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आपको लग रहा है सब Normal है — पर Body क्या कह रही है?

Information By Dr. Keshav Chauhan

अक्सर हम अपने शरीर के छोटे-छोटे संकेतों को इतना सामान्य मान लेते हैं कि उन पर ध्यान ही नहीं देते। हल्की थकान, कभी-कभी गैस, नींद में हल्की परेशानी या बिना वजह चिड़चिड़ापन—ये सब हमें मामूली लगते हैं। धीरे-धीरे हम इन्हें अपनी दिनचर्या का हिस्सा मान लेते हैं और यही सोच बन जाती है कि सब ठीक है।

लेकिन शरीर कभी भी बिना वजह संकेत नहीं देता। ये छोटे बदलाव दरअसल अंदर चल रहे असंतुलन की शुरुआत हो सकते हैं। आयुर्वेद मानता है कि बीमारी अचानक नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे बनती है—संकेत पहले आते हैं, समस्या बाद में दिखती है। इसलिए जो हमें “Normal” लग रहा है, वही कहीं न कहीं शरीर की चेतावनी भी हो सकती है।

आयुर्वेद के अनुसार “Normal” का असली मतलब क्या है?

आयुर्वेद में “Normal” होने का मतलब सिर्फ बीमारी का न होना नहीं है। असली स्वास्थ्य वह स्थिति है, जहाँ शरीर, मन और जीवनशैली तीनों संतुलन में हों। जब शरीर के दोष संतुलित हों, पाचन शक्ति मजबूत हो और शरीर को सही पोषण मिल रहा हो, तभी व्यक्ति वास्तव में स्वस्थ माना जाता है।

अगर बाहर से सब ठीक दिख रहा हो, लेकिन अंदर थकान, असंतुलन या हल्की समस्याएँ बनी रहें, तो यह पूरी तरह स्वस्थ होने की स्थिति नहीं है। आयुर्वेद इसी अंतर को समझाता है, “सिर्फ ठीक महसूस करना” और “वास्तव में स्वस्थ होना” दोनों अलग बातें हैं।

शरीर के सूक्ष्म संकेत: जिन्हें अक्सर हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं

शरीर कभी भी अचानक बीमार नहीं होता। वह पहले धीरे-धीरे छोटे-छोटे संकेत देता है, ताकि हम समय रहते समझ सकें। लेकिन ये संकेत इतने हल्के होते हैं कि हम उन्हें अक्सर सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। यही छोटी-छोटी बातें आगे चलकर बड़े असंतुलन का कारण बन सकती हैं।

  • लगातार थकान (Chronic Fatigue): 8 घंटे की नींद के बाद भी अगर आप थका हुआ महसूस करते हैं, तो यह सेल्स के लेवल पर ऊर्जा की कमी है।
  • जीभ पर सफेद परत (Coated Tongue): सुबह आईने में अपनी जीभ देखें। अगर उस पर सफेद कोटिंग है, तो समझ लीजिए कि आपका मेटाबॉलिज्म टॉक्सिन्स से भरा हुआ है।
  • पेट का फूलना और गैस (Bloating): खाने के तुरंत बाद पेट का टाइट हो जाना इस बात का सबूत है कि आपकी 'जठराग्नि' बुझ रही है।
  • सांसों की दुर्गंध (Bad Breath): ब्रश करने के बाद भी मुंह से बदबू आना फेफड़ों या पेट में जमा गंदगी का संकेत है।
  • त्वचा की समस्याएं (Skin Breakouts): मुहांसे, खुजली या डल स्किन बताते हैं कि आपका लिवर खून साफ नहीं कर पा रहा है।
  • जोड़ों में जकड़न (Joint Stiffness): सुबह उठते ही उंगलियों या पैरों में अकड़न होना 'आम' (Toxins) के जोड़ों में जमा होने का लक्षण है।
  • मानसिक धुंध (Brain Fog): किसी काम में मन न लगना या याददाश्त का कमजोर होना बताता है कि टॉक्सिन्स आपके नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर रहे हैं।

आखिर क्यों आपका शरीर धीरे-धीरे समस्याओं का घर बनता जा रहा है? 

