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सीने में जकड़न और घरघराहट बार-बार क्यों होती है? आयुर्वेद में अस्थमा को कैसे समझा जाता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

सॉंस  लेना जीवन की सबसे सहज प्रक्रिया है, लेकिन जब हर सॉंस  के साथ संघर्ष करना पड़े, तो यह न केवल शारीरिक कष्ट देता है बल्कि मन में भय भी पैदा करता है। सीने में जकड़न और घरघराहट को अक्सर लोग मामूली एलर्जी या जुकाम समझकर छोड़ देते हैं, लेकिन यह अस्थमा की शुरुआत हो सकती है। इसे समय पर पहचानना और सही इलाज शुरू करना इसलिए बेहद ज़रूरी है क्योंकि फेफड़ों की सूजन अगर पुरानी हो जाए, तो यह श्वसन मार्ग को स्थायी रूप से संकरा कर सकती है। आयुर्वेद के अनुसार, अस्थमा का उपचार केवल लक्षणों को दबाना नहीं है, बल्कि शरीर के भीतर जमे हुए उस 'कफ' को बाहर निकालना है जो आपकी सॉंस ों का रास्ता रोके खड़ा है।

अस्थमा या दमा क्या होता है?

इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो, हमारे फेफड़ों में हवा ले जाने वाली नलियाँ बहुत संवेदनशील होती हैं। अस्थमा की स्थिति में इन नलियों के भीतर सूजन आ जाती है और शरीर बहुत ज़्यादा चिपचिपा बलगम कफ बनाने लगता है। इसके कारण हवा के आने-जाने का रास्ता छोटा हो जाता है। जब मरीज़ इस संकरे रास्ते से सॉंस  लेने की कोशिश करता है, तो घर्षण की वजह से सीने से 'सीटी' जैसी आवाज़ आती है, जिसे घरघराहट कहा जाता है। सरल शब्दों में, यह आपके फेफड़ों के भीतर की एक रक्षात्मक प्रतिक्रिया है जो अनियंत्रित हो गई है।

अस्थमा के विभिन्न प्रकार और उनकी अवस्थाएं

अस्थमा के कारणों और गंभीरता के आधार पर इसे इन मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है

एलर्जिक अस्थमा यह सबसे आम प्रकार है, जो धूल, परागकणों, पालतू जानवरों की रूसी या फफूंद के कारण भड़कता है।

नॉन-एलर्जिक अस्थमा यह बाहरी एलर्जी के बजाय अत्यधिक ठंड, उमस, धुआं, परफ्यूम या वायरल संक्रमण की वजह से होता है।

व्यायाम-प्रेरित अस्थमा शारीरिक मेहनत या तेज़ी से दौड़ने-चलने के दौरान फेफड़ों की नलियों का सिकुड़ जाना।

व्यावसायिक अस्थमा कारखानों, केमिकल फैक्ट्रियों या लकड़ी के बुरादे के बीच काम करने वालों को होने वाला दमा।

कफ-वैरिएंट अस्थमा इसमें सॉंस  फूलने के बजाय मरीज़ को केवल बहुत ज़्यादा सूखी खाँसी  रहती है, जिसे पहचानना मुश्किल होता है।

शरीर में दिखने वाले मुख्य लक्षण

सॉंस  की भारी तक़लीफ़ आराम करते समय या चलते हुए अचानक सॉंस  का उखड़ना और ऑक्सीजन की कमी महसूस होना।

सीने में दबाव ऐसा महसूस होना जैसे छाती पर कोई भारी वज़न रखा गया है या उसे कसकर जकड़ लिया गया है।

तेज़ घरघराहट सॉंस  छोड़ते समय छाती से पतली सीटी जैसी आवाज़ आना जो साफ़ सुनाई देती है।

रात के वक़्त खाँसी सोते समय या सुबह जल्दी बहुत ज़्यादा खाँसी  उठना जिससे नींद पूरी तरह टूट जाए।

बोलने में दिक़्क़त सॉंस  फूलने के कारण एक ही बार में पूरा वाक्य बोलने में अक्षम होना।

अस्थमा होने के मुख्य कारण

आनुवंशिक बनावट यदि परिवार में माता-पिता या दादा-दादी को अस्थमा रहा हो, तो बच्चों में इसका ख़तरा अधिक होता है।

कमज़ोर पाचन आयुर्वेद के अनुसार, पेट में बनने वाला 'आम' विषाक्त तत्व जब रक्त के ज़रिए फेफड़ों तक पहुँचता है, तो वहां अवरोध Blockage पैदा करता है।

