Diseases Search
Close Button
 
 

हर मौसम बदलते ही ज़ुकाम और खाँसी क्यों बढ़ जाती है? क्या यह शरीर की अंदरूनी कमज़ोरी का संकेत है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

एंटीबायोटिक और तुरंत राहत देने वाले कफ सिरप व एंटी-एलर्जिक दवाओं का इस्तेमाल बार-बार होने वाले ज़ुकाम, खाँसी  और मौसम बदलने पर होने वाली बीमारियों में काफी आम है। ये दवाएँ और सिरप शरीर के अंदर बलगम को सुखा देते हैं या खाँसी  के दर्दनाक संकेतों को मस्तिष्क तक पहुँचने से कुछ समय के लिए रोक देते हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह पूरी तरह ठीक हो गया है और उसकी परेशानी खत्म हो गई है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि मरीज़ को दवा छोड़ने के तुरंत बाद और अगला मौसम आते ही फिर से भयंकर ज़ुकाम होने लगता है और सीने की जकड़न पहले से भी बड़े रूप में वापस आ जाती है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार भारी दवाएँ खाने से प्राकृतिक इम्युनिटी का कमज़ोर होना, बीमारी कितनी गंभीर है, दवाओं पर शरीर की निर्भरता, या सबसे महत्वपूर्ण शरीर में मौजूद अशुद्धियाँ, अंदर जमा टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं और कफ-वात दोष का असंतुलन। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और श्वसन तंत्र की सेहत प्राकृतिक रूप से बनी रहे।

मौसम बदलते ही ज़ुकाम और खाँसी  क्या है?

मौसम के बदलाव के दौरान तापमान में अचानक उतार-चढ़ाव होता है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ शरीर इस अचानक हुए बदलाव को आसानी से सहन नहीं कर पाता। आमतौर पर लोग इसका शिकार कमज़ोर इम्युनिटी, बहुत ज़्यादा ठंडी चीज़ें खाने, प्रदूषण या ठंडी हवा के कारण होते हैं। जब शरीर की ओजस (Immunity) कमज़ोर होती है, तो बाहरी वायरस और बैक्टीरिया आसानी से श्वसन तंत्र पर हमला कर देते हैं, जिससे नाक बहना, गले में खराश, बुखार और लगातार खाँसी  जैसी दिक्कतें होने लगती हैं। एंटीबायोटिक खाने पर कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है, लेकिन ये दवाएँ सिर्फ कीटाणुओं को मारती हैं, शरीर के अंदर मौजूद उस कमज़ोर इम्युनिटी को ठीक नहीं करतीं जिसमें इन्फेक्शन बार-बार पनपता है। दवा को बिना डॉक्टर की सलाह के लगातार इस्तेमाल करना शरीर के अच्छे बैक्टीरिया को भी खत्म कर देता है और लिवर व पाचन पर बुरा असर डालता है।

श्वसन तंत्र की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

मौसम बदलने पर होने वाली आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं

  • वायरल राइनाइटिस (Common Cold) यह सबसे आम ज़ुकाम है, जो मौसम बदलते ही वायरस के कारण होता है और 3 से 7 दिन तक रहता है।
  • एलर्जिक राइनाइटिस धूल, धुएं या पराग कणों के कारण अचानक छींकें आना और नाक से पानी बहना।
  • ब्रोंकाइटिस (Bronchitis) साँस की नलियों में सूजन आना, जिससे भयंकर खाँसी  और सीने में जकड़न होती है।
  • साइनसाइटिस (Sinusitis) साइनस में कफ भर जाना, जिससे सिरदर्द, नाक बंद और चेहरे पर भारीपन रहता है।

