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थायरॉइड में सूजन और गले में भारीपन – दीर्घकालिक उपचार की संभावना

Information By Dr. Keshav Chauhan

परिचय

गले में कुछ अटका हुआ महसूस होना या कुछ निगलते वक्त दिक्कत होना आजकल बहुत आम बात हो गई है। कई बार आप शीशे में देखते होंगे तो गर्दन के निचले हिस्से में हल्की सी सूजन या भारीपन नजर आता होगा। आज की इस भागदौड़ और स्ट्रेस से भरी जिंदगी में थायरॉइड की दिक्कत घर-घर में देखने को मिल रही है। गले में भारीपन के साथ-साथ बहुत ज्यादा थकान रहना, अचानक से वजन बढ़ जाना या कम हो जाना और बालों का गिरना भी इसके साथ ही शुरू हो जाता है। अक्सर हम लोग इस सूजन को आम खराश या मौसम का असर मानकर इग्नोर कर देते हैं, लेकिन अगर यह महीनों तक ऐसे ही रहे, तो यह साफ इशारा है कि आपकी थायरॉइड ग्रंथि कमजोर पड़ रही है।  

थायरॉइड में सूजन और गले में भारीपन क्या है?

अगर आपको गले में भारीपन या सूजन लग रही है, तो इसका सीधा सा मतलब है कि गर्दन के सामने वाले हिस्से में मौजूद तितली के आकार की थायरॉइड ग्रंथि में सूजन आ गई है। मेडिकल की भाषा में इसे 'गोइटर' या घेंघा कहते हैं।

यह ग्रंथि हमारे शरीर में एक इंजन की तरह काम करती है। यह हमारे मेटाबॉलिज्म, एनर्जी और शरीर के तापमान को सही रखने वाले जरूरी हार्मोन बनाती है। जब हमारे खान-पान में गड़बड़ी होती है या शरीर में आयोडीन की कमी हो जाती है, तो यह ग्रंथि अपना काम ठीक से नहीं कर पाती। ऐसे में शरीर की जरूरतें पूरी करने के लिए हमारा दिमाग इस ग्रंथि पर और ज्यादा हार्मोन बनाने का जोर डालता है। इसी जोर और ज्यादा काम के कारण यह फूलने लगती है, जिससे गले में बाहर से सूजन और अंदर से घुटन या भारीपन महसूस होने लगता है।

इसके प्रकार

थायरॉइड की सूजन और गले के भारीपन को मुख्य रूप से इन प्रकारों में बांटा जा सकता है:

  • हाइपोथायरायडिज्म (हार्मोन की कमी): इस स्थिति में ग्रंथि सूज तो जाती है, लेकिन जरूरत के हिसाब से हार्मोन नहीं बना पाती। इससे शरीर का वजन तेजी से बढ़ता है और हमेशा सुस्ती छाई रहती है।
  • हाइपरथायरायडिज्म (हार्मोन की अधिकता): इसमें ग्रंथि जरूरत से बहुत ज्यादा हार्मोन बनाने लगती है, जिससे वजन अचानक गिरने लगता है और घबराहट महसूस होती है।
  • ऑटोइम्यून सूजन (हाशिमोटो रोग): इसमें शरीर का अपना ही इम्यून सिस्टम गलती से थायरॉइड ग्रंथि को दुश्मन समझकर उस पर हमला कर देता है, जिससे भारी सूजन आ जाती है।
  • नोड्यूलर गोइटर: इसमें पूरी ग्रंथि एक साथ सूजने की बजाय उसके अंदर छोटी-छोटी गांठें बन जाती हैं।

 लक्षण और संकेत

 लंबे समय तक थायरॉइड ग्रंथि में सूजन रहने से मरीजों को इन परेशानियों का सामना करना पड़ता है:

  •  गर्दन के निचले हिस्से में साफ तौर पर कोई उभार या सूजन दिखाई देना।
  •  कुछ भी निगलते या सांस लेते समय गले में कुछ फंसा हुआ लगना या घुटन महसूस होना।
  •  आवाज़ में अचानक से भारीपन आ जाना या गला बैठ जाना
  •  थोड़ा सा काम करने पर भी बहुत ज्यादा थक जाना और शरीर की सारी एनर्जी खत्म लगना।
  •  बिना किसी खास वजह के वजन का बहुत तेजी से बढ़ जाना या कम हो जाना।
  •  मौसम के हिसाब से बहुत ज्यादा ठंड या बहुत ज्यादा गर्मी बर्दाश्त न कर पाना।

मुख्य कारण

 इस ग्रंथि में सूजन और हार्मोन के बिगड़ने के पीछे हमारी रोजमर्रा की कुछ गलतियां जिम्मेदार होती हैं:

  • पोषक तत्वों की कमी: खाने में आयोडीन, सेलेनियम और जिंक जैसी जरूरी चीजों की कमी होना।
  • मानसिक तनाव और चिंता: ज्यादा स्ट्रेस लेने से दिमाग और थायरॉइड का आपस का कनेक्शन टूट जाता है। आयुर्वेद भी मानता है कि अपनी भावनाओं या गुस्से को दबाकर रखने का सीधा असर गले पर पड़ता है।
  • खराब जीवनशैली: मैदा, बहुत ज्यादा चीनी और बासी खाना शरीर के मेटाबॉलिज्म को एकदम धीमा कर देते हैं।
  • अंदरूनी सूजन: गलत खाने-पीने की वजह से आंतों में बनने वाले टॉक्सिन्स (गंदगी) शरीर के अंदर सूजन पैदा करते हैं, जो थायरॉइड तक पहुंच जाती है।

जोखिम और जटिलताएं

अगर इस परेशानी को सिर्फ दवाइयों के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो शरीर में कई गंभीर दिक्कतें आ सकती हैं:

  • सांस और खाने की नली पर दबाव: सूजन बहुत ज्यादा बढ़ने पर यह सांस और खाने की नली को दबाने लगती है, जिससे सांस लेने में काफी दिक्कत हो सकती है।
  • दिल की बीमारियां: हार्मोन का बैलेंस बिगड़ने से दिल की धड़कन बहुत तेज या बहुत धीमी हो सकती है, जिससे आगे चलकर हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है।
  • प्रजनन पर असर: महिलाओं में इसकी वजह से माहवारी का चक्र पूरी तरह बिगड़ जाता है और कंसीव करने में काफी परेशानी आती है।
  • नसों को नुकसान: लंबे समय तक इसका इलाज न होने से शरीर की नसें कमजोर पड़ सकती हैं और सुन्नपन आ सकता है।

प्राकृतिक रूप से बीमारी और लक्षणों की पहचान कैसे करें?

नेचुरल हेल्थ साइंस में मशीनों से ज्यादा शरीर के अपने इशारों को गहराई से समझा जाता है:

  • पानी निगलने का टेस्ट: शीशे के सामने खड़े होकर एक घूंट पानी पिएं। पानी निगलते वक्त अपनी गर्दन के निचले हिस्से को ध्यान से देखें। अगर कोई असामान्य उभार या गांठ ऊपर-नीचे होती हुई दिखे, तो यह थायरॉइड सूजन का साफ इशारा है।
  • तापमान चेक करना: अगर गर्मियों के मौसम में भी आपको बहुत ज्यादा ठंड लगती है और हाथ-पैर ठंडे ही रहते हैं, तो समझ लीजिए कि यह ग्रंथि कमजोर पड़ रही है।
  • थकान पर गौर करें: अगर 8 घंटे की अच्छी और गहरी नींद के बाद भी आपको उठने में संघर्ष करना पड़ता है और थकान लगती है, तो यह आम थकान नहीं है, बल्कि थायरॉइड की वजह से मेटाबॉलिज्म का धीमा पड़ना है।

