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आयुर्वेद में मानव शरीर केवल हड्डियों और मांसपेशियों से नहीं बना होता। इसमें वात, पित्त और कफ दोषों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब ये दोष असंतुलित हो जाते हैं, तो शरीर में जकड़न, सूजन, मांसपेशियों में दर्द और जोड़ों में अकड़न जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। पिचु थेरेपी इन समस्याओं में राहत देती है। इस थेरेपी में हर्बल औषधियों और जड़ी-बूटियों से तैयार तेल को कपड़े या रूई में भिगोकर दर्द वाले स्थान पर लगाया जाता है। तेल हल्का गुनगुना रखा जाता है। यदि तेल ठंडा हो जाए, तो इसे दोबारा गुनगुना किया जाता है। पिचु को कुछ समय तक वहीँ रखा जाता है और हल्की मालिश की जाती है। इससे मांसपेशियों की सूजन कम होती है और जकड़न धीरे-धीरे घटती है। जोड़ों में लचीलापन आता है। पिचु थेरेपी केवल एक स्थान तक सीमित नहीं होती। इसका प्रभाव पूरे शरीर पर महसूस किया जा सकता है।
चाहे घुटनों का दर्द हो, कमर का दर्द हो या कंधों में जकड़न, पिचु थेरेपी प्रभावी होती है। यह थेरेपी मरीज को रिलैक्स महसूस कराती है। पिचु थेरेपी एक बार में पूरी तरह असर नहीं दिखाती। थेरेपिस्ट मरीज की स्थिति देखकर तेल और औषधियों का चयन करता है। थेरेपी कितनी बार करनी है, यह भी वही तय करते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, यह थेरेपी समस्या की जड़ तक जाती है। पेन किलर केवल अस्थायी राहत देते हैं, जबकि पिचु थेरेपी दर्द को स्थायी रूप से कम करती है। इससे शरीर में दोष संतुलन बना रहता है और जोड़ों, मांसपेशियों और नसों की सेहत बेहतर होती है।
पिचु थेरपी कैसे काम करती है? दर्द और सूजन में इसकी भूमिका
पिचु थेरेपी मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द और सूजन में बहुत प्रभावी मानी जाती है। आजकल की जीवनशैली में अधिकतर लोग लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं। शरीर की रोज़मर्रा की हलचल पहले की तुलना में कम हो गई है। जिससे जोड़ों की फ्लेक्सिबिलिटी घट जाती है। इसके परिणामस्वरूप घुटनों, कमर और कंधों में दर्द और जकड़न होने लगती है। कई लोगों को सूजन और मांसपेशियों की अकड़न की समस्या भी रहती है। पिचु थेरेपी इन समस्याओं में राहत देती है और शरीर को रिलैक्स करने में मदद करती है। थेरेपी की प्रक्रिया शुरू होने से पहले थेरेपिस्ट मरीज की समस्या और दोषों का मूल्यांकन करता है। आयुर्वेद के अनुसार दोषों के असंतुलन से ही ये समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। मरीज के दोष और समस्या के अनुसार हर्बल औषधियाँ चुनी जाती हैं।
इनसे तैयार तेल को हल्का गुनगुना किया जाता है। इसके बाद कपड़ा या रूई में तेल भिगोकर दर्द या जकड़न वाले स्थान पर रखा जाता है। इससे मांसपेशियों की सूजन कम होती है और दर्द में राहत मिलती है। कुछ समय के बाद हल्की मालिश की जाती है, जिससे मांसपेशियों का रूखापन दूर होता है। त्वचा और मांसपेशियों को नमी मिलती है और ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है। शरीर की थकान कम होती है और मरीज को गहरी रिलैक्सेशन का अनुभव होता है। इस प्रकार पिचु थेरेपी केवल दर्द और सूजन को कम नहीं करती, बल्कि मांसपेशियों और जोड़ों को मजबूत बनाती है, रक्त संचार को सुधारती है और शरीर में ऊर्जा का संचार करती है। लंबे समय तक दर्द या जकड़न की समस्याओं में यह थेरेपी विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है।
बस्ती थेरपी को आयुर्वेद में सबसे श्रेष्ठ क्यों माना गया है?
बस्ती थेरपी को आयुर्वेद में सबसे श्रेष्ठ इसलिए माना गया है क्योंकि यह समस्या की जड़ पर जाकर काम करती है, सिर्फ ऊपर-ऊपर दर्द या लक्षणों को दबाती नहीं है।
आयुर्वेद के अनुसार शरीर की ज़्यादातर तकलीफ़ें—जैसे कमर दर्द, घुटनों का दर्द, सर्वाइकल, साइटिका, नसों की कमजोरी, जकड़न, यहाँ तक कि थकान और बेचैनी—वात दोष बिगड़ने से शुरू होती हैं। अब वात दोष शरीर में कहाँ रहता है? आयुर्वेद कहता है कि वात का मुख्य स्थान बड़ी आँत (पेट का निचला हिस्सा) होता है। अगर यहीं से वात बिगड़ा है, तो दवा भी वहीं पहुँचना ज़रूरी है। बस्ती थेरपी ठीक यही काम करती है। बस्ती में औषधीय तेल या काढ़ा शरीर के अंदर ऐसे रास्ते से पहुँचाया जाता है जहाँ से उसका असर पूरे शरीर में फैल सकता है। यह सिर्फ पेट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नसों, जोड़ों, मांसपेशियों और रीढ़ तक असर करता है। इसलिए जिन लोगों को लंबे समय से दर्द रहता है, दवाइयों से आराम नहीं मिलता या दर्द बार-बार लौट आता है, उनमें बस्ती ज़्यादा असर दिखाती है।
एक और वजह यह है कि बस्ती शरीर को जबरदस्ती कुछ नहीं कराती। यह धीरे-धीरे शरीर को खुद संतुलन में आने में मदद करती है। तेल अंदर जाकर सूखापन कम करता है, नसों को आराम देता है और अंदर से ताक़त देता है। यही कारण है कि बस्ती के बाद लोग सिर्फ दर्द में राहत नहीं, बल्कि शरीर में हल्कापन, बेहतर नींद और ज़्यादा ऊर्जा भी महसूस करते हैं। आधुनिक इलाज में अक्सर दर्द की गोली दी जाती है, जो कुछ घंटों के लिए असर करती है। लेकिन बस्ती में शरीर को अंदर से ठीक करने की कोशिश होती है, इसलिए इसका असर धीरे आता है, मगर टिकाऊ होता है। आयुर्वेद के आचार्यों ने इसी वजह से कहा है कि वात से जुड़ी बीमारियों में बस्ती आधा नहीं, पूरा इलाज है। सीधे शब्दों में कहें तो बस्ती थेरपी इसलिए सबसे श्रेष्ठ मानी गई है क्योंकि यह शरीर के उस हिस्से से शुरुआत करती है जहाँ से ज़्यादातर समस्याएँ जन्म लेती हैं, और वहीं से पूरे शरीर को संतुलन में लाने का काम करती है।
कमर दर्द और घुटनों के दर्द में पिचु थेरपी के फायदे
कमर दर्द और घुटनों के दर्द में पिचु थेरपी बहुत फायदेमंद मानी जाती है। इसे आम ज़िंदगी की भाषा में समझना आसान है। जब कमर या घुटनों में दर्द होता है, तो वहाँ की मांसपेशियाँ थक चुकी होती हैं। नसों पर दबाव पड़ने लगता है। कई बार अंदर से वह हिस्सा सूख-सा जाता है। लंबे समय तक बैठना इसका बड़ा कारण है। गलत तरीके से उठना-बैठना भी दर्द बढ़ाता है। उम्र बढ़ने के साथ यह समस्या और बढ़ जाती है। ज़्यादा मेहनत का असर भी सबसे पहले कमर और घुटनों पर ही पड़ता है। ऐसे समय में पिचु थेरपी उस हिस्से को जरूरी आराम देती है। पिचु थेरपी में तेल को रुई या कपड़े में भिगोया जाता है। इसे दर्द वाले हिस्से पर रखा जाता है। तेल कुछ समय तक वहीं रहने दिया जाता है। इससे तेल धीरे-धीरे अंदर तक पहुँचता है। वह उस जगह की सख़्ती को नरम करने लगता है। कमर दर्द में अक्सर उठते-बैठते खिंचाव महसूस होता है। मुड़ते समय दर्द बढ़ जाता है। पिचु थेरपी इस खिंचाव को कम करती है। इससे चलना-फिरना आसान हो जाता है।
शरीर हल्का और ढीला महसूस करने लगता है। घुटनों के दर्द में भी यही फायदा मिलता है। घुटनों में जकड़न होने पर सीढ़ियाँ चढ़ना मुश्किल हो जाता है। बैठना या पालथी मारना भी कठिन लगता है। पिचु थेरपी से घुटनों को गर्माहट मिलती है। तेल की चिकनाहट अंदर तक जाती है। इससे अकड़न धीरे-धीरे कम होने लगती है। कुछ समय बाद सूजन भी घटने लगती है। घुटनों में हल्कापन महसूस होता है। चलने-फिरने में पहले से ज्यादा आराम मिलता है। इस थेरपी की सबसे खास बात यह है कि यह जल्दी खत्म नहीं होती। तेल को काम करने का पूरा समय मिलता है। इसलिए असर भी धीरे-धीरे और गहराई से होता है। पिचु थेरपी के बाद लोग सुकून और आराम महसूस करते हैं। जो लोग रोज़ दर्द की गोलियाँ लेते हैं, उन्हें भी इसमें फर्क दिखता है। यह शरीर को बाहर से सहारा देती है। साथ ही शरीर को खुद ठीक होने में मदद करती है। सीधे शब्दों में कहें तो पिचु थेरपी कमर और घुटनों के दर्द में इसलिए फायदेमंद है क्योंकि यह आराम देती है। यह जकड़न खोलती है। दर्द को धीरे-धीरे कम करती है। और यह सब बिना शरीर पर ज़्यादा दबाव डाले करती है।
पिचु / बस्ती थेरपी कितने दिन तक करानी चाहिए और इस उपचार का खर्च कितना आता है?
पिचु / बस्ती थेरपी कितने दिन तक करानी चाहिए, यह पूरी तरह समस्या की गंभीरता पर निर्भर करता है। यह व्यक्ति की शारीरिक स्थिति पर भी निर्भर करता है। आमतौर पर पिचु थेरपी 7 से 14 दिन तक कराई जाती है। यह एक स्थानीय उपचार है। इसका असर धीरे-धीरे उसी स्थान पर दिखाई देता है। हल्के या नए दर्द में कई बार 5 से 7 दिन में ही आराम महसूस होने लगता है। पुराने कमर दर्द, घुटनों के दर्द या लंबे समय से चली आ रही जकड़न में इसे 10 से 14 दिन तक जारी रखा जाता है। बस्ती थेरपी शरीर के अंदर से काम करने वाली गहरी आयुर्वेदिक थेरपी मानी जाती है। इसलिए इसकी अवधि पिचु थेरपी से अलग होती है। सामान्यतः बस्ती थेरपी 8, 10 या 16 दिन के कोर्स में कराई जाती है। इसका उद्देश्य शरीर को धीरे-धीरे संतुलन में लाना होता है।
बहुत पुराने या नसों से जुड़े दर्द में वैद्य इसकी अवधि आगे भी तय कर सकते हैं। यह उपचार हमेशा निगरानी में ही किया जाता है। इस थेरपी में लगभग ₹750 से ₹1000 तक का खर्च आता है। पिचु थेरपी कम दिनों में स्थानीय आराम देती है। वहीं बस्ती थेरपी थोड़ा अधिक समय लेकर अंदर से सुधार करती है। दोनों ही थेरपी कितने दिन करनी है, यह स्वयं तय नहीं करना चाहिए। वैद्य की सलाह से अवधि तय करना सबसे सुरक्षित और फायदेमंद होता है।
FAQs
- पिचु थेरपी और बस्ती थेरपी में क्या फर्क है?
पिचु थेरपी स्थानीय स्तर पर तेल या घृत से दर्द वाले हिस्से पर काम करती है, जबकि बस्ती थेरपी शरीर के अंदर जाकर वात दोष संतुलित करती है। - कमर दर्द में पिचु थेरपी कितने दिन तक करनी चाहिए?
आम तौर पर 7–14 दिन, लेकिन दर्द की गंभीरता और पुरानापन देखकर वैद्य तय करते हैं। - घुटनों के दर्द में कौन-सी थेरपी ज्यादा असरदार है?
हल्के और नई समस्या में पिचु थेरपी, लंबे समय से चले दर्द या वात दोष बढ़े हुए मामलों में बस्ती थेरपी अधिक लाभ देती है। - क्या पिचु या बस्ती थेरपी घर पर खुद की जा सकती है?
नहीं, यह अनुभवी आयुर्वेदिक वैद्य की देखरेख में ही सुरक्षित और असरदार है। - बस्ती थेरपी दर्द से तुरंत राहत देती है या धीरे-धीरे?
यह धीरे-धीरे असर करती है, लेकिन स्थायी और गहरा लाभ देती है। - पिचु थेरपी के दौरान तेल गर्म होना जरूरी है?
हाँ, हल्का गरम तेल बेहतर तरीके से त्वचा और मांसपेशियों तक पहुँचता है। - थेरपी के बाद क्या तुरंत पानी या ठंडी हवा में जाना चाहिए?
नहीं, थेरपी के बाद थोड़ी देर आराम करना चाहिए, तभी असर बेहतर होता है। - क्या बुज़ुर्गों और बच्चों के लिए यह थेरपी सुरक्षित है?
प्रतिमर्श और हल्की पिचु थेरपी बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए सुरक्षित है, लेकिन वैद्य की सलाह जरूरी है। - कितने समय में दर्द में राहत महसूस होती है?
कुछ ही दिनों में हल्का आराम महसूस हो सकता है, लेकिन स्थायी लाभ पूरे कोर्स के बाद आता है। - पिचु या बस्ती थेरपी केवल दर्द के लिए है या रोकथाम के लिए भी होती है?
दोनों के लिए उपयोगी है—दर्द कम करने के साथ-साथ लंबे समय तक नसों और जोड़ों को मजबूत और संतुलित रखने में मदद करती है।
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