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बच्चे को बार -बार Tonsillitis - Surgery टालना संभव

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 27 May, 2026
  • category-iconUpdated on 27 May, 2026
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हर माता-पिता के लिए अपने बच्चे को दर्द में देखना सबसे मुश्किल होता है, खासकर जब बात गले में भयंकर दर्द, खाना निगलने में तकलीफ और बार-बार आने वाले तेज़ बुखार की हो, यह समस्या अक्सर ठंडी हवा लगने या आइसक्रीम खाने के बाद लौट आती है, जिससे बच्चे की ऊर्जा और स्वास्थ्य दोनों तेज़ी से गिरने लगते हैं

जब बार-बार एंटीबायोटिक्स (Antibiotics) काम करना बंद कर देते हैं, तो कई बार डॉक्टर सर्जरी से टॉन्सिल्स (Tonsils) निकालने की सलाह दे देते हैं लेकिन क्या इस रक्षा प्रणाली को शरीर से काटना ही एकमात्र उपाय है, या इस तकलीफदेह समस्या को प्राकृतिक रूप से जड़ से ठीक किया जा सकता है?

बच्चे को टॉन्सिलिटिस बार-बार क्यों जकड़ लेता है?

बच्चों के गले के दोनों तरफ मौजूद टॉन्सिल्स असल में शरीर के सुरक्षा गार्ड होते हैं, जो बाहरी बैक्टीरिया और वायरस को शरीर में जाने से रोकते हैं। लेकिन जब इनकी खुद की प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो जाती है, तो ये आसानी से संक्रमण का शिकार हो जाते हैं:

  • कमज़ोर इम्युनिटी (Weak Immunity): बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है। जब वे बार-बार ठंडी या कफ बढ़ाने वाली चीज़ें खाते हैं, तो टॉन्सिल्स पर भारी दबाव पड़ता है।
  • मौसम का बदलाव: अचानक ठंडे से गर्म या गर्म से ठंडे माहौल में जाने पर शरीर तापमान के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता, जिससे संक्रमण हो जाता है।
  • खराब पाचन: आयुर्वेद के अनुसार, जब बच्चे का पाचन ठीक नहीं होता, तो शरीर में विषाक्त पदार्थ (Toxins) बनते हैं, जो गले में कफ के रूप में जमा होकर संक्रमण को न्योता देते हैं।
  • पर्यावरणीय एलर्जी: धूल, धुआं या प्रदूषण के लगातार संपर्क में रहने से भी गले के लिम्फ नोड्स (Lymph nodes) में बार-बार सूजन आ जाती है।

बच्चों में टॉन्सिलिटिस किन प्रकार के हो सकते हैं?

यह गले का संक्रमण हर बार एक जैसा नहीं होता। इसकी गंभीरता और बार-बार होने की प्रकृति के आधार पर इसे अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा जा सकता है, जिन्हें समझना सही इलाज के लिए बहुत ज़रूरी है:

  • तीव्र टॉन्सिलिटिस (Acute Tonsillitis): यह अचानक होता है और इसमें तेज़ बुखार के साथ गले में भयंकर दर्द होता है। इसके लक्षण आमतौर पर 3 से 14 दिनों तक रह सकते हैं।
  • क्रोनिक टॉन्सिलिटिस (Chronic Tonsillitis): जब टॉन्सिल्स में लगातार सूजन बनी रहे और बच्चे को हमेशा गले में खराश या निगलने में हल्की परेशानी महसूस हो, तो यह क्रोनिक स्थिति है।
  • रिकरेंट टॉन्सिलिटिस (Recurrent Tonsillitis): यह सबसे आम है, जिसमें बच्चे को साल में कई बार (5 से 7 बार) संक्रमण होता है और माता-पिता को बार-बार एंटीबायोटिक्स का सहारा लेना पड़ता है।

बच्चे में टॉन्सिलिटिस के लक्षण कैसे पहचानें?

