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10 साल से खाँसी और बलगम क्यों बना रहता है? क्या यह क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस और कफ दोष का संकेत है

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

पुरानी खाँसी और बलगम की अनदेखी पड़ सकती है भारी बहुत से लोग सालों-साल सुबह उठते ही बलगम वाली खाँसी  और छाती में जकड़न को एक सामान्य बात समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन अगर यह सिलसिला 10 साल या उससे ज़्यादा समय से चल रहा है तो यह साधारण जुकाम नहीं बल्कि 'क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस' का गंभीर संकेत है। समय पर इसका इलाज करना इसलिए बेहद ज़रूरी  है क्योंकि फेफड़ों की नलियों में बना यह पुराना संक्रमण धीरे-धीरे फेफड़ों की ताक़त को खत्म कर देता है जिससे मरीज़ को ऑक्सीजन की कमी होने लगती है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में बढ़ा हुआ कफ जब सूखकर जम जाता है तो वह केवल खाँसी  नहीं बल्कि पूरे शरीर की ऊर्जा को सोख लेता है।

क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस क्या होता है?

इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो हमारे फेफड़ों में हवा ले जाने वाली छोटी-छोटी नलियाँ होती हैं। जब इन नलियों में लगातार सूजन बनी रहती है तो शरीर बचाव के लिए बहुतज़्यादा बलगम बनाने लगता है। जब यह सूजन और बलगम की समस्या साल में कम से कम 3 महीने तक और लगातार 2 सालों तक बनी रहे तो इसे 'क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस' कहा जाता है। सरल शब्दों में यह आपके फेफड़ों के भीतर की एक 'पुरानी गंदगी' है जिसे शरीर खाँसी  के ज़रिए बाहर निकालने की नाकाम कोशिश करता रहता है।

ब्रोंकाइटिस के प्रकार

ब्रोंकाइटिस मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित है जिन्हें उनकी अवधि और गंभीरता के आधार पर समझा जा सकता है

तीव्र ब्रोंकाइटिस यह अचानक होता है और आमतौर पर किसी सर्दी-जुकाम या वायरल संक्रमण के बाद आता है। यह कुछ हफ्तों में ठीक हो जाता है।

जीर्ण ब्रोंकाइटिस यह एक गंभीर स्थिति है जिसमें खाँसी और कफ कम से कम तीन महीने तक बना रहता है। यह अक्सर धूम्रपान के कारण होता है।

एलर्जिक ब्रोंकाइटिस यह धूल धुएं या परागकणों जैसी चीजों के संपर्क में आने से होने वाली एलर्जी के कारण होता है।

अस्थमाटिक ब्रोंकाइटिस जब किसी व्यक्ति को अस्थमा और ब्रोंकाइटिस दोनों एक साथ होते हैं तो नलियां अत्यधिक संकुचित हो जाती हैं।

व्यावसायिक ब्रोंकाइटिस यह उन लोगों को होता है जो ऐसी जगहों पर काम करते हैं जहाँ रासायनिक धुएं या धूल की मात्रा बहुत अधिक होती है।

शरीर में दिखने वाले मुख्य लक्षण

सुबह के वक़्त बलगम सोकर उठने के बाद छाती में भारीपन और बहुत ज़्यादा बलगम का बाहर आना।

सॉंस  फूलना थोड़ा सा चलने या घरेलू काम करने पर भी सॉंस  का तेज़ी से उखड़ना।

छाती में दर्द और जकड़न खांसते-खांसते पसलियों और सीने में खिंचाव व दर्द महसूस होना।

घरघराहट सॉंस  लेते समय छाती से पतली सीटी जैसी आवाज़ का आना।

थकान और सुस्ती शरीर में ऑक्सीजन की कमी के कारण हर वक़्त निढाल महसूस करना।

10 साल तक खाँसी  बने रहने के मुख्य कारण

धूम्रपान की पुरानी आदत बीड़ी या सिगरेट का धुआं फेफड़ों की नसों को हमेशा के लिए संकरा कर देता है।

कमज़ोर पाचन और 'आम' आयुर्वेद के अनुसार खराब पाचन से बनने वाला 'आम' टॉक्सिन्स कफ बनकर फेफड़ों में जम जाता है।

प्रदूषण का प्रभाव ज़हरीली हवा और धूल के बीच लंबे वक़्त तक रहना फेफड़ों में सूजन पैदा करता है।

कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता बार-बार होने वाले वायरल इन्फेक्शन का सही इलाज न कराना।

ठंडा और बासी खान-पान फ्रिज की चीज़ें और बहुत ज़्यादा डेयरी उत्पादों का सेवन कफ को बढ़ाता है।

जोखिम बढ़ाने वाले कारण और जटिलताएं

जोखिम बढ़ाने वाले 5 प्रमुख कारण

आयु का बढ़ना उम्र बढ़ने के साथ फेफड़ों की फैलने और सिकुड़ने की ताक़त कम होने लगती है।

काम करने की जगह फैक्ट्रियों भट्टों या केमिकल के बीच काम करने वाले लोग।

गैस्ट्रिक रिफ्लक्स एसिडिटी पेट का एसिड गले तक आने से सॉंस  की नलियों में जलन और सूजन बढ़ती है।

