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बार-बार गले में जलन और खांसी: Silent Reflux (LPR) के छुपे संकेत क्या हैं?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

क्या आपको अक्सर ऐसा महसूस होता है कि आपके गले में कुछ फंसा हुआ है? या फिर बिना किसी ज़ुकाम के आपको बार-बार खांसी आती है और गला जलता रहता है? ज़्यादातर लोग इसे मामूली एलर्जी या गले का इन्फेक्शन समझकर कफ़ सिरप पीने लगते हैं। लेकिन हक़ीक़त में यह साइलेंट रिफ्लक्स (LPR) का संकेत हो सकता है। इसे 'साइलेंट' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें आम एसिडिटी की तरह छाती में जलन नहीं होती बल्कि एसिड सीधे आपके गले और आवाज़ की नली को नुक़सान पहुँचाता है। इसे समय पर पहचानना और इलाज करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि अनदेखी करने पर यह आवाज़ का भारीपन और सॉंस की नली में गंभीर सूजन पैदा कर सकता है।

साइलेंट रिफ्लक्स (LPR) क्या होता है?

आसान भाषा में कहें तो हमारे पेट में भोजन पचाने के लिए शक्तिशाली एसिड बनता है। सामान्य तौर पर पेट और खाने की नली के बीच का 'वॉल्व' इस एसिड को नीचे ही रखता है। लेकिन जब यह वॉल्व ढीला पड़ जाता है तो एसिड ऊपर की ओर चढ़कर आपके गले (Larynx) और ग्रासनली (Pharynx) तक पहुँच जाता है। चूंकि गले की परत पेट के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा कोमल होती है इसलिए थोड़ा सा एसिड भी वहां तेज़ जलन और सूजन पैदा कर देता है।

साइलेंट रिफ्लक्स (LPR) के लक्षण

साइलेंट रिफ्लक्स के लक्षण आम एसिडिटी से काफ़ी अलग होते हैं

गले में कुछ फंसा हुआ महसूस होना (Globus Pharyngeus) ऐसा लगता है जैसे गले में कोई गांठ या 'गोला' अटका है जिसे निगलना मुश्किल हो रहा है।

पुरानी खांसी (Chronic Cough) बार-बार गले को साफ़ करने की इच्छा होना और सूखी खांसी आना।

आवाज़ में भारीपन (Hoarseness) सुबह उठने पर आवाज़ का बैठ जाना या बोलने में तकलीफ़ होना।

गले में कड़वा स्वादमुँह के पिछले हिस्से में अचानक खट्टा या कड़वा पानी महसूस होना।

सॉंस लेने में दिक़्क़त कुछ मामलों में रात को सोते समय अचानक सॉंस फूलना या गले में जकड़न महसूस होना।

साइलेंट रिफ्लक्स के कारण

कमज़ोर स्फिंक्टर (Sphincter) खाने की नली का निचला हिस्सा सही से बंद न होना।

ग़लत खान-पान बहुत ज़्यादा चाय-कॉफ़ी शराब कार्बोनेटेड ड्रिंक्स और तला-भुना मसालेदार भोजन।

देर रात भोजन रात को भारी खाना खाकर तुरंत सो जाने से एसिड ऊपर की ओर दबाव बनाता है।

मोटापा और तनाव पेट पर बढ़ता दबाव और मानसिक तनाव पाचन तंत्र को सुस्त कर देता है।

जोखिम और जटिलताएँ 

साइलेंट रिफ्लक्स को 'साइलेंट' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह धीरे-धीरे आपके गले की कोमल परतों को अंदर से खोखला करता रहता है। इसकी अनदेखी करना भविष्य में बहुत भारी पड़ सकता है।

किन लोगों को इसका 'ज़्यादा' ख़तरा है? 

