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खड़े रहने पर पैरों में दर्द क्यों बढ़ता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 24 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 24 Apr, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5007

आज की व्यस्त जीवनशैली में लंबे समय तक खड़े रहना कई लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। शुरुआत में यह सामान्य थकान जैसा महसूस होता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत पैरों में दर्द, भारीपन और सूजन का कारण बनने लगती है।

अक्सर लोग इसे नज़रअंदाज कर देते हैं, यह सोचकर कि थोड़ा आराम करने से ठीक हो जाएगा। लेकिन बार-बार होने वाला यह दर्द केवल थकान नहीं, बल्कि नसों, जोड़ों और रक्त संचार में आ रहे असंतुलन का संकेत हो सकता है। यदि समय रहते इसे समझा और संभाला न जाए, तो यही समस्या आगे चलकर वैरिकोज वेन्स, जॉइंट पेन या क्रॉनिक दर्द का रूप ले सकती है, जो रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगती है।

पैरों में दर्द को नजरअंदाज करना क्यों गलत है

पैरों में होने वाला दर्द सिर्फ दिनभर की थकान नहीं होता, बल्कि शरीर का एक संकेत होता है कि अंदर कहीं असंतुलन पैदा हो रहा है। इसे बार-बार अनदेखा करना समस्या को धीरे-धीरे और गहरा बना सकता है।

लगातार दर्द नसों की कमजोरी, जोड़ों की खराबी या रक्त संचार में रुकावट का संकेत हो सकता है। यदि समय पर ध्यान न दिया जाए, तो यही साधारण लगने वाला दर्द आगे चलकर सूजन, वैरिकोज वेन्स या क्रॉनिक दर्द जैसी गंभीर समस्याओं का रूप ले सकता है, जो दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगती हैं।

खड़े रहने पर दर्द क्यों बढ़ता है – मूल कारण

लंबे समय तक खड़े रहने से पैरों पर लगातार दबाव पड़ता है, जिससे नसों और जोड़ों पर असर होता है। धीरे-धीरे रक्त संचार धीमा पड़ने लगता है, जिससे दर्द, सूजन और भारीपन महसूस होता है।

  • अधिक दबाव: शरीर का पूरा वजन पैरों पर पड़ने से नसों और जोड़ों पर तनाव बढ़ता है।
  • रक्त का जमाव: खून नीचे की ओर जमा होने लगता है और ऊपर लौटने में कठिनाई होती है।
  • नसों की कमजोरी: वाल्व कमजोर होने से रक्त सही दिशा में प्रवाहित नहीं हो पाता।
  • सूजन और भारीपन: जमा हुआ रक्त पैरों में सूजन और भारीपन पैदा करता है।
  • मांसपेशियों की थकान: लगातार खड़े रहने से मांसपेशियां थक जाती हैं और दर्द बढ़ता है।

लंबे समय तक खड़े रहने के दुष्परिणाम

अगर इन संकेतों को लगातार नजरअंदाज किया जाए, तो यह समस्याएं धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती हैं और रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित करने लगती हैं:

  • स्थायी दर्द: पैरों में लगातार रहने वाला दर्द, जो आराम करने पर भी पूरी तरह ठीक नहीं होता
  • वैरिकोज वेन्स: नसों का फूलना, मुड़ना और स्पष्ट रूप से बाहर दिखाई देना
  • जोड़ों की समस्या: घुटनों और टखनों में सूजन, जकड़न और चलने में दर्द
  • चलने में कठिनाई: समय के साथ चलना-फिरना भी असहज और दर्दनाक हो जाना
  • रक्त संचार में कमी: पैरों में रक्त का सही प्रवाह न होने से सुन्नपन और कमजोरी महसूस होना

लंबे समय तक खड़े रहने से जोड़ों पर असर और बढ़ता दर्द

लंबे समय तक खड़े रहने से घुटनों और टखनों पर लगातार अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे जोड़ों की प्राकृतिक संतुलन क्षमता और cushioning धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती है।

जब शरीर का वजन लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहता है, तो जोड़ों के बीच मौजूद cartilage (नरम कुशन) पर दबाव बढ़ता है। समय के साथ यह घिसाव (wear and tear) पैदा करता है, जिससे सूजन और दर्द शुरू हो जाता है।