इसके पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की गलतियां हैं जो पहाड़ बन चुकी हैं:

  • विरुद्ध आहार (Incompatible Food): दूध के साथ नमक, मछली के साथ दूध, या ठंडे-गर्म का कॉम्बिनेशन शरीर में केमिकल लोचा पैदा करता है।
  • अध्यशन (Overeating): पिछला भोजन पचे बिना दोबारा खा लेना सबसे बड़ा अपराध है। यह पेट को डस्टबिन बना देता है।
  • वेगों को रोकना (Suppressing Natural Urges): छींक, पेशाब या मल त्याग के वेग को रोकना नर्वस सिस्टम को डैमेज करता है।
  • तनाव और अधूरी नींद (Stress & Lack of Sleep): तनाव से 'कोर्टिसोल' हार्मोन बढ़ता है जो पाचन को ठप कर देता है।
  • सेडेंटरी लाइफस्टाइल (Lack of Movement): जब पसीना नहीं निकलता, तो टॉक्सिन्स बाहर नहीं जा पाते और शरीर के अंदर ही सड़ते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार रोग के 6 चरण 

आयुर्वेद बताता है कि कोई भी बीमारी अचानक नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे 6 चरणों में विकसित होती है। अगर इन शुरुआती चरणों को समय पर समझ लिया जाए, तो रोग को बढ़ने से रोका जा सकता है।

  1. संचय (Accumulation): इस चरण में दोष शरीर में धीरे-धीरे जमा होने लगते हैं। अभी कोई बड़ा लक्षण नहीं दिखता, बस हल्की असहजता महसूस हो सकती है।
  2. प्रकोप (Aggravation): अब जमा हुए दोष बढ़ने लगते हैं। गैस, जलन, भारीपन जैसे हल्के लक्षण दिखने लगते हैं, लेकिन इन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
  3. प्रसार (Spread): इस अवस्था में दोष अपने स्थान से निकलकर शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने लगते हैं। शरीर में असंतुलन बढ़ता है और अलग-अलग जगहों पर परेशानी महसूस हो सकती है।
  4. स्थान संश्रय (Localization): अब दोष शरीर के किसी कमजोर हिस्से में जाकर रुक जाते हैं। यही वह जगह होती है जहाँ आगे चलकर बीमारी विकसित होती है।
  5. व्यक्त (Manifestation): इस चरण में रोग के स्पष्ट लक्षण दिखाई देने लगते हैं। अब समस्या साफ तौर पर महसूस होती है और पहचान में आने लगती है।
  6. भेद (Complication): यह अंतिम अवस्था है, जहाँ रोग जटिल रूप ले सकता है। अगर इस स्तर तक पहुँच जाए, तो उपचार भी कठिन हो सकता है।

समझने की बात: अगर पहले 2–3 चरणों में ही संकेतों को पहचान लिया जाए, तो बीमारी को पूरी तरह रोका जा सकता है। यही आयुर्वेद का असली उद्देश्य है, रोग को बनने से पहले ही रोकना।

जीवा आयुर्वेद का विशेष उपचार दृष्टिकोण (The Jiva Approach)

जीवा आयुर्वेद में हम केवल लक्षणों को नहीं दबाते, बल्कि बीमारी की जड़ तक पहुँचते हैं। हमारा उपचार "Ayurvedic Protocol" पर आधारित है जिसमें हम तीन स्तरों पर काम करते हैं:

  • मूल कारण की पहचान: नाड़ी परीक्षा के माध्यम से यह जानना कि आपके कौन से दोष असंतुलित हैं।
  • व्यक्तिगत चिकित्सा (Personalized Medicine): हर व्यक्ति का शरीर अलग है, इसलिए उसकी दवा भी कस्टमाइज्ड होनी चाहिए। हम 500 से अधिक शुद्ध जड़ी-बूटियों के मिश्रण से आपके लिए सटीक दवा तैयार करते हैं।
  • संपूर्ण स्वास्थ्य (Holistic Healing): दवा के साथ-साथ हम डाइट चार्ट और लाइफस्टाइल में बदलाव के निर्देश देते हैं ताकि बीमारी दोबारा लौटकर न आए।