घरेलू प्रदूषण चूल्हे का धुआं या बंद कमरों में रहने वाले लोग।

पुरानी एलर्जी जिन लोगों को बचपन से ही धूल या ठंड से एलर्जी रही हो।

होने वाली 5 गंभीर जटिलताएं

सीओपीडी COPD फेफड़ों की वह स्थिति जहाँ सॉंस  लेना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

दिल का फेल होना फेफड़ों की बीमारी दिल पर बहुत ज़्यादा दबाव डालती है।

फेफड़ों का कैंसर लगातार रहने वाली सूजन कोशिकाओं में बदलाव लाकर कैंसर काख़तरा बढ़ा सकती है।

निमोनियापुराने बलगम में बैक्टीरिया बहुत तेज़ी से पनपते हैं जो गंभीर इन्फेक्शन पैदा करते हैं।

वजन का गिरना शरीर अपनी सारी ऊर्जा केवल सॉंस  लेने में खर्च कर देता है जिससे मरीज़ सूखने लगता है।

बीमारी की पहचान के लिए की जाने वाली जाँच

स्पाइरोमेट्री PFT यह फेफड़ों की हवा बाहर छोड़ने की ताक़त को मापने का सबसे ज़रूरी टेस्ट है।

चेस्ट एक्स-रे फेफड़ों की सूजन और बलगम के जमाव को देखने के लिए।

बलगम की जाँच यह देखने के लिए कि बलगम में कोई टीबी या बैक्टीरिया का संक्रमण तो नहीं है।

ऑक्सीजन सैचुरेशन SPO2 खून में ऑक्सीजन के स्तर की हर वक़्त निगरानी करना।

नाड़ी और कोष्ठ परीक्षण आयुर्वेद में नाड़ी देखकर यह पता लगाया जाता है कि कफ कितना पुराना और गहरा है।

आयुर्वेद में पुरानी खाँसी 'कास' और 'कफ' का गहरा विज्ञान

आयुर्वेद पुरानी खाँसी  को' जीर्ण कास' के रूप में समझता है। इसके पीछे का विज्ञान बहुत गहरा है

कफ और वात का असंतुलनआयुर्वेद मानता है कि जब शरीर में 'कफ' बहुतज़्यादा बढ़ जाता है और सूखकर सॉंस  की नलियों में चिपक जाता है तो वह 'प्राण वायु' वात के रास्ते को रोक देता है।

अग्नि मांद्य कमज़ोर पाचन खाँसी  का सीधा संबंध पेट से है। यदि आपकी पाचन अग्नि कमज़ोर है तो भोजन ऊर्जा बनने के बजाय 'बलगम' में बदल जाता है।

स्रोतोरोध मार्गों में रुकावट फेफड़ों की छोटी-छोटी नलियों में जब कचरा जमा होता है तो उसे आयुर्वेद 'स्रोतोरोध' कहता है। इलाज का असली मकसद इन मार्गों को साफ़ करना है।

आयुर्वेदिक थेरेपी और पंचकर्म उपचार

वमन चिकित्सा यह कफ दोष को जड़ से खत्म करने की सबसेतेज़ विधि है।

स्नेहन और स्वेदन छाती पर औषधीय तेल की मालिश और भाप जिससे जकड़न तुरंत खुलती है।

नस्यम नाक के मार्ग से दी जाने वाली दवा जो श्वसन मार्ग को चिकना और साफ़ रखती है।

क्या खाएं और क्या न खाएं?

क्या खाएं

गुनगुना पानी हमेशा गुनगुना पानी पिएं जो कफ को पिघलाने मेंबेहद ज़रूरी है।

शहद पुराना शहद कफ को काटने का सबसेफ़ायदा पहुँचाने वाला साधन है।

हल्का भोजन मूंग दाल की खिचड़ी और सब्जियाँ जो जल्दी पच जाएं।

क्या न खाएं

ठंडी चीज़ें आइसक्रीम कोल्ड ड्रिंक्स और फ्रिज का पानी कफ को तुरंत भड़काते हैं।

भारी डेयरी उत्पाद दही मिठाई और बहुतज़्यादा पनीर खाने से बचें।

तली-भुनी चीज़ें तेल और घी काज़्यादा इस्तेमाल बलगम को गाढ़ा बना देता है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

यह मेरा बेटा है अब यह बिल्कुल ठीक है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। जब यह छोटा था तो इसे कोल्ड cold और खाँसी  की बहुत समस्या रहती थी। हम घर में एसी AC नहीं चला सकते थे क्योंकि हमें डर लगता था कि इसे तुरंत जुकाम हो जाएगा। बच्चा सोते समय अपनी पोजीशन पर होता था लेकिन उसे साँस  लेने में भी दिक्कत होती थी। अगर उसे कुछ खिलाओ तो वह तुरंत उल्टी कर देता था। 

