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Seasonal Allergy बार-बार क्यों लौटती है — Ayurveda में Immunity Reset की जरूरत

Information By Dr. Keshav Chauhan

मौसम बदलते ही छींकें, नाक बहना और गले में खराश जैसी मौसमी एलर्जी (Seasonal Allergy) जकड़ लेती है। लोग राहत के लिए एंटी-हिस्टामाइन या कफ सिरप लेते हैं, जो सिर्फ कुछ समय के लिए लक्षणों को दबाते हैं। दवा का असर खत्म होते ही एलर्जी भयंकर रूप में लौट आती है। आयुर्वेद के अनुसार, एलर्जी बार-बार होना कमज़ोर इम्युनिटी (ओजस क्षय) और शरीर में जमे 'आम' (टॉक्सिन्स) का संकेत है। सिर्फ बाहरी दवाओं से शरीर अंदर से और कमज़ोर हो जाता है। इसलिए आयुर्वेदिक जीवनशैली अपनाकर इम्युनिटी को रिसेट (Reset) करना बेहद ज़रूरी है।

Seasonal Allergy और Immunity Reset क्या है?

मौसमी एलर्जी (Seasonal Allergy) एक ऐसी स्थिति है जहाँ मौसम बदलने पर शरीर का इम्यून सिस्टम हवा में मौजूद परागकण (Pollen), धूल या ठंडी हवा के प्रति अति-संवेदनशील (Hypersensitive) हो जाता है। एक सामान्य इंसान में मौसम का बदलाव कोई दिक्कत नहीं देता, लेकिन कमज़ोर इम्युनिटी वाले मरीज़ में शरीर इन बाहरी चीज़ों को दुश्मन समझकर भयंकर प्रतिक्रिया देता है। लोग इसके लिए रोज़ाना एंटी-एलर्जिक गोलियाँ लेते हैं, जो शरीर के हिस्टामाइन को सुखा देती हैं। लेकिन इससे इम्युनिटी (Immunity) प्राकृतिक रूप से मज़बूत नहीं होती। बिना डॉक्टर की सलाह के सिर्फ दवाओं पर निर्भर रहना शरीर को हमेशा के लिए कमज़ोर कर देता है।

Allergy और Immunity से जुड़ी मुख्य बीमारियाँ कौन सी हैं?

श्वसन तंत्र और एलर्जी से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • एलर्जिक राइनाइटिस (Allergic Rhinitis): लगातार छींकें आना, नाक बहना और आँखों से पानी गिरना।
  • एलर्जिक अस्थमा (Allergic Asthma): मौसम बदलते ही साँस की नलियों में सूजन आना और साँस फूलना।
  • अर्टिकेरिया (Urticaria/Hives): ठंडी हवा या धूल के संपर्क में आते ही त्वचा पर लाल चकत्ते और भयंकर खुजली होना।
  • साइनसाइटिस (Sinusitis): नाक और माथे की हड्डियों (Sinus) में कफ भर जाना और भारी दर्द रहना।

Seasonal Allergy और कमज़ोर इम्युनिटी के लक्षण और संकेत

दवाओं से आराम मिलने के बाद एलर्जी का बार-बार लौट आना कई आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • लगातार छींकें आना: सुबह उठते ही या ठंडी हवा के संपर्क में आते ही लगातार दर्जनों छींकें आना।
  • नाक और आँखों में खुजली: नाक बंद होना, पानी गिरना और आँखों में भयंकर खुजली व लालपन रहना।
  • गले में खराश: गले में हमेशा कुछ अटका हुआ सा महसूस होना और सूखी खाँसी आना।
  • भारी थकान: शरीर में ऊर्जा की भारी कमी और हमेशा सुस्ती महसूस होना।
  • दवा का असर खत्म होते ही वापसी: एंटी-एलर्जिक गोली का असर खत्म होते ही कुछ ही घंटों में लक्षणों का फिर से शुरू हो जाना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

Allergy बार-बार लौटने के कारण (वात, कफ और ओजस क्षय)

मौसमी एलर्जी बार-बार होने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं:

