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Dust Allergy - Antihistamine रोज़ ले रहे हैं? Long Term असर

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

सुबह उठते ही लगातार 15-20 छींकें आना, नाक से पानी बहना और आंखों में भयंकर खुजली होना। इस परेशानी से तुरंत बचने के लिए आप झट से एक एंटीहिस्टामाइन Antihistamine या एंटी-एलर्जिक गोली निगल लेते हैं 20 मिनट में छींकें बंद हो जाती हैं और आप चैन की सांस लेते हुए अपने ऑफिस या घर के काम में लग जाते हैं इस धूल-भरी दुनिया में, जब अचानक ज़रा सी डस्टिंग करने या अलमारी खोलने पर सांसें उखड़ने लगती हैं, तो हम इन दवाइयों को अपना सबसे अच्छा दोस्त मान लेते हैं

लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं है; यह आपके शरीर की नेचुरल इम्युनिटी के साथ एक बहुत बड़ा धोखा है जब रोज़ाना एंटीहिस्टामाइन खाना आपकी मजबूरी बन जाए, तो समझ लीजिए कि आपका शरीर उस 'डस्ट' Dust से नहीं, बल्कि अंदर जमे हुए 'टॉक्सिन्स' Toxins से लड़ रहा है रोज़ाना एंटी-एलर्जिक गोलियां खाने की इस आदत को अगर नज़रअंदाज़ किया गया, तो यह आगे चलकर आपके रेस्पिरेटरी सिस्टम श्वसन तंत्र को हमेशा के लिए कमज़ोर कर सकती है और अस्थमा Asthma जैसी गंभीर बीमारियों का रूप ले सकती है।

डस्ट एलर्जी और बार-बार छींक आना शरीर में क्या संकेत देती है?

धूल, मिट्टी या परागकण Pollen हर किसी के आस-पास होते हैं, लेकिन हर कोई इनसे बीमार नहीं पड़ता। जब आपका शरीर सामान्य धूल के कणों पर भी ओवर-रिएक्ट Over-react करने लगे, तो यह इस बात का संकेत है कि आपका इम्यून सिस्टम कन्फ्यूज़ हो चुका है।

  • हाइपर-रिएक्टिव इम्यून सिस्टम Hyper-reactive Immune System: जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है, तो वह धूल के सामान्य कणों को भी एक खतरनाक दुश्मन मान लेती है और बचाव के लिए भारी मात्रा में 'हिस्टामाइन' Histamine रिलीज़ करती है, जिससे छींकें और खुजली शुरू होती है।
  • रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट में सूजन Inflammation in Respiratory Tract: बार-बार डस्ट एलर्जी होना यह बताता है कि आपकी श्वास नली और फेफड़ों की अंदरूनी परत में क्रोनिक सूजन बनी हुई है।
  • कमज़ोर गट हेल्थ Weak Gut Health: विज्ञान और आयुर्वेद दोनों मानते हैं कि आपकी 70% इम्युनिटी आपके पेट में है। डस्ट एलर्जी का सीधा संबंध आपके खराब पाचन और आंतों में जमे हुए कचरे Toxins से है।

Antihistamine के लॉन्ग-टर्म साइड इफेक्ट्स किन प्रकारों में सामने आते हैं?

एलर्जी की गोलियां केवल उस 'हिस्टामाइन' केमिकल को ब्लॉक करती हैं, लेकिन बीमारी को जड़ से खत्म नहीं करतीं। सालों तक इन गोलियों का रोज़ाना इस्तेमाल शरीर के अलग-अलग सिस्टम्स को भयानक नुकसान पहुँचाता है:

  • ब्रेन फॉग और सुस्ती Brain Fog & Drowsiness: एंटीहिस्टामाइन दवाइयां आपके नर्वस सिस्टम को धीमा कर देती हैं। रोज़ाना इन्हें खाने वाले लोग हमेशा एक 'मेंटल फॉग' में रहते हैं। उनका दिमाग सुस्त रहता है, याददाश्त कमज़ोर होने लगती है और दिनभर एक अजीब सी थकान Lethargy छाई रहती है।
  • म्यूकस मेम्ब्रेन का सूखना Dryness in Mucous Membranes: ये दवाइयां नाक और गले के स्राव Secretions को सुखा देती हैं। लंबे समय तक इनके इस्तेमाल से नाक के अंदर भयंकर सूखापन, गले में खराश, सूखी खाँसी और आंखों में ड्राईनेस Dry Eyes Syndrome की गंभीर समस्या पैदा हो जाती है।
  • लिवर और किडनी पर भारी दबाव: कोई भी केमिकल जब रोज़ाना शरीर में जाता है, तो उसे फिल्टर करने का काम लिवर और किडनी का होता है। सालों तक एंटी-एलर्जिक दवाइयां खाने से लिवर स्लगिश Sluggish Liver हो जाता है और शरीर का मेटाबॉलिज़्म धीमा पड़ जाता है, जिससे वज़न भी बढ़ने लगता है।
  • दवाइयों पर निर्भरता Dependency: सबसे बड़ा नुकसान यह है कि शरीर अपना प्राकृतिक डिफेंस मैकेनिज्म भूल जाता है। एक समय बाद हल्की सी डोस काम करना बंद कर देती है और मरीज़ को स्टेरॉयड्स Steroids और इनहेलर्स Inhalers का सहारा लेना पड़ता है।

क्या आपके शरीर में भी इन दवाइयों के डैमेज के ये शुरुआती लक्षण दिख रहे हैं?

एंटी-एलर्जिक दवाइयों का साइड इफेक्ट अचानक नहीं होता। यह शरीर में धीरे-धीरे एक साइलेंट किलर की तरह काम करता है। अगर आपको रोज़ाना ये संकेत दिख रहे हैं, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ:

  • दवा के बिना नींद न आना: अगर आप एलर्जी की गोली खाए बिना रात को सो नहीं पाते, क्योंकि आपको लगता है कि नाक बंद हो जाएगी या सांस फूलने लगेगी।
  • मुँह और गले का भयंकर सूखना: सुबह उठने पर या रात के बीच में अगर आपका गला कांटों की तरह सूखने लगा है और आपको बार-बार पानी पीना पड़ता है।
  • वज़न बढ़ना और पाचन बिगड़ना: बिना किसी स्पष्ट कारण के वज़न का लगातार बढ़ना, कब्ज़ रहना और पेट का हमेशा फूला-फूला Bloated महसूस होना।
  • बार-बार मौसम बदलते ही बीमार पड़ना: दवाइयां खाने के बावजूद, जैसे ही मौसम में हल्का सा भी बदलाव होता है, आपको तुरंत भयंकर कोल्ड, कफ और बुखार जकड़ लेता है।

इस एलर्जी में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और उनकी जटिलताएँ?

लगातार छींकों और एलर्जी से तुरंत राहत पाने के चक्कर में मरीज़ अक्सर ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं जो उनके रेस्पिरेटरी सिस्टम को स्थायी रूप से डैमेज कर देते हैं:

  • सिर्फ लक्षणों को दबाना Symptom Suppression: छींक आना शरीर का एक तरीका है कचरे को बाहर फेंकने का। दवाइयां खाकर उस छींक को अंदर ही रोक देना सबसे बड़ी गलती है। इससे वो टॉक्सिन्स फेफड़ों में ही जम जाते हैं।
  • नेज़ल ड्रॉप्स Nasal Drops का अंधाधुंध इस्तेमाल: नाक खोलने वाले स्प्रे या ड्रॉप्स Decongestants का रोज़ाना इस्तेमाल नाक की अंदरूनी झिल्ली Nasal lining को नष्ट कर देता है। कुछ समय बाद 'रिबाउंड कंजेशन' Rebound Congestion होता है, जहां ड्रॉप के बिना नाक खुलती ही नहीं है।
  • भविष्य की गंभीर जटिलताएँ: अगर डस्ट एलर्जी और इस कमज़ोर इम्युनिटी को ठीक न किया जाए, तो यह क्रोनिक साइनसाइटिस Chronic Sinusitis, नेज़ल पॉलीप्स Nasal Polyps - नाक की हड्डी/मांस बढ़ना, और अंततः 'ब्रोंकियल अस्थमा' Bronchial Asthma का भयंकर रूप ले लेती है।

