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Hearing कम हो रही - Hearing Aid के अलावा क्या ?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 21 May, 2026
  • category-iconUpdated on 13 Jun, 2026
  • category-iconENT
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ढलती उम्र के साथ कानों से कम सुनाई देना आजकल बहुत आम बात हो गई है। शुरू में तो लोग इसे बस थकान या बुढ़ापे का असर मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। पर जब एक ही बात दो-दो बार पूछनी पड़े, लोगों की आवाज़ साफ न आए या टीवी की आवाज़ बहुत तेज़ करनी पड़े, तब ये दिक्कत रोज़मर्रा की ज़िंदगी में खलने लगती है। कम सुनाई देना सिर्फ कानों की खराबी नहीं है। हर वक्त की टेंशन, शोर-शराबा, अधूरी नींद और शरीर का अंदर से कमज़ोर होना भी इसकी बड़ी वजहें हैं। जहां आज की दवाइयां सिर्फ कान की मशीन पर ज़ोर देती हैं, वहीं आयुर्वेद इसे वात के बिगड़ने और नसों की कमज़ोरी से जोड़कर देखता है। इसलिए इसे जड़ से मज़बूत करना बहुत अहम है।

सुनने की क्षमता कम होना आखिर क्या है? 

जब आपको आम बातचीत सुनने में दिक्कत होने लगे, बार-बार सामने वाले से बात दोहरानी पड़े या टीवी की आवाज़ दूसरों से ज़्यादा रखनी पड़े, तो समझ लें कि सुनने की ताक़त कम हो रही है। कई बार ये अचानक होता है और कई बार बहुत धीरे-धीरे। लोग इसे उम्र का तकाज़ा मान लेते हैं, पर हमेशा ऐसा नहीं होता। शरीर पहले ही इशारे देने लगता है जैसे धीमी आवाज़ें न सुनना, भीड़ में बात समझने में दिक्कत या कानों में लगातार सांय-सांय की आवाज़ आना।

कब सुनाई कम होना सामान्य नहीं माना जाता? 

हर इंसान के सुनने की ताक़त थोड़ी अलग होती है, लेकिन जब इससे आपकी रोज़ की ज़िंदगी में अड़चन आने लगे, तो इसे आम बात नहीं समझना चाहिए। शुरुआत में हम इन बातों को थकान समझकर टाल देते हैं। अगर आपको बार-बार लोगों से बात दोहरानी पड़े, मोबाइल की आवाज़ फुल करनी पड़े या शोर में कुछ समझ न आए, तो ये खतरे की घंटी है। समय रहते इन इशारों को समझना बहुत ज़रूरी है, वरना बाद में परेशानी काफी बढ़ सकती है।

सुनने की क्षमता कम होने के शुरुआती चेतावनी संकेत 

कम सुनाई देने की शुरुआत बहुत दबे पांव होती है, इसलिए शरीर के इन इशारों को पकड़ना ज़रूरी है:

  • फोन पर आवाज़ साफ न आना: फोन पर बात करते समय आवाज़ कटी-कटी सी लगती है और बार-बार पूछना पड़ता है।
  • बारीक आवाज़ें न सुनना: बच्चों या महिलाओं की पतली आवाज़ें समझने में काफी दिक्कत होती है।
  • भीड़ में बात न समझ आना: आस-पास शोर हो तो सामने वाले की बात बिल्कुल पल्ले नहीं पड़ती।
  • कानों में सीटी बजना: बिना किसी आवाज़ के भी कानों में लगातार सांय-सांय या सीटी बजने जैसी आवाज़ आती रहती है।
  • टीवी/मोबाइल की आवाज़ तेज़ रखना: घर के बाकी लोगों के मुकाबले आपको टीवी की वॉल्यूम काफी ज़्यादा चाहिए होती है।
  • बार-बार बात दोहराने को कहना: बात करते वक्त बार-बार "क्या कहा?" या "फिर से बोलना" कहने की आदत पड़ जाती है।
  • एक कान से कम सुनना: कई बार सिर्फ एक कान से आवाज़ कम और दबी हुई सी आती है।

सुनने की क्षमता कम होने के प्रमुख कारण 

यह दिक्कत सिर्फ बुढ़ापे की निशानी नहीं है, इसके पीछे हमारी लाइफस्टाइल का बहुत बड़ा हाथ है:

  • बढ़ती उम्र की मार: उम्र ढलने के साथ कानों की नसें और अंदरूनी हिस्सा कमज़ोर पड़ने लगता है।
  • लगातार तेज़ शोर: हमेशा भारी शोर-शराबे या डीजे के बीच रहने से कानों के परदों पर बुरा असर पड़ता है।
  • कानों में मैल जमना: कान में बहुत मैल भर जाने से आवाज़ अंदर जा ही नहीं पाती, जिससे भारीपन लगता है।
  • कान का इन्फेक्शन: बार-बार कान पकने या इन्फेक्शन होने से अंदरूनी ढांचा बिगड़ जाता है।
  • नींद की कमी: नींद पूरी न होने से शरीर की नसों को आराम नहीं मिलता, जिसका सीधा असर कानों पर पड़ता है।
  • शरीर की कमज़ोरी: शरीर में सही पोषण न हो और आपका पाचन ढीला हो, तो नसें कमज़ोर हो जाती हैं और सुनाई देना कम हो जाता है।

किन लोगों में यह समस्या ज्यादा देखी जा रही है? 

आजकल यह परेशानी सिर्फ बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं है, जवान लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं:

  • हेडफोन के दीवाने: घंटों कान में ईयरफोन लगाकर फुल वॉल्यूम में गाने सुनने वाले युवा।
  • शोर में काम करने वाले: फैक्ट्री या भारी शोर-शराबे वाली जगहों पर काम करने वाले लोग।
  • टेंशन में रहने वाले: जो लोग हर वक्त भारी दिमागी टेंशन लेते हैं, उनकी नसें जल्दी जवाब दे जाती हैं।
  • बीमारी के शिकार: शुगर और हाई बीपी के मरीज़ों में खून का दौरा बिगड़ने से कानों पर असर पड़ता है।
  • अधूरी नींद वाले लोग: जिन्हें ढंग से नींद नहीं आती, उनका शरीर और नसें दोनों कमज़ोर हो जाते हैं।

क्या हर Hearing Loss में Hearing Aid जरूरी होता है? 

बिल्कुल नहीं। हर इंसान की दिक्कत अलग होती है। मशीन कुछ मामलों में मदद करती है, पर ये अकेला रास्ता नहीं है। अगर आपके कम सुनने की वजह दिमागी टेंशन, बिगड़ा हुआ वात, कमज़ोरी या नींद की कमी है, तो सिर्फ मशीन लगाने से बात नहीं बनेगी। इसके लिए शरीर को अंदर से सुधारना और अपनी रूटीन को ठीक करना ही असली इलाज है।

कौन-सी आदतें कानों को धीरे-धीरे कमजोर करती हैं? 

रोज़मर्रा की कुछ आदतें हमारे कानों को अंदर ही अंदर खोखला कर रही हैं:

  • तेज़ आवाज़ में गाने सुनना: हमेशा फुल वॉल्यूम में गाने सुनना कानों की नसों को बर्बाद कर देता है।
  • हर वक्त ईयरफोन लगाना: कान को हवा न लगने देना और लगातार आवाज़ देते रहना नुकसानदायक है।
  • नींद न लेना: ढंग से न सोने पर दिमाग और कानों की नसों को रिपेयर होने का मौका नहीं मिलता।
  • धूम्रपान करना: सिगरेट पीने से खून का दौरा बिगड़ता है, जो कानों को कमज़ोर करता है।
  • कानों में तीली डालना: कान साफ करने के चक्कर में माचिस की तीली या पिन डालने से परदे डैमेज हो जाते हैं।

धीरे-धीरे कम सुनाई देना क्यों खतरनाक हो सकता है? 

जो बीमारियां दबे पांव आती हैं, लोग अक्सर उन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं। सुनाई कम देना भी ऐसा ही है। यह एकदम से नहीं होता, इसलिए इंसान धीरे-धीरे इसकी आदत डाल लेता है। शुरू में लोग बस होंठ पढ़कर अंदाज़ा लगाते हैं या शोर वाली जगहों से कटने लगते हैं। लेकिन अंदर ही अंदर कानों की ताक़त खत्म हो रही होती है। समय के साथ बात सिर्फ कानों तक नहीं रहती; इंसान दिमागी तौर पर थक जाता है, लोगों से चिढ़ने लगता है और उसका कॉन्फिडेंस एकदम ज़ीरो हो जाता है।

आयुर्वेद में कान और श्रवण शक्ति को कैसे समझा जाता है? 