  • कमज़ोर अग्नि और 'आम' का बनना: खराब पाचन से पेट में विषैले तत्त्व (आम) बनते हैं, जो खून के ज़रिए शरीर में फैलकर इम्युनिटी को कमज़ोर करते हैं।
  • कफ दोष का संचय: गलत खान-पान से शरीर में कफ बढ़ता है, जो ठंडे मौसम में छाती और नाक में जमकर एलर्जी पैदा करता है।
  • ओजस (Ojas) का कम होना: गलत जीवनशैली से शरीर की मूल ताक़त (ओजस) खत्म हो जाती है, जिससे शरीर मौसम के बदलाव को बर्दाश्त नहीं कर पाता।
  • वात दोष का भड़कना: ठंडी और शुष्क हवा वात को बढ़ाती है, जिससे श्वसन तंत्र में भारी रूखापन और सिकुड़न पैदा होती है।
  • लगातार दवाओं का सेवन: रोज़ाना एंटी-हिस्टामाइन खाने से शरीर का अपना नेचुरल रिस्पांस सिस्टम सुन्न हो जाता है।

Seasonal Allergy के जोखिम और गंभीर जटिलताएँ

इस एलर्जी को अगर अनदेखा किया जाए या सिर्फ दवाओं के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • क्रोनिक अस्थमा का खतरा: लगातार एलर्जी रहने से साँस की नलियों में स्थायी सूजन आ जाती है, जो अस्थमा बन जाती है।
  • नींद में रुकावट: रात में नाक बंद रहने और खाँसी उठने से नींद पूरी नहीं होती, जिससे दिनभर भारी थकान रहती है।
  • नेज़ल पॉलिप्स (Nasal Polyps): नाक के अंदर बार-बार सूजन होने से वहाँ माँस की गाँठें बन जाती हैं।
  • मानसिक तनाव: हमेशा बीमार रहने के डर से इंसान एंग्जायटी और चिड़चिड़ेपन का शिकार हो जाता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

मौसमी एलर्जी (असात्म्य) पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से मौसमी एलर्जी सिर्फ बाहरी धूल या परागकण की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'असात्म्य' (Incompatibility) और 'ओजस क्षय' की श्रेणी में रखा जाता है। जब पाचक अग्नि कमज़ोर होती है, तो शरीर में वात और कफ दोष बिगड़ जाते हैं और 'आम' (टॉक्सिन्स) का निर्माण होता है। यह 'आम' जब रस और रक्त धातु में मिलता है, तो शरीर बाहरी चीज़ों (जैसे धूल या मौसम) के प्रति एलर्जिक हो जाता है। डॉक्टर नाड़ी देखकर ढूँढते हैं कि शरीर में 'आम' कहाँ जमा है। आयुर्वेद में बस लक्षणों को सुन्न करना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि पाचक अग्नि सुधरे, टॉक्सिन्स बाहर निकलें और शरीर की इम्युनिटी प्राकृतिक रूप से रिसेट (Reset) हो।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके शरीर के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: छींकें आने के समय, बलगम और खुजली की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: पिछली बीमारियाँ और इस्तेमाल की जा रही एंटी-एलर्जिक दवाओं का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: रोज़ाना के खान-पान, ठंडी चीज़ें खाने की आदत और पाचन को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: दोषों के असंतुलन को पकड़ने के बाद ही इम्युनिटी को रिसेट करने का सबसे सटीक इलाज शुरू किया जाता है।

Immunity बढ़ाने और Allergy दूर करने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में इम्युनिटी को रिसेट करने, वात-कफ शांत करने और एलर्जी खत्म करने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • गिलोय (Giloy): यह इम्युनिटी को रिसेट करने की सबसे बेहतरीन औषधि है। यह खून को साफ करती है और शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालती है।
  • हल्दी (Turmeric): हल्दी में बेहतरीन एंटी-एलर्जिक और सूजन कम करने वाले गुण होते हैं, जो नाक और गले की एलर्जी को तुरंत शांत करते हैं।
  • तुलसी (Tulsi): यह एक प्राकृतिक एंटी-वायरल और कफनाशक है, जो श्वसन तंत्र को मज़बूत करती है और मौसम की सेंसिटिविटी को कम करती है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह शरीर की मूल ताक़त ('ओजस') को बढ़ाता है और कमज़ोर नर्वस सिस्टम को मज़बूती देता है।