जादुई आयुर्वेदिक जड़-बूटियां: प्रकृति का वरदान

आयुर्वेद में ऐसी कई औषधियां हैं जो शरीर की गहरी सफाई (Deep Cleaning) कर उसे पुनर्जीवित कर देती हैं। यहाँ कुछ मुख्य जड़ी-बूटियां दी गई हैं:

  • गिलोय (Giloy): इसे 'अमृता' कहा जाता है। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है और खून से जहरीले तत्वों को बाहर निकालती है।
  • त्रिफला (Triphala): आंवला, बहेड़ा और हरड़ का यह मिश्रण पेट की सफाई के लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन औषधि है। यह पाचन तंत्र को रीसेट कर देता है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): अगर बीमारी की वजह से मानसिक तनाव या कमजोरी है, तो अश्वगंधा नसों को मजबूती देता है और स्ट्रेस हार्मोन्स को कम करता है।
  • सोंठ (Dry Ginger): यह 'आम' (Toxins) को जलाने का काम करती है और मेटाबॉलिज्म को तेज करती है।

रात को सोते समय आधा चम्मच त्रिफला चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लें। यह न केवल पेट साफ रखेगा बल्कि आपकी त्वचा में भी चमक लाएगा।

आयुर्वेदिक पंचकर्म और थैरेपी: शरीर की सर्विसिंग

जैसे गाड़ी को बेहतर चलाने के लिए समय-समय पर सर्विसिंग की जरूरत होती है, वैसे ही शरीर को पंचकर्म की जरूरत होती है। जीवा आयुर्वेद में हम इन मुख्य थैरेपीज का सुझाव देते हैं:

  • स्नेहन और स्वेदन (Oil Massage & Steam): औषधीय तेलों से मालिश करने से अंगों में जमा टॉक्सिन्स ढीले हो जाते हैं और भाप के जरिए पसीने के रूप में बाहर निकल जाते हैं।
  • वस्ति (Medicated Enema): इसे आयुर्वेद की 'आधी चिकित्सा' कहा जाता है। यह मलाशय के जरिए वात दोष को शांत करती है और शरीर को अंदर से साफ करती है।
  • शिरोधारा (Shirodhara): माथे पर तेल की धार गिराने से नर्वस सिस्टम शांत होता है, जिससे गहरी नींद आती है और हार्मोनल संतुलन बनता है।

महीने में कम से कम एक बार पूरे शरीर की तिल के तेल से मालिश (अभ्यंग) करें। यह उम्र के असर को कम करता है और मांसपेशियों को लचीला बनाता है।

खान-पान का सही गणित: क्या खाएं और क्या बचाएं?

श्रेणी क्या खाएं (शामिल करें) क्या न खाएं (परहेज करें)
अनाज और दालें पुराने चावल, मूंग दाल, दलिया, ओट्स और रागी। मैदा, सफेद ब्रेड, नूडल्स और भारी उड़द की दाल।
सब्जियां लौकी, तोरई, कद्दू, परवल और मौसमी हरी सब्जियां। कच्ची सब्जियां (ज्यादा सलाद), फूलगोभी और भारी तली सब्जियां।
डेयरी और वसा शुद्ध A2 गाय का घी, गुनगुना दूध (हल्दी के साथ) और ताजा छाछ। ठंडा दूध, पनीर (रात में), और रिफाइंड तेल।
मसाले अदरक, हल्दी, जीरा, धनिया, सोंठ और अजवाइन। बहुत ज्यादा लाल मिर्च, गरम मसाला और अत्यधिक नमक।
पेय पदार्थ गुनगुना पानी, हर्बल टी और ताजे फलों का जूस (बिना चीनी)। कोल्ड ड्रिंक्स, ज्यादा चाय/कॉफी और शराब।
मीठा और स्नैक्स गुड़, खजूर, शहद और भुने हुए मखाने। सफेद चीनी, पेस्ट्री, चॉकलेट और डिब्बाबंद स्नैक्स।

जीवा आयुर्वेद में हम आपकी जांच कैसे करते हैं?