आयुर्वेद डस्ट एलर्जी और एंटीहिस्टामाइन के साइड इफेक्ट्स को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे 'एलर्जिक राइनाइटिस' Allergic Rhinitis कहता है, आयुर्वेद उसे 'वात-कफज प्रतिश्याय' और 'असात्म्य' Asatmya - शरीर की असहिष्णुता के विज्ञान से बहुत गहराई से समझता है।

  • आम Toxins का संचय: जब हमारी जठराग्नि पाचन तंत्र कमज़ोर होती है, तो खाया हुआ भोजन सही से पचता नहीं है और 'आम' टॉक्सिन्स में बदल जाता है। यह कचरा रक्त के साथ मिलकर हमारे रेस्पिरेटरी चैनल्स प्राणवह स्रोतस में जमा हो जाता है। जब धूल के कण इस कचरे से टकराते हैं, तो शरीर भयंकर रिएक्शन देता है।
  • ओजस Ojas/Immunity का क्षय: ओजस शरीर की वह चरम शक्ति है जो हमें बीमारियों से बचाती है। खराब लाइफस्टाइल, तनाव और रोज़ाना एंटीहिस्टामाइन खाने से शरीर का प्राकृतिक ओजस सूख जाता है, जिससे आप हर छोटी चीज़ के प्रति एलर्जिक हो जाते हैं।
  • कफ का सूखना और वात का प्रकोप: एंटी-एलर्जिक दवाइयां कफ को शरीर से बाहर निकालने के बजाय उसे अंदर ही सुखा देती हैं वात दोष बढ़ाकर। यह सूखा हुआ कफ फेफड़ों और साइनस में गोंद की तरह चिपक जाता है, जो आगे चलकर क्रोनिक ब्लॉकेज बनाता है।

डस्ट एलर्जी दूर करने और इम्युनिटी बढ़ाने वाली आयुर्वेदिक डाइट

आपका खाना ही आपके फेफड़ों में कफ जमा भी सकता है और उन्हें दोबारा साफ भी कर सकता है। रोज़ाना गोलियां खाने से बचने और एलर्जी को शांत करने के लिए इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी रूटीन में अनिवार्य रूप से शामिल करें।

आहार की श्रेणी क्या खाएं फायदेमंद - कफ को पिघलाने वाले और इम्युनिटी बढ़ाने वाले क्या न खाएं ट्रिगर फूड्स - कफ और टॉक्सिन्स बढ़ाने वाले
अनाज Grains पुराना चावल, जौ, मूंग दाल की खिचड़ी, बाजरा, दलिया। वाइट ब्रेड, मैदा, पिज़्ज़ा, पास्ता, भारी उड़द की दाल।
सब्ज़ियाँ Vegetables लौकी, तरोई, करेला, परवल, मेथी, लहसुन, अदरक। कच्चा सलाद विशेषकर रात में, आलू, अरबी, भिंडी।
फल Fruits पपीता, सेब उबला हुआ, अनार। फल हमेशा दोपहर में लें। केले, ठंडे संतरे, तरबूज, बाज़ार के पैकेटबंद जूस।
पेय पदार्थ Beverages गुनगुना पानी, तुलसी-अदरक की चाय, हल्दी वाला दूध गाय का। फ्रिज का ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक्स, शेक्स, आइसक्रीम।
डेयरी और अन्य Dairy/Others पुराना शुद्ध शहद कफ नाशक, थोड़ा घी। भारी चीज़ Cheese, पनीर, बासी खाना, गाढ़ा दही।

