गर्मी का मौसम शुरू होते ही हवा में कई बदलाव होने लगते हैं, जो दमे के मरीज़ों की परेशानी बढ़ा देते हैं। इनमें सबसे बड़ी वजह है उमस, यानी हवा में नमी का बहुत ज़्यादा बढ़ जाना।
हवा में नमी ज़्यादा होने पर सांस लेना भारी लगने लगता है। फेफड़ों को भी अपना काम करने में ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। उमस वाली इस गर्मी में ऐसा लगता है जैसे हवा में घुटन हो। इससे सांस की नली में जलन और सूजन बढ़ जाती है। इसके साथ ही, गर्मियों की हवा में धूल, धुआं और फूलों के बारीक कण भी बहुत ज़्यादा उड़ते हैं। ये सब चीज़ें मिलकर सांस की नली को बहुत नाज़ुक बना देती हैं। दमे के मरीज़ों को ऐसे मौसम में घर से बाहर निकलते समय, खासकर सुबह और शाम के वक़्त, बहुत ज़्यादा सावधानी बरतने की ज़रूरत होती है।
आयुर्वेद की मानें तो गर्मियों में शरीर का पित्त दोष बढ़ जाता है। इससे फेफड़ों में गर्मी और सूजन दोनों बढ़ने लगती हैं। यही वजह है कि कई लोगों को गर्मी के मौसम में भी दमे का अटैक आ जाता है।
Pollen आखिर होता क्या है?
Pollen (परागकण) पेड़-पौधों के बहुत ही बारीक कण होते हैं, जो अक्सर हवा में उड़ते रहते हैं। पौधे इन्हें अपने विकास के लिए हवा में छोड़ते हैं। आम लोगों पर इन कणों का कोई असर नहीं होता और शरीर इन्हें आसानी से नज़रअंदाज़ कर देता है। पर जिन लोगों को एलर्जी वाला दमा होता है, उनका शरीर इन Pollen कणों को किसी बाहरी हमले की तरह समझता है। शरीर का इम्यून सिस्टम तुरंत इसके खिलाफ एक्शन लेने लगता है। इसी वजह से सांस की नलियां सिकुड़ने लगती हैं, अंदर सूजन आ जाती है और सांस लेना काफी मुश्किल हो जाता है।
दमा आखिर होता क्या है?
दमा या Asthma एक ऐसी परेशानी है जिसमें सांस की नलियाँ सिकुड़ जाती हैं और उनमें सूजन आ जाती है। इससे सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और सीने में जकड़न महसूस होती है। यह कोई रातों-रात होने वाली बीमारी नहीं है, यह धीरे-धीरे ही शरीर में पनपती है।
जब भी कोई बाहरी कण, धूल, धुआं या ठंडी हवा हमारी सांस की नलियों में जाती है, तो शरीर का सिस्टम उसे खतरे की तरह देखता है और तुरंत बचाव करता है। इसी कोशिश में सांस की नलियाँ सिकुड़ने लगती हैं और अंदर बलगम जमा होने लगता है। इससे सांस लेना और भी ज़्यादा मुश्किल हो जाता है।
दमे के मरीज़ों को आमतौर पर ये तकलीफें होती हैं:
- सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज़ आना।
- सीने में भारीपन और जकड़न महसूस होना।
- बार-बार खांसी आना, खासकर रात और सुबह के वक़्त।
- थोड़ा सा चलने या काम करने पर ही सांस फूलना।
यह सच है कि दमा पूरी तरह खत्म नहीं होता, पर सही इलाज और एक अच्छे रूटीन से इसे काबू में रखा जा सकता है। आप आराम से एक नॉर्मल ज़िन्दगी जी सकते हैं।
मई-जून में Pollen का असर क्यों बढ़ जाता है?
मई-जून के महीने शुरू होते ही कई पेड़-पौधे और घास एक साथ Pollen छोड़ने लगते हैं। तेज़ और गर्म हवाएं इन बारीक कणों को काफी दूर तक उड़ा ले जाती हैं। यही वजह है कि इस मौसम में हवा के अंदर Pollen सबसे ज़्यादा होता है। शहरों में तो यह दिक्कत और भी बड़ी हो जाती है। जब हवा का प्रदूषण और Pollen आपस में मिलते हैं, तो यह फेफड़ों को बहुत नुकसान पहुंचाता है। अकेले Pollen से होने वाली परेशानी प्रदूषण के साथ मिलकर कई गुना बढ़ जाती है। इसी कारण से गांवों के मुकाबले शहरों में रहने वाले दमे के मरीज़ों को इन दिनों ज़्यादा तकलीफ सहनी पड़ती है।
गर्मी में दमे के लक्षण क्यों बदल जाते हैं?