इसके अलावा, खड़े रहने से आसपास की मांसपेशियां भी थक जाती हैं, जो सामान्य रूप से जोड़ों को सहारा देती हैं। जब यह सहारा कम होता है, तो जोड़ों पर सीधा दबाव बढ़ता है, जिससे stiffness, चलने में दर्द और धीरे-धीरे chronic joint issues की संभावना बढ़ने लगती है।

शुरुआती संकेत जिन्हें अक्सर नजरअंदाज किया जाता है

पैरों से जुड़े ये छोटे-छोटे लक्षण शुरुआत में सामान्य लगते हैं, लेकिन यही आगे चलकर बड़ी समस्या का संकेत बन सकते हैं। अगर इन्हें समय पर समझ लिया जाए, तो गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है।

  • पैरों में भारीपन: दिन के अंत में पैरों का बोझिल और थका हुआ महसूस होना, जैसे पैरों में ताकत कम हो गई हो
  • हल्की सूजन: खासकर टखनों और पंजों के आसपास सूजन दिखना, जो सुबह कम और शाम को ज्यादा हो जाती है
  • शाम के समय दर्द बढ़ना: दिनभर खड़े रहने के बाद दर्द और असहजता का बढ़ जाना
  • नसों का उभरना: त्वचा के ऊपर नीली या उभरी हुई नसें दिखना, जो वैरिकोज वेन्स की शुरुआत हो सकती हैं
  • जलन या खिंचाव: पैरों में हल्की जलन, खिंचाव या झनझनाहट महसूस होना

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण: पैरों के दर्द की असली जड़

आयुर्वेद के अनुसार पैरों का दर्द केवल बाहरी कारणों का परिणाम नहीं, बल्कि शरीर के अंदर चल रहे असंतुलन का संकेत है। जब वात दोष बढ़ जाता है, तो यह नसों और जोड़ों में सूखापन, खिंचाव और जकड़न पैदा करता है, जिससे दर्द धीरे-धीरे बढ़ने लगता है, खासकर लंबे समय तक खड़े रहने से यह स्थिति और खराब हो जाती है।

इसके साथ ही, कमजोर पाचन के कारण बनने वाला ‘आम’ (टॉक्सिन्स) शरीर में जमा होकर जोड़ों और नसों में रुकावट पैदा करता है। यह जमा हुआ आम शरीर के सूक्ष्म मार्गों (स्रोतस) को ब्लॉक कर देता है, जिससे रक्त और पोषण का सही प्रवाह नहीं हो पाता।

पैरों में भारीपन, सूजन, दर्द और थकान लगातार महसूस होने लगती है। यही कारण है कि आयुर्वेद इस समस्या को केवल दर्द नहीं, बल्कि पूरे शरीर के संतुलन से जुड़ी स्थिति मानता है, जिसे जड़ से ठीक करना आवश्यक होता है।

जीवा आयुर्वेद का दृष्टिकोण: पैरों के दर्द का समग्र समाधान

जीवा आयुर्वेद में पैरों के दर्द को केवल दबाने की नहीं, बल्कि उसकी जड़ को समझकर ठीक करने की कोशिश की जाती है। उपचार का उद्देश्य शरीर के अंदर के असंतुलन को संतुलित करना और प्राकृतिक रूप से राहत दिलाना होता है।

  • दोष विश्लेषण: यह समझा जाता है कि वात, पित्त या कफ में कौन सा दोष बढ़ा हुआ है
  • अग्नि का मूल्यांकन: पाचन शक्ति की स्थिति जांची जाती है, क्योंकि कमजोर पाचन दर्द को बढ़ाता है
  • ‘आम’ का निष्कासन: शरीर में जमा टॉक्सिन्स को बाहर निकालने पर ध्यान दिया जाता है
  • रक्त संचार सुधार: नसों में ब्लड फ्लो को बेहतर बनाने के लिए उपचार किया जाता है
  • आयुर्वेदिक औषधियाँ: जड़ी-बूटियों से बनी दवाएं जो अंदर से जोड़ों और नसों को मजबूत करती हैं
  • थेरेपी सपोर्ट: अभ्यंग, बस्ती जैसी थेरेपी से दर्द और जकड़न को कम किया जाता है
  • डाइट और दिनचर्या: व्यक्ति के अनुसार आहार और लाइफस्टाइल में सुधार कराया जाता है

