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क्या सर्दियों में दवाइयों के बावजूद साँस पूरी नहीं खुलती? अस्थमा की जड़ आयुर्वेद से समझें

Information By Dr. Keshav Chauhan

सुबह की ठंडी हवा में जब साँस लेने में हल्की-सी भी रुकावट महसूस होती है, तब यह समझ आता है कि अस्थमा कितनी गहराई से ज़िंदगी को प्रभावित करता है। भारत में अस्थमा अब केवल एक छोटी बीमारी नहीं रह गई है। ग्लोबल अस्थमा नेटवर्क की रिपोर्ट बताती है कि देश में करीब 3.5 करोड़ लोग अस्थमा से जूझ रहे हैं, यानी हर कई परिवारों में कोई-न-कोई इससे प्रभावित है। चिंता की बात यह भी है कि दुनिया भर में अस्थमा से होने वाली मौतों का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा भारत में होता है, जो इस रोग की गंभीरता और इसके सही प्रबंधन की ज़रूरत को साफ दिखाता है।

सर्दियों में जब ठंडी हवा, वायु प्रदूषण और कोहरा बढ़ जाता है, तब अस्थमा की तकलीफ अक्सर और ज्यादा तेज़ महसूस होती है। कई बार आप दवाइयाँ लेते हैं, लेकिन फिर भी लगता है कि साँस पूरी तरह नहीं खुलती, फेफड़ों में जकड़न रहती है, या खाँसी और कफ की समस्या कम नहीं होती। ऐसे सवाल आपके मन में उठते हैं जैसे “अगर दवा ले रहा/रही हूँ, तो फिर भी मेरी साँस क्यों पूरी नहीं खुलती?” या “क्या सर्दियाँ अस्थमा को और बढ़ा देती हैं?”

इस लेख में हम इन सवालों का सरल और सटीक जवाब देने की कोशिश करेंगे। हम समझेंगे कि सर्दियों में अस्थमा क्यों बढ़ता है, दवाइयाँ कब काम करती हैं और कब नहीं, और आयुर्वेद के दृष्टिकोण से अस्थमा की मूल वजह क्या है और उसे कैसे संभाला जा सकता है।

क्या दवाइयों के बावजूद साँस पूरी न खुलना अस्थमा में सामान्य बात है?

हाँ, बहुत से मामलों में यह अनुभव सामान्य होता है। आप नियमित दवा लेते हैं, फिर भी लगता है कि साँस अधूरी है, छाती में जकड़न बनी रहती है या थोड़ी मेहनत में ही साँस फूल जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ज़्यादातर दवाइयाँ तुरंत राहत देने पर ध्यान देती हैं, लेकिन अस्थमा की जड़ पर कम काम कर पाती हैं।

दवाइयों की सीमाएँ 

साँस की दवा की मशीन या गोलियाँ श्वास नलियों को कुछ समय के लिए खोल देती हैं। इससे जकड़न कम होती है और साँस लेने में सहूलियत मिलती है। पर सर्दियों में जब ठंड, कफ और सूजन बढ़ती है, तब यह राहत अस्थायी रह जाती है। जैसे ही दवा का असर कम होता है, परेशानी फिर लौट आती है।

केवल लक्षण दबना, जड़ का इलाज नहीं 

अक्सर इलाज का उद्देश्य खाँसी, घरघराहट और जकड़न को दबाना होता है। पर यह नहीं देखा जाता कि कफ क्यों बढ़ रहा है, श्वास नलियाँ बार-बार क्यों सिकुड़ रही हैं, और शरीर अंदर से कमज़ोर क्यों हो रहा है। नतीजा यह कि आप दवा पर निर्भर हो जाते हैं, लेकिन पूरी तरह ठीक महसूस नहीं कर पाते।

मरीज़ों का आम अनुभव 

कई मरीज़ बताते हैं कि दवा लेने के बाद भी सुबह-सुबह साँस भारी रहती है, ठंडी हवा लगते ही खाँसी बढ़ जाती है और रात में नींद टूटती है। आप भी शायद यही महसूस करते होंगे कि “दवा है, फिर भी आराम पूरा क्यों नहीं?” यही संकेत है कि सिर्फ ऊपर-ऊपर राहत मिल रही है, अंदर की समस्या बनी हुई है।

सर्दियों में अस्थमा का अटैक बार-बार क्यों आने लगता है?

सर्दियों में अस्थमा के दौरे बढ़ने के पीछे एक नहीं, कई वजहें साथ काम करती हैं। यह मौसम श्वास तंत्र के लिए चुनौतीपूर्ण होता है, खासकर तब जब पहले से अस्थमा मौजूद हो।

ठंड, कोहरा और प्रदूषण 

ठंडी हवा श्वास नलियों को सिकोड़ देती है। कोहरे के साथ जब वायु प्रदूषण बढ़ता है, तो साँस के साथ हानिकारक कण अंदर जाते हैं। इससे श्वास नलियों में जलन और सूजन बढ़ती है। आप महसूस करते हैं कि बाहर निकलते ही साँस भारी हो गई या छाती में जकड़न आ गई।

विषाणु संक्रमण 

सर्दियों में सर्दी-ज़ुकाम और गले के संक्रमण आम होते हैं। ये संक्रमण श्वास नलियों को और संवेदनशील बना देते हैं। अगर आपको अस्थमा है, तो साधारण-सा संक्रमण भी दौरे को भड़का सकता है। खाँसी लंबे समय तक बनी रहती है और कफ आसानी से बाहर नहीं निकलता।

घर के अंदर की हवा और धूल 

सर्दियों में आप ज़्यादातर समय घर के अंदर रहते हैं। बंद कमरों में धूल, नमी और पुराने बिस्तरों की गंध जमा हो जाती है। ये सब श्वास तंत्र को परेशान करते हैं। हीटर या अंगीठी का धुआँ भी हवा को भारी बना देता है, जिससे साँस लेना और कठिन लगता है।

एलोपैथी और आयुर्वेदिक सोच में अस्थमा को लेकर क्या फर्क है?

जब आपको साँस की परेशानी होती है, तो सबसे पहले आप दवा की ओर ही जाते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि दवा से तुरंत राहत मिलती है। लेकिन यहीं से एलोपैथी और आयुर्वेद की सोच में फर्क साफ दिखाई देता है।

लक्षण आधारित इलाज बनाम कारण आधारित इलाज 

आम तौर पर एलोपैथी में अस्थमा के इलाज का उद्देश्य खाँसी, घरघराहट और साँस की जकड़न को जल्दी से कम करना होता है। दवा श्वास नलियों को कुछ समय के लिए खोल देती है, जिससे आपको आराम महसूस होता है। लेकिन यह आराम तब तक ही रहता है, जब तक दवा का असर रहता है। 

आयुर्वेद अस्थमा को सिर्फ साँस की बीमारी नहीं मानता। इसके अनुसार असली समस्या शरीर के अंदर जमा कफ, बिगड