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बच्चों के लिए healthy tiffin में क्या ध्यान रखें?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अक्सर हम सोचते हैं कि सुबह-सुबह जल्दी उठकर बच्चे के टिफिन में कुछ भी पैक कर दिया और बच्चे ने स्कूल जाकर उसे खत्म कर लिया, तो हमारी ज़िम्मेदारी पूरी हो गई। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि टिफिन पूरा खत्म करने के बाद भी बच्चा घर आकर चिड़चिड़ा क्यों रहता है, या थोड़ी सी पढ़ाई करने के बाद उसे भयंकर थकान क्यों घेर लेती है? दरअसल, पेट भरना और शरीर का सही तरीके से पोषित होना, दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क है। बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास का असली काम तो उन पोषक तत्वों से होता है जो वह रोज़ाना खा रहा है। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि बच्चों के टिफिन का चुनाव कोई मामूली काम नहीं है, बल्कि यह उनके भविष्य की सेहत की नींव रखने का सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

स्कूल में पढ़ाई और खेल-कूद के दौरान शरीर में क्या होता है?

जब आपका बच्चा स्कूल जाता है, उसका शरीर खेल-कूद में लगातार ऊर्जा खर्च करता है और उसका दिमाग नई बातें सीखता है। बच्चे का शरीर इस पूरी भागदौड़ के दौरान अपनी सारी रिज़र्व ऊर्जा को एक्टिव रहने में लगाता है। बच्चे की तेज़ी से बढ़ने वाली कोशिकाएँ और मांसपेशियाँ आवश्यक विटामिन्स और मिनरल्स की जरूरत महसूस करती हैं। यदि एक टिफिन में सिर्फ जंक फूड, यानी कम कैलोरी हैं, तो ऊर्जा का स्तर अचानक बढ़ता है और फिर तेजी से गिरता है। यही कारण है कि लंच ब्रेक के बाद कई बच्चे पढ़ाई से ध्यान भटकने लगते हैं 

क्या टिफिन खाली होने का मतलब सही पोषण मिलना है?

जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। कई बार माता-पिता इस बात से खुश हो जाते हैं कि बच्चे ने बिस्किट या पैकेटबंद स्नैक्स पूरा खा लिया है और टिफिन खाली लौटा है। टिफिन खाली होने का मतलब सिर्फ इतना है कि आपके बच्चे की भूख शांत हो गई है, लेकिन उसकी बढ़ती उम्र की जो ज़रूरतें थीं, उनकी भरपाई अभी बाकी है। अगर आप यह सोचकर खुश हो रहे हैं कि बच्चा कुछ तो खा रहा है, तो फायदे की जगह आप उसकी इम्युनिटी और ग्रोथ को हफ्तों पीछे धकेल रहे हैं। समस्या बच्चे की खाने की ज़िद में नहीं, बल्कि हमारी इस आधी-अधूरी जानकारी और सुबह की जल्दबाज़ी में है।

लगातार अनहेल्दी टिफिन से बच्चों की सेहत पर क्या असर पड़ता है?

जब हम बिना सोचे-समझे स्वाद के चक्कर में पोषण को नज़रअंदाज़ करके बच्चे को जंक फूड देते हैं, तो उनके शरीर के अंदर अजीबोगरीब बदलाव होते हैं

  • एकाग्रता में भारी कमी: अगर टिफिन में भारी मात्रा में रिफाइंड शुगर और मैदा है, तो बच्चे का 'शुगर क्रैश' होता है, जिससे क्लास में उसे नींद आती है और फोकस बिगड़ जाता है।
  • कमज़ोर हड्डियां और दांत: शरीर में कैल्शियम और ज़रूरी फ्लूइड्स की कमी से हड्डियां कमज़ोर होने लगती हैं और कम उम्र में ही दांतों में कैविटी की शिकायत लगातार बनी रहती है।
  • मोटापा और सुस्ती: फाइबर की कमी और अनहेल्दी फैट्स के कारण बच्चे का वज़न तो बढ़ता है, लेकिन शरीर में ताकत नहीं होती, जिससे वह हमेशा सुस्त रहता है।
  • बार-बार बीमार पड़ना: कमज़ोर इम्यूनिटी और विटामिन्स की कमी के कारण बच्चा बहुत जल्दी किसी भी बदलते मौसम या नए इन्फेक्शन की चपेट में आ सकता है।

क्या खराब पोषण शरीर में किसी बड़ी परेशानी का संकेत बन सकता है?