हम दोनों बहुत लाचार महसूस करते थे कि क्या करें। हमने एलोपैथी करा ली थी और घर के सारे नुस्खे भी आजमा लिए थे। बच्चा इतनी दवाइयां खा रहा था कि उसे संभालना मुश्किल था। वह एक ऐसी सिचुएशन थी जिसमें मुझे बहुत परेशानी होती थी।

फिर एक दिन मेरे फ्रेंड आए और उन्होंने मुझे जीवा आयुर्वेदा के बारे में बताया। शुरुआत में मन में कोई भरोसा नहीं था फिर भी हम गए। डॉक्टर ने बहुत अच्छे से परामर्श किया। उन्होंने अपना बना हुआ एक चूर्ण बाल ओजस और अणु तेल दिया।

सिर्फ 2 महीने के गैप में ही पता नहीं कहाँ इसका दर्द खत्म होने लगा और मुझे बहुत राहत मिली। अगर मैं पीछे मुड़कर देखूँ कि मेरा बच्चा पहले कैसा था और अब कैसा है तो भगवान के बाद अगर मैं किसी को थैंक्स बोलना चाहूँगी तो वह जीवा आयुर्वेदा और उनके डॉक्टर्स को। उन्होंने मेरे बच्चे की प्रकृति को समझते हुए उसका पूरा ट्रीटमेंट किया और आज वह मेरे साथ बिल्कुल खुश है।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

विशेषता आधुनिक इलाज  आयुर्वेदिक इलाज 
लक्ष्य यह मुख्य रूप से लक्षणों को तुरंत दबाने और इनहेलर से राहत देने पर काम करता है। यह शरीर के 'रूट कॉज' को ठीक कर फेफड़ों को भीतर से मज़बूत बनाने पर ज़ोर देता है।
तरीका इसमें स्टेरॉयड्स और ब्रोंकोडायलेटर्स का इस्तेमाल होता है। इसमें प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ कस्टमाइज़्ड डाइट और पंचकर्म का उपयोग होता है।
प्रभाव इसका असर तेज़ होता है लेकिन यह बीमारी को जड़ से खत्म नहीं करता। इसमें सुधार धीरे-धीरे होता है लेकिन परिणाम अधिक स्थायी और गहरे होते हैं।
दुष्प्रभाव इनहेलर्स के लंबे इस्तेमाल से मुँह में संक्रमण या इम्युनिटी कम होने का खतरा रहता है। आयुर्वेदिक उपचार प्राकृतिक होते हैं और पूरे शरीर के संतुलन पर काम करते हैं।

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?

  •  यदि खाँसी  के साथ खून के धब्बे दिखाई दें।
  •  यदि आपको रात में लेटने पर सॉंस  लेने में बहुतज़्यादा दिक़्क़त हो।
  •  यदि बलगम का रंग गहरा पीला या हरा हो जाए और साथ में बुखार रहे।
  •  यदि आपका वज़न बिना किसी कारण केतेज़ी से गिर रहा हो।
  •  यदि छाती में हरवक़्त सख़्त दर्द बना रहे।

निष्कर्ष

10 साल की पुरानी खाँसी  आपकी ज़िंदगी का स्थायी हिस्सा नहीं होनी चाहिए। यह आपके फेफड़ों की पुकार है कि उन्हें अब आराम और गहरी सफ़ाई की ज़रूरत है। आयुर्वेद काहोलीस्टिक हीलिंग दृष्टिकोण आपको न केवल खाँसी  से मुक्ति दिलाता है बल्कि आपके शरीर के भीतर उस संतुलन को बहाल करता है जो बरसों पहले बिगड़ गया था। अपनी सेहत के प्रति ज़िम्मेदार बनें और आज ही आयुर्वेद के शीतल और सुरक्षित मार्ग को अपनाएं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

   हाँ, आयुर्वेदिक दवाओं और सही परहेज के साथ फेफड़ों को दोबारा स्वस्थ किया जा सकता है।

  नहीं, लेकिन क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस का सही इलाज न होने पर यह दमे का रूप ले सकता है।

   जी हाँ, ठंड कफ को जमा देती है, जिससे जकड़न और खाँसी बढ़ जाती है।

  हाँ, अदरक और शहद का मिश्रण बलगम को निकालने में बहुत मदद  करता है।

 एलोपैथिक इनहेलर की निर्भरता बढ़ सकती है, इसलिए आयुर्वेद के साथ इसे धीरे-धीरे कम करने का प्रयास करें।

   हाँ, 'भुजंगासन' और 'मत्स्यासन' फेफड़ों को खोलने में बहुत फ़ायदा पहुँचाते हैं।

   धूम्रपान छोड़ने के कुछ ही दिनों बाद फेफड़े खुद को साफ़ करना शुरू कर देते हैं।

  हाँ, लहसुन में प्राकृतिक एंटी-बायोटिक गुण होते हैं जो पुरानी खाँसी  में मदद करते हैं।

   यह ब्रोंकाइटिस भी हो सकता है, लेकिन इसकी पुष्टि के लिए डॉक्टर सेजाँच करवाना ज़रूरी  है।

   जीवा का उपचार पूरी तरह प्राकृतिक है और मरीज़ की प्रकृति के अनुसार दिया जाता है।

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