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पित्ती (एलर्जी) का आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

जिसे हुआ शीतपित्त खा खा कर परेशान हुआ एंटीएर्जिक तो उसे चाहिए आयुर्वेद का मैजिक!!!

आजकल की इस भागदौड़ वाली जिंदगी में हमने फास्ट फूडस्, कोल्ड्रिंक्स, चीज, चॉकलेटस जैसे पदार्थों को अपने जीवन प्रणाली में शामिल कर लिया है। जिससे शरीर में पित्तप्रकूपित होकर शरीर पर खुज़ली, दाह युक्त चकत्ते पैदा करते हैं। यही शीतपित्त है। तरल पदार्थों का कम सेवन करना और पित्तवर्धक पदार्थ ज्यादा खाना यही शीपित्त का जनक है।

इसे अगर हम आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से देखें, तो आचार्यों के मतानुसार मतलब ठंडी हवा के स्पर्श से। आधुनिक मतानुसार भी यह अिर्केरियर है, जो कहीं भी हो सकता है।

शीतपित्त संस्पर्शात्प्रदुष्टौ कफमारूतौ। पित्तेन सह संभुय बहिरन्तर्विसर्पतः।।

रोग के कारण व प्रसारः

ठंडी हवा के स्पर्श से कफ और वात प्रकूपित होकर पित्त के साथ मिलकर बाह्यय त्वचा तथा आंतरिक रक्तादि धातुओं में फैलकर ‘शीतपित्त’ को उत्पन्न करते हैं। इसमें बनने वाले चकत्ते कभी नुकीले और छोटे होते हैं, तो कभी सिक्कों के जितने आकार के होते हैं।

इस व्याधि में शरीर पर किंचित लालिमा युक्त चकत्ते या पीडीका बनते हैं, साथ ही तीव्र कंडू और दाह भी होता है। खुजाने पर ये और ज्यादा बढ़ जाते हैं।

घरेलू उपचारः

  • दूध के साथ हल्दी का सेवन करें, जो त्वचा को निखारने के साथ-साथ दूषित रक्त को भी साफ करता है।

  • गेरू और फिटकरी कूटकर चकत्तो पर लगायें।

  • शीतपित्त के चकत्तों पर 1 चम्मच पुदीना का रस लगाने से खुजली में आराम मिलता है।

  • इस व्याधि को हम उचित आहार-विहार से भी दूर कर सकते हैं।

  • अगर पीटीकाओं में दर्द और चुभन हो तो 1/4 कप गुलाबजल और व्हिनेगर 1/4 कप मिलाकर लगायें।

  • इस स्थिति में ठंडे पानी से नहाने से लाभ मिलता है।

  • कैलामाइन लोशन लगाना भी लाभप्रद है।

  • घृतकुमारी दाहयुक्त जगह पर लगायें।

  • ‘करे जो सेवन नीम, हरिद्रा, मंजिष्ठ, गिलोय शीतपित्त वो जड़ से खोय’।

  • ‘त्रिफला ले रात्री, प्रातः में धात्री, नित्य ले विरेचन, करे जो स्त्रोतों का शोधन!

’डॉ. दादी के नुस्खे अपनाकर रह सकते हैं हम शीतपित्त से बचकर ना हो फिर इसका प्रकोप दोबारा ऐसा है आयुर्वेद हमारा’।

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