बार-बार ज़ुकाम और खाँसी  के लक्षण और संकेत

बार-बार बीमार पड़ना कई स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं

  • लगातार छींकें और नाक बहना सुबह उठते ही या ठंडी हवा लगते ही नाक से पानी आना और बंद हो जाना।
  • गले में खराश और दर्द कुछ भी निगलने में तकलीफ होना और गले में कांटे चुभने जैसा महसूस होना।
  • बलगम वाली या सूखी खाँसी  छाती में भारीपन के साथ पीला बलगम आना या रात के समय सूखी खाँसी  का दौरा पड़ना।
  • हल्का बुखार और शरीर टूटना शरीर का तापमान बढ़ना, भयंकर थकान और मांसपेशियों में दर्द रहना।
  • दवा का असर खत्म होते ही वापसी एंटीबायोटिक का कोर्स खत्म करते ही अगले मौसम में बीमारी का फिर से उभर आना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

हर मौसम में ज़ुकाम और खाँसी  बढ़ने के मुख्य कारण क्या हैं?

मौसम बदलते ही बार-बार बीमार पड़ने के पीछे सिर्फ बाहरी वायरस नहीं, बल्कि कई अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं

  • कमज़ोर रोग प्रतिरोधक क्षमता (Low Immunity) जब शरीर की अपनी ताकत (ओजस) कमज़ोर होती है, तो वह मौसम के बदलाव को बर्दाश्त नहीं कर पाती और शरीर जल्दी इन्फेक्शन पकड़ लेता है।
  • कफ दोष का बढ़ना आयुर्वेद के अनुसार वसंत या सर्दियों के मौसम में शरीर में प्राकृतिक रूप से कफ दोष बढ़ता है। अगर पाचन कमज़ोर हो, तो यह कफ सीने में जम जाता है।
  • कमज़ोर पाचन अग्नि (मंदाग्नि) पेट की अग्नि मंद होने से शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनता है, जो ऊपर की तरफ उठकर फेफड़ों और नाक में रुकावट पैदा करता है।
  • गलत खान-पान (विरुद्ध आहार) मौसम ठंडा होने पर भी फ्रिज का ठंडा पानी, आइसक्रीम और दही खाने से कफ तेज़ी से बिगड़ता है।
  • प्रदूषण और धूल बाहरी वातावरण में मौजूद धूल और धुआं साँस की नलियों को अति-संवेदनशील बना देते हैं।

ज़ुकाम और खाँसी  के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

इस बीमारी को अगर अनदेखा किया जाए या सिर्फ बाहरी सिरप पर निर्भर रहा जाए, तो यह कई जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं

  • अस्थमा (Asthma) अगर पुरानी खाँसी  को जड़ से ठीक न किया जाए, तो यह फेफड़ों की नलियों को सिकोड़ कर अस्थमा का रूप ले लेती है।
  • निमोनिया का खतरा इन्फेक्शन फेफड़ों के अंदर गहराई तक पहुँच जाने से भयंकर निमोनिया हो सकता है।
  • साइनस का इन्फेक्शन नाक बंद रहने से कफ साइनस में सड़ने लगता है, जिससे गंभीर सिरदर्द होता है।
  • कान का इन्फेक्शन गले और नाक का इन्फेक्शन कान की नली (Eustachian tube) तक फैल सकता है जिससे कान में तेज़ दर्द होता है।
  • शारीरिक कमज़ोरी बार-बार बीमार पड़ने से शरीर का वज़न कम होता है और हर समय भयंकर थकान छाई रहती है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से बार-बार मौसम बदलने पर होने वाली खाँसी  और ज़ुकाम सिर्फ गले या फेफड़ों की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'प्रतिश्याय' (ज़ुकाम) और 'कास' (खाँसी ) कहा जाता है और यह माना जाता है कि जब शरीर में कफ और वात दोष बिगड़ जाते हैं, और इम्युनिटी (ओजस) कमज़ोर हो जाती है, तब ऐसी परेशानी आती है। डॉक्टर नाड़ी और जीभ देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं शरीर में टॉक्सिन्स (आम) तो नहीं जमा हो गए हैं, जिसने श्वसन मार्गों (Pranavaha Srotas) को पूरी तरह दूषित कर दिया है। जब तक यह दूषित 'आम' और बिगड़ा हुआ कफ शरीर में रहेगा, मौसम बदलते ही कीटाणुओं को पनपने की जगह हमेशा मिलती रहेगी। आयुर्वेद में बस लक्षण मिटाना और बलगम सुखाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, श्वसन तंत्र की अंदरूनी शुद्धि हो और इम्युनिटी प्राकृतिक रूप से मज़बूत बने जिससे शरीर हर मौसम का सामना आसानी से कर सके।