आयुर्वेद का दृष्टिकोण

आयुर्वेद में इसे 'गलगंड' या 'गंडमाला' के नाम से बहुत ही गहराई से समझाया गया है। आयुर्वेद के मुताबिक यह परेशानी मुख्य रूप से शरीर में 'कफ दोष' के बहुत ज्यादा बढ़ने और 'मेद धातु' (चर्बी) के खराब होने की वजह से होती है।

जब हमारी पाचन अग्नि (खाना पचाने की ताकत) कमजोर पड़ जाती है, तो खाया हुआ भोजन पचने की जगह पेट में सड़ने लगता है और 'आम' नाम का एक विषैला और चिपचिपा पदार्थ बनाता है। यही बढ़ा हुआ कफ और आम गले में जाकर नसों को ब्लॉक कर देते हैं और एक भारी सूजन पैदा कर देते हैं। इसी कफ के बढ़ने की वजह से ग्रंथि सुस्त पड़ जाती है और शरीर में आलस, सुस्ती और मोटापा बढ़ने लगता है।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण

जीवा आयुर्वेद में, हर मरीज़ की बहुत गहराई से जांच की जाती है क्योंकि हर इंसान के शरीर की बनावट और स्वास्थ्य की स्थिति बिल्कुल अलग होती है। इलाज शुरू करने से पहले, हमारे आयुर्वेद विशेषज्ञ कई ज़रूरी बातों पर ध्यान देते हैं, जैसे:

  • शरीर की प्रकृति की जांच: बीमारी की असली वजह जानने के लिए वात, पित्त और कफ दोषों के आधार पर मरीज़ के शरीर की सामान्य बनावट को समझना और परखना।
  • लक्षणों की जांच: मरीज़ को हो रही परेशानी और बीमारी के मुख्य लक्षणों की बारीकी से जांच करना और उनकी गंभीरता को समझना।
  • पुराने स्वास्थ्य इतिहास की जांच: मरीज़ की पुरानी बीमारियों, पिछले इलाज और स्वास्थ्य से जुड़ी पुरानी समस्याओं के इतिहास को देखना और समझना।
  • जीवनशैली का मूल्यांकन: मरीज़ के रोज़मर्रा के जीवन को समझना, जैसे उनका खान-पान, सोने का तरीका, दिन भर की शारीरिक मेहनत और मानसिक तनाव का स्तर।
  • आसपास के माहौल की जांच: बीमारी को बढ़ाने वाले बाहरी कारणों की जांच करना, जैसे हवा में प्रदूषण, धूम्रपान की आदत या काम करने की जगह पर धूल और रसायनों के संपर्क में आना।
  • दोषों के असंतुलन की जांच: शरीर में कफ, वात या पित्त दोषों के बिगड़ने की गहराई से जांच करना, जो इंसान के शरीर के सामान्य काम-काज और स्वास्थ्य में रुकावट डालते हैं।

इस रोग के लिए महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां

  • कचनार गुग्गुल: यह थायरॉइड की सूजन और गांठों के लिए आयुर्वेद की बहुत ही असरदार दवा मानी जाती है। यह गले में जमे हुए कफ को पिघलाकर सूजन को नेचुरल तरीके से कम करती है।
  • अश्वगंधा: यह स्ट्रेस को कम करने में काफी मददगार है और दिमाग तथा थायरॉइड के बीच के आपसी संपर्क को सुधारती है।
  • पुनर्नवा: यह पूरे शरीर और खास तौर पर गले की सूजन को घटाती है और खराब हो चुकी कोशिकाओं को नई जान देती है।
  • त्रिकटु (सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली): यह मिश्रण कमजोर पड़े पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है, जिससे 'आम' पच जाता है और मेटाबॉलिज्म तेज होता है।
  • जलकुंभी: यह नेचुरल आयोडीन का एक बहुत अच्छा साधन है जो ग्रंथि को उसका जरूरी पोषण देता है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी

जब थायरॉइड की सूजन काफी पुरानी हो जाए और वजन लगातार बढ़ रहा हो, तो ऐसे में जीवा आयुर्वेद में 'उद्वर्तन' और 'नस्य' जैसी पंचकर्म थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। उद्वर्तन में हर्बल पाउडर से शरीर की मालिश की जाती है, जो जिद्दी चर्बी और जमे हुए कफ को पिघलाती है। नस्य में नाक के रास्ते से औषधीय तेल डाला जाता है, जो सीधे दिमाग और गले की ग्रंथियों पर असर करके थायरॉइड को फिर से एक्टिव करने में मदद करता है।

रोग के लिए सही आहार

क्या खाएं: अपने खाने में जौ, पुराने चावल, मूंग की दाल और लौकी-तोरई जैसी हल्की चीजों को शामिल करें। भुना हुआ धनिया और जीरे का पानी इस परेशानी में बहुत फायदेमंद होता है। खाना हमेशा ताजा और हल्का ही होना चाहिए।

क्या न खाएं: कच्ची पत्तागोभी, फूलगोभी और सोयाबीन से बनी चीजों से पूरी तरह परहेज करें, क्योंकि ये थायरॉइड को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा मैदा, चीनी, भारी डेयरी उत्पाद और जंक फूड बिल्कुल न खाएं।

जीवा आयुर्वेद में हम थायरॉइड के मरीज़ों की जांच कैसे करते हैं?

हमारा मानना है कि हर व्यक्ति का शरीर एकदम अलग होता है, इसलिए बीमारी की वजह भी हर किसी में अलग-अलग हो सकती है। हमारे डॉक्टर इलाज शुरू करने से पहले बहुत गहराई से जांच करते हैं:

  • प्रकृति और दोषों की जांच: सबसे पहले बातचीत और नाड़ी देखकर यह समझा जाता है कि शरीर में वात, पित्त और कफ का क्या संतुलन है और गले में कफ कितनी मात्रा में जमा हो गया है।
  • भावनात्मक तनाव का आकलन: आयुर्वेद में गले का चक्र (विशुद्धि) हमारी भावनाओं से जुड़ा होता है। डॉक्टर यह देखते हैं कि कहीं मन में दबी हुई भावनाओं या स्ट्रेस का असर तो थायरॉइड पर नहीं पड़ रहा है।
  • वजन और पाचन की जांच: यह देखा जाता है कि पाचन की आग कितनी कमजोर पड़ गई है और 'आम' शरीर में कहां रुकावट पैदा कर रहा है।
  • असली जड़ का पता लगाना: यह सूजन सिर्फ आयोडीन की कमी से है या फिर इसके पीछे सालों का कफ दोष और कमजोर पाचन है, इसका गहराई से पता लगाया जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर

जीवा आयुर्वेद में, इलाज की हर प्रक्रिया को एक बहुत ही व्यवस्थित और सुचारू तरीके से किया जाता है ताकि आपको आयुर्वेदिक इलाज का पूरी तरह से व्यक्तिगत और प्रभावी अनुभव मिल सके।

संपर्क की जानकारी दें: अपनी जानकारी देने के बाद, आप बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने के लिए सीधे 0129 4264323 पर भी हमसे जुड़ सकते हैं।

मिलने का समय पक्का करना: जीवा आयुर्वेद में, हमारे अनुभवी और प्रशिक्षित आयुर्वेदिक डॉक्टरों के साथ आपके मिलने का समय तय किया जाता है। आप अपनी सुविधा के अनुसार बातचीत का माध्यम भी चुन सकते हैं:

क्लिनिक: जीवा आयुर्वेद के कई शहरों में 88 से ज़्यादा क्लिनिक हैं, जिससे आप हमारे सबसे पास वाले क्लिनिक में जाकर आमने-सामने बातचीत कर सकते हैं और इलाज पा सकते हैं।