छोटे बच्चे अक्सर अपनी तकलीफ सही से बता नहीं पाते हैं। इसलिए माता-पिता को उन शारीरिक और व्यवहारिक संकेतों पर बारीकी से नज़र रखनी चाहिए जो गले के संक्रमण की ओर इशारा करते हैं:

  • गले में लालिमा और सूजन: टॉन्सिल्स का आकार काफी बढ़ जाना और उन पर सफेद या पीले रंग के धब्बे (Pus) नज़र आना।
  • खाना निगलने में तकलीफ: बच्चे का खाना खाने से मना करना, पानी पीने में भी रोना और गले में दर्द की शिकायत करना।
  • थका हुआ महसूस करना: शरीर का तापमान अचानक बढ़ जाना और बच्चे का हर समय बहुत ज़्यादा सुस्त (Lethargic) रहना।
  • कान में दर्द: टॉन्सिल्स की नसों का कान और सिर से सीधा संपर्क होता है, इसलिए संक्रमण बढ़ने पर दर्द कान तक पहुँच जाता है।
  • साँसों से बदबू आना: गले में बैक्टीरिया जमा होने के कारण मुँह से दुर्गंध आना और आवाज़ में भारीपन (Hoarseness) होना।

इस परेशानी में होने वाली आम गलतियाँ और जटिलताएँ

बार-बार टॉन्सिल्स होने पर लोग अक्सर तुरंत राहत पाने के लिए कुछ ऐसे कदम उठाते हैं, जो भविष्य में समस्या को और गंभीर बना देते हैं। इससे कई तरह की शारीरिक जटिलताएँ पैदा होने का खतरा रहता है:

  • लगातार एंटीबायोटिक्स का उपयोग: हर बार बुखार आने पर एंटीबायोटिक्स देना बच्चे के आंतों के गुड बैक्टीरिया को खत्म कर देता है। इसके बजाय नीम जैसी प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ ज़्यादा सुरक्षित विकल्प हैं।
  • गले में कफ बढ़ाने वाला आहार: गले में दर्द होने पर बच्चे को ठंडा दूध, केला या दही देना कफ दोष को और भड़का देता है, जिससे सूजन बढ़ जाती है।
  • सर्जरी की जल्दबाज़ी: टॉन्सिल्स को शरीर का रक्षा कवच माना जाता है। इन्हें तुरंत निकलवा देने से भविष्य में श्वास नली के गंभीर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
  • स्लीप एपनिया (Sleep Apnea): अगर टॉन्सिल्स बहुत बड़े हो जाएँ, तो बच्चे को रात में सोते समय साँस लेने में तकलीफ होती है और वह खर्राटे लेने लगता है।

आयुर्वेद का टॉन्सिलिटिस पर क्या नज़रिया है?

आयुर्वेद में टॉन्सिलिटिस को 'तुण्डिकेरी' (Tundikeri) कहा जाता है। यह केवल गले का बाहरी संक्रमण नहीं है, बल्कि शरीर के अंदरूनी दोषों, विशेषकर कफ और वात दोष के असंतुलन का परिणाम है:

  • कफ दोष की अधिकता: शरीर में बढ़ा हुआ कफ दोष गले में जमा हो जाता है, जिससे लिम्फैटिक ऊतकों (Lymphatic tissues) में भारी सूजन आ जाती है।
  • जठराग्नि का कमज़ोर होना: जब बच्चे की पाचन अग्नि मंद होती है, तो 'आम' (Toxins) बनता है। यह आम गले के क्षेत्र में जाकर कफ के साथ मिल जाता है और संक्रमण पैदा करता है।
  • रक्त धातु की दृष्टि: टॉन्सिल्स में बार-बार संक्रमण होना इस बात का संकेत है कि शरीर का रक्त और रस धातु दूषित हो चुका है, जिसे अंदर से साफ करना ज़रूरी है।
  • प्रतिरक्षा (Ojas) का घटना: बार-बार बीमार पड़ने से शरीर का ओज (Vitality) कम हो जाता है, जिससे शरीर बाहरी कीटाणुओं से नहीं लड़ पाता।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण कैसे काम करता है?