अगर हम आयुर्वेद की बात करें, तो हमारे कानों का सीधा लेना-देना शरीर के वात दोष से है। सुनने की मशीनरी सिर्फ कान के परदे तक सीमित नहीं है इसका कनेक्शन हमारे दिमाग की नसों, मन के सुकून और शरीर की अंदर की ताक़त से भी है। होता क्या है कि जब शरीर में वात बहुत ज़्यादा भड़कने लगता है, तो कानों के अंदर एकदम सूखापन आ जाता है। अजीब-अजीब सी आवाज़ें गूंजने लगती हैं और सुनने की ताक़त बुरी तरह कमज़ोर पड़ जाती है। वात का असल काम हमारे पूरे शरीर की नसों को कंट्रोल में रखना है। अब अगर आप रोज़ बेवजह की टेंशन पालेंगे, नींद से समझौता करेंगे या उटपटांग लाइफस्टाइल जिएंगे, तो वात का बिगड़ना तो तय है। शुरू में लोग इसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर बैठते हैं, पर आगे चलकर यही चीज़ कानों की सारी ताक़त निचोड़ लेती है।

आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण 

आयुर्वेद में कम सुनाई देने को कोई आम कान की खराबी नहीं माना जाता। कानों में अचानक सीटी बजने लगना, भारीपन लगना या लोगों की बातें साफ पल्ले न पड़ना ये सब असल में शरीर, नसों और मन के बीच टूटे हुए तालमेल का सीधा नतीजा है। हमारा टारगेट आपको कोई मशीन पकड़ाकर काम चलाना नहीं है, बल्कि शरीर को अंदर से इतना मज़बूत बनाना है कि ये दिक्कत जड़ से ही खत्म हो जाए।

  • वात को शांत करना: वात का और हमारी सुनने की ताक़त का बहुत गहरा रिश्ता है। वात के भड़कने से ही नसें सूखने लगती हैं। इसलिए सबसे पहले इसी उखड़ी हुई हवा को काबू में करना बहुत ज़रूरी है। 
  • नसों को ताक़त देना: जब शरीर और नसें अंदर से थक जाती हैं, तो उनका सीधा असर हमारे कानों पर पड़ता है। इसलिए नसों को अंदर से पूरी खुराक देकर उन्हें पक्का किया जाता है। 
  • दिमागी शांति: हर समय की टेंशन और फालतू की फिक्र कानों को नाज़ुक बना डालती हैं। इलाज के दौरान मन को एकदम ठंडा और शांत रखना बहुत बड़ा काम है। 
  • पेट और शरीर की ताक़त: अगर आपका पाचन ही ढीला पड़ा है, तो शरीर में ताक़त खाक बनेगी? इसलिए सबसे पहले पेट की आग को सही किया जाता है ताकि शरीर अपनी पुरानी ताक़त वापस पा सके। 
  • रूटीन सुधारना: रात-रात भर उल्लू की तरह जागना, लगातार तेज़ शोर-शराबे में रहना और बाहर का उल्टा-सीधा खाना कानों का कबाड़ा कर देता है। अपनी रूटीन को सुधार लेना इस परेशानी का सबसे बड़ा हल है।

उपचार में उपयोग होने वाली आयुर्वेदिक औषधियाँ 

आयुर्वेद के खजाने में कुछ ऐसी कमाल की देसी जड़ी-बूटियां मौजूद हैं जो नसों में नई जान फूंकती हैं, दिमाग को ठंडा रखती हैं और शरीर की खोई हुई ताक़त को वापस खींच लाती हैं।

  • अश्वगंधा: शरीर की सारी थकावट को जड़ से मिटाकर नई ऊर्जा भरने और नसों को पक्का करने में इसका कोई तोड़ नहीं है। 
  • ब्राह्मी: दिमागी उलझन और टेंशन को शांत करने के साथ-साथ नसों का सही तालमेल बिठाने में ये सबसे बढ़िया है। 
  • शंखपुष्पी: टेंशन के मारे अगर दिमाग पूरी तरह से पक गया है या थक गया है, तो ये उसे तुरंत रिलैक्स कर देती है। 
  • गिलोय: शरीर को अंदर से ढाल की तरह पक्का बनाने और पुरानी से पुरानी थकावट को खींचकर बाहर निकालने में इसका काम गज़ब का है। 
  • त्रिफला: पेट की पूरी सफाई करके ये आपका पाचन एकदम दुरुस्त कर देती है। जब हाज़मा सही होता है, तो पूरे शरीर को गज़ब की ताक़त मिलती है।