इम्युनिटी रिसेट के लिए पंचकर्म: दोष शोधन और रसायन चिकित्सा

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, इम्युनिटी को नया जीवन देने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • वमन और नस्य चिकित्सा: जब एलर्जी सालों पुरानी हो और व्यक्ति रोज़ एंटी-हिस्टामाइन खाता हो, तो पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली शरीर के गहरे डिटॉक्स की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • कफ का डिटॉक्स (वमन): इसमें औषधीय काढ़ा पिलाकर छाती और आमाशय में जमे पुराने कफ व टॉक्सिन्स को बाहर निकाला जाता है।
  • नाक की एलर्जी के लिए नस्य: नाक में औषधीय तेल की बूँदें डालकर सिर, नाक और गले के दोषों को साफ किया जाता है, जिससे छींकें और साइनस में जादुई रूप से आराम मिलता है।

Allergy के रोगी के लिए सही और शुद्ध आहार

इम्युनिटी को रिसेट करने के लिए वात-कफ दोष को शांत करने वाला, सुपाच्य और गर्म आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • गर्म और हल्का भोजन: पुराना चावल, मूंग की दाल और लौकी का इस्तेमाल बढ़ाएँ, यह पाचन सुधारते हैं और कफ नहीं बनने देते।
  • गुनगुना पानी और शहद: दिन भर हल्का गुनगुना पानी पिएँ। अदरक और तुलसी के रस में एक चम्मच शहद मिलाकर लेना एलर्जी की बेहतरीन दवा है।
  • गर्म तासीर वाले मसाले: खाने में काली मिर्च, दालचीनी, जीरा और हल्दी का प्रयोग ज़रूर करें, ये भारी जकड़न को काटते हैं।

क्या न खाएँ?

  • ठंडी और कफ बढ़ाने वाली चीज़ें: आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक, और फ्रिज का ठंडा पानी बिल्कुल बंद कर दें।
  • दही और भारी फल: रात के समय दही, केला या भारी फल कभी न खाएँ, यह शरीर में तुरंत कफ पैदा करते हैं।
  • मैदा और जंक फूड: पिज़्ज़ा, बर्गर और पैकेटबंद चीज़ों का सेवन बंद कर दें, क्योंकि ये इम्युनिटी कमज़ोर करते हैं और पेट में टॉक्सिन्स बढ़ाते हैं।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच कैसे होती है

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच पूरी समझ के साथ की जाती है। यहाँ कोशिश होती है कि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी और एलर्जी के लक्षणों को आराम से सुना जाता है।
  • आपकी पुरानी दवाओं और एंटी-एलर्जिक गोलियों के खाने की आदतों के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके खाने-पीने और ठंडी चीज़ें लेने की आदतों को समझा जाता है।
  • आपकी नींद, मानसिक तनाव और पेट साफ होने की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जाना जाता है।

इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो आपकी इम्युनिटी को पूरी तरह रिसेट कर सके।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

दोष असंतुलन और Immunity को पूरी तरह Reset होने में कितना समय लगता है?