यह समग्र तरीका धीरे-धीरे दर्द को कम करने के साथ-साथ उसे दोबारा होने से भी रोकने में मदद करता है।

पैरों के दर्द और नसों की समस्या में उपयोगी आयुर्वेदिक औषधियाँ

आयुर्वेद में ऐसी जड़ी-बूटियों और संयोजनों का उपयोग किया जाता है, जो नसों को मजबूत करें, सूजन कम करें और रक्त संचार को बेहतर बनाएं। ये औषधियाँ दर्द को जड़ से नियंत्रित करने में सहायक होती हैं।

  • अश्वगंधा: नसों और मांसपेशियों को मजबूत बनाती है, कमजोरी और दर्द को कम करने में सहायक
  • गुग्गुल (योगराज गुग्गुल): जोड़ों के दर्द, सूजन और stiffness को कम करने में प्रभावी
  • दशमूल: सूजन और दर्द को शांत करता है, वात दोष को संतुलित करता है
  • निर्गुंडी: सूजन, दर्द और नसों की जकड़न में राहत देने वाली प्रमुख जड़ी-बूटी

इन औषधियों का उपयोग व्यक्ति की प्रकृति और समस्या की गंभीरता के अनुसार किया जाता है, इसलिए इन्हें विशेषज्ञ की सलाह से ही लेना उचित होता है। 

पैरों के दर्द और नसों की समस्या में प्रभावी आयुर्वेदिक थेरेपी

आयुर्वेदिक थेरेपी केवल बाहरी राहत नहीं देतीं, बल्कि नसों, जोड़ों और रक्त संचार को भीतर से संतुलित करने में मदद करती हैं। ये प्रक्रियाएं दर्द, सूजन और जकड़न को कम करके पैरों में हल्कापन और आराम देती हैं।

  • अभ्यंग (Abhyanga): औषधीय तेलों से पूरे पैरों की मालिश, जो रक्त संचार बढ़ाती है और नसों को रिलैक्स करती है
  • स्वेदन (Swedan): हर्बल स्टीम थेरेपी, जो सूजन और stiffness को कम करके दर्द में राहत देती है
  • बस्ती (Basti): वात संतुलन के लिए प्रमुख थेरेपी, जो अंदर से नसों और जोड़ों को पोषण देती है
  • पिंड स्वेद (Pinda Sweda): हर्बल पोटली से सेक, जो मांसपेशियों के खिंचाव और दर्द को कम करता है
  • लेप (Herbal Paste): प्रभावित जगह पर जड़ी-बूटियों का लेप, जो सूजन और जलन को शांत करता है

इन थेरेपी का नियमित और सही तरीके से किया गया उपयोग पैरों के दर्द को कम करने के साथ-साथ उसकी जड़ पर काम करता है।

डाइट चार्ट (पैरों के दर्द और नसों की समस्या में)

सही आहार नसों को मजबूत बनाने, सूजन कम करने और रक्त संचार सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हल्का, पोषक और संतुलित भोजन ही शरीर को अंदर से ठीक करने में मदद करता है।

क्या खाएं (लाभकारी आहार) क्या न खाएं (हानिकारक आहार)
मूंग दाल की खिचड़ी, हल्का और सादा भोजन तला-भुना और भारी भोजन
गर्म दूध, हल्दी वाला दूध बहुत ज्यादा ठंडे पेय पदार्थ
मौसमी फल जैसे केला, सेब, पपीता पैकेट फूड और जंक फूड
उबली या हल्की पकी सब्जियां ज्यादा मसालेदार और तेल वाला खाना
सूखे मेवे सीमित मात्रा में (बादाम, अखरोट) अत्यधिक चाय और कॉफी
गुनगुना पानी नियमित रूप से कोल्ड ड्रिंक्स और सोडा
पर्याप्त गुनगुना पानी देर रात भारी भोजन

संतुलित और समय पर लिया गया आहार नसों को मजबूत बनाता है, सूजन कम करता है और दर्द में धीरे-धीरे राहत देता है।