अगर महीनों और सालों तक बच्चे को सही टिफिन नहीं मिल रहा है, तो इसे नज़रअंदाज़ बिल्कुल न करें। यह शरीर में कई लंबी दिक्कतें पैदा कर सकता है:

  • बचपन का मोटापा: गलत कार्बोहाइड्रेट्स और शुगर का लगातार सेवन आगे चलकर थायरॉइड या अर्ली-डायबिटीज जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है।
  • हाइपरएक्टिविटी और चिड़चिड़ापन: जंक फूड में मौजूद प्रिजर्वेटिव्स और कृत्रिम रंग  बच्चे के नर्वस सिस्टम पर असर डालते हैं, जिससे वे बेवजह चिड़चिड़े हो जाते हैं।
  • मेटाबॉलिक इम्बैलेंस: खराब टिफिन का असर सीधा बच्चे के मेटाबॉलिज़्म और पाचन तंत्र पर पड़ सकता है, जिससे पुरानी कब्ज़ या पेट दर्द की समस्या रहने लगती है।
  • एनीमिया (खून की कमी): आयरन से भरपूर भोजन न मिलने के कारण रेड ब्लड सेल्स कमज़ोर होने लगते हैं, जिससे बच्चे का चेहरा पीला पड़ने लगता है और जल्दी थक जाता है।

प्राचीन आयुर्वेद बच्चों के पोषण को किस नज़रिए से देखता है?

आयुर्वेद के अनुसार, बचपन की अवस्था 'कफ दोष' के प्रभाव में होती है। यह वह समय है जब शरीर में 'धातुओं' का निर्माण सबसे तेज़ी से हो रहा होता है। आयुर्वेद मानता है कि बच्चों की 'जठराग्नि' (पाचन अग्नि) अभी विकसित हो रही होती है। अगर उन्हें भारी, बासी या जंक फूड दिया जाए, तो शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनने लगता है। इस प्रक्रिया में शरीर का 'रस धातु' (प्लाज्मा) कमज़ोर हो जाता है और उनका 'ओजस' (जीवन ऊर्जा/इम्यूनिटी) घट जाता है। जब आप बच्चे को टिफिन देते हैं, तो आयुर्वेद 'सत्विक आहार' (सादा, ताज़ा और ऊर्जावान भोजन) देने पर ज़ोर देता है। इसका सीधा मतलब है कि जब तक आप बच्चे के खाने में प्रकृति से जुड़ी चीज़ें शामिल नहीं करेंगे, महंगे से महंगा सप्लीमेंट पाउडर भी फायदा नहीं करेगा।

बच्चों के टिफिन को हेल्दी और टेस्टी बनाने वाले बेहतरीन साथी

प्रकृति ने हमें बच्चों के विकास के लिए कुछ बेहतरीन चीज़ें दी हैं, जो कमज़ोरी को खत्म कर उनके शरीर में नई जान फूँक देती हैं:

  • पनीर और सब्जियों के रोल: यह प्रोटीन और फाइबर का एक बेहतरीन कॉम्बो है। आटे की रोटी में घर का बना पनीर और बारीक कटी सब्जियां लपेट कर देने से उन्हें भरपूर ऊर्जा मिलती है।
  • मखाना और सूखे मेवे: बिस्किट या चिप्स की जगह घी में भुने हुए मखाने और बादाम-अखरोट दें। यह दिमाग को तेज़ करता है और शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का बैलेंस बनाता है।
  • मूंग दाल का चीला या इडली: पचने में बेहद आसान होने के साथ-साथ यह कमज़ोर आंतों को ताकत देती है और लंबे समय तक पेट भरा रखती है।
  • मौसमी ताज़े फल: सेब, केला, या पपीता टिफिन के एक छोटे हिस्से में ज़रूर दें। इम्यूनिटी (ओजस) बढ़ाने के लिए यह प्रकृति का सबसे बड़ा हथियार है।