व्यावसायिक आवाज़ का उपयोग गायक शिक्षकऔर कॉल सेंटर में काम करने वाले लोग जो अपनी आवाज़ का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं। उनके वोकल कॉर्ड्स पहले से ही तनाव में होते हैं और एसिड का एक छोटा सा अंश भी उन्हें बुरी तरह प्रभावित करता है।

देर रात खाने की आदत वे लोग जो रात को 10-11 बजे भारी भोजन करते हैं और तुरंत सो जाते हैं। सोते समय गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण एसिड बहुत आसानी से गले तक पहुँच जाता है।

मोटापा पेट के आसपास की अतिरिक्त चर्बी आंतों और 'लोअर इसोफेजियल स्फिंक्टर' पर दबाव डालती है जिससे एसिड ऊपर की ओर लीक होने लगता है।

तनावपूर्ण जीवनशैली अत्यधिक मानसिक तनाव और कम नींद पाचन अग्नि को बिगाड़ देती है जिससे एसिड का रिफ्लक्स बढ़ जाता है।

इलाज न मिलने पर होने वाली जटिलताएँ 

क्रॉनिक लैरिंजाइटिस (Chronic Laryngitis) गले में लगातार सूजन रहने से आवाज़ स्थायी रूप से भारी या फटी-फटी हो सकती है।

वोकल कॉर्ड नोड्यूल्स (Granulomas) एसिड की मार से वोकल कॉर्ड्स पर छोटे-छोटे दाने या गांठें बन सकती हैं जिन्हें ठीक करने के लिए कभी-कभी सर्जरी की नौबत आ जाती है।

फेफड़ों की समस्या (Respiratory Issues) यदि एसिड के महीन कण सॉंस की नली में चले जाएं तो यह अस्थमा (Asthma) ब्रोंकाइटिस और बार-बार निमोनिया होने का कारण बन सकता है।

बैरेट की ग्रासनली (Barrett’s Esophagus) लंबे समय तक एसिड के संपर्क में रहने से खाने की नली की कोशिकाएं (Cells) बदलने लगती हैं जो आगे चलकर कैंसर का जोखिम बढ़ा सकती हैं।

कान में इन्फेक्शन साइलेंट रिफ्लक्स का एसिड कभी-कभी कान और गले को जोड़ने वाली नली ( तक पहुँच जाता है जिससे कान में दर्द और भारीपन महसूस होता है।

साइलेंट रिफ्लक्स (LPR) की जाँच कैसे होती है? 

चूंकि इसमें छाती में जलन (Heartburn) नहीं होती इसलिए इसकी जाँच के लिए विशेष तरीक़ों की ज़रूरत पड़ती है

लैरिंजोस्कोपी (Laryngoscopy) यह सबसे महत्वपूर्ण जाँच है। इसमें डॉक्टर एक बहुत ही पतली और लचीली ट्यूब को नाक या मुँह के ज़रिए गले तक ले जाते हैं। इसके कैमरे से वोकल कॉर्ड्स की लाली सूजन और टिशू के नुक़सान को साफ़ देखा जाता है।

24-घंटे pH मॉनिटरिंग इसमें एक बहुत ही महीन तार नाक के ज़रिए खाने की नली में डाला जाता है जो अगले 24 घंटों तक यह रिकॉर्ड करता है कि आपके पेट का एसिड कितनी बार और कितनी ऊँचाई (गले तक) तक पहुँच रहा है। यह साइलेंट रिफ्लक्स को पकड़ने का सबसे सटीक तरीक़ा है।

इसोफेजियल मैनोमेट्री (Manometry) इस टेस्ट के ज़रिए यह जाँच की जाती है कि आपकी ग्रासनली (Esophagus) की मांसपेशियाँ भोजन को नीचे धकेलने और एसिड को रोकने के लिए कितनी मज़बूती से काम कर रही हैं।

बेरियम स्वैलो (Barium Swallow) मरीज़ को एक विशेष तरल पदार्थ पिलाया जाता है और फिर एक्स-रे लिया जाता है। इससे यह पता चलता है कि खाने की नली में कोई रुकावट अल्सर या स्ट्रक्चरल समस्या तो नहीं है।