जीवा आयुर्वेद में हम केवल सूजन कम करने पर ध्यान नहीं देते, बल्कि हमारा लक्ष्य बच्चे की मूल इम्युनिटी को इतना मज़बूत बनाना है कि उसे बार-बार संक्रमण हो ही नहीं। हम बीमारी की जड़ पर प्रहार करते हैं:

  • दोषों का संतुलन: सबसे पहले बच्चे के शरीर में बढ़े हुए कफ और वात दोष को शांत करने के लिए पूरी तरह से प्राकृतिक औषधियाँ दी जाती हैं।
  • आम पाचन: शरीर में जमे हुए विषाक्त पदार्थों को पचाने और शरीर से बाहर निकालने के लिए पाचन तंत्र को दुरुस्त किया जाता है।
  • इम्युनिटी बूस्टिंग: रसायन औषधियों के माध्यम से बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जाती है और एक स्वस्थ दिनचर्या का पालन कराया जाता है।
  • स्थानीय सूजन कम करना: गले के आसपास की नसों और ऊतकों को शांत करने के लिए बाहरी और आंतरिक लेप या विशेष काढ़ों का प्रयोग किया जाता है।

बच्चे के गले को प्राकृतिक रूप से ठीक करने वाली आयुर्वेदिक डाइट

टॉन्सिलिटिस के इलाज में सबसे अहम भूमिका सही आहार की होती है। एक अनुकूल आहार कफ को पिघलाता है, जबकि गलत खानपान सूजन को बढ़ा देता है। इस डाइट चार्ट का पालन करें:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - कफ और सूजन कम करने वाले) क्या न खाएं (नुकसानदायक - कफ और संक्रमण बढ़ाने वाले)
अनाज पुराना चावल, मूंग दाल की खिचड़ी, जौ, ओट्स। मैदा, सफेद ब्रेड, भारी और पचने में मुश्किल अनाज।
सब्ज़ियाँ लौकी, तरोई, गाजर, पालक (अच्छे से पकी हुई)। भिंडी, अरबी, और रात के समय किसी भी तरह का कच्चा सलाद।
फल पपीता, उबला हुआ सेब, अनार (कम मात्रा में)। केले, अमरूद, संतरा, और फ्रिज में रखे एकदम ठंडे फल।
डेयरी और वसा देसी गाय का घी, हल्दी वाला हल्का गुनगुना दूध। ठंडा दूध, दही (खासकर रात में), आइसक्रीम, चीज़।
पेय पदार्थ गुनगुना पानी, तुलसी और अदरक की चाय, जीरे का पानी। बर्फ का पानी, कोल्ड ड्रिंक्स, और डिब्बाबंद मीठे जूस।

टॉन्सिल्स को जड़ से ठीक करने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसी कई शक्तिशाली जड़ी-बूटियाँ दी हैं जो एंटीबायोटिक्स की तरह काम करती हैं, लेकिन बिना किसी साइड इफेक्ट के। ये टॉन्सिल्स की सूजन और दर्द को प्राकृतिक रूप से खींच लेती हैं:

  • गिलोय (Giloy): यह एक बेहतरीन इम्युनोमोड्यूलेटर है। गिलोय शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर बार-बार होने वाले बुखार और संक्रमण को रोकता है।
  • तुलसी (Tulsi): तुलसी में प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल गुण होते हैं। इसका अर्क गले की खराश और सूजन को तुरंत कम करता है।
  • हल्दी (Haridra): हल्दी एक शक्तिशाली सूजन-रोधी (Anti-inflammatory) औषधि है। यह टॉन्सिल्स में जमे कफ और पस (Pus) को सुखाने में मदद करती है।
  • मुलेठी (Yashtimadhu): मुलेठी गले को बहुत आराम पहुँचाती है और आवाज़ के भारीपन को दूर करती है। यह गले की सूखी नसों को प्राकृतिक चिकनाई देती है।
  • त्रिफला (Triphala): गले के संक्रमण को दूर करने के साथ-साथ यह बच्चे के पेट को साफ रखता है, जिससे शरीर में अवांछित 'आम' नहीं बनता।