टिफिन पैक करते समय वो आम गलतियाँ जो फायदे को नुकसान में बदल देती हैं

हम अक्सर जाने-अनजाने में सुबह की जल्दबाज़ी में कुछ ऐसा कर बैठते हैं जो बच्चे की परेशानी बढ़ा देता है:

  • रोज़ाना पैकेटबंद जंक फूड देना: इससे बच्चे के शरीर में अनहेल्दी फैट जमा हो जाता है और न्यूट्रिशनल क्रैश होने का खतरा रहता है।
  • प्लास्टिक के टिफिन का इस्तेमाल: गर्म खाना जब प्लास्टिक में जाता है, तो हानिकारक केमिकल्स खाने में मिल जाते हैं जो हार्मोनल बैलेंस बिगाड़ते हैं। हमेशा स्टील या कांच के टिफिन का इस्तेमाल करें।
  • टिफिन में कृत्रिम जूस पैक करना: फलों के जूस के नाम पर मिलने वाले डिब्बाबंद ड्रिंक्स में सिर्फ सफेद चीनी होती है, जो शरीर को अंदर से और ज़्यादा डिहाइड्रेट कर देती है।
  • सफेद ब्रेड और मैदा: इनके ज़्यादा इस्तेमाल से शरीर का इन्फ्लेमेशन (सूजन) बढ़ जाता है और आंतों में खाना चिपकने से कब्ज़ होती है।

महंगे सप्लीमेंट्स की जगह इन आसान तरीकों से दें असली प्राकृतिक पोषण

आप कुछ बहुत ही आसान और स्मार्ट तरीके अपनाकर बच्चे के टिफिन को उसकी फेवरेट चीज़ बना सकते हैं:

  • सब्जियों को चालाकी से छुपाएं: अगर बच्चा गाजर या पालक नहीं खाता, तो उसकी प्यूरी बनाकर आटे में गूंथ लें और उसकी रंग-बिरंगी पूरियाँ या पराठे बना दें।
  • खाने को रंग-बिरंगा बनाएं: बच्चे आँखों से पहले खाते हैं। टिफिन में अलग-अलग रंगों के फल और सब्जियां रखें। यह विटामिन्स और एंटीऑक्सीडेंट्स का पावरहाउस है।
  • गुड़ और खजूर का इस्तेमाल: सफेद चीनी की जगह टिफिन में मीठे के लिए खजूर की बर्फी या गुड़ से बने मखाने रखें; यह शरीर के वात और थकान को शांत करता है।
  • छोटा और खाने में आसान (Bite-sized) भोजन: बच्चों के पास खेलने की जल्दी होती है, इसलिए उन्हें ऐसी चीज़ें दें जो वे आसानी से और जल्दी चबा सकें, जैसे मिनी-इडली या फ्रूट क्यूब्स।

आयुर्वेद बच्चों के शारीरिक विकास पर इतना भरोसा क्यों करता है?

आयुर्वेद सिर्फ लक्षणों को नहीं दबाता, बल्कि बीमारी की जड़ तक जाता है। आयुर्वेद यह मानता है कि बचपन में जो धातुएं (Tissues) बनती हैं, वे जीवन भर शरीर का आधार रहती हैं। इसलिए अगर बचपन में ही जठराग्नि (पाचन) को ठीक रखकर 'रस धातु' को पोषण दिया जाए, तो बाकी सातों धातुएं अपने आप मज़बूत होने लगती हैं। आयुर्वेद में बच्चों का डाइट प्लान कुछ इस तरह सेट किया जाता है जो अंदरूनी सफाई भी करे और 'ओजस' को बढ़ाकर उन्हें भविष्य की गंभीर बीमारियों से भी बचाए।

बच्चों के पोषण के मामले में डॉक्टर के पास भागने की नौबत कब आ सकती है?