उपचार में उपयोग होने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी 

इन पुराने और देसी तरीकों का बस एक ही मकसद है शरीर की सारी जकड़न को जड़ से मिटाना, नसों को एकदम रिलैक्स करना और दिमाग को पक्की वाली शांति देना।

  • अभ्यंग (तेल मालिश): जड़ी-बूटियों से पके हुए गुनगुने तेल से जब पूरे बदन की मालिश होती है, तो खून का दौरा एकदम सही रास्ते पर आ जाता है और शरीर की सारी टेंशन पल भर में गायब हो जाती है। 
  • शिरोधारा: माथे के ठीक बीच में जब लगातार औषधीय तेल की धार गिरती है, तो दिमागी बेचैनी चुटकियों में छूमंतर हो जाती है और नसें पूरी तरह शांत हो जाती हैं। 
  • नस्य कर्म: नाक के रास्ते दवाई वाला तेल डालने से सिर और कानों में फंसा सारा भारीपन बाहर खिंच जाता है और नसों का खतरनाक खिंचाव खत्म हो जाता है। 
  • स्वेदन (हल्की भाप): शरीर की जकड़न और भारीपन को चुटकियों में दूर करने के लिए हल्की भाप का तरीका बहुत काम आता है। इससे शरीर एकदम हल्का और तरोताज़ा महसूस करने लगता है।

सहायक आहार: क्या खाएं और क्या न खाएं

संतुलित आहार तंत्रिका स्वास्थ्य और शरीर की ऊर्जा बनाए रखने में महत्वपूर्ण माना जाता है।

क्या खाएं?

  • ताजा और हल्का भोजन
  • हरी सब्जियाँ और मौसमी फल
  • पर्याप्त पानी और हल्के पेय
  • सीमित मात्रा में घी
  • सूखे मेवे और पौष्टिक आहार
  • सुपाच्य और गर्म भोजन

क्या न खाएं?

  • अत्यधिक तला और भारी भोजन
  • बहुत ज्यादा चाय और कॉफी
  • बहुत ठंडा भोजन और पेय
  • पैकेट बंद और कृत्रिम खाद्य पदार्थ
  • देर रात भोजन करना
  • लंबे समय तक खाली पेट रहना

डॉक्टर से कब सलाह लें?

सुनने की क्षमता में कमी को केवल उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब यह रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे।

  • बार-बार बात दोहराने की जरूरत पड़ना
  • कानों में लगातार सीटी या भनभनाहट रहना
  • एक या दोनों कानों से कम सुनाई देना
  • फोन पर बातचीत समझने में कठिनाई होना
  • भीड़ में लोगों की बात स्पष्ट न समझ पाना
  • अचानक सुनाई कम होना
  • कानों में दर्द, भारीपन या चक्कर महसूस होना
  • टीवी या मोबाइल की आवाज़ बहुत तेज रखनी पड़ना
  • लक्षण लंबे समय तक बने रहना

निष्कर्ष

सुनने की क्षमता कम होना केवल उम्र बढ़ने की सामान्य स्थिति नहीं माना जाता, बल्कि इसके पीछे तंत्रिका कमजोरी, लगातार शोर, मानसिक तनाव, अनियमित जीवनशैली और शरीर के अंदरूनी असंतुलन जैसे कई कारण जुड़े हो सकते हैं। आधुनिक चिकित्सा इसे मुख्य रूप से कानों और श्रवण तंत्र की समस्या के रूप में देखती है, जबकि आयुर्वेद इसे वात दोष असंतुलन, तंत्रिका कमजोरी और मानसिक अस्थिरता से संबंधित मानता है।

समय रहते शुरुआती संकेतों को समझना और सही देखभाल अपनाना महत्वपूर्ण माना जाता है। संतुलित जीवनशैली, पर्याप्त आराम, मानसिक शांति और कानों की सही सुरक्षा लंबे समय तक श्रवण क्षमता को बेहतर बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

जब व्यक्ति को बार-बार बातें समझने में कठिनाई होने लगती है, तो वह धीरे-धीरे बातचीत से बचने लगता है। इससे अकेलापन और आत्मविश्वास में कमी महसूस हो सकती है। कई लोगों में चिड़चिड़ापन और मानसिक थकान भी बढ़ सकती है। लंबे समय तक यह स्थिति सामाजिक दूरी का कारण बन सकती है। इसलिए केवल कानों ही नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति पर भी ध्यान देना जरूरी माना जाता है।

लंबे समय तक तेज ध्वनि वाले वातावरण में रहने से कानों की सूक्ष्म संरचनाओं पर लगातार दबाव पड़ सकता है। शुरुआत में व्यक्ति को हल्का भारीपन या आवाज साफ न सुनाई देने जैसी परेशानी महसूस हो सकती है। धीरे-धीरे यह सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। कई बार नुकसान धीरे-धीरे बढ़ता है और व्यक्ति को देर से समझ आता है। इसलिए ध्वनि सुरक्षा को महत्वपूर्ण माना जाता है।

कानों में सीटी, भनभनाहट या हल्की आवाज सुनाई देना कई कारणों से जुड़ा हो सकता है। कभी-कभी यह तनाव, थकान या तेज आवाज के संपर्क के बाद भी महसूस हो सकता है। लेकिन यदि यह समस्या बार-बार या लंबे समय तक बनी रहे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह श्रवण तंत्र या तंत्रिका असंतुलन का संकेत भी हो सकता है। सही समय पर जांच करवाना उपयोगी माना जाता है।

धीरे-धीरे सुनने की क्षमता कम होने पर व्यक्ति को बातचीत, फोन कॉल और सामाजिक परिस्थितियों में कठिनाई महसूस हो सकती है। कई लोग दूसरों की बात समझने में अधिक मानसिक प्रयास करने लगते हैं। इससे थकान और ध्यान में कमी भी महसूस हो सकती है। कुछ लोग भीड़ और बातचीत वाली जगहों से बचने लगते हैं। इसका असर आत्मविश्वास और सामाजिक जीवन पर भी पड़ सकता है।

बहुत अधिक या गलत तरीके से कान साफ करना कानों की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकता है। नुकीली चीजों या कठोर वस्तुओं का उपयोग कानों की संवेदनशील संरचनाओं को प्रभावित कर सकता है। कई बार इससे संक्रमण और जलन का खतरा भी बढ़ सकता है। कानों में मौजूद प्राकृतिक मैल एक सुरक्षा परत की तरह काम करता है। इसलिए बिना आवश्यकता बार-बार सफाई करना सही नहीं माना जाता।

लगातार कम नींद लेने से शरीर और तंत्रिका तंत्र दोनों पर असर पड़ सकता है। मानसिक थकावट और तनाव बढ़ने पर कानों की संवेदनशीलता भी प्रभावित हो सकती है। कुछ लोगों में नींद की कमी के दौरान कानों में आवाज या भारीपन ज्यादा महसूस हो सकता है। पर्याप्त आराम न मिलने से शरीर की मरम्मत प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। इसलिए संतुलित नींद को जरूरी माना जाता है।

आजकल तेज संगीत, लंबे समय तक इयरफोन उपयोग और लगातार स्क्रीन उपयोग के कारण युवाओं में भी सुनने से जुड़ी समस्याएं बढ़ती दिखाई दे रही हैं। शुरुआत में यह समस्या हल्की लग सकती है, लेकिन समय के साथ बढ़ सकती है। कई युवा इसे सामान्य थकान समझकर अनदेखा कर देते हैं। यदि समय रहते सावधानी न रखी जाए, तो आगे चलकर सुनने की क्षमता अधिक प्रभावित हो सकती है।

लगातार मानसिक तनाव शरीर के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकता है। इसका असर कानों की संवेदनशीलता और ध्वनि समझने की क्षमता पर भी पड़ सकता है। कुछ लोगों को तनाव के दौरान कानों में आवाज, भारीपन या बेचैनी महसूस हो सकती है। मानसिक दबाव बढ़ने पर शरीर की ऊर्जा और संतुलन भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए तनाव नियंत्रण को महत्वपूर्ण माना जाता है।

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