एलर्जी की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे एलर्जी कितनी पुरानी है और दवाओं पर निर्भरता कितनी ज़्यादा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर एलर्जी की शुरुआत है, तो आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही छींकें आना और गले की खराश कम होने लगती है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर बीमारी सालों पुरानी है, तो शरीर के टॉक्सिन्स निकलने और इम्युनिटी को पूरी तरह रिसेट होने में 6 महीने से 1 साल लग सकता है।
  • उपचार का तरीका: इस प्राकृतिक इलाज में रसायन जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म और योगासन शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम: डाइट का कड़ाई से पालन करने पर इम्युनिटी मज़बूत हो जाती है और भविष्य में मौसम बदलने पर एलर्जी लौटकर नहीं आती।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक उपचार और दोष-आधारित आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य Anti-histamines और स्टेरॉयड से एलर्जी के लक्षण दबाना अग्नि सुधारकर और ‘आम’ हटाकर इम्युनिटी को प्राकृतिक रूप से संतुलित करना
नज़रिया एलर्जी को केवल बाहरी रिएक्शन मानना कमजोर पाचन, दूषित रक्त और इम्युनिटी असंतुलन को मूल कारण मानना
उपचार तरीका एंटी-हिस्टामिन और स्टेरॉयड दवाओं पर निर्भरता गिलोय, हल्दी और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना
डाइट और लाइफस्टाइल एलर्जी ट्रिगर्स से बचने की सीमित सलाह सात्विक आहार, अग्नि-वर्धक भोजन और दोष संतुलन पर ज़ोर
लंबा असर दवा छोड़ते ही मौसम बदलने पर एलर्जी दोबारा लौटना इम्युनिटी मजबूत होकर दीर्घकालिक और प्राकृतिक आराम मिलना

Allergy बढ़ने पर डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

समय पर सलाह लेने से शरीर को बड़ी जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के अनुसार मौसमी एलर्जी (Seasonal Allergy) बार-बार लौटना शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) के जमा होने और इम्युनिटी के कमज़ोर (ओजस क्षय) होने का स्पष्ट संकेत है। मौसम बदलने पर जब कमज़ोर इम्युनिटी बाहरी धूल या ठंडी हवा का सामना करती है, तो वात और कफ दोष भड़क जाते हैं, जिससे भयंकर छींकें और खाँसी आती है। बाहरी एंटी-एलर्जिक गोलियाँ सिर्फ लक्षणों को सुन्न करती हैं, बीमारी की जड़ को नहीं काटतीं। गिलोय और हल्दी जैसी असरदार आयुर्वेदिक औषधियों, नस्य पंचकर्म और सही गर्म आहार अपनाकर हम अपनी इम्युनिटी को पूरी तरह रिसेट कर सकते हैं।

FAQs

हाँ, आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और पंचकर्म से इम्युनिटी को रिसेट करके इसे जड़ से खत्म किया जा सकता है।

हाँ, रोज़ाना ऐसी दवाएँ खाने से शरीर का नेचुरल रिस्पांस सिस्टम सुस्त पड़ जाता है और प्राकृतिक इम्युनिटी घट जाती है।

बिल्कुल, बढ़ा हुआ वात नसों में रूखापन लाता है और कफ गाढ़ा होकर श्वसन तंत्र में रुकावट पैदा करता है, जिससे एलर्जी भड़कती है।

हाँ, हल्दी में प्राकृतिक एंटी-एलर्जिक गुण होते हैं। इसे गुनगुने दूध के साथ लेने से शरीर की इम्युनिटी तेज़ी से बढ़ती है।

हाँ, रात में दही, छाछ या आइसक्रीम जैसी ठंडी और भारी चीज़ें खाने से शरीर में तेज़ी से कफ बनता है जो एलर्जी को बढ़ाता है।

हाँ, नाक में औषधीय तेल की बूँदें डालने से जमा हुआ कफ पिघलता है और नाक की नसों की एलर्जी प्राकृतिक रूप से शांत होती है।

बिल्कुल, कमज़ोर पाचन से शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनता है, जो इम्युनिटी को कमज़ोर कर बाहरी धूल या परागकण के प्रति शरीर को संवेदनशील बना देता है।

हाँ, गिलोय एक बेहतरीन रसायन है जो खून से टॉक्सिन्स को साफ करता है और कमज़ोर ओजस (इम्युनिटी) को प्राकृतिक रूप से रिसेट करता है।

हाँ, भारी मानसिक तनाव से शरीर का वात दोष और कॉर्टिसोल बढ़ता है, जो सीधे रोग प्रतिरोधक क्षमता को गिरा देता है।

धूल और परागकण सिर्फ एक ट्रिगर हैं। असली कारण आपकी कमज़ोर इम्युनिटी है जो इन चीज़ों को दुश्मन समझकर भयंकर प्रतिक्रिया देती है।

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