इम्युनिटी बढ़ाने और खाँसी -ज़ुकाम के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में गले की खराश दूर करने, कफ को पिघलाकर बाहर निकालने और फेफड़ों को ताकत देने के लिए ये जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं

  • गिलोय यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Ojas) को मज़बूत करती है और मौसम बदलने पर होने वाले इन्फेक्शन से बचाती है।
  • तुलसी आयुर्वेद में इसे श्वसन रोगों के लिए बहुत शक्तिशाली माना गया है। यह कफ को पिघलाकर बाहर निकालती है और नाक को साफ करती है।
  • मुलेठी यह गले की खराश और सूखी खाँसी  को शांत करने के लिए बेहतरीन औषधि है। यह गले को प्राकृतिक नमी देती है।
  • वासा (अडूसा) यह जड़ी-बूटी फेफड़ों में जमे हुए सबसे ज़िद्दी बलगम को पिघलाकर बाहर निकालती है और साँस की नलियों को साफ करती है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, दूषित कफ और वात को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य और मज़बूत इम्युनिटी पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया

  • गहरी सफाई और फेफड़ों का शोधन जब खाँसी -ज़ुकाम हर महीने लौटता हो और शरीर बहुत कमज़ोर हो गया हो, तो जीवा आयुर्वेद में विशेष पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय यह 7 से 15 दिनों तक चलने वाली श्वसन तंत्र की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • नस्य कर्म नाक के ज़रिए औषधीय तेल (अणु तेल आदि) डालकर सिर और साइनस में जमे पुराने कफ और दोषों को बाहर निकाला जाता है।
  • वमन और स्वेदन छाती में जमे हुए भयंकर कफ को उल्टी के ज़रिए (वमन) बाहर निकाला जाता है, और छाती पर औषधीय तेल लगाकर भाप (स्वेदन) दी जाती है जिससे जमा हुआ बलगम पिघलता है।

ज़ुकाम और खाँसी  के रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, पुरानी खाँसी  और कमज़ोर इम्युनिटी को दूर करने के लिए गर्म तासीर, हल्का, पचने में आसान और शरीर के कफ को संतुलित करने वाला आहार चुनना महत्वपूर्ण है

क्या खाएँ?

  • गर्म पानी और काढ़ा दिन भर हल्का गर्म पानी पिएँ। तुलसी, अदरक और काली मिर्च का काढ़ा फेफड़ों की सफाई करता है और इम्युनिटी बढ़ाता है।
  • नरम और सुपाच्य भोजन पुरानी मूंग दाल की खिचड़ी, दलिया और उबली हुई ताज़ी सब्ज़ियाँ खाएँ, जो पचने में आसान हों और अग्नि को बढ़ाएँ।
  • शहद और अदरक का रस एक चम्मच शहद में ताज़े अदरक का रस मिलाकर दिन में दो-तीन बार चाटें, यह प्राकृतिक कफ नाशक है।

क्या न खाएँ?

  • ठंडी चीज़ें और बर्फ फ्रिज का पानी, कोल्ड ड्रिंक्स और आइसक्रीम खाना बिल्कुल बंद कर दें, ये खाँसी  और ज़ुकाम को तेज़ी से भड़काते हैं।
  • दही और केला विशेष रूप से रात के समय दही, केला और ठंडे फल खाने से शरीर में कफ और बलगम तेज़ी से जमता है।
  • जंक फूड और गरिष्ठ भोजन मैदे से बनी चीज़ें और भारी तली-भुनी चीज़ों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, क्योंकि यह शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ाते हैं और इम्युनिटी कमज़ोर करते हैं।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में रोगों का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है