आयुर्वेद में साइलेंट रिफ्लक्स (अम्लपित्त)

आयुर्वेद में LPR को 'ऊर्ध्वग अम्लपित्त' के रूप में समझा जाता है।

दोषों का असंतुलन इसके पीछे मुख्य रूप से 'पाचक पित्त' का बढ़ना और 'व्यान वायु' का असंतुलित होना ज़िम्मेदार है। जब पित्त की गर्मी और अम्लता (Acidity) बढ़ जाती है तो वायु उसे ऊपर की ओर धकेलती है जिससे गले के कोमल ऊतकों (Tissues) में जलन होती है।

असली वजह आयुर्वेद के अनुसार इसकी जड़ 'विदग्धाग्नि' है। जब भोजन सही से नहीं पचता तो वह एसिडिक हो जाता है और शरीर में जलन पैदा करता है। यह पित्त की विदाई और कफ़ दोष के बिगड़ने का मिश्रण है जिससे गले में चिपचिपाहट और भारीपन महसूस होता है।

क्या खाएं और क्या न खाएं? 

क्या खाएं (फ़ायदेमंद)

भरपूर पानी और नारियल पानी।

अदरक गिलोय और लहसुन का काढ़ा।

पुराना चावल मूंग की दाल और लौकी-तोरई।

ताज़ा और हल्का सुपाच्य भोजन।

क्या न खाएं (परहेज़)

लाल मांस (Red Meat) और शराब।

उड़द की दाल राजमा और बहुत ज़्यादा पनीर।

मैदा सफ़ेद चीनी और ज़्यादा नमक।

खट्टी चीज़ें (दही अचार इमली)।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

आधुनिक  इलाज आयुर्वेदिक  इलाज
नज़रिया मुख्य रूप से दर्द के लक्षणों (Pain) को दबाने पर ज़ोर देता है नज़रिया दर्द की जड़ 'वात दोष' और 'अग्नि' को संतुलित करने पर काम करता है
दवाइयाँ पेनकिलर्स स्टेरॉयड इंजेक्शन या मसल रिलैक्सेंट्स दवाइयाँ जड़ी-बूटियाँ (जैसे शल्लकी अश्वगंधा) जो नसों को पोषण देती हैं
प्रक्रिया गंभीर मामलों में सीधे सर्जरी की सलाह दी जाती है प्रक्रिया पंचकर्म (कटि बस्ती स्नेहन) के ज़रिए बिना सर्जरी सुधार का प्रयास
दुष्प्रभाव लंबे समय तक पेनकिलर्स लेने से किडनी और पेट पर असर पड़ सकता है दुष्प्रभाव सामान्यतः प्राकृतिक उपचार जो पूरे शरीर के संतुलन पर काम करते हैं
नतीजा तुरंत राहत मिल सकती है लेकिन समस्या दोबारा होने का खतरा रहता है नतीजा सुधार में समय लगता है पर लंबे समय तक राहत मिल सकती है

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए? 

गले की हल्की जलन को 'मामूली सर्दी' समझकर छोड़ देना साइलेंट रिफ्लक्स को गंभीर बना सकता है। यदि आपको नीचे दिए गए ख़तरनाक संकेत महसूस हों तो तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लेना ज़रूरी है

आवाज़ का लगातार बैठना यदि आपकी आवाज़ में भारीपन (Hoarseness) 2 हफ़्तों से ज़्यादा बना रहे और आराम करने पर भी ठीक न हो।

निगलने में कठिनाई (Dysphagia) यदि खाना या पानी निगलते समय गले में रुकावट या दर्द महसूस हो रहा हो।

सॉंस लेने में तकलीफ़ रात को सोते समय अचानक खांसी के साथ दम घुटना या सॉंस लेने में घरघराहट होना।