जब आप जीवा आयुर्वेद में कदम रखते हैं, तो हम केवल आपकी बीमारी की फाइल नहीं देखते, बल्कि आपको एक संपूर्ण व्यक्ति के रूप में समझते हैं। हमारी परामर्श प्रक्रिया तीन स्तंभों पर टिकी है:

  • प्रकृति विश्लेषण: हर इंसान का डीएनए अलग होता है, वैसे ही उसकी 'प्रकृति' (Vata, Pitta, Kapha) अलग होती है। हम यह पता लगाते हैं कि आपके शरीर का मूल स्वभाव क्या है।
  • नाड़ी परीक्षा (Pulse Diagnosis): हमारे अनुभवी डॉक्टर आपकी कलाई की धड़कन (नाड़ी) को छूकर यह जान लेते हैं कि आपके शरीर के किस अंग में दोष असंतुलित हैं और टॉक्सिन्स कहाँ जमा हैं।
  • Detailed Consultation: हम आपकी नींद, तनाव का स्तर, काम की प्रकृति और पुरानी मेडिकल हिस्ट्री पर विस्तार से चर्चा करते हैं। यह 'रूट कॉज' (Root Cause) तक पहुँचने का हमारा सबसे सटीक तरीका है।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

अपने इलाज पर कितना खर्च आएगा, यह जानना हर मरीज़ के लिए ज़रूरी होता है। जीवा आयुर्वेद में हम खर्च की जानकारी साफ और आसान तरीके से देते हैं, ताकि आप बिना किसी उलझन के सही फैसला ले सकें।

इलाज का सामान्य खर्च:

जो लोग अपनी बीमारी के लिए नियमित (regular) इलाज शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए दवाइयों और डॉक्टर की सलाह का महीने का खर्च लगभग ₹3,000 से ₹3,500 के बीच आता है। यह एक औसत अंदाज़ा है। असल खर्च आपकी बीमारी कितनी पुरानी है और उसकी स्थिति कैसी है, इस पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल (स्पेशल पैकेज):

अगर आप अपनी बीमारी को जड़ से मिटाने के लिए थोड़ा ज़्यादा गहराई और विस्तार से इलाज करना चाहते हैं, तो हमारे 'विशेष पैकेज' आपके लिए सबसे अच्छे हैं। इसमें हम सिर्फ बीमारी को नहीं दबाते, बल्कि आपकी पूरी लाइफस्टाइल को सुधारने पर काम करते हैं। इसमें शामिल हैं:

  • खास दवाइयाँ (Customized Medicines)
  • सीनियर डॉक्टर से कंसल्टेशन
  • मन को शांत रखने के सेशन्स (Stress Management)
  • योग और एक्सरसाइज़ की ट्रेनिंग
  • पर्सनल डाइट प्लान (जो सिर्फ आपके लिए बना हो)

इन पैकेजेस का खर्च आमतौर पर ₹15,000 से ₹40,000 के बीच होता है, जो आपके 3 से 4 महीने के पूरे इलाज को कवर करता है।

जीवाग्राम (24x7 देखभाल वाला इलाज):

जिन लोगों को बीमारी से लड़ने के लिए ज़्यादा ध्यान, शांति और आराम के साथ इलाज (पंचकर्म व शोधन) चाहिए, उनके लिए हमारा जीवाग्राम सेंटर सबसे बेहतरीन विकल्प है। यह प्रकृति के करीब बना एक ऐसा सेंटर है जहाँ आपको घर जैसा सुकून और अस्पताल जैसी केयर मिलती है। यहाँ आपको मिलता है:

  • पंचकर्म थेरेपी (उत्तर बस्ती, विरेचन और अंदरूनी सफाई)
  • सादा और पौष्टिक 'सात्विक' खाना
  • इलाज की आधुनिक और बेहतर सुविधाएँ
  • आरामदायक रहने की व्यवस्था

यहाँ 7 दिन का प्रोग्राम लगभग ₹1 लाख का होता है। इसमें आपको हर समय विशेषज्ञों की देखभाल मिलती है, ताकि आपका शरीर और मन दोनों पूरी तरह से तरोताज़ा (rejuvenated) होकर स्वस्थ प्रेगनेंसी के लिए तैयार हो सकें।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।
  • दवाइयों पर निर्भरता कम: 88% मरीजों ने धीरे-धीरे एलोपैथिक दवाओं और हार्मोनल सपोर्ट पर निर्भरता कम की है।