जीवा आयुर्वेद में जांच कैसे की जाती है? (पैरों के दर्द में)

जीवा आयुर्वेद में पैरों के दर्द की जांच केवल लक्षणों तक सीमित नहीं होती, बल्कि शरीर के अंदर के असंतुलन को समझकर की जाती है।

  • वात दोष मूल्यांकन: दर्द और जकड़न में वात की भूमिका
  • रक्त संचार जांच: पैरों में ब्लड फ्लो और जमाव की स्थिति
  • जोड़ों का विश्लेषण: सूजन, stiffness और घिसाव का आकलन
  • ‘आम’ की पहचान: शरीर में टॉक्सिन्स का स्तर
  • अग्नि मूल्यांकन: पाचन शक्ति की स्थिति
  • नाड़ी परीक्षा: समग्र दोष असंतुलन की पहचान
  • लाइफस्टाइल रिव्यू: खड़े रहने, गतिविधि और दिनचर्या का विश्लेषण

इससे समस्या की जड़ समझकर सटीक उपचार तय किया जाता है।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

सुधार होने में कितना समय लगता है? (पैरों के दर्द में)

शुरुआती स्टेज: 7–15 दिनों में दर्द, सूजन और भारीपन में हल्की राहत महसूस होने लगती है।
पुरानी (Chronic) समस्या: 4–8 हफ्तों में वात संतुलन, रक्त संचार और जोड़ों की स्थिति धीरे-धीरे बेहतर होने लगती है, जिससे स्थायी राहत मिलती है।
अन्य कारक: सुधार की गति आपकी दिनचर्या, खड़े रहने की अवधि, आहार, वजन और शारीरिक सक्रियता पर निर्भर करती है।

इलाज से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं?

सही और कस्टमाइज़्ड आयुर्वेदिक उपचार से आपको धीरे-धीरे ये सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं:

  • पैरों के दर्द और सूजन में कमी
  • भारीपन और थकान का कम होना
  • नसों में खिंचाव और जकड़न से राहत
  • चलने-फिरने में आसानी और लचीलापन बढ़ना
  • रक्त संचार बेहतर होना
  • लंबे समय में दर्द के दोबारा होने की संभावना कम होना

यह सुधार धीरे-धीरे लेकिन अंदर से स्थायी रूप से महसूस होता है।

पेशेंट टेस्टिमोनियल 

मेरा नाम उर्मिला राय है, मेरी उम्र 55 वर्ष है और मैं नोएडा सेक्टर 50 से हूँ। मुझे पैरों और हाथों में दर्द, घुटनों की समस्या और गैस्ट्रिक परेशानी थी। मुझे किसी ने जीवा आयुर्वेद के बारे में बताया, जिसके बाद मैंने यहाँ उपचार शुरू किया। यहाँ का ट्रीटमेंट, डाइट और लाइफस्टाइल गाइडेंस बहुत अच्छा है। थेरेपी और योग से भी मुझे काफी लाभ मिला। जीवाग्राम रहने के लिए भी बहुत अच्छी जगह है और यहाँ का वातावरण बहुत सकारात्मक है। अब मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करती हूँ।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च और पारदर्शिता 

कई लोग सोचते हैं कि ऐसा कस्टमाइज्ड आयुर्वेद बहुत महंगा होगा। लेकिन आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है । जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें ।

  • जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है । (यह एक अनुमानित आधार है और अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।)
  • अधिक व्यापक दृष्टिकोण के लिए विशेष पैकेज प्रोटोकॉल भी हैं, जिन्हें शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है ।
  • इन पैकेज में दवा, परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सत्र, योग और ध्यान मार्गदर्शन, आहार योजना और थेरेपी शामिल हैं । इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है ।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।
  • दवाइयों पर निर्भरता कम: 88% मरीजों ने धीरे-धीरे एलोपैथिक दवाओं और हार्मोनल सपोर्ट पर निर्भरता कम की है।

