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दर्द होने पर exercise रोक देना सही है या गलत?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

फिट और मज़बूत रहने के लिए वर्कआउट (व्यायाम) करना बहुत ज़रूरी है। लेकिन कई बार यही एक्सरसाइज़ शरीर में ऐसा दर्द पैदा कर देती है कि समझ नहीं आता आगे क्या करें। ऐसे में हर किसी के दिमाग में एक ही सवाल आता है  "दर्द हो रहा है, तो क्या वर्कआउट बिल्कुल छोड़ दूँ या हल्का-फुल्का करता रहूँ?" सच कहूं तो इसका कोई एक रटा-रटाया जवाब नहीं है। हर दर्द की कहानी अलग होती है और हमारा शरीर हमें अलग-अलग इशारे देता है। सही फैसला इस बात पर टिका है कि आप अपने शरीर की आवाज़ को कितना समझते हैं।

Exercise के दौरान दर्द क्यों होता है?

जब हम एक्सरसाइज़ करते हैं, तो हमारी मांसपेशियों (muscles) पर रोज़मर्रा के मुकाबले ज़्यादा ज़ोर पड़ता है। वे खिंचती हैं और लगातार काम करती हैं। ऐसे में हल्की थकावट, जलन या जकड़न (stiffness) महसूस होना एकदम नॉर्मल है। असल में, यह इस बात का सबूत है कि आपकी मांसपेशियां पहले से ज़्यादा मज़बूत बन रही हैं और आपका शरीर एक नए फिटनेस रूटीन में ढल रहा है।

लेकिन कई बार हम जोश-जोश में हद से ज़्यादा ज़ोर लगा देते हैं। खासकर तब, जब हमने ठीक से वॉर्म-अप (warm-up) न किया हो, एक्सरसाइज़ करने का तरीका गलत हो या शरीर को पूरा आराम न मिला हो। तब यह दर्द सिर्फ एक 'थकान' नहीं रह जाता। यह मांसपेशियों के बुरी तरह खिंचने या किसी अंदरूनी चोट का इशारा बन जाता है। कई बार तो यह दर्द एक-दो दिन बाद उभरता है, जो चीख-चीख कर कहता है कि अब शरीर को थोड़ा आराम (recovery) चाहिए।

मांसपेशियों के सामान्य दर्द और चोट के दर्द में अंतर

वर्कआउट के बाद होने वाला दर्द हमेशा एक जैसा नहीं होता। कभी ये बस एक मीठा सा दर्द या थकान होती है, तो कभी ये किसी सीरियस चोट का अलार्म होता है। इन दोनों के बीच का फर्क समझना बहुत ज़रूरी है ताकि आप सही समय पर सही कदम उठा सकें।

  • सामान्य दर्द (Normal Soreness): यह दर्द हल्का होता है, जैसे कोई खिंचाव। थोड़ा आराम करने या हल्की स्ट्रेचिंग करने से यह खुद ही गायब हो जाता है। यह बस शरीर को यह बताने का तरीका है कि आज मांसपेशियों से अच्छी खासी मेहनत की गई है।
  • चोट का दर्द (Injury Pain): यह दर्द एकदम चुभने वाला, तेज़ और लगातार बढ़ने वाला होता है। इसके होने पर आपके लिए रोज़ के छोटे-मोटे काम करना भी मुश्किल हो जाता है। इसमें सूजन आ सकती है, कमज़ोरी लग सकती है या फिर हाथ-पैर मोड़ने में भी भयंकर दिक्कत हो सकती है।

Exercise रोकना कब जरूरी होता है?

अगर वर्कआउट के दौरान बात सिर्फ थकान से आगे निकल जाए और आपको तेज़ दर्द या अजीब सी बेचैनी होने लगे, तो उसे इग्नोर करने की गलती कभी न करें। सही टाइम पर एक्सरसाइज़ रोक देने से आप किसी बड़ी चोट या हमेशा के दर्द से बच सकते हैं।