आयुर्वेदिक और मॉडर्न उपचार में अंतर

विशेषता आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
दृष्टिकोण मुख्य रूप से लक्षणों को कम करने पर ध्यान देती है शरीर के अंदर संतुलन बनाकर मूल कारण को ठीक करने पर जोर देती है
दवाओं का स्वरूप रासायनिक और सिंथेटिक दवाएं प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ और खनिज आधारित उपचार
उद्देश्य रोग को जल्दी नियंत्रित करना रोग की जड़ को समझकर धीरे-धीरे सुधार करना
साइड इफेक्ट्स लंबे समय में साइड इफेक्ट्स की संभावना हो सकती है सही मार्गदर्शन में अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है
जीवनशैली की भूमिका जीवनशैली पर सीमित ध्यान आहार, दिनचर्या और आदतों को उपचार का हिस्सा माना जाता है

डॉक्टर से कब सलाह लें? 

अक्सर लोग सोचते हैं कि जब दर्द सहनशक्ति से बाहर होगा, तब डॉक्टर के पास जाएंगे। लेकिन आयुर्वेद कहता है कि 'Prevention is better than cure'। अगर आपको नीचे दी गई चेतावनियां मिल रही हैं, तो तुरंत संपर्क करें:

  • बिना किसी भारी काम के भी सुबह उठते ही थकान महसूस होना।
  • हफ्तों तक पाचन खराब रहना या पेट साफ न होना।
  • अचानक वजन का बढ़ना या गिरना।
  • नींद में कमी और लगातार रहने वाला तनाव।
  • त्वचा का रंग बदलना या आँखों के नीचे काले घेरे।

निष्कर्ष

इस विस्तृत लेख का सार यह है कि हमारा शरीर कभी झूठ नहीं बोलता। जिसे हम 'नॉर्मल' मानकर नजरअंदाज कर रहे हैं, वह भविष्य की किसी बड़ी बीमारी की दस्तक हो सकती है। हमने समझा कि कैसे 'आम' (Toxins) हमारे शरीर को अंदर से खोखला करते हैं और कैसे जीवा आयुर्वेद का व्यक्तिगत दृष्टिकोण (Personalized Approach) आपको दोबारा जीवंत बना सकता है। शुद्ध खान-पान, सही जड़ी-बूटियाँ और पंचकर्म न केवल बीमारी को ठीक करते हैं, बल्कि आपको एक नया और ऊर्जावान जीवन देते हैं।

FAQs

जी नहीं, यह एक मिथक है। यदि बीमारी नई है, तो सुधार बहुत जल्दी दिखता है। पुरानी बीमारियों में जड़ तक पहुँचने में थोड़ा समय लगता है, पर परिणाम स्थायी होते हैं।

बिल्कुल नहीं। जीवा के डॉक्टर आपकी वर्तमान दवाओं को देखते हुए एक सुरक्षित योजना बनाते हैं। जैसे-जैसे स्वास्थ्य सुधरता है, पुरानी दवाओं को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।

बिल्कुल नहीं! हम आपकी लाइफस्टाइल के अनुसार ही बदलाव सुझाते हैं। यह 'डाइटिंग' नहीं, बल्कि 'सही तरीके से खाना' है।

नहीं, पंचकर्म 'शरीर की सर्विसिंग' है। स्वस्थ लोग भी साल में एक बार इसे डिटॉक्स के लिए करा सकते हैं।

जब जड़ी-बूटियां डॉक्टर की देखरेख और आपकी प्रकृति के अनुसार ली जाती हैं, तो वे पूरी तरह सुरक्षित होती हैं।

हाँ, जीवा आयुर्वेद वीडियो कॉल और फोन पर परामर्श की सुविधा देता है, और दवाएं आपके घर तक पहुँचाई जाती हैं।

जी हाँ, शिरोधारा और अश्वगंधा जैसी औषधियां मानसिक स्वास्थ्य के लिए चमत्कारिक हैं।

हाँ, आयुर्वेद बच्चों की इम्युनिटी बढ़ाने के लिए सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका है।

बेहतर परिणामों के लिए सात्विक और सुपाच्य भोजन की सलाह दी जाती है, क्योंकि भारी भोजन पाचन को धीमा कर देता है।

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