वायु प्रदूषण शहरों का धुआं और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे ज़हरीले तत्व फेफड़ों को संवेदनशील बना देते हैं।

मानसिक तनाव अत्यधिक चिंता और घबराहट शरीर के नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर अस्थमा के हमले को तेज़ कर सकती है।

संक्रमण बचपन में हुए निमोनिया या बार-बार होने वाले ब्रोंकाइटिस से फेफड़े कमज़ोर हो जाते हैं।

जोखिम बढ़ाने वाले कारण और होने वाली जटिलताएं

जोखिम बढ़ाने वाले 5 प्रमुख कारण

धूम्रपान तंबाकू का धुआं सॉंस  की नलियों के रक्षात्मक रेशों Cilia को नष्ट कर देता है।

मोटापा शरीर का अतिरिक्त वज़न फेफड़ों के विस्तार को रोकता है और सूजन बढ़ाता है।

एलर्जी का इतिहास यदि आपको पहले से स्किन एलर्जी या 'हे फीवर' की समस्या है।

रसायनों के संपर्क में रहना पेंट, कीटनाशक या हेयर डाई जैसे रसायनों के बीच ज़्यादा समय बिताना।

मौसम का बदलाव सर्दी से गर्मी या अचानक बरसात के मौसम में कफ दोष का असंतुलन।

 होने वाली 5 गंभीर जटिलताएं

नींद का अभाव लगातार खाँसी  और सॉंस  की तक़लीफ़ से मरीज़ मानसिक रूप से बहुत ज़्यादा थक जाता है।

फेफड़ों की नलियों का स्थायी रूप से संकरा होना इलाज न मिलने पर नलियां हमेशा के लिए सख़्त हो सकती हैं।

दैनिक जीवन की गुणवत्ता में गिरावट सामान्य पैदल चलना या सीढ़ियां चढ़ना भी मुश्किल हो जाता है।

स्टेरॉयड के दुष्प्रभाव लंबे समय तक एलोपैथिक इनहेलर्स पर निर्भर रहने से शरीर की इम्युनिटी गिर सकती है।

जीवन का ख़तरा गंभीर अस्थमा अटैक Status Asthmaticus होने पर सॉंस  पूरी तरह रुक सकती है।

अस्थमा की जाँच कैसे की जाती है?

स्पाइरोमेट्री जाँच यह फेफड़ों की कार्यक्षमता मापने का सबसे सटीक टेस्ट है कि आप कितनी हवा अंदर ले सकते हैं और बाहर छोड़ सकते हैं।

पीक फ्लो मीटर एक छोटा यंत्र जो यह मापता है कि आप फेफड़ों से कितनी तेज़ी से हवा बाहर निकाल पा रहे हैं।

चेस्ट एक्स-रे यह फेफड़ों के भीतर किसी संक्रमण, सूजन या रुकावट को देखने के लिए किया जाता है।

एलर्जी टेस्ट खून या त्वचा की जाँच जिससे पता चले कि कौन सी चीज़ दमे को भड़का रही है।

नाड़ी परीक्षण आयुर्वेदिक विशेषज्ञ आपकी नाड़ी के ज़रिए वात और कफ के असंतुलन की गहराई को समझते हैं।

आयुर्वेद में अस्थमा तमक श्वास और पाचन का संबंध

आयुर्वेद में अस्थमा को 'तमक श्वास' के नाम से जाना जाता है। इसे इस प्रकार समझा जाता है

दोषों का खेल आयुर्वेद मानता है कि जब बढ़ा हुआ 'कफ' श्वसन मार्ग में चिपक जाता है, तो 'प्राण वायु' वात का रास्ता रुक जाता है। रास्ता न मिलने पर यह हवा शरीर में इधर-उधर भागती है, जिससे सॉंस  फूलती है।

पेट और फेफड़ों का रिश्ता अस्थमा का मूल कारण केवल फेफड़े नहीं, बल्कि खराब पाचन मंदाग्नि है। जब भोजन सही से नहीं पचता, तो वह कफ बनाता है जो फेफड़ों में जाकर इकट्ठा हो जाता है।

असली वजह ठंडी और भारी चीज़ों का सेवन करना, धूल भरे वातावरण में रहना और शारीरिक मेहनत न करना कफ को बढ़ाता है।

काम आने वाली मुख्य आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

वसाका अडूसा यह श्वसन मार्ग को चौड़ा करने और जमे हुए कफ को पिघलाने में सबसे ज़्यादा असरदार है।