सर्दियों के मौसम में जहां ठंडी हवा दमे को बढ़ावा देती है, वहीं गर्मियों में Pollen, धूल और प्रदूषण मिलकर फेफड़ों को परेशान करते हैं। इसी वजह से गर्मियों में दमे के लक्षण थोड़े अलग लगते हैं। लोग अक्सर इसे आम एलर्जी मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं:
- बार-बार छींक आना: सुबह उठते ही या बाहर निकलते वक़्त लगातार छींकें आना जो रुकने का नाम ही न लें।
- आंखों में जलन और पानी: हवा में उड़ते बारीक कणों के कारण आंखों में लाल हो जाना और जलन महसूस होना।
- सुबह खांसी बढ़ना: रात भर सोने के बाद सुबह उठते ही खांसी का तेज़ हो जाना और गले में खिंचाव लगना।
- सीने में हल्की जकड़न: सीने के अंदर एक तरह का कसाव या भारीपन महसूस होना, जैसे कुछ दब रहा हो।
- रात में सूखी खांसी: दिन में आराम रहे, पर रात को लेटते ही सूखी खांसी शुरू हो जाए जिससे नींद खराब हो।
- सांस लेते समय सीटी की आवाज़: सांस लेते या छोड़ते वक़्त सीने से सीटी जैसी हल्की आवाज़ आना।
इन सभी इशारों को बस मौसम का बदलाव समझकर टालना बिल्कुल ठीक नहीं है। अगर आपके साथ यह बार-बार हो रहा है, तो सही समय पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।
कौन से लोग सबसे ज़्यादा सावधान रहें?
Pollen का असर हर किसी पर एक जैसा नहीं पड़ता। कुछ लोगों का शरीर इन बारीक कणों को लेकर बहुत नाज़ुक होता है। ऐसे लोगों को मई-जून के दिनों में अपना खास ख्याल रखने की ज़रूरत होती है:
- जिन्हें पहले से एलर्जी है: जिन लोगों को धूल, फूलों या किसी और चीज़ से एलर्जी होती है, उन पर Pollen का असर बहुत तेज़ होता है।
- बच्चे: बच्चों की सांस की नलियां बड़ों के मुकाबले ज़्यादा नाज़ुक होती हैं, इसलिए Pollen उन्हें जल्दी अपनी चपेट में ले लेता है।
- बुज़ुर्ग: उम्र बढ़ने के साथ फेफड़ों की ताक़त कम होने लगती है। ऐसे में बुज़ुर्गों के लिए दमे के लक्षण ज़्यादा मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।
- जिन्हें धूल से एलर्जी हो: ऐसे लोगों में Pollen और प्रदूषण का मिक्सचर और भी ज़्यादा तकलीफ देता है।
- स्मोकिंग करने वाले: स्मोकिंग से फेफड़े पहले ही कमज़ोर हो चुके होते हैं। ऐसे में Pollen का अटैक और भी तेज़ होता है।
- दमे की फैमिली हिस्ट्री: अगर माता-पिता या दादा-दादी को दमा रहा है, तो आगे की पीढ़ी में भी इसके होने के चांस ज़्यादा रहते हैं।
इन सभी लोगों को मई-जून के महीने में बाहर निकलते समय, और खासकर सुबह व शाम के वक़्त बहुत ज़्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।
सुबह के वक़्त दमे की तकलीफ क्यों बढ़ जाती है?
सुबह के शुरुआती घंटों में, खासकर जब सूरज निकल रहा होता है, हवा में Pollen सबसे ज़्यादा होता है। रात भर पेड़ों और पत्तों पर जमा हुआ Pollen सुबह की हवा के साथ उड़ने लगता है। इसी वजह से कई दमे के मरीज़ों को सुबह उठते ही छींक, खांसी या सांस लेने में दिक्कत होने लगती है।
आयुर्वेद भी इस बात को बहुत अच्छे से समझाता है। सुबह के समय को कफ का समय माना जाता है। रात भर शरीर में कफ जमा होता है, जो सुबह उठने पर सांस की नलियों में भारीपन और जकड़न लाता है। अगर आपके शरीर में पहले से ही कफ ज़्यादा है, तो Pollen के साथ मिलकर यह परेशानी और भी बढ़ जाती है।
घर के अंदर भी सांस की तकलीफ क्यों बढ़ सकती है?