  • बीमारी और शरीर की स्थिति ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे इम्युनिटी कितनी कमज़ोर है, सीने में जकड़न कितनी है, और मरीज़ का कफ कितना बिगड़ा हुआ है।
  • हल्की समस्या में सुधार अगर यह समस्या अभी शुरू हुई है, तो आमतौर पर 2 से 4 हफ्तों में ही गले का दर्द, ज़ुकाम और खाँसी  शांत होने लगती है।
  • पुरानी बीमारी का समय अगर आप हर मौसम में बीमार पड़ते हैं और सालों से एंटीबायोटिक्स का बहुत असर हो चुका है, तो फेफड़ों को पूरी तरह शुद्ध होने और अंदरूनी कमज़ोरी दूर होने में 2 से 4 महीने भी लग सकते हैं।
  • उपचार का तरीका इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से वात-कफ शामक जड़ी-बूटियाँ, इम्युनिटी बूस्टर औषधियां, सही खानपान और प्राणायाम करना शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम मरीज़ अगर अपनी डाइट का कड़ाई से पालन करता है, तो दोष संतुलित हो जाते हैं और भविष्य में मौसम बदलने पर बीमार पड़ने की संभावना लगभग खत्म हो जाती है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

यह मेरा बेटा है, अब यह बिल्कुल ठीक है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। जब यह छोटा था, तो इसे कोल्ड (cold) और खाँसी  की बहुत समस्या रहती थी। हम घर में एसी (AC) नहीं चला सकते थे क्योंकि हमें डर लगता था कि इसे तुरंत जुकाम हो जाएगा। बच्चा सोते समय अपनी पोजीशन पर होता था, लेकिन उसे साँस  लेने में भी दिक्कत होती थी। अगर उसे कुछ खिलाओ, तो वह तुरंत उल्टी कर देता था। 

हम दोनों बहुत लाचार महसूस करते थे कि क्या करें। हमने एलोपैथी करा ली थी और घर के सारे नुस्खे भी आजमा लिए थे। बच्चा इतनी दवाइयां खा रहा था कि उसे संभालना मुश्किल था। वह एक ऐसी सिचुएशन थी जिसमें मुझे बहुत परेशानी होती थी।

फिर एक दिन मेरे फ्रेंड आए और उन्होंने मुझे जीवा आयुर्वेदा के बारे में बताया। शुरुआत में मन में कोई भरोसा नहीं था, फिर भी हम गए। डॉक्टर ने बहुत अच्छे से परामर्श किया। उन्होंने अपना बना हुआ एक चूर्ण, बाल ओजस और अणु तेल दिया।सिर्फ 2 महीने के गैप में ही पता नहीं कहाँ इसका दर्द खत्म होने लगा और मुझे बहुत राहत मिली। अगर मैं पीछे मुड़कर देखूँ कि मेरा बच्चा पहले कैसा था और अब कैसा है, तो भगवान के बाद अगर मैं किसी को थैंक्स बोलना चाहूँगी, तो वह जीवा आयुर्वेदा और उनके डॉक्टर्स को। उन्होंने मेरे बच्चे की प्रकृति को समझते हुए उसका पूरा ट्रीटमेंट किया और आज वह मेरे साथ बिल्कुल खुश है।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

खाँसी -ज़ुकाम और इम्युनिटी की बीमारी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है

तुलना का आधार आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
उपचार का दृष्टिकोण लक्षणों को दबाने पर केंद्रित बीमारी की जड़ पर काम करना
कार्य करने का तरीका कफ सिरप/एंटी-एलर्जिक से छींक और खाँसी को तुरंत रोकना बलगम को पिघलाकर बाहर निकालना और शरीर को मजबूत करना
मूल कारण पर प्रभाव कफ के मूल कारण और अंदरूनी कमजोरी को ठीक नहीं करता कफ-वात असंतुलन, टॉक्सिन्स और कमजोरी को संतुलित करता है
उपचार विधियाँ कफ सिरप, एंटी-एलर्जिक दवाइयाँ गिलोय, तुलसी, वासा जैसी जड़ी-बूटियाँ और संतुलित आहार
दुष्प्रभाव सुस्ती, दवा छोड़ते ही समस्या लौटना सामान्यतः सुरक्षित, प्राकृतिक सुधार
परिणाम अस्थायी राहत श्वसन तंत्र मजबूत, स्थायी आराम
समय जल्दी असर थोड़ा समय लगता है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