पिप्पली यह फेफड़ों की इम्युनिटी बढ़ाती है और कफ को दोबारा बनने से रोकती है।

सोमवल्ली सॉंस  की तक़लीफ़ और जकड़न को कम करने के लिए यह एक बेहतरीन औषधि है।

हरिद्रा हल्दी इसका एंटी-एलर्जिक गुण सॉंस की नलियों की सूजन को कम करता है।

आयुर्वेदिक थेरेपी और पंचकर्म उपचार

वमन चिकित्सा यह कफ दोष को शरीर से बाहर निकालने का सबसे बेहतर तरीका है, जिससे फेफड़े पूरी तरह साफ़ हो जाते हैं।

स्नेहन और स्वेदन औषधीय तेल से छाती की मालिश और भाप देना, जिससे बलगम ढीला होकर आसानी से निकल सके।

नस्यम नाक के मार्ग से औषधीय तेल डालना, जो श्वसन मार्ग की नसों को मज़बूत और साफ़ बनाता है।

अस्थमा में क्या खाएं और क्या न खाएं

क्या खाएं

गुनगुना पानी यह गले की खराश दूर करता है और कफ को पिघलाने में मदद करता है।

अदरक और लहसुन इनमें मौजूद उष्ण गर्म गुण कफ को सुखाते हैं और सूजन कम करते हैं।

पुराना अनाज पुराना गेहूं या चावल जो पचाने में बहुत हल्का हो।

क्या न खाएं

ठंडी तासीर वाली चीज़ें दही, आइसक्रीम, ठंडा पानी और केला कफ को तुरंत बढ़ा देते हैं।

भारी और तली-भुनी चीज़ें चीज़, पनीर और मैदा पाचन को खराब कर सॉंस की तक़लीफ़ बढ़ाते हैं।

फर्मेंटेड फूड इडली, डोसा या सिरका वात और कफ दोनों को असंतुलित कर सकते हैं।

 ठीक होने में कितना समय लग सकता है? 

अस्थमा एक पुरानी बीमारी है, इसलिए इसे ठीक होने में समय और अनुशासन की ज़रूरत होती है

शुरुआती 1 महीना नियमित दवा और आहार से सीने की जकड़न और रात वाली खाँसी  में ज़्यादा सुधार महसूस होने लगता है।

2 से 4 महीने फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है और मरीज़ को इनहेलर की ज़रूरत कम होने लगती है। घरघराहट की आवाज़ बंद हो जाती है।

6 महीने और उससे अधिक यदि मरीज़ पंचकर्म के साथ दवाओं का पालन करे, तो शरीर की इम्युनिटी इतनी बढ़ जाती है कि धूल या ठंड का असर होना बंद हो जाता है। बहुत पुराने मामलों में इसे पूरी तरह नियंत्रित करने के लिए 1 साल तक का वक़्त लग सकता है।

 इलाज से क्या फ़ायदा मिल सकता है?

  1. सॉंस की आज़ादी आप बिना किसी डर और जकड़न के गहरी और लंबी सॉंस  ले पाएंगे।
  2. इनहेलर्स पर निर्भरता में कमी जैसे-जैसे फेफड़े मज़बूत होंगे, बाहरी दवाओं की ज़रूरत अपने आप कम हो जाएगी।
  3. बेहतर नींद रात भर होने वाली खाँसी  से मुक्ति मिलेगी और आप सुबह ताज़गी के साथ उठेंगे।
  4. प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि बार-बार होने वाले जुकाम और एलर्जी से सुरक्षा मिलेगी।
  5. सक्रिय जीवनशैली आप बिना थके अपने दैनिक कार्य और हल्की सैर जैसी गतिविधियां कर पाएंगे।

मरीज़ो का अनुभव 

मैं मोनिका दीक्षित हूँ और मुझे अस्थमा की गंभीर समस्या थी। मैंने इसके लिए कई एलोपैथिक डॉक्टरों को दिखाया और बहुत से अस्पतालों के चक्कर काटे। डॉक्टरों ने मुझे नेबुलाइजर और नेजल स्प्रे का उपयोग करने की सलाह दी थी। लेकिन इन सबके बावजूद मेरी परेशानी कम नहीं हुई, बल्कि दिन-ब-दिन बढ़ती ही गई।

उसके बाद मैंने टीवी पर डॉक्टर प्रताप चौहान का शो देखा और जीवा क्लीनिक आई। पिछले 3 सालों से मैं यहाँ अपना इलाज करा रही हूँ और आज स्थिति यह है कि मेरा नेबुलाइजर और नेजल स्प्रे दोनों छूट गए हैं। मुझे अपनी समस्या में 80% तक राहत मिली है और मेरी दवाइयां भी अब धीरे-धीरे कम हो रही हैं। इसके लिए मैं जीवा आयुर्वेद का बहुत धन्यवाद करना चाहती हूँ।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