गले में गांठ का अहसास यदि ऐसा लगे कि गले में कोई चीज़ स्थायी रूप से अटकी हुई है और वह निगलने से भी नीचे नहीं जा रही।

तेज़ी से वज़न कम होना गले की समस्या के साथ-साथ यदि बिना किसी कारण के आपका वज़न गिर रहा हो।

पुरानी सूखी खांसी ऐसी खांसी जो कफ़ सिरप या एंटीबायोटिक्स लेने के बाद भी ठीक नहीं हो रही हो।

निष्कर्ष

बार-बार गले में जलन और खांसी केवल एक ऊपरी समस्या नहीं बल्कि आपके शरीर के आंतरिक 'पित्त संतुलन' के बिगड़ने की गंभीर चेतावनी है। साइलेंट रिफ्लक्स (LPR) को नज़रअंदाज़ करना आपके वोकल कॉर्ड्स और श्वसन तंत्र को स्थायी नुक़सान पहुँचा सकता है। केवल लक्षणों को दबाने वाली दवाएँ लेना काफ़ी नहीं है बल्कि होल्स्टिक हीलिंग (Holistic Healing) यानी पूरे शरीर के संतुलन पर ध्यान देना ही असली समाधान है।

आयुर्वेद न केवल आपके गले की जलन को शांत करता है बल्कि आपकी 'पाचन अग्नि' (Agni) को मज़बूत कर एसिड के रिफ्लक्स को जड़ से रोकता है। सही समय पर आयुर्वेदिक उपचार अनुशासित जीवनशैली और जड़ी-बूटियों का मेल आपको एक स्वस्थ और सक्रिय जीवन की ओर ले जा सकता है। याद रखिए आपके पाचन की सेहत ही आपके गले और आवाज़ की सुरक्षा की बुनियाद है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, GERD में मुख्य रूप से छाती में जलन (Heartburn) होती है, जबकि LPR में एसिड सीधे गले तक पहुँचता है और छाती में जलन अक्सर नहीं होती।

जी हाँ, अत्यधिक तनाव पाचन तंत्र को सुस्त करता है और एसिड के उत्पादन को अनियंत्रित कर देता है, जिससे रिफ्लक्स की समस्या बढ़ जाती है।

बिल्कुल, सोते समय सिर को 6-8 इंच ऊँचा रखने से गुरुत्वाकर्षण (Gravity) एसिड को ऊपर गले तक चढ़ने से रोकने में मदद करता है।

यदि इसे सालों तक बिना इलाज के छोड़ दिया जाए, तो एसिड से होने वाली लगातार सूजन कोशिकाओं में बदलाव कर कैंसर का जोखिम बढ़ा सकती है।

हाँ, गुनगुना पानी पीने से आंतों की सफ़ाई होती है और पित्त शांत रहता है, जो एसिडिटी को नियंत्रित करने में सहायक है।

चाय और कॉफ़ी में मौजूद कैफीन पेट के वॉल्व (LES) को ढीला कर देता है। इन्हें छोड़ने से रिफ्लक्स में बहुत जल्दी सुधार दिखता है।

जी हाँ, 'यष्टिमधु' जैसी जड़ी-बूटियाँ और 'कवल' (गार्गल) जैसी थेरेपी वोकल कॉर्ड की सूजन और लाली को कम करने में बहुत प्रभावी हैं।

नहीं, आयुर्वेद के अनुसार रात को फल खाने से कफ़ और पित्त असंतुलित हो सकते हैं, जिससे रिफ्लक्स की समस्या बढ़ सकती है।

हाँ, कब्ज़ के कारण पेट के अंदर का दबाव (Intra-abdominal pressure) बढ़ जाता है, जो एसिड को ऊपर की ओर धकेलता है।

आमतौर पर सही परहेज़ और दवाओं के साथ 15-20 दिनों में गले की जलन और खांसी में साफ़ सुधार महसूस होने लगता है।

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