मौसम बदलने पर होने वाले ज़ुकाम-खाँसी  में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि

  • खाँसी  और ज़ुकाम 2-3 हफ्ते से ज़्यादा समय तक बना रहे और किसी घरेलू उपाय से कम न हो।
  • खांसते समय बलगम में खून दिखाई देने लगे या बलगम का रंग बहुत गाढ़ा हरा हो जाए।
  • सांस लेने में भयंकर दिक्कत हो और छाती में तेज़ दर्द रहने लगे।
  • लगातार तेज़ बुखार हो और शरीर में भयंकर थकान व वज़न कम होने लगे।
  • रात को सोते समय अचानक सांस रुकने लगे या घरघराहट (Wheezing) की आवाज़ आए।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और फेफड़ों को स्थायी रूप से खराब होने से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से हर मौसम बदलते ही बार-बार होने वाला ज़ुकाम और खाँसी  मुख्य रूप से शरीर की अंदरूनी कमज़ोरी (ओजस की कमी), वात और कफ दोष के बिगड़ने तथा कमज़ोर पाचन के कारण 'आम' के जमा होने से जुड़ी होती है। ठंडी चीज़ें खाने, गलत खान-पान और कमज़ोर इम्युनिटी से फेफड़ों और सांस की नलियों में कीटाणु आसानी से हमला कर देते हैं। सिर्फ कफ सिरप पीने या एंटीबायोटिक खाने से लक्षण छिप जाते हैं लेकिन शरीर की ताकत नहीं बढ़ती। इलाज में श्वसन मार्गों की अंदरूनी शुद्धि और शरीर को ताकत देना सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें दोषों को संतुलित करना, गर्म पानी पीना, गिलोय-तुलसी जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना और सही खान-पान अपनाना शामिल है जिससे बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, जब शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता (ओजस) कमज़ोर होती है, तो शरीर मौसम के बदलाव और बाहरी कीटाणुओं का सामना नहीं कर पाता।

नहीं, एंटीबायोटिक सिर्फ बैक्टीरियल इन्फेक्शन को रोकती हैं। यह शरीर की अंदरूनी ताकत नहीं बढ़ातीं, जिससे बीमारी बार-बार लौटती है।

हाँ, विशेष रूप से रात के समय दही और केला शरीर में कफ दोष को तेज़ी से बढ़ाते हैं, जिससे खाँसी  और बलगम भड़कता है।

हाँ, गिलोय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (ओजस) को बहुत ताकत देती है, जो बार-बार होने वाले वायरल इन्फेक्शन को रोकती है।

हाँ, फ्रिज का ठंडा पानी और आइसक्रीम गले और श्वसन मार्गों की नलियों को सिकोड़ कर कफ को तुरंत ट्रिगर करते हैं।

हाँ, आयुर्वेद में वासा को सबसे शक्तिशाली कफ निस्सारक माना गया है, जो जमे हुए ज़िद्दी बलगम को पिघलाकर बाहर करता है।

हाँ, कब्ज़ और खराब पाचन से शरीर में टॉक्सिन्स (आम) जमा होते हैं जो ऊपर की तरफ उठकर फेफड़ों में रुकावट और खाँसी  पैदा करते हैं।

हाँ, अदरक का रस और शहद कफ को पिघलाने और गले के इन्फेक्शन को खत्म करने का सबसे बेहतरीन प्राकृतिक उपाय है।

हाँ, आयुर्वेद में नस्य कर्म (नाक में औषधीय तेल डालना) नाक और साइनस की रुकावट खोलने और नसों को मज़बूत करने का सबसे बेहतरीन तरीका है।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us