  • अचानक तेज़ दर्द उठना: अगर डंबल उठाते या दौड़ते समय अचानक से तेज़ चुभन या झटके वाला दर्द हो, तो वहीं रुक जाएं। आगे न बढ़ें।
  • सूजन (Swelling) दिखना: अगर किसी जोड़ या मांसपेशी के पास सूजन आ गई है, तो समझ लीजिए अंदर कुछ डैमेज हुआ है। इसे ज़बरदस्ती जारी रखना बेवकूफी होगी।
  • हिलने-डुलने में दिक्कत: अगर आपको हाथ-पैर मोड़ने या नॉर्मल तरीके से हिलने में भी जान निकल रही है, तो ये एक रेड सिग्नल है।
  • कमज़ोरी या बैलेंस बिगड़ना: अगर आपको लगने लगे कि मांसपेशियों में जान ही नहीं बची है या आपका बैलेंस डगमगा रहा है, तो तुरंत ब्रेक लें।
  • दर्द का कम न होना: अगर आराम करने के बाद भी दर्द घटने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है, तो इसे हल्के में बिल्कुल न लें।

दर्द के बावजूद व्यायाम कब जारी रखना सही हो सकता है?

ऐसा भी नहीं है कि ज़रा सा दर्द हुआ और आपने हमेशा के लिए जिम छोड़ दिया। कई बार थोड़ा-बहुत हिलना-डुलना ही शरीर की जकड़न को खोलता है और ब्लड सर्कुलेशन (खून का दौरा) बढ़ाता है। लेकिन ऐसा तभी करें जब दर्द बर्दाश्त करने लायक और एकदम नॉर्मल हो।

  • सिर्फ हल्की अकड़न (Stiffness) हो: अगर बस हल्की सी जकड़न या खिंचाव है, तो थोड़ी बहुत वॉक या हल्की स्ट्रेचिंग करने से काफी आराम मिल जाता है।
  • नया-नया वर्कआउट शुरू किया हो: जब हम कई दिनों बाद एक्सरसाइज़ शुरू करते हैं, तो शुरू के कुछ दिन शरीर टूटता है। ऐसे में एकदम से रुकने के बजाय हल्का-फुल्का वर्कआउट करते रहना चाहिए।
  • हिलने से अच्छा फील होना: अगर थोड़ा चलने-फिरने या वॉर्म-अप करने से दर्द कम हो रहा है और बॉडी हल्की लग रही है, तो आप अपनी एक्सरसाइज़ कंटिन्यू कर सकते हैं।
  • कोई सूजन या दर्द न हो: जब तक कहीं कोई सूजन नहीं है या कोई ऐसा दर्द नहीं है जो बर्दाश्त के बाहर हो, तब तक हल्की एक्टिविटी करना बिल्कुल सेफ है।

बस एक बात का ध्यान रखे ऐसे में भारी वज़न न उठाएं और सब कुछ बहुत आराम से, धीरे-धीरे करें।

गलत तरीके से व्यायाम करने के दुष्परिणाम

वर्कआउट का फायदा तभी मिलता है जब आप उसे सही फॉर्म, सही तरीके और अपनी कैपेसिटी के हिसाब से करते हैं। अगर आप गलत तरीके से एक्सरसाइज़ करेंगे, तो फिट होने के बजाय शरीर का कबाड़ा कर बैठेंगे।

  • मांसपेशियों का फटना या चोट: गलत पोस्चर या औकात से ज़्यादा वज़न उठाने (Ego Lifting) के चक्कर में अक्सर नस चढ़ जाती है या मसल फट जाती है।
  • जोड़ों (Joints) की परेशानी: अगर आपकी टेक्निक गलत है, तो उसका सीधा और सबसे बुरा असर आपके घुटनों, कंधों और कोहनी पर पड़ेगा। यहीं से हमेशा रहने वाला दर्द शुरू होता है।
  • परमानेंट दर्द का बैठ जाना: अगर आप रोज़ गलत तरीके से एक्सरसाइज़ करते रहेंगे, तो शरीर में एक ऐसा दर्द और जकड़न बैठ जाएगी जो कभी आपका पीछा नहीं छोड़ेगी।
  • लचीलापन (Flexibility) गायब होना: गलत तरीके से की गई एक्सरसाइज़ शरीर को फिट नहीं, बल्कि एक पत्थर की तरह सख्त और कड़क बना देती है।
  • चोट ठीक होने में महीनों लगना: अगर गलत वर्कआउट की वजह से कोई बड़ी चोट लग गई, तो उसे ठीक होने में बहुत लंबा समय लग जाता है, जिससे आपकी रोज़मर्रा की लाइफ भी डिस्टर्ब हो जाती है।