हम में से बहुत से लोग सोचते हैं कि बस घर के अंदर रहने से दमे से बच जाएंगे। पर यह बात पूरी तरह सच नहीं है। घर के अंदर भी ऐसी बहुत सी चीज़ें होती हैं जो आपकी सांस की दिक्कत को बढ़ा सकती हैं। पुराने पर्दों या गद्दों में घुसी धूल, तकियों में जमे बारीक कण, पालतू जानवरों के बाल और कोनों में लगी फफूंद ये सब मिलकर घर की हवा को खराब कर देते हैं।
बंद कमरों में हवा ठीक से पास नहीं हो पाती, जिससे ये कण हवा में तैरते रहते हैं और सांस लेते वक़्त हमारे अंदर चले जाते हैं। गर्मियों में जब हम खिड़कियां बंद रखते हैं और ताज़ा हवा अंदर नहीं आ पाती, तो यह दिक्कत और बढ़ जाती है। इसीलिए दमे के मरीज़ों के लिए घर की साफ-सफाई और ताज़ा हवा का आना-जाना उतना ही ज़रूरी है, जितना कि बाहर के प्रदूषण से बचना।
आयुर्वेद के हिसाब से दमा और कफ दोष का क्या नाता है?
आयुर्वेद में दमे का नाम 'तमक श्वास' है। अगर आप सोच रहे हैं कि यह बीमारी क्यों होती है, तो इसका सीधा कनेक्शन शरीर में कफ और वात दोष के बिगड़ने से है। जब हमारे शरीर में बहुत ज़्यादा कफ इकट्ठा होने लगता है, तो सांस की नलियां ब्लॉक होने लगती हैं। उस पर वात दोष इस ब्लॉकेज को और बढ़ा देता है। नतीजा यह होता है कि सांस लेना काफी मुश्किल हो जाता है। मौसम बदलने पर जब हमारा पाचन कमज़ोर पड़ता है, तो यह दिक्कत और भी बढ़ जाती है।
हम लोग अक्सर गलत खानपान या देर रात भारी चीज़ें खा लेते हैं। इससे शरीर के अंदर 'आम' (टॉक्सिन्स) बनने लगता है। अब जब यही गंदगी हमारे फेफड़ों तक पहुंचती है, तो बार-बार खांसी आती है और सांस अटकने लगती है। यही वजह है कि आयुर्वेद सिर्फ सांस की नली खोलने पर काम नहीं करता। यह आपका पाचन ठीक करके शरीर से सारी गंदगी बाहर निकालने और कफ को बैलेंस करने पर फोकस करता है।
आयुर्वेद का उपचार का नज़रिया
आयुर्वेद दमे को सिर्फ सांस फूलने की बीमारी मानकर नहीं चलता। यह कफ और वात के बिगड़ने, कमज़ोर पाचन और शरीर में जमा गंदगी का मिला-जुला रूप है। इसमें इलाज का मकसद आपको सिर्फ तुरंत आराम देना नहीं है। इसका टारगेट आपकी इम्युनिटी और फेफड़ों की ताक़त को जड़ से ठीक करना होता है।
- जड़ पर काम: सिर्फ खांसी को किसी तरह रोक देना इलाज नहीं है। इसमें बीमारी के असली कारणों को पकड़ा जाता है, जैसे कि धूल, कमज़ोर पाचन, एलर्जी या फिर आपका खराब रूटीन।
- कफ का बैलेंस: कफ के बढ़ने से ही छाती में बलगम जमता है और भारीपन लगता है। इसी वजह से शरीर में कफ को बैलेंस रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।
- सांस के रास्ते की सफाई: इसमें फेफड़ों और सांस की नलियों को एकदम खुला और साफ रखा जाता है। इससे आप बिना किसी रुकावट के आराम से सांस ले पाते हैं।
- इम्युनिटी पर ज़ोर: अगर आपको बार-बार सर्दी या खांसी हो रही है, तो यह अस्थमा को और बिगाड़ देगा। इसीलिए शरीर की अपनी ताक़त बढ़ाने पर पूरा ध्यान दिया जाता है।
- रूटीन में सुधार: देर रात तक जगना, किसी भी वक्त खाना और हमेशा तनाव में रहना। इन सब आदतों को सुधारना भी इस इलाज का एक बहुत ज़रूरी हिस्सा है।
इलाज में काम आने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ
आयुर्वेद की ये बूटियां कोई आम दवाएं नहीं हैं जो सिर्फ दर्द कम कर दें। ये आपके फेफड़ों को अंदर से मज़बूती देती हैं और कफ को बार-बार बनने से रोकती हैं:
- मुलेठी: गला बार-बार सूख रहा हो या उसमें खराश हो, तो मुलेठी इसमें बहुत फायदा करती है।
- पिप्पली: यह सिर्फ फेफड़ों को ही ठीक नहीं रखती, बल्कि आपके पाचन को भी एकदम चुस्त रखती है।
- तुलसी: शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने और सांस को नॉर्मल करने में तुलसी की कोई बराबरी नहीं कर सकता।