बच्चों के लिए पसंदीदा आयुर्वेदिक थेरेपीज़

आंतरिक औषधियों के साथ-साथ कुछ बाहरी आयुर्वेदिक थेरेपीज़ गले की भयंकर जकड़न और दर्द से तुरंत राहत दिलाने में बहुत कारगर साबित होती हैं:

  • कवल और गंडूष (Kavala & Gandusha): औषधीय तेलों या गर्म हर्बल काढ़े (जैसे त्रिफला या हल्दी का पानी) से गरारे करना। यह गले से अतिरिक्त कफ को खींचकर बाहर निकालता है।
  • नस्य (Nasya): नाक में अणु तेल या शुद्ध घी की कुछ बूँदें डालना। यह गले और नाक के मार्ग को साफ रखता है और बार-बार होने वाली एलर्जी से बचाता है।
  • अभ्यंग (Abhyanga): छाती और पीठ पर औषधीय तेलों (जैसे वातनाशक तेल) से हल्की मालिश करना। यह जमा हुए भारी कफ को पिघलाकर साँस लेना आसान बनाता है।
  • स्वेदन (Swedana): मालिश के बाद गले और छाती के आसपास बहुत हल्की भाप देना, जिससे रक्त संचार सुधरता है और सूजन का दर्द कम होता है।

जीवा आयुर्वेद में उपचार की प्रक्रिया कैसे काम करती है?

हम केवल गले की सूजन देखकर कोई सिरप नहीं थमाते। हमारी प्रक्रिया बच्चे के संपूर्ण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की जाँच पर आधारित होती है:

  • गहन परामर्श: हमारे विशेषज्ञ डॉक्टर बच्चे के लक्षणों, पिछले मेडिकल इतिहास और खानपान की आदतों को विस्तार से समझते हैं।
  • नाड़ी और दोष परीक्षण: यह पता लगाया जाता है कि बच्चे के शरीर में कौन सा दोष (वात, पित्त या कफ) सबसे अधिक विकृत है।
  • मूल्यांकन और डायग्नोसिस: इसके बाद बीमारी के असली कारण (Root Cause) की पहचान की जाती है, ताकि इलाज केवल लक्षणों तक सीमित न रहे।
  • कस्टमाइज़्ड मेडिसिन: बच्चे की उम्र, बल और बीमारी की गंभीरता के आधार पर विशेष आयुर्वेदिक औषधियाँ तैयार की जाती हैं।

जीवा आयुर्वेद में आपका उपचार सफर

एक माता-पिता के रूप में आपके मन में कई सवाल होते हैं। जीवा में हम यह सुनिश्चित करते हैं कि यह उपचार का सफर आपके और बच्चे दोनों के लिए पूरी तरह तनावमुक्त हो:

  • जीवा से संपर्क करें: आप हमारे हेल्पलाइन नंबर +919266714040 पर कॉल करके अपने बच्चे की समस्या बता सकते हैं।
  • अपॉइंटमेंट फिक्स करें: आप हमारे 80 से अधिक क्लिनिक में अनुभवी डॉक्टरों से मिलकर बच्चे की शारीरिक जाँच आराम से करा सकते हैं।
  • टेली-कंसल्टेशन: अगर काम की व्यस्तता के कारण क्लिनिक आना मुश्किल है, तो आप घर बैठे वीडियो कॉल के ज़रिए डॉक्टर से बात कर सकते हैं।
  • निरंतर फॉलो-अप: हम इलाज शुरू करने के बाद आपको अकेला नहीं छोड़ते। हमारे हेल्थ कोच नियमित रूप से बच्चे की प्रगति की जानकारी लेते हैं।

इलाज और रिकवरी में कितना समय लगता है?