आयुर्वेद का नज़रिया: गलत तरीके से की गई एक्सरसाइज़ का शरीर पर असर

आयुर्वेद साफ कहता है कि वर्कआउट तभी फायदा करता है जब आप अपनी बॉडी की कैपेसिटी और उसके कुदरती नेचर को समझकर मेहनत करें। अगर आप गलत तरीके से, ज़्यादा ज़ोर लगाकर या उल्टी-सीधी एक्सरसाइज़ करते हैं, तो शरीर का पूरा बैलेंस बिगड़ जाता है। खासकर शरीर में 'वात' (यानी हवा) भड़क जाती है, जिससे दर्द, जकड़न और नसों में सूखापन आ जाता है। इसके साथ ही, हमारी मांसपेशियां (मसल्स) अंदर से कमज़ोर पड़ने लगती हैं और इंसान थोड़ा सा काम करते ही जल्दी थकने लगता है।

गलत रूटीन और लिमिट से ज़्यादा मेहनत करने पर पाचन बिगड़ता है और शरीर में 'आम' बनने लगता है। यही टॉक्सिन्स शरीर में भारीपन और अकड़न (Stiffness) भर देता है। इतना ही नहीं, नसों में रुकावट आने से खून का दौरा (ब्लड सर्कुलेशन) और एनर्जी दोनों ब्लॉक हो जाते हैं, जिससे दर्द और परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। अगर आप लंबे समय तक यही गलती करते रहें, तो शरीर की खुद को हील करने (रिकवरी) की कुदरती ताकत एकदम खत्म हो जाती है। फिर एक छोटी सी चोट ठीक होने में भी महीनों लग जाते हैं और रोज़ के छोटे-मोटे काम भी पहाड़ जैसे भारी लगने लगते हैं।

गलत एक्सरसाइज़ के दर्द को खींचने वाली असरदार आयुर्वेदिक थेरेपी

गलत वर्कआउट की वजह से जो दर्द और भयंकर जकड़न शरीर में बैठ जाती है, उसे जड़ से निकालने के लिए आयुर्वेद में कुछ कमाल की थेरेपी हैं। ये शरीर को अंदर से रिलैक्स करती हैं। इनका सीधा काम होता है भड़के हुए वात को शांत करना, अकड़ी हुई मसल्स को ढीला करना और खून के दौरे को फिर से तेज़ करना:

  • अभ्यंग (जड़ी-बूटियों वाले तेल से मालिश): जब खास औषधीय तेलों से शरीर की गहरी मालिश की जाती है, तो जिम या गलत एक्सरसाइज़ से अकड़ी हुई मांसपेशियां एकदम खुल जाती हैं और दर्द में तुरंत आराम मिलता है।
  • स्वेदन (हर्बल भाप की सिकाई): मालिश के बाद शरीर को हल्की-हल्की भाप दी जाती है। इससे शरीर का सारा कड़कपन मानो पिघल जाता है और मसल्स पूरी तरह रिलैक्स हो जाती हैं।
  • पिंड स्वेदन (गर्म पोटली से सिकाई): जड़ी-बूटियों की गर्म पोटली बनाकर जब दर्द वाली जगह पर सिकाई होती है, तो यह अंदर तक घुसे हुए दर्द और सूजन को पूरी तरह खींच लेती है।
  • बस्ती चिकित्सा (आयुर्वेदिक एनिमा): यह शरीर में बिगड़े हुए 'वात' को कंट्रोल करने का सबसे तगड़ा इलाज है। यह शरीर के अंदर से गहरी सफाई करता है और हड्डियों के दर्द को मिटाता है।
  • नस्य चिकित्सा: इसमें नाक के रास्ते औषधीय तेल डाला जाता है। अगर गलत वर्कआउट से आपकी गर्दन, कंधों या ऊपरी हिस्से में स्ट्रेस आ गया है, तो यह उस जकड़न को खोलती है और दिमाग को गजब की शांति देती है।

डाइट चार्ट 

सही आहार मांसपेशियों की रिकवरी, वात संतुलन और शरीर की ताकत बढ़ाने में मदद करता है। हल्का, पौष्टिक और आसानी से पचने वाला भोजन सबसे अधिक लाभकारी माना जाता है।