- त्रिकटु: जब छाती में भारीपन लगे या कफ ज़्यादा जम जाए, तो त्रिकटु उसे काटकर शरीर से बाहर कर देता है।
इलाज की आयुर्वेदिक थेरेपी
इन सभी तरीकों का बस एक ही मकसद है कि सांस का रास्ता खुले और शरीर की सारी थकावट दूर हो:
- अभ्यंग (तेल मालिश): हल्के गर्म आयुर्वेदिक तेल से की गई मालिश वात को बैलेंस करती है और शरीर को काफी आराम देती है।
- स्वेदन (सिकाई): शरीर को जब हल्की भाप दी जाती है, तो अंदर फंसी सारी जकड़न टूट जाती है। इसके बाद आप खुद महसूस करेंगे कि सांस लेना कितना आसान हो गया है।
- नस्य कर्म: सांस के रास्ते की पूरी सफाई के लिए नाक में कुछ खास तेल की बूंदें डाली जाती हैं।
- धूमपान कर्म: इसमें जड़ी-बूटियों का एक खास धुआं दिया जाता है। यह नलियों में चिपके पुराने कफ को भी पिघलाकर बाहर निकाल देता है।
- शिरोधारा: दिमाग की सारी टेंशन को खत्म करके शरीर को एकदम रिलैक्स करने के लिए यह तरीका सबसे बढ़िया है।
आहार में क्या बदलाव करें? (क्या खाएं और क्या न खाएं)
अस्थमा में सही खानपान आपकी इम्युनिटी और फेफड़ों के लिए बहुत ज़रूरी है।
- गर्म और ताज़ा खाना: यह पचने में आसान होता है और शरीर में कफ नहीं बढ़ने देता।
- हल्का भोजन: हरी सब्ज़ियां और मूंग की दाल खाएं। इससे पाचन सही रहता है।
- ठंडी चीज़ों से बचें: फ्रिज में रखा या बासी खाना कफ बढ़ाता है, जिससे सांस की दिक्कत होती है।
- मीठा और पैकेट वाला खाना: बहुत ज़्यादा मीठी या पैकेट वाली चीज़ें शरीर में भारीपन लाती हैं। इन्हें कम करें।
- गुनगुना पानी: हल्का गर्म पानी पीने से गला साफ रहता है और पाचन सुधरता है।
- देर रात न खाएं: देर से खाने पर पाचन धीमा होता है, जिससे रात में खाँसी बढ़ जाती है।
- ज़्यादा तला-भुना: ज़्यादा चिकनाई वाली चीज़ें कफ और बेचैनी दोनों बढ़ाती हैं। लंबे समय तक भूखे भी न रहें।
मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव
मेरा नाम मोनिका दीक्षित है और मैं गाज़ियाबाद से हूँ। मुझे अस्थमा की समस्या थी, जिसके लिए मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ और कई तरह के इलाज लिए, लेकिन समस्या कम होने की बजाय धीरे-धीरे बढ़ती गई। फिर मैंने टीवी पर डॉ. प्रताप चौहान का कार्यक्रम देखा और उसके बाद जीवा आयुर्वेद क्लिनिक आई। यहाँ डॉक्टरों ने मेरी पूरी स्थिति को समझकर आयुर्वेदिक उपचार शुरू किया। धीरे-धीरे मुझे राहत मिलने लगी। आज मैंने रेगुलाइज़र और इनहेलर स्प्रे का इस्तेमाल छोड़ दिया है। मेरी दवाइयाँ भी धीरे-धीरे कम हो गई हैं और अब मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करती हूँ।
डॉक्टर से सलाह कब लेनी चाहिए?
सांस की किसी भी दिक्कत को कभी नज़रअंदाज़ न करें। अगर ये इशारे मिलें तो तुरंत चेकअप करवाएं:
- सांस बार-बार फूल रही हो।
- सीने में लगातार जकड़न रहे।
- रात में खाँसी सोने न दे।
- सांस लेते वक़्त सीटी जैसी आवाज़ आई।
- थोड़ा सा चलने पर ही बहुत थकान लगी।
- मौसम बदलते ही परेशानी एकदम बढ़ जाए।
- दवाओं का कोई असर न हो रहा हो।
निष्कर्ष
अस्थमा सिर्फ सांस फूलने की बीमारी नहीं है। यह आपके पूरे श्वास सिस्टम, इम्युनिटी और पाचन पर सीधा असर डालती है। अगर सही वक़्त पर इस पर ध्यान न दिया जाए, तो यह रोज़ की ज़िन्दगी को काफी मुश्किल बना देती है।
आज की मॉडर्न साइंस इसे सिर्फ एलर्जी और सांस की नलियों की सूजन मानकर चलती है। लेकिन आयुर्वेद इसे बिगड़े हुए कफ, कमज़ोर पाचन और एक खराब रूटीन का नतीजा मानता है। सही खानपान, अच्छी आदतें और अपने शरीर की ज़रूरतें समझकर आप अपने फेफड़ों और शरीर के बैलेंस को लंबे समय तक बिल्कुल फिट और तंदुरुस्त रख सकते हैं।





































