनियमित दिनचर्या शरीर की सफाई प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। जब शरीर में गंदगी जमा होती है, तो किडनी पर दबाव बढ़ जाता है। आयुर्वेदिक उपचार का उद्देश्य केवल लक्षण कम करना नहीं, बल्कि शरीर के भीतर संतुलन दोबारा स्थापित करना होता है।

आयुर्वेदिक उपचार किडनी की सेहत सुधारने में कैसे मदद करता है?

आयुर्वेदिक उपचार धीरे-धीरे काम करता है। इसका उद्देश्य शरीर को मजबूर करना नहीं, बल्कि उसकी प्राकृतिक कार्यक्षमता को सहारा देना है ताकि वह संतुलन में लौट सके। सबसे पहले पाचन शक्ति (अग्नि) को संतुलित करने पर ध्यान दिया जाता है, क्योंकि कमजोर पाचन से शरीर में आम (विषैले अपशिष्ट) बनने लगते हैं, जिससे किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसके साथ ही स्थिति के अनुसार कुछ पारंपरिक जड़ी-बूटियाँ उपयोग में लाई जाती हैं, जैसे पुनर्नवा, जो सूजन और जल प्रतिधारण कम करने में सहायक मानी जाती है; गोखरू, जो मूत्र मार्ग को संतुलित करने में मदद करता है; और वरुण, जिसे मूत्र संबंधी विकारों में उपयोग किया जाता है। कुछ स्थितियों में त्रिफला या अन्य संयोजन भी पाचन और शरीर की सफाई की प्रक्रिया को समर्थन देने के लिए दिए जाते हैं। हालांकि, यह समझना बहुत जरूरी है कि इन औषधियों का चयन व्यक्ति की उम्र, रिपोर्ट, क्रिएटिनिन स्तर और रोग की अवस्था देखकर ही किया जाता है। स्वयं किसी भी जड़ी-बूटी का सेवन करना उचित नहीं है, क्योंकि गलत मात्रा या गलत संयोजन से स्थिति बिगड़ भी सकती है। आयुर्वेद में खान-पान और दिनचर्या को भी उपचार का हिस्सा माना जाता है। यदि व्यक्ति केवल दवा ले और जीवनशैली न बदले, तो अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। संतुलित आहार, पर्याप्त लेकिन नियंत्रित पानी, तनाव कम करना और नियमित जांच — ये सभी मिलकर सुधार की दिशा में काम करते हैं।

किडनी की समस्या में किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए?

अगर किडनी से जुड़ी परेशानी चल रही है, तो केवल दवा लेना ही काफी नहीं होता। रोज़मर्रा की आदतें भी उतनी ही अहम भूमिका निभाती हैं। छोटी-छोटी लापरवाहियाँ किडनी पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं, जबकि सही सावधानियाँ धीरे-धीरे सुधार की दिशा में मदद करती हैं। नीचे दी गई हर बात साधारण लग सकती है, लेकिन इन्हें नियमित रूप से अपनाना बहुत जरूरी है।

  • नमक की मात्रा सीमित रखें
    ज्यादा नमक शरीर में पानी को रोककर रखता है, जिससे सूजन और ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। जब ब्लड प्रेशर बढ़ता है, तो किडनी की नसों पर दबाव पड़ता है। इसलिए खाने में ऊपर से नमक डालने से बचें और पैक्ड फूड कम करें।
  • बहुत तला-भुना और भारी भोजन कम करें
    तैलीय और भारी खाना पचने में समय लेता है और शरीर में अनावश्यक गंदगी बढ़ा सकता है। इससे किडनी को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। हल्का, घर का बना और आसानी से पचने वाला भोजन बेहतर विकल्प होता है।
  • पर्याप्त लेकिन संतुलित मात्रा में पानी पिएँ
    पानी किडनी को शरीर की गंदगी बाहर निकालने में मदद करता है। लेकिन बहुत ज्यादा या बहुत कम पानी दोनों ही सही नहीं हैं। अपनी स्थिति के अनुसार डॉक्टर की सलाह लेकर संतुलित मात्रा में पानी पीना चाहिए।
  • डॉक्टर की सलाह के बिना दवा न लें
    कई दर्दनिवारक और अन्य दवाएँ लंबे समय तक लेने से किडनी पर असर डाल सकती हैं। बिना सलाह के दवा लेना आगे चलकर नुकसान पहुंचा सकता है। हर नई दवा शुरू करने से पहले डॉक्टर से पूछना जरूरी है।
  • ब्लड प्रेशर और शुगर को नियंत्रित रखें
    हाई ब्लड प्रेशर और मधुमेह किडनी खराब होने के बड़े कारणों में से हैं। अगर ये दोनों नियंत्रित रहेंगे, तो किडनी पर दबाव कम रहेगा। नियमित जांच और सही दवा लेना बहुत जरूरी है।
    समय पर पेशाब जाएँ, उसे रोककर न रखें
    लंबे समय तक पेशाब रोकने से संक्रमण और दबाव की समस्या हो सकती है। इससे किडनी और मूत्र मार्ग दोनों प्रभावित हो सकते हैं। शरीर के संकेतों को अनदेखा करना सही नहीं है।
  • हल्की शारीरिक गतिविधि करें
    रोज़ हल्की सैर या सरल व्यायाम से रक्त संचार बेहतर होता है। इससे ब्लड प्रेशर और वजन नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। सक्रिय जीवनशैली किडनी की सेहत के लिए भी फायदेमंद होती है।

