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यूरिन इन्फेक्शन के बाद ब्लैडर की कमज़ोरी और सेंसिटिविटी को कैसे सुधारें?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

एंटीबायोटिक और तुरंत राहत देने वाली दवाओं का इस्तेमाल यूरिन इन्फेक्शन UTI और पेशाब से जुड़ी बीमारियों में काफी आम है। ये दवाएँ शरीर के अंदर इन्फेक्शन फैलाने वाले बैक्टीरिया को मार देती हैं और जलन के दर्दनाक संकेतों को मस्तिष्क तक पहुँचने से रोक देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह पूरी तरह ठीक हो गया है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि इन्फेक्शन ठीक होने के बाद भी मरीज़ को बार-बार पेशाब आने, पेशाब रोक न पाने और ब्लैडर में दबाव महसूस होने की भयंकर परेशानी होने लगती है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार भारी एंटीबायोटिक खाने से ब्लैडर की मांसपेशियों का कमज़ोर होना, नसों की सेंसिटिविटी बढ़ना, दवाओं पर शरीर की निर्भरता, या सबसे महत्वपूर्ण शरीर में मौजूद वात दोष का असंतुलन। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और मूत्र मार्ग की सेहत बनी रहे।

ब्लैडर की कमज़ोरी और सेंसिटिविटी क्या है?

यूरिन इन्फेक्शन के बाद ब्लैडर मूत्राशय की कमज़ोरी एक ऐसी स्थिति है, जहाँ ब्लैडर की मांसपेशियाँ और नसें अति-संवेदनशील Hypersensitive हो जाती हैं। आमतौर पर लोग इसका शिकार गंभीर इन्फेक्शन, तनाव, कम पानी पीने या पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों के कमज़ोर होने के कारण होते हैं। जब ब्लैडर सेंसिटिव हो जाता है, तो थोड़ा सा भी पेशाब इकट्ठा होने पर वह सिकुड़ने लगता है और दिमाग को बार-बार वॉशरूम जाने का सिग्नल देता है। पेशाब रोकने वाली दवाएँ खाने पर कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है, लेकिन ये दवाएँ सिर्फ नसों को सुन्न करती हैं, शरीर के अंदर मौजूद उस कमज़ोरी को ठीक नहीं करतीं जिसके कारण ब्लैडर पेशाब रोक नहीं पा रहा है। दवा को बिना डॉक्टर की सलाह के लगातार इस्तेमाल करना पाचन तंत्र और किडनी पर बुरा असर डालता है।

पेशाब और ब्लैडर की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

मूत्र रोग और ब्लैडर की तकलीफ से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं

  • ओवरएक्टिव ब्लैडर OAB इसमें ब्लैडर बहुत ज़्यादा सक्रिय हो जाता है, जिससे मरीज़ को अचानक और तेज़ पेशाब लगने की इच्छा होती है जिसे रोकना मुश्किल होता है।
  • स्ट्रेस इनकॉन्टिनेंस यह वह स्थिति है जहाँ खाँसने, छींकने, हँसने या भारी सामान उठाने पर ब्लैडर पर ज़ोर पड़ता है और पेशाब की कुछ बूँदें निकल जाती हैं।
  • इंटरस्टिशियल सिस्टाइटिस Painful Bladder Syndrome यह ब्लैडर की एक पुरानी सूजन है, जिसमें बिना किसी इन्फेक्शन के भी पेडू में तेज़ दर्द और बार-बार पेशाब आने की समस्या रहती है।

ब्लैडर की कमज़ोरी और सेंसिटिविटी के लक्षण और संकेत

इन्फेक्शन ठीक होने के बाद भी पेशाब से जुड़ी ये परेशानियाँ कई स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकती हैं। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं

  • बार-बार पेशाब आना दिन और रात दोनों समय जल्दी-जल्दी वॉशरूम भागना पड़ना।
  • अचानक तेज़ इच्छा Urgency अचानक इतनी तेज़ पेशाब लगना कि टॉयलेट तक पहुँचना मुश्किल हो जाए।
  • पेशाब का लीक होना इच्छा को रोक न पाना और पेशाब के कपड़े में ही निकल जाने का डर बना रहना।
  • पेडू में भारीपन निचले पेट में लगातार एक दबाव या हल्का दर्द महसूस होना।
  • दवा का असर खत्म होते ही वापसी ब्लैडर रिलैक्स करने वाली दवा बंद करते ही कुछ ही घंटों के भीतर बार-बार पेशाब आने का फिर से उभर आना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

यूरिन इन्फेक्शन के बाद ब्लैडर कमज़ोर होने के मुख्य कारण क्या हैं?