वीडियो के ज़रिए बातचीत, केवल 49 रुपये में: अगर आपके शहर में जीवा आयुर्वेद का क्लिनिक नहीं है, तो भी आप डॉक्टर के साथ ऑनलाइन बातचीत कर सकते हैं। यह सुविधा भारी छूट के साथ सिर्फ 49 रुपये में उपलब्ध है, जबकि इसकी सामान्य कीमत 299 रुपये है। बस हमें 0129 4264323 पर कॉल करें और अपने घर बैठे आराम से हमारे अनुभवी और कुशल आयुर्वेदिक डॉक्टरों से जुड़ें।

गहराई से बीमारी की पहचान: हमारे अनुभवी और कुशल डॉक्टर आपसे बात करते हैं और परेशानी की मुख्य वजह का पता लगाने के लिए आपकी समस्या और उसके लक्षणों को समझने की पूरी कोशिश करते हैं।

जड़ से इलाज की योजना: बीमारी की पहचान के अनुसार, इलाज की एक योजना तैयार की जाती है, और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों वाली दवाओं का उपयोग करके आपके लिए पूरी तरह से एक विशेष इलाज दिया जाता है।

सुधार पर नज़र रखना: नियमित रूप से संपर्क में रहने से आपके स्वास्थ्य में हो रहे सुधार को देखने में मदद मिलती है और ज़रूरत पड़ने पर इलाज में बदलाव भी किया जा सकता है।

ठीक होने में लगने वाला समय

आयुर्वेदिक इलाज में शरीर को अंदर से पूरी तरह ठीक होने में थोड़ा वक्त लगता है। यह कृत्रिम गोलियों की तरह शरीर को एकदम से सुन्न नहीं करता। अगर आप सही कफ-नाशक डाइट और दवाइयों का नियम से पालन करते हैं, तो एक से दो महीने में ही थकान और गले का भारीपन कम होने लगता है। सूजन को जड़ से पिघलाने और थायरॉइड को फिर से अपने नॉर्मल तरीके से काम करने लायक बनाने में करीब 3 से 6 महीने का समय लग सकता है।

आप किन परिणामों की उम्मीद कर सकते हैं?

जीवा आयुर्वेद के सही और नियमबद्ध इलाज के बाद आप अपने शरीर में एक नया हल्कापन महसूस करेंगे। गले की घुटन और भारीपन की समस्या दूर हो जाएगी। आपका मेटाबॉलिज्म सुधरेगा, जिससे बिना किसी एक्स्ट्रा मेहनत के बढ़ा हुआ वजन कम होने लगेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि आपकी थायरॉइड ग्रंथि अपने आप हार्मोन बनाना शुरू कर देगी, जिससे धीरे-धीरे आपकी कृत्रिम गोलियों पर जो निर्भरता है, वो खत्म हो सकती है।

मरीज़ों के अनुभव

“हर सर्दियों में टॉन्सिलाइटिस मेरे लिए एक नियमित समस्या बन गई थी। मैंने कुछ दवाइयाँ लीं और गरारे भी किए, लेकिन यह वह दीर्घकालिक समाधान नहीं था जिसकी मैं तलाश कर रहा था। एक मित्र ने मुझे आयुर्वेदिक उपचार के लिए जिवा की सिफारिश की, और मैंने उनकी दवाइयाँ लेना शुरू कर दिया। इस सर्दी में मैं एक भी सुबह गले में दर्द के साथ नहीं उठा। धन्यवाद जिवा।”

श्रीराम
औरंगाबाद

मरीज़ जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

कुछ प्रमुख कारण जिनकी वजह से लोग Jiva Ayurveda पर भरोसा करते हैं:

  • मूल कारण पर आधारित उपचार: आयुर्वेद में केवल थायरॉइड हार्मोन के आंकड़ों को ठीक करने के बजाय उस मूल कारण (कफ और कमज़ोर पाचन) को समझने पर जोर दिया जाता है जिसके कारण यह समस्या हो रही है।
  • अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सकों की टीम: Jiva Ayurveda के पास अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टरों की एक बड़ी टीम है जो प्रत्येक मरीज की स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद ही उपचार की सलाह देती है।
  • व्यक्तिगत “Ayunique” उपचार दृष्टिकोण: हर व्यक्ति की प्रकृति और स्वास्थ्य स्थिति अलग होती है। इसलिए उपचार योजना भी व्यक्तिगत रूप से तैयार की जाती है।
  • समग्र उपचार दृष्टिकोण: आयुर्वेदिक देखभाल केवल औषधियों तक सीमित नहीं होती। इसमें आहार सुधार और तनाव प्रबंधन जैसी तकनीकों को भी शामिल किया जाता है।
  • लगातार सुधार: नियमित रूप से दवाओं और सुझाए गए जीवनशैली बदलावों का पालन करने वाले मरीजों ने अपने स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण सुधार महसूस किया है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर ₹3,000 से ₹3,500 के बीच होता है।

कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएं शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में ₹15,000 से ₹40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है, और यह प्रदान करता है:

  • प्रामाणिक पंचकर्म चिकित्सा
  • सात्विक भोजन
  • आधुनिक उपचार सेवाएं
  • आरामदायक आवास
  • जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने वाली कई अन्य सुविधाएं

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

आजकल की आम मेडिकल साइंस में थायरॉइड के लिए मुख्य तौर पर बाहर से कृत्रिम हार्मोन की गोलियां दी जाती हैं। ये गोलियां बस खून में हार्मोन के लेवल को मेंटेन रखती हैं, लेकिन उस ग्रंथि का कोई इलाज नहीं करतीं जो असल में बीमार पड़ी है। जब शरीर को रोज बाहर से बना-बनाया हार्मोन मिलने लगता है, तो ग्रंथि और भी ज्यादा आलसी और सुस्त हो जाती है, इसीलिए यह गोली लोगों को जिंदगी भर खानी पड़ जाती है।

दूसरी तरफ, आयुर्वेदिक इलाज बाहर से कोई कृत्रिम हार्मोन शरीर पर नहीं थोपता। यह नेचुरल जड़ी-बूटियों (जैसे कचनार और अश्वगंधा) के इस्तेमाल से ग्रंथि के ऊपर जमे हुए कफ और सूजन को हटाता है। यह थायरॉइड ग्रंथि को अंदर से ताकत और सही पोषण देता है ताकि वह अपना काम खुद करना सीख सके। आयुर्वेद ग्रंथि को अपाहिज नहीं बनाता, बल्कि उसे फिर से जीवित करता है।

डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए?

  • गले की सूजन अगर अचानक से बहुत बड़ी और सख्त हो जाए।
  • सांस लेने में बहुत तेज आवाज़ आए या घबराहट के साथ घुटन सी महसूस हो।
  • पानी या कोई भी आम खाना निगलने पर गले में तेज दर्द होने लगे।
  • आवाज़ अचानक से बहुत ज़्यादा बैठ जाए या उसमें बदलाव आ जाए।
  • बिना कोई मेहनत किए भी दिल की धड़कन हमेशा बहुत तेज़ रहने लगे।

निष्कर्ष

थायरॉइड में सूजन या गले का भारीपन सिर्फ मौसम बदलने की बीमारी नहीं है। यह आपके शरीर का एक इशारा है कि आपका मेटाबॉलिज्म अंदर से कमजोर पड़ गया है। रोज़ाना बाज़ार के कृत्रिम हार्मोन की गोलियां खाकर इस ग्रंथि को पूरी जिंदगी के लिए सुला देना सही नहीं है। आयुर्वेद की मदद लेकर आप इस समस्या को जड़ से ठीक कर सकते हैं। अपने खाने-पीने में सादा भोजन शामिल करें, गले में जमे कफ को दूर करें और एक्सपर्ट्स की देखरेख में नेचुरल तरीके से एक स्वस्थ जीवन की ओर आगे बढ़ें। आज ही अपना परामर्श बुक करें और खुद को स्वस्थ बनाएं।

FAQs

गले में भारीपन और सूजन थायरॉइड का संकेत कैसे है?