इन बातों का पालन करने से किडनी पर अतिरिक्त दबाव कम होता है और शरीर धीरे-धीरे बेहतर महसूस करता है।

किडनी रोग में क्या खाएं और क्या न खाएं? 

किडनी रोग में सही आहार बेहद महत्वपूर्ण होता है।

क्या खाएं:

  • हल्का और ताजा भोजन
  • नियंत्रित मात्रा में प्रोटीन
  • उबली हुई सब्जियां
  • कम नमक वाला भोजन
  • पर्याप्त लेकिन नियंत्रित पानी (डॉक्टर की सलाह अनुसार)

क्या न खाएं:

  • ज्यादा नमक
  • पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड
  • अत्यधिक प्रोटीन
  • ज्यादा पोटैशियम वाले खाद्य (जैसे केला – गंभीर अवस्था में)
  • कोल्ड ड्रिंक और शराब

कब आयुर्वेदिक डॉक्टर से मिलना चाहिए?

अगर सूजन बढ़ रही है, पेशाब में बदलाव लगातार दिख रहा है, थकान बहुत ज्यादा है या जांच रिपोर्ट में बदलाव आया है, तो देर करना ठीक नहीं। कई लोग घरेलू उपायों से ही काम चलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन हर स्थिति में यह सही नहीं होता। विशेषज्ञ से मिलकर पूरी जांच और सलाह लेना बेहतर है।

आयुर्वेदिक डॉक्टर आपकी पूरी स्थिति समझकर इलाज तय करते हैं। वे केवल रिपोर्ट नहीं देखते, बल्कि आपकी दिनचर्या, खान-पान और मानसिक स्थिति को भी ध्यान में रखते हैं। इससे इलाज व्यक्तिगत और प्रभावी बनता है।

निष्कर्ष

किडनी से जुड़ी समस्याएँ धीरे-धीरे बढ़ती हैं, इसलिए उन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए। शरीर के छोटे संकेतों को समझना और समय पर कदम उठाना बहुत जरूरी है। आयुर्वेद हमें यह सिखाता है कि बीमारी को दबाना नहीं, बल्कि उसकी जड़ तक पहुँचना जरूरी है। सही खान-पान, संतुलित जीवनशैली और उचित मार्गदर्शन से किडनी की सेहत को बेहतर दिशा में ले जाया जा सकता है।

अगर आप या आपके परिवार में कोई किडनी से जुड़ी समस्या से परेशान है, तो समय पर सलाह लेना समझदारी है। हमारे प्रमाणित जीवा आयुर्वेदिक डॉक्टरों से व्यक्तिगत परामर्श के लिए कॉल करें: 0129-4264323

FAQs

 जब किडनी शरीर से विषैले पदार्थ और अतिरिक्त पानी सही तरह बाहर नहीं निकाल पाती, तब समस्या शुरू होती है।

डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, बार-बार संक्रमण, दर्द की दवाइयों का ज्यादा सेवन और गलत खानपान।

सूजन (खासकर पैरों में), थकान, पेशाब में बदलाव, भूख कम लगना और कमर के निचले हिस्से में दर्द।

हाँ, शुरुआती स्टेज में कई बार स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते, इसलिए नियमित जांच जरूरी है।

सामान्यतः पुरुषों में 0.7–1.3 mg/dL और महिलाओं में 0.6–1.1 mg/dL को सामान्य माना जाता है (लैब के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है)

 शुरुआती और मध्यम स्थिति में सही उपचार, डाइट और जीवनशैली से काफी सुधार संभव है। गंभीर स्थिति में आयुर्वेद सहायक भूमिका निभाता है।

औषधियां, डिटॉक्स प्रक्रियाएं (पंचकर्म), खानपान सुधार और जीवनशैली में बदलाव।

किडनी रोग को GFR के आधार पर 5 स्टेज में बाँटा जाता है, जिसमें स्टेज 1 हल्की क्षति और स्टेज 5 पूर्ण किडनी फेलियर मानी जाती है।

 हर मरीज के लिए पानी की मात्रा अलग हो सकती है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही लें।

 हाँ, जब किडनी ठीक से काम नहीं करती तो शरीर में पानी रुकने से सूजन हो सकती है।

यदि किडनी रोग का समय पर पता चल जाए और सही इलाज व नियंत्रण रखा जाए, तो कई मामलों में डायलिसिस की आवश्यकता को टाला जा सकता है।

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