आयुर्वेद सर्जरी की तरह रातों-रात अंगों को काटकर अलग नहीं करता। यह शरीर को अंदर से रिपेयर करता है, जिसमें थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: सही औषधियों और डाइट से बच्चे के गले का दर्द, सूजन और बार-बार बुखार आने की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी।
  • 3-4 महीने: इस दौरान बच्चे की जठराग्नि मज़बूत होगी, कफ का संतुलन बनेगा और मौसम बदलने पर होने वाले संक्रमण का खतरा टल जाएगा।
  • 5-6 महीने: इस समय तक बच्चे की मूल इम्युनिटी इतनी मज़बूत हो जाएगी कि वह बिना बार-बार बीमार पड़े एक सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकेगा।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय जरूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएं शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग Rs.1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताजा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

मरीज़ जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

हम आपको बार-बार एंटीबायोटिक्स (Antibiotics) का गुलाम नहीं बनाते, बल्कि आपके बच्चे के शरीर की उस अग्नि को जगाते हैं जो किसी भी संक्रमण से प्राकृतिक रूप से लड़ सकती है:

  • जड़ से इलाज: हम केवल बीमारी के लक्षणों को नहीं दबाते, बल्कि उस मूल कारण को खत्म करते हैं जिसकी वजह से बच्चा बार-बार बीमार पड़ रहा है।
  • विशेषज्ञ डॉक्टर: हमारे पास सालों का शानदार अनुभव है। हमने हज़ारों बच्चों को जटिल बीमारियों और अनावश्यक सर्जरी से बचाकर प्राकृतिक जीवन दिया है।
  • कस्टमाइज्ड केयर: हर बच्चे की प्रकृति अलग होती है, इसलिए हमारा इलाज बिल्कुल आपके बच्चे के मूल कारण (Root Cause) पर आधारित होता है।
  • प्राकृतिक और सुरक्षित: बाज़ार की तेज़ दवाइयाँ शरीर के गुड बैक्टीरिया को मार देती हैं, जबकि हमारे आयुर्वेदिक रसायन पूरी तरह सुरक्षित हैं और इम्युनिटी को प्राकृतिक ताक़त देते हैं।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

टॉन्सिलिटिस के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Modern Medicine) आयुर्वेद (Ayurvedic Healing)
इलाज का मुख्य लक्ष्य एंटीबायोटिक्स देकर तुरंत बैक्टीरिया को मारना या सर्जरी से टॉन्सिल्स निकाल देना। शरीर की इम्युनिटी बढ़ाकर संक्रमण को रोकना और दोषों को संतुलित करना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल एक स्थानीय बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण माना जाता है। इसे कमज़ोर जठराग्नि, बढ़े हुए कफ और कमज़ोर इम्युनिटी का परिणाम माना जाता है।
डाइट और लाइफस्टाइल खानपान पर बहुत ज़्यादा विशेष पाबंदियां नहीं दी जाती हैं। कफ को शांत करने वाले आहार और सही दिनचर्या पर पूरा ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर एंटीबायोटिक्स के बार-बार उपयोग से इम्युनिटी गिरती है; सर्जरी से भविष्य के संक्रमण का खतरा बढ़ता है। बच्चा अंदर से मज़बूत होता है और बार-बार बीमार पड़ने की प्रवृत्ति हमेशा के लिए खत्म हो जाती है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालाँकि आयुर्वेद इस समस्या को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने बच्चे के शरीर में ये कुछ गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • साँस लेने में भयंकर रुकावट: अगर टॉन्सिल्स इतने सूज जाएँ कि बच्चे को साँस लेने में भारी दिक्कत हो रही हो या वह मुँह खोलकर साँस ले रहा हो।
  • लगातार तेज़ बुखार: अगर बुखार 103°F से ऊपर हो और सामान्य दवा देने के बावजूद 2 से 3 दिनों तक बिल्कुल नीचे न उतर रहा हो।
  • कुछ भी निगलने में असमर्थता: अगर बच्चा थोड़ा सा पानी या अपनी लार (Saliva) भी न निगल पा रहा हो और लार मुँह से बाहर गिर रही हो।
  • गर्दन में भारी अकड़न: अगर गले के साथ-साथ गर्दन में तेज़ दर्द और जकड़न आ जाए, जो संक्रमण के बहुत ज़्यादा फैलने का संकेत हो सकता है।