आयुर्वेद vs मॉडर्न अप्रोच 

बिंदु आयुर्वेदिक दृष्टिकोण मॉडर्न दृष्टिकोण
सोच का तरीका इसे वात असंतुलन, ‘आम’ और रक्त संचार की समस्या के रूप में देखता है इसे vein weakness, poor circulation और joint degeneration के रूप में देखता है
मुख्य कारण वात वृद्धि, कमजोर पाचन, टॉक्सिन्स का जमाव लंबे समय तक खड़े रहना, वाल्व की कमजोरी, cartilage wear
लक्षणों की समझ दर्द, जकड़न, भारीपन, सूखापन और सूजन pain, swelling, varicose veins, stiffness
उपचार का तरीका दोष संतुलन, अग्नि सुधार, औषधियाँ और पंचकर्म painkillers, compression therapy, physiotherapy, surgery (गंभीर मामलों में)
मुख्य फोकस जड़ कारण को ठीक करना और संपूर्ण संतुलन बनाना लक्षणों को कम करना और दर्द नियंत्रित करना
रिजल्ट धीरे-धीरे लेकिन स्थायी सुधार, पुनरावृत्ति कम जल्दी राहत, लेकिन समस्या दोबारा हो सकती है

कब डॉक्टर से सलाह लें

अगर पैरों में दर्द लगातार बढ़ रहा हो, सूजन कम न हो रही हो या नसें साफ़ तौर पर उभरने लगी हों, तो इसे हल्के में लेना सही नहीं है। चलने में कठिनाई, पैरों में सुन्नपन, जलन या तेज़ दर्द महसूस होना भी संकेत है कि समस्या सामान्य नहीं रही। ऐसे में समय पर विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है, ताकि स्थिति बिगड़ने से पहले ही सही उपचार शुरू किया जा सके।

निष्कर्ष

खड़े रहने से होने वाला पैरों का दर्द सिर्फ साधारण थकान नहीं, बल्कि शरीर का एक संकेत है कि अंदर कहीं असंतुलन विकसित हो रहा है। अगर समय रहते इस पर ध्यान दिया जाए, सही दिनचर्या अपनाई जाए और शरीर के संकेतों को समझा जाए, तो इस समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है। याद रखें, स्वस्थ शरीर वही है जिसमें चलना-फिरना सहज हो और जीवन दर्द के बिना संतुलित तरीके से आगे बढ़ सके।

FAQs

शुरुआत में हल्का दर्द या थकान सामान्य हो सकती है, लेकिन अगर यह रोज होने लगे या बढ़ने लगे, तो यह शरीर का संकेत है कि नसों या जोड़ों पर ज्यादा दबाव पड़ रहा है। इसे नजरअंदाज करना आगे चलकर समस्या को बढ़ा सकता है।

नहीं, यह केवल सौंदर्य से जुड़ी समस्या नहीं है। यह नसों में रक्त संचार की गड़बड़ी का संकेत है, जो दर्द, सूजन और भारीपन जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है।

 ऐसा जरूरी नहीं है। लंबे समय तक खड़े रहना, गलत लाइफस्टाइल, मोटापा और कमजोर मांसपेशियां भी कम उम्र में पैरों के दर्द का कारण बन सकती हैं।

आराम से अस्थायी राहत मिल सकती है, लेकिन अगर मूल कारण जैसे खराब रक्त संचार या वात असंतुलन ठीक नहीं किया जाए, तो दर्द दोबारा लौट सकता ह

हाँ, जिन लोगों को नौकरी या काम के कारण लंबे समय तक खड़ा रहना पड़ता है, उनमें नसों और जोड़ों पर ज्यादा दबाव पड़ता है, जिससे यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है।

 हाँ, समय पर ध्यान न देने पर यह वैरिकोज वेन्स, क्रॉनिक जॉइंट पेन और चलने में कठिनाई जैसी समस्याओं में बदल सकती है।

हल्की एक्सरसाइज और स्ट्रेचिंग रक्त संचार को बेहतर बनाती है, जिससे दर्द और stiffness में राहत मिल सकती है। लेकिन बहुत अधिक या गलत व्यायाम से दर्द बढ़ भी सकता है।

हाँ, खराब आहार से पाचन बिगड़ता है और ‘आम’ बनता है, जो सूजन और दर्द को बढ़ा सकता है। सही और संतुलित भोजन से समस्या को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

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