थायरॉइड ग्रंथि हमारी गर्दन के निचले हिस्से में होती है। जब वह अपना काम ठीक से नहीं कर पाती या उस पर एक्स्ट्रा दबाव पड़ता है, तो उसका साइज बढ़ जाता है, जिससे बाहर से सूजन और अंदर से भारीपन फील होता है।

क्या थायरॉइड की हार्मोन वाली गोली हमेशा के लिए बंद हो सकती है?

हाँ, अगर आपकी ग्रंथि पूरी तरह से डैमेज नहीं हुई है, तो आयुर्वेद के कफ-नाशक इलाज और कचनार के इस्तेमाल से ग्रंथि को फिर से एक्टिव किया जा सकता है, जिसके बाद धीरे-धीरे दवाइयों की जरूरत खत्म हो सकती है।

थायरॉइड की सूजन में वज़न क्यों तेज़ी से बढ़ता है?

सूजी हुई और सुस्त ग्रंथि मेटाबॉलिज्म को एकदम धीमा कर देती है। इससे शरीर खाए गए खाने को एनर्जी में बदलने की बजाय चर्बी के रूप में इकट्ठा करने लगता है।

क्या थायरॉइड में पत्तागोभी और फूलगोभी सच में नुकसान करते हैं?

जी हाँ, कच्ची पत्तागोभी और फूलगोभी में कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो थायरॉइड ग्रंथि को आयोडीन सोखने से रोकते हैं, जिससे सूजन और ज्यादा बढ़ जाती है।

आयुर्वेद में कचनार गुग्गुल का थायरॉइड में क्या फायदा है?

 कचनार गुग्गुल आयुर्वेद की एक बहुत ही खास दवा है जो शरीर में कहीं भी बनी हुई गांठों, सूजन और जमे हुए कफ को शरीर से बाहर निकालने में मदद करती है।

 थायरॉइड की बीमारी में हर वक्त थकान क्यों लगती है?

थायरॉइड हार्मोन हमारी कोशिकाओं को एनर्जी बनाने का सिग्नल देते हैं। हार्मोन की कमी से शरीर में एनर्जी नहीं बन पाती, जिससे आराम करने के बाद भी शरीर थका-थका और टूटा हुआ सा लगता है।

क्या स्ट्रेस लेने से भी थायरॉइड में सूजन आ सकती है?

बिल्कुल। बहुत ज्यादा स्ट्रेस लेने से तनाव वाले हार्मोन बढ़ जाते हैं, जो सीधे तौर पर थायरॉइड ग्रंथि के काम को दबा देते हैं और शरीर में सूजन पैदा करते हैं।

धनिया का पानी थायरॉइड में कैसे फ़ायदा पहुंचाता है?

धनिया नेचुरल तरीके से तीनों दोषों को शांत करने का काम करता है। यह पेट की पाचन अग्नि को सुधारता है और गले की नसों में आई हुई सूजन और गर्मी को भी शांत करता है।

क्या थायरॉइड की दिक्कत से आवाज़ भी बदल सकती है?

हाँ, जब ग्रंथि बहुत ज्यादा सूज जाती है, तो वह गले की नसों (वोकल कॉर्ड्स) पर दबाव डालने लगती है, जिससे आवाज़ भारी या फिर कर्कश सी हो जाती है।

थायरॉइड में किस तरह की एक्सरसाइज या योग करना चाहिए?

थायरॉइड ग्रंथि को एक्टिव रखने के लिए उज्जायी प्राणायाम, सर्वांगासन और हलासन सबसे अच्छे माने जाते हैं। ये सभी गले के हिस्से में खून का बहाव तेज करते हैं।

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