मूत्र मार्ग में इन्फेक्शन खत्म होने के बाद भी ब्लैडर के कमज़ोर रहने के पीछे कई अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं

  • नसों की सूजन Neuropathy इन्फेक्शन के दौरान ब्लैडर की अंदरूनी परत में सूजन आ जाती है, जिससे नसें अति-संवेदनशील हो जाती हैं और बिना पेशाब भरे ही सिकुड़ने लगती हैं।
  • एंटीबायोटिक्स का साइड इफेक्ट ज़्यादा दवाइयाँ खाने से शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता और मांसपेशियाँ कमज़ोर हो जाती हैं।
  • पेल्विक फ्लोर का कमज़ोर होना उम्र, मोटापा या पुराने इन्फेक्शन की वजह से ब्लैडर को सहारा देने वाली मांसपेशियाँ ढीली पड़ जाती हैं।
  • वात दोष का बढ़ना आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में अपान वात निचले हिस्से की वायु के बिगड़ने से पेशाब को रोक कर रखने की क्षमता कम हो जाती है।
  • खराब जीवनशैली चाय, कॉफी और शराब का ज़्यादा सेवन ब्लैडर को बहुत ज़्यादा उत्तेजित करता है।

ब्लैडर की कमज़ोरी के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

इस समस्या को अगर अनदेखा किया जाए या सही समय पर इलाज न मिले, तो यह कई जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं

  • नींद की कमी रात भर बार-बार पेशाब जाने से नींद टूटती है, जिससे दिन भर भयंकर थकान और कमज़ोरी रहती है।
  • मानसिक तनाव और चिंता घर से बाहर जाने में डर लगना, हमेशा वॉशरूम ढूँढते रहना और शर्मिंदगी के कारण डिप्रेशन हो सकता है।
  • त्वचा का इन्फेक्शन लगातार पेशाब लीक होने से गुप्त अंगों के आसपास दाने, लालिमा और फंगल इन्फेक्शन हो सकता है।
  • किडनी पर दबाव ब्लैडर की सिकुड़न और पेशाब के रिवर्स फ्लो से गुर्दे को नुकसान पहुँचने का खतरा रहता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से इन्फेक्शन के बाद ब्लैडर का कमज़ोर होना सिर्फ एक बाहरी दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'मूत्राघात' या अपान वात का बिगड़ना कहा जाता है और यह माना जाता है कि जब शरीर में वात दोष बढ़ जाता है, तब ऐसी परेशानी आती है। वात का गुण चंचलता है, जब यह ब्लैडर में बढ़ता है तो उसे स्थिर नहीं रहने देता और बार-बार सिकुड़न पैदा करता है। डॉक्टर नाड़ी और जीभ देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं एंटीबायोटिक खाने से शरीर में बहुत ज़्यादा खुश्की रूखापन तो नहीं आ गई है। जब तक यह बिगड़ा हुआ वात शरीर में रहेगा, ब्लैडर सेंसिटिव रहेगा। आयुर्वेद में बस लक्षण मिटाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, ब्लैडर की मांसपेशियों को अंदरूनी ताकत मिले और वात प्राकृतिक रूप से संतुलित बने।

ब्लैडर की कमज़ोरी के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में मांसपेशियों को ताकत देने, वात को शांत करने और ब्लैडर को मज़बूत रखने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं

  • अश्वगंधा यह मांसपेशियों और नसों को ताकत देने की सबसे बेहतरीन औषधि है। यह ब्लैडर की सिकुड़न को नियंत्रित करती है।
  • शिलाजीत आयुर्वेद में इसे मूत्र मार्ग की कमज़ोरी दूर करने के लिए बहुत शक्तिशाली माना गया है। यह ब्लैडर की दीवारों को मज़बूत बनाता है।
  • गोक्षुर गोखरू यह पेशाब की प्रणाली को सुचारू करता है और बची-खुची सूजन या इन्फेक्शन को जड़ से खत्म करता है।
  • पुनर्नवा यह ब्लैडर की सेंसिटिविटी को कम करता है और पुरानी अशुद्धियों को साफ करके पेडू के भारीपन को दूर करता है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, बिगड़े वात को शांत करके संपूर्ण स्वास्थ्य और मज़बूत ब्लैडर पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया

  • गहरी सफाई और नसों का पोषण जब ब्लैडर की कमज़ोरी काफी पुरानी हो और किसी दवा से स्थायी आराम न मिल रहा हो, तो जीवा आयुर्वेद में दोषों को संतुलित करने के लिए विशेष पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • बस्ती कर्म यह अपान वात को शांत करने का सबसे असरदार तरीका है। इसमें औषधीय तेलों या काढ़े का एनीमा दिया जाता है जो सीधा निचले अंगों को पोषण देता है।
  • उत्तर बस्ती मूत्राशय की सीधा ताकत बढ़ाने के लिए औषधीय तेल को मूत्र मार्ग से अंदर पहुँचाया जाता है, जो अंदरूनी सूजन और सेंसिटिविटी को जड़ से खत्म करता है।
  • स्थायी राहत के लिए औषधियाँ अंदरूनी पोषण के साथ ताकत देने वाली जड़ी-बूटियों का सेवन कराया जाता है। इससे सालों पुरानी भयंकर कमज़ोरी में राहत मिलती है।

ब्लैडर को मज़बूत करने के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, ब्लैडर को शांत करने के लिए सही मात्रा में तरल पदार्थ, वात शामक आहार और नसों को आराम देने वाला भोजन चुनना महत्वपूर्ण है

क्या खाएँ?

  • हल्का और पौष्टिक खाना गाय का घी, दूध और मूंग की दाल खाएँ, यह शरीर के वात दोष को शांत कर नसों को ताकत देते हैं।
  • पानी वाली सब्ज़ियाँ लौकी, कद्दू और परवल खाएँ, यह पेट को साफ रखते हैं और ब्लैडर पर दबाव नहीं पड़ने देते।
  • आंवला और बादाम आंवला ब्लैडर की मांसपेशियों को मज़बूत करता है और भीगे हुए बादाम नसों को ताकत देते हैं।

क्या न खाएँ?

  • चाय, कॉफी और चॉकलेट कैफीन ब्लैडर को बहुत ज़्यादा उत्तेजित करता है, जिससे पेशाब की इच्छा भड़कती है, इन्हें बिल्कुल बंद कर दें।
  • खट्टी और मसालेदार चीज़ें अचार, टमाटर, नीबू और मिर्च खाना कम कर दें, ये ब्लैडर की सेंसिटिविटी और सूजन को बढ़ाते हैं।
  • ठंडी और रूखी चीज़ें फ्रिज का ठंडा पानी, बासी खाना और रूखा भोजन खाने से वात बढ़ता है, जो समस्या को और खराब करता है।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में रोगों का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है

  • बीमारी और शरीर की स्थिति ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे ब्लैडर की कमज़ोरी कितनी पुरानी है, और मरीज़ का वात दोष कितना बिगड़ा हुआ है।
  • हल्की समस्या में सुधार अगर यह सेंसिटिविटी हाल ही के इन्फेक्शन के कारण है, तो आमतौर पर 3 से 6 हफ्तों में ही ब्लैडर शांत होने लगता है।
  • पुरानी बीमारी का समय अगर नसों की कमज़ोरी सालों पुरानी है और पेशाब रोक न पाने की भयंकर दिक्कत है, तो शरीर को पूरी तरह ताकत मिलने में 2 से 6 महीने भी लग सकते हैं।
  • उपचार का तरीका इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से वात शामक जड़ी-बूटियाँ, पेल्विक फ्लोर की एक्सरसाइज़ और सही खानपान शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम मरीज़ अगर अपनी डाइट का कड़ाई से पालन करता है, तो दोष संतुलित हो जाते हैं और भविष्य में समस्या के दोबारा पनपने की संभावना खत्म हो जाती है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

तीन महीने से मैं मूत्रमार्ग के संक्रमण के लिए एलोपैथिक दवाइयाँ ले रहा था। जब उनसे आराम नहीं मिला, तो मेरे एलोपैथी डॉक्टर ने मुझे आयुर्वेदिक डॉक्टर से मिलने की सलाह दी, इसलिए मैं जीवा आया। अब मैं पूरी तरह ठीक हूँ। जीवा के डॉक्टरों को इलाज के लिए धन्यवाद। अब मैं आयुर्वेद का पक्का अनुयायी हूँ और दूसरों को भी इसे अपनाने की सलाह देता हूँ।

दर्शन (फरीदाबाद)

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

ब्लैडर की कमज़ोरी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है

तुलना का आधार आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
उपचार का दृष्टिकोण लक्षणों को दबाने पर केंद्रित बीमारी की जड़ पर काम करना
कार्य करने का तरीका एंटी-मस्कैरेनिक दवाओं से ब्लैडर की नसों को अस्थायी रूप से सुन्न करना ब्लैडर की मांसपेशियों को प्राकृतिक रूप से मजबूत करना
मूल कारण पर प्रभाव नसों की कमज़ोरी को ठीक नहीं करता वात असंतुलन और कमजोरी को संतुलित करता है
उपचार विधियाँ एंटी-मस्कैरेनिक दवाइयाँ जड़ी-बूटियाँ और प्राकृतिक उपचार
दुष्प्रभाव मुँह सूखना, कब्ज़ और दवा छोड़ते ही समस्या लौटना सामान्यतः सुरक्षित, शरीर के अनुरूप सुधार
परिणाम अस्थायी राहत पेशाब रोकने की क्षमता में सुधार
समय जल्दी असर थोड़ा समय लगता है, लेकिन स्थायी लाभ

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

पेशाब रोक न पाने की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि

  • पेशाब में अचानक खून दिखाई देने लगे।
  • पेशाब लीक होने के कारण त्वचा पर गंभीर घाव या दाने हो जाएँ।
  • रात में 5-6 बार से ज़्यादा पेशाब के लिए उठना पड़े और नींद पूरी न हो।
  • पेडू और कमर के निचले हिस्से में तेज़ दर्द रहने लगे।
  • पेशाब करते समय रुक-रुक कर धार आए या ज़ोर लगाना पड़े।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और किसी भी गंभीर मनोवैज्ञानिक और शारीरिक परेशानी से बचा जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से यूरिन इन्फेक्शन के बाद ब्लैडर का कमज़ोर होना मुख्य रूप से अपान वात दोष के बिगड़ने तथा नसों में रूखापन आने से जुड़ा होता है। ज़्यादा एंटीबायोटिक खाने, गलत खान-पान, कैफीन का अधिक सेवन और कमज़ोर पेल्विक मांसपेशियों से ब्लैडर की सिकुड़न बढ़ती है। सिर्फ नसों को सुन्न करने वाली गोली खाने से लक्षण छिप जाते हैं लेकिन बीमारी जड़ से खत्म नहीं होती। इलाज में शरीर की अंदरूनी ताकत बढ़ाना और वात को शांत करना सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें अश्वगंधा और गोखरू जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना, व्यायाम करना और वात शामक दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, अगर नसों को ताकत देने के लिए सही आयुर्वेदिक औषधियाँ खाई जाएँ और व्यायाम किया जाए, तो इसे जड़ से खत्म किया जा सकता है।

नहीं, ये गोलियाँ सिर्फ नसों की अति-सक्रियता को कुछ समय के लिए दबाती हैं, ये मांसपेशियों को अंदरूनी ताकत नहीं देतीं।

हाँ, कैफीन ब्लैडर को बहुत ज़्यादा उत्तेजित करता है जो बार-बार पेशाब आने और सेंसिटिविटी का बड़ा कारण है।

हाँ, अश्वगंधा सबसे अच्छी आयुर्वेदिक औषधि है जो नसों को शांत कर ब्लैडर की सिकुड़न और कमज़ोरी को खत्म करने में मदद करती है।

हाँ, कब्ज़ के कारण भरी हुई आँतें ब्लैडर पर दबाव डालती हैं, जिससे पेशाब की इच्छा भड़कती है।

नहीं, पानी कम पीने से पेशाब गाढ़ा हो जाता है जो ब्लैडर को ज़्यादा इरिटेट करता है और दिक्कत को बढ़ा देता है।

हाँ, कीगल व्यायाम पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों को मज़बूत बनाते हैं जिससे पेशाब रोकने की क्षमता प्राकृतिक रूप से बढ़ती है।

हाँ, ज़्यादा तनाव से शरीर का नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है जो ब्लैडर की सेंसिटिविटी को बढ़ाकर बार-बार टॉयलेट जाने पर मजबूर करता है।

हाँ, बढ़ती उम्र के साथ वात दोष बढ़ता है और मांसपेशियाँ ढीली पड़ जाती हैं, लेकिन सही आयुर्वेद उपचार से इसे सुधारा जा सकता है।

हाँ, आयुर्वेद में घी और दूध को वात शामक माना गया है, जो शरीर के रूखेपन को दूर कर ब्लैडर की नसों को पोषण देते हैं।

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