विशेषता आधुनिक इलाज  आयुर्वेदिक इलाज 
मुख्य लक्ष्य इसका प्राथमिक उद्देश्य ब्रोंकियल ट्यूब की सूजन को कम करना और संक्रमण को रोकना है। इसका लक्ष्य 'प्राण वह स्रोत' श्वसन तंत्र को साफ़ करना और फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाना है।
इलाज का तरीका इसमें आमतौर पर एंटी-बायोटिक्स, स्टेरॉयड्स और इनहेलर्स का उपयोग किया जाता है। इसमें कफ को ढीला करने वाली औषधियाँ और 'पंचकर्म' जैसी शुद्धि प्रक्रियाओं का उपयोग होता है।
दुष्प्रभाव Side Effects लंबे समय तक इनहेलर्स या एंटी-बायोटिक्स लेने से पाचन कमज़ोर होना और प्रतिरोधक क्षमता घटने का खतरा रहता है। आयुर्वेदिक औषधियाँ प्राकृतिक होती हैं और शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने पर ज़ोर देती हैं।
जड़ से समाधान यह अक्सर लक्षणों खांसी, बलगम को अस्थायी रूप से दबा देता है, जिससे समस्या बार-बार लौट सकती है। यह शरीर में जमे हुए कफ को बाहर निकालकर वात-कफ के असंतुलन को जड़ से ठीक करने पर काम करता है।
दृष्टिकोण यह एक 'इमरजेंसी' मैनेजमेंट की तरह काम करता है। यह 'होलिस्टिक हीलिंग' Holistic Healing पर आधारित है, जो जीवनशैली और आहार में सुधार लाता है।

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?

  •   यदि इनहेलर लेने के बाद भी आपकी सॉंस की तक़लीफ़ कम न हो रही हो।
  •   यदि आपको बोलने या चलते हुए बहुत ज़्यादा संघर्ष करना पड़े।
  •   यदि आपके नाखूनों या होठों का रंग हल्का नीला पड़ने लगे।
  •   यदि छाती में जकड़न के साथ बहुत तेज़ पसीना और घबराहट हो।
  •   यदि खाँसी के साथ खून या बहुत गाढ़ा पीला बलगम आए।

निष्कर्ष

अस्थमा केवल सॉंस  की बीमारी नहीं, बल्कि आपके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता की एक पुकार है। केवल लक्षणों को दबाने से आपकी समस्या कभी खत्म नहीं होगी। आयुर्वेद का होलीस्टिक हीलिंग दृष्टिकोण आपको भीतर से मज़बूत बनाता है, आपके पाचन को सुधारता है और आपके फेफड़ों को नई ज़िंदगी देता है। अपनी सेहत के प्रति ज़िम्मेदार बनें और दवाओं के साथ-साथ अपनी जीवनशैली में भी बदलाव लाएं। सही उपचार से ही आप अपनी साँसों को दोबारा सुरक्षित कर सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेद में सही उपचार और आहार के पालन से अस्थमा को पूरी तरह नियंत्रित (Remission) किया जा सकता है।

नहीं, आयुर्वेदिक दवा शुरू करने के बाद जैसे-जैसे सुधार होगा, डॉक्टर धीरे-धीरे इनहेलर कम करवाएंगे।

हाँ, अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम फेफड़ों की मांसपेशियों को बहुत ताक़त देते हैं।

हाँ, नमी और उमस कफ को बढ़ाती है, इसलिए इस मौसम में ज़्यादा सावधानी की ज़रूरत होती है।

जी हाँ, बच्चों की रिकवरी क्षमता ज़्यादा होती है, सही आयुर्वेद उपचार उन्हें भविष्य की गंभीर दिक़्क़तों से बचा सकता है।

हाँ, शहद कफ को पिघलाने में मदद करता है, इसे अदरक के रस के साथ लेना बहुत फ़ायदा पहुँचाता है।

रात के वक़्त दूध पीने से बचें क्योंकि यह कफ बढ़ा सकता है। यदि पीना हो तो उसमें हल्दी और सोंठ मिलाएं।

हाँ, बहुत ज़्यादा तनाव फेफड़ों की मांसपेशियों में खिंचाव पैदा कर सकता है।

हाँ, अलसी के बीज और अखरोट में मौजूद ओमेगा-3 सूजन कम करने में मदद करता है।

क्योंकि जीवा प्रत्येक मरीज़ की प्रकृति के अनुसार दवा और डाइट चार्ट तैयार करता है, जो इलाज को ज़्यादा प्रभावी बनाता है।

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