निष्कर्ष

बच्चे के टॉन्सिल्स उसके शरीर के महत्वपूर्ण सैनिक हैं जो उसे गंभीर बीमारियों से बचाते हैं। थोड़ी सी सूजन या बार-बार होने वाले संक्रमण के डर से इन सैनिकों को सर्जरी के ज़रिए शरीर से बाहर निकाल देना सही समाधान नहीं है। बार-बार एंटीबायोटिक्स देकर बच्चे की प्राकृतिक इम्युनिटी को कमज़ोर करने के बजाय, उसे आयुर्वेद की गहराई से जोड़ें। एक सही कफ-नाशक डाइट, गिलोय और मुलेठी जैसी सुरक्षित औषधियाँ और एक अनुशासित दिनचर्या आपके बच्चे को हमेशा के लिए इस तकलीफ से आज़ाद कर सकती है। अपने बच्चे को बिना किसी चीर-फाड़ के एक स्वस्थ भविष्य देने के लिए और इस बीमारी से राहत पाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

डॉक्टर की सलाह सीधे अपने फोन पर — WhatsApp Channel से जुड़ें।

FAQs

हाँ, ज्यादातर बच्चों में उम्र बढ़ने के साथ इम्युनिटी मजबूत हो जाती है, जिससे टॉन्सिल्स का आकार छोटा होने लगता है। इसके कारण बार-बार होने वाला गले का संक्रमण और टॉन्सिलिटिस का खतरा धीरे-धीरे कम हो सकता है।

टॉन्सिल स्टोन गले में जमा खाना, बैक्टीरिया और मृत कोशिकाओं से बनते हैं। यह बच्चों में भी हो सकते हैं और मुँह से बदबू, गले में खराश तथा निगलने में परेशानी का कारण बन सकते हैं।

टॉन्सिलिटिस पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया खांसी, छींक और संक्रमित चीजें साझा करने से फैल सकते हैं। इसलिए बच्चों में गले का संक्रमण तेजी से फैलने का खतरा रहता है और साफ-सफाई का ध्यान रखना जरूरी होता है।

अगर बच्चे को तेज बुखार, गले में ज्यादा दर्द या निगलने में परेशानी है, तो उसे आराम देना बेहतर होता है। इससे रिकवरी जल्दी होती है और दूसरे बच्चों में संक्रमण फैलने का खतरा भी कम रहता है।

हाँ, हल्दी में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीबैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं। हल्का गुनगुना हल्दी वाला दूध गले की सूजन कम करने, इम्युनिटी मजबूत करने और बार-बार होने वाले टॉन्सिल संक्रमण से बचाव में मदद कर सकता है।

हल्के गुनगुने पानी में नमक डालकर दिन में 2 से 3 बार गरारे कराने से गले की सूजन और दर्द कम हो सकता है। यह गले में जमा कफ साफ करने और संक्रमण से राहत देने में भी मदद करता है।

हाँ, टॉन्सिल्स में सूजन आने पर आवाज भारी या बदली हुई लग सकती है। लेकिन यह बदलाव अस्थायी होता है। जैसे ही सूजन और संक्रमण कम होता है, बच्चे की आवाज सामान्य हो जाती है।

हाँ, ज्यादा मिठाई, चॉकलेट और रिफाइंड शुगर खाने से बैक्टीरिया तेजी से बढ़ सकते हैं। इससे गले में संक्रमण, कफ और टॉन्सिल्स की सूजन होने का खतरा बढ़ जाता है।

सूजे हुए टॉन्सिल्स गले के पिछले हिस्से को संवेदनशील बना देते हैं। ब्रश या जीभ साफ करते समय गैग रिफ्लेक्स ट्रिगर हो सकता है, जिससे बच्चे को उल्टी या मिचली जैसा महसूस हो सकता है।

हाँ, हल्की भाप लेने से गले और नाक का रास्ता खुलता है। इससे सूजन कम होती है, कफ ढीला पड़ता है और गले के दर्द में राहत मिल सकती है। टॉन्सिलिटिस में स्टीम लेना काफी फायदेमंद माना जाता है।

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