लगातार हेल्दी टिफिन और घर का खाना देने के बाद भी अगर बच्चे के शरीर में ये लक्षण दिखें, तो आपको तुरंत पीडियाट्रिशियन (बच्चों के डॉक्टर) के पास जाना चाहिए

  • अगर बच्चा पर्याप्त खा रहा है फिर भी अचानक उसका वज़न बहुत तेज़ी से गिरने या बहुत ज़्यादा बढ़ने लगे।
  • टिफिन का कोई खास खाना (जैसे दूध, पीनट बटर या ग्लूटेन) खाने के बाद शरीर पर रैशेस या साँस लेने में दिक्कत होने लगे (यह फूड एलर्जी हो सकती है)।
  • अगर बच्चा लगातार पेट दर्द की शिकायत करे और कई दिनों तक कब्ज़ या दस्त रहे।
  • अगर स्कूल से आने के बाद वह इतना सुस्त हो जाए कि उसका खेलना-कूदना बिल्कुल बंद हो जाए।

निष्कर्ष

हमेशा याद रखें कि प्रकृति ने हमें और हमारे बच्चों को स्वस्थ रखने के लिए बेहतरीन और ताज़ा भोजन का उपहार दिया है। बस ज़रूरत है तो उस प्राकृतिक खाने को सही समय और सही तरीके से परोसने की। आपका बच्चा टिफिन में जो भी खाता है, उसका सीधा असर उसकी ग्रोथ, लंबाई, याददाश्त और यहाँ तक कि उसके व्यवहार पर पड़ता है। इसलिए, सिर्फ 'टिफिन खाली होने' को अपना लक्ष्य मानकर पोषण से समझौता करने की गलती न करें। अपनी इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में थोड़ा समय निकालें, मेन्यू प्लान करें और बच्चे को ताज़ा, घर का बना खाना दें। जब आपके बच्चे का शरीर अंदर से पूरी तरह से पोषित और संतुलित रहेगा, तो यकीनन वह न सिर्फ क्लास में सबसे आगे रहेगा, बल्कि मैदान में भी पहले से कहीं ज़्यादा ऊर्जावान महसूस करेगा।

Referneces

ICMR-NIN Poshan Abhiyaan

Infant and young child feeding

https://www.pib.gov.in/Pressreleaseshare.aspx?PRID=1882214&lang=2&reg=48&utm_source

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

टिफिन में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और हेल्दी कार्बोहाइड्रेट का संतुलन होना चाहिए ताकि बच्चे को लंबे समय तक ऊर्जा मिले।

नहीं। ये पेट तो भर सकते हैं, लेकिन शरीर को ज़रूरी पोषण नहीं देते और जल्दी भूख लगने का कारण बन सकते हैं।

ज़रूरी नहीं। टिफिन खत्म करना और सही पोषण मिलना दो अलग बातें हैं।

पनीर रोल, मूंग दाल चीला, इडली, वेज पराठा, मखाना, सूखे मेवे और मौसमी फल अच्छे विकल्प हैं।

नहीं। इनमें अधिक नमक, चीनी और प्रिज़र्वेटिव हो सकते हैं जो सेहत को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

फल विटामिन, मिनरल और एंटीऑक्सीडेंट प्रदान करते हैं, जो इम्यूनिटी और विकास में मदद करते हैं।

बेहतर होगा कि स्टील या कांच के टिफिन का उपयोग किया जाए।

इससे फोकस कम हो सकता है, थकान बढ़ सकती है और बच्चे की एकाग्रता प्रभावित हो सकती है।

सब्जियों को पराठे, रोल, चीला या आटे में मिलाकर स्वादिष्ट तरीके से परोस सकते हैं।

अगर बच्चे का वजन असामान्य रूप से बदल रहा हो, बार-बार पेट दर्द हो, फूड एलर्जी के लक्षण हों या लगातार कमजोरी महसूस हो रही हो, तो डॉक्टर से संपर्क करें।

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