क्या खाएं (लाभकारी आहार) क्या न खाएं (हानिकारक आहार)
मूंग दाल की खिचड़ी तला-भुना और भारी भोजन
गुनगुना दूध (हल्दी के साथ) बहुत ठंडे पेय पदार्थ
मौसमी फल (केला, सेब, पपीता) जंक फूड और पैकेट फूड
हल्की उबली सब्जियां बहुत ज्यादा मसालेदार खाना
सूखे मेवे (सीमित मात्रा में) अत्यधिक चाय और कॉफी
गुनगुना पानी नियमित रूप से कोल्ड ड्रिंक्स और सोडा
उबली सब्जियाँ देर रात भारी भोजन

कब डॉक्टर से सलाह लें?

यदि व्यायाम के बाद होने वाला दर्द लगातार बढ़ता जा रहा हो और आराम करने के बावजूद कम न हो, तो इसे सामान्य थकान मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सूजन का लंबे समय तक बना रहना, मांसपेशियों में कमजोरी महसूस होना या सामान्य चलने-फिरने में कठिनाई होना गंभीर संकेत हो सकते हैं। अगर दर्द तेज चुभन जैसा हो, बार-बार एक ही जगह पर चोट महसूस हो या शरीर का संतुलन प्रभावित होने लगे, तो यह मांसपेशियों या जोड़ों की चोट का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में देर न करते हुए विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है, ताकि समस्या बढ़ने से पहले सही उपचार मिल सके और लंबी रिकवरी से बचा जा सके।

निष्कर्ष

व्यायाम से होने वाला मांसपेशियों का दर्द कई बार सामान्य होता है और यह शरीर के मजबूत होने की प्रक्रिया का हिस्सा भी हो सकता है, लेकिन इसे समझना बेहद जरूरी है कि कब यह सामान्य है और कब यह चेतावनी का संकेत बन जाता है। सही व्यायाम तकनीक, शरीर के अनुसार संतुलित अभ्यास, पर्याप्त आराम और सही रिकवरी से मांसपेशियां मजबूत और लचीली बनती हैं। वहीं गलत तरीके से किया गया अभ्यास या लगातार दर्द को नजरअंदाज करना छोटी समस्या को लंबे समय की चोट और कमजोरी में बदल सकता है। इसलिए शरीर के संकेतों को समझकर समय पर सही कदम उठाना ही स्वस्थ और सुरक्षित फिटनेस का आधार है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, हर व्यक्ति को दर्द होना जरूरी नहीं है। अगर शरीर सही तरीके से वॉर्म-अप और सही तकनीक के साथ व्यायाम कर रहा है, तो दर्द बहुत हल्का या बिल्कुल नहीं भी हो सकता है।

हाँ, दर्द का होना फिटनेस का पैमाना नहीं है। शरीर की ताकत, लचीलापन और सहनशक्ति बढ़ना भी अच्छे व्यायाम का संकेत है।

अगर शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिलता, तो लगातार व्यायाम से मांसपेशियों पर दबाव बढ़ सकता है और दर्द बढ़ सकता है।

हाँ, असुविधाजनक जूते या गलत उपकरण शरीर के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं और मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं।

हाँ, शरीर में पानी की कमी से मांसपेशियों में खिंचाव और थकान जल्दी होती है, जिससे दर्द बढ़ सकता है।

हाँ, स्ट्रेचिंग न करने से मांसपेशियां अचानक दबाव सह नहीं पातीं और चोट लगने की संभावना बढ़ जाती है।

हाँ, उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों की रिकवरी धीमी हो जाती है, इसलिए दर्द थोड़ा अधिक समय तक रह सकता है।

हर बार नहीं, हल्के दर्द में हल्की गतिविधि मदद कर सकती है, लेकिन तेज दर्द में आराम जरूरी होता है।

हाँ, बहुत देर तक या गलत समय पर व्यायाम करने से शरीर अधिक थक सकता है और दर्द बढ़ सकता है।

 हाँ, तनाव से शरीर में तनाव हार्मोन बढ़ते हैं, जिससे मांसपेशियां सख्त हो सकती हैं और दर्द महसूस हो सकता है।

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