रेस्पिरेटरी सिस्टम को फौलादी ताक़त देने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में प्रकृति ने हमें ऐसे दिव्य रसायन दिए हैं, जो बिना किसी सुस्ती या साइड-इफेक्ट के एलर्जी को जड़ से मिटाते हैं और डैमेज हुए फेफड़ों को दोबारा ज़िंदा कर देते हैं:

  • हरिद्रा Turmeric: हल्दी दुनिया का सबसे बेहतरीन प्राकृतिक एंटी-एलर्जिक और एंटी-इंफ्लेमेटरी एजेंट है। यह शरीर में हिस्टामाइन के स्राव को प्राकृतिक रूप से कंट्रोल करती है और एलर्जी के प्रभाव को काटती है।
  • तुलसी Tulsi: तुलसी एक पावरफुल इम्यूनो-मॉड्यूलेटर Immuno-modulator है। यह श्वास नली की सूजन को कम करती है और फेफड़ों को ताज़ी ऑक्सीजन ग्रहण करने की ताक़त देती है।
  • कंटकारी Kantakari: जिन लोगों को डस्ट एलर्जी के कारण लगातार खांसी रहती है और गले में कफ अटका रहता है, कंटकारी उस चिपके हुए कफ को पिघलाकर बाहर निकालने की अचूक औषधि है।
  • शिरीष Shirish: आयुर्वेद में शिरीष को 'विषघ्न' Toxin destroyer कहा गया है। यह शरीर से हर प्रकार के एलर्जन Allergen के प्रभाव को शरीर से बाहर फेंकने में चमत्कारी है।
  • पिप्पली Pippali: पिप्पली आपके फेफड़ों को मजबूत बनाती है और रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट में जमे क्रोनिक इंफेक्शन को खत्म करती है।

एलर्जी को जड़ से मिटाने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब कफ और एलर्जी आपके साइनस और फेफड़ों में बहुत गहराई तक जम चुकी हो, तो पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ शरीर को तुरंत हील कर देती हैं:

  • नस्य Nasya: नाक के ज़रिए औषधीय तेल जैसे अणु तेल या षड्बिंदु तेल डालने की यह थेरेपी सीधे आपके साइनस को साफ करती है। यह नाक की अंदरूनी झिल्ली को मज़बूत बनाती है, जिससे धूल के कणों का असर होना बंद हो जाता है।
  • स्वेदन Swedana: औषधीय जड़ी-बूटियों की भाप दी जाती है। यह छाती और साइनस में जमे हुए गाढ़े कफ को पिघलाकर नाक और मुँह के रास्ते बाहर निकालने में मदद करती है।
  • वमन Vamana: यह एक डीप डिटॉक्सिफिकेशन प्रक्रिया है जिसमें शरीर के ऊपरी हिस्से पेट और फेफड़ों से अतिरिक्त और खराब कफ को उल्टी Emesis के ज़रिए जड़ से बाहर निकाल दिया जाता है। यह एलर्जी और अस्थमा का सबसे रामबाण इलाज है।
  • धूमपान Herbal Smoking: आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के धुएं को नाक से खींचा जाता है, जो श्वास नली को खोलता है और तुरंत आराम देता है।

एलर्जी के पूरी तरह रिपेयर होने और दवाइयां छूटने में कितना समय लगता है?

सालों से एंटीहिस्टामाइन के कारण कमज़ोर हुए इम्यून सिस्टम को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: औषधियों और डाइट से आपका पेट साफ होगा और जठराग्नि सुधरेगी। सुबह आने वाली छींकों में भारी कमी आएगी। आपकी एंटी-एलर्जिक गोलियों की रोज़ाना की डोज़ छूटने लगेगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म और रसायनों के प्रभाव से साइनस और फेफड़ों का जमा हुआ कफ बाहर निकल जाएगा। बिना किसी गोली के आप धूल और मौसम के बदलाव को बर्दाश्त कर पाएंगे। सुस्ती और थकान दूर होगी।
  • 5-6 महीने: आपकी 'ओजस' इम्युनिटी पूरी तरह पोषित हो जाएगी और आपका रेस्पिरेटरी सिस्टम फौलादी बन जाएगा। आप बिना किसी डर और गोली के एक सामान्य, ऊर्जावान जीवन जी सकेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

डस्ट एलर्जी और एंटीहिस्टामाइन के साइड इफेक्ट्स के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा Symptomatic care आयुर्वेद Holistic care
इलाज का मुख्य लक्ष्य हिस्टामाइन के सिग्नल्स को ब्लॉक करने के लिए एंटी-एलर्जिक Cetirizine/Allegra और स्टेरॉयड्स देना। इम्युनिटी ओजस को बढ़ाना, 'आम' को पचाना और रेस्पिरेटरी सिस्टम को प्राकृतिक रूप से मज़बूत करना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल बाहर से आने वाली धूल Allergen के कारण होने वाला रिएक्शन मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए कफ/वात और शरीर में जमे टॉक्सिन्स का परिणाम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल किसी विशेष डाइट पर कोई खास ज़ोर नहीं दिया जाता, केवल डस्ट से बचने की सलाह दी जाती है। कफ-शामक डाइट, सही दिनचर्या, कब्ज़ दूर करना और नस्य जैसी थेरेपी को इलाज का आधार माना जाता है।
लंबा असर दवाइयां छोड़ने पर छींकें और एलर्जी तुरंत वापस आ जाती है और शरीर दवा का आदी हो जाता है। शरीर अंदर से मज़बूत होता है और इम्यून सिस्टम खुद एलर्जी से लड़ना सीख लेता है, जिससे स्थायी आराम मिलता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • सांस लेने में भयंकर कठिनाई Severe Breathlessness: अगर अचानक आपको सांस खींचने में बहुत ज़्यादा मेहनत करनी पड़ रही हो और छाती जकड़ जाए।
  • सीटी जैसी आवाज़ आना Wheezing: सांस लेते या छोड़ते समय छाती से तेज़ सीटी जैसी Wheezing आवाज़ आने लगे।
  • होठों या चेहरे का नीला पड़ना Cyanosis: ऑक्सीजन की कमी के कारण अगर आपके होंठ या नाखून नीले पड़ने लगें, तो यह एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है।
  • गले का बुरी तरह सूज जाना: अगर एलर्जी के कारण गले के अंदर सूजन आ जाए और थूक निगलना भी असंभव हो जाए।

निष्कर्ष

घर की सफाई करना, अलमारी खोलना या बाहर खुली हवा में सांस लेना कोई बीमारी नहीं है; यह एक सामान्य जीवन है। लेकिन जब इन रोज़मर्रा के कामों में आपको छींकों के दौरे पड़ने लगें और आपको एंटीहिस्टामाइन गोलियों का सहारा लेना पड़े, तो यह आपके शरीर का वह अलार्म है जो बता रहा है कि आपकी इम्युनिटी दम तोड़ रही है। जब आप इस अलार्म को रोज़ाना एंटी-एलर्जिक गोलियों से दबाते हैं, तो आप अपने फेफड़ों को हील करने के बजाय उन्हें और भी ज़्यादा सुस्त और अपाहिज कर रहे होते हैं। इस दवाइयों के खतरनाक चक्र से बाहर निकलें। अपने पाचन को सुधारें, ठंडी और बासी चीज़ों से ब्रेक लें और अपनी डाइट में अदरक, तुलसी व पुराना शहद शामिल करें। हरिद्रा, कंटकारी और पिप्पली जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और नस्य व वमन थेरेपी से अपने श्वसन तंत्र को नया जीवन दें। एलर्जी के कारण अपनी सांसों को कमज़ोर न पड़ने दें, और अपने शरीर व इम्यून सिस्टम को स्थायी रूप से ताक़तवर बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

सामान्य सर्दी-ज़ुकाम वायरस के कारण होता है और 5-7 दिन में खुद ठीक हो जाता है। इसमें हल्का बुखार भी हो सकता है। लेकिन डस्ट एलर्जी धूल के संपर्क में आते ही ट्रिगर होती है, महीनों तक चल सकती है, इसमें बुखार नहीं होता, बल्कि लगातार छींकें और आंखों में खुजली बनी रहती है।

बिल्कुल। एंटीहिस्टामाइन दवाइयां आपके नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करती हैं और भूख को बढ़ाती हैं। साथ ही यह आपके मेटाबॉलिज़्म और लिवर को सुस्त कर देती हैं, जिससे शरीर में फैट और पानी जमा (Water retention) होने लगता है, और वज़न बढ़ने लगता है।

हाँ। एसी की ठंडी और रूखी हवा आपकी नाक और श्वास नली के अंदरूनी हिस्से को सुखा देती है। एसी के फिल्टर में जमा धूल के कण भी हवा में फैलते हैं, जो सीधे फेफड़ों में जाकर कफ दोष को भड़काते हैं और एलर्जी के लक्षण तुरंत शुरू हो जाते हैं।

हाँ। आयुर्वेद और विज्ञान दोनों मानते हैं कि अगर एलर्जिक राइनाइटिस (डस्ट एलर्जी) का लंबे समय तक सही इलाज न किया जाए, तो यह सूजन नाक से होती हुई फेफड़ों की नलियों तक पहुँच जाती है और भविष्य में ब्रोंकियल अस्थमा का रूप ले सकती है।

ठंडा पानी या फ्रिज की चीज़ें शरीर की जठराग्नि (पाचन की आग) को बुझा देती हैं। इससे शरीर में आम (Toxins) और कफ दोनों बहुत तेज़ी से बढ़ते हैं। यह बढ़ा हुआ कफ छाती में जम जाता है, जिससे एलर्जी और छींकों की समस्या और भी गंभीर हो जाती है।

आयुर्वेद सिर्फ एलर्जी के लक्षणों को नहीं दबाता, बल्कि यह उस असात्म्य (शरीर की असहिष्णुता) को खत्म करता है। शरीर को डिटॉक्स करके और इम्युनिटी (ओजस) बढ़ाकर आयुर्वेद शरीर को इतना मज़बूत कर देता है कि धूल का कण उसे बीमार नहीं कर पाता। इससे स्थायी आराम मिलता है।

डस्ट एलर्जी में नाक की अंदरूनी झिल्ली बहुत संवेदनशील (Sensitive) हो जाती है। नस्य में नाक के अंदर अणु तेल या षड्बिंदु तेल डाला जाता है, जो नाक की अंदरूनी परत पर एक सुरक्षात्मक लेयर (Protective layer) बना देता है और सूखे हुए कफ को बाहर निकालता है, जिससे धूल असर नहीं कर पाती।

हाँ, हल्दी (Curcumin) सबसे बेहतरीन प्राकृतिक एंटी-एलर्जिक है। जब इसे गर्म गाय के दूध और चुटकी भर काली मिर्च के साथ रात में लिया जाता है, तो यह फेफड़ों की सूजन कम करता है और हिस्टामाइन के रिलीज़ को रोकता है। (ध्यान दें: कफ बहुत अधिक होने पर दूध की जगह पानी में हल्दी लें)।

नहीं। आयुर्वेद के अनुसार कच्चा सलाद और ठंडे फल पचने में भारी होते हैं और शरीर में वात और कफ बढ़ाते हैं। डस्ट एलर्जी के मरीज़ों को हमेशा अच्छी तरह पका हुआ, गर्म और सुपाच्य भोजन (जैसे उबली हुई सब्ज़ियां और सूप) ही खाना चाहिए।

यह आपकी एलर्जी के पुराने होने और आपकी जठराग्नि पर निर्भर करता है। जीवा आयुर्वेद के सही उपचार, पंचकर्म और कफ-शामक डाइट का पालन करने पर आमतौर पर 1 से 2 महीने में ही आपकी रोज़ाना गोलियां खाने की ज़रूरत 80-90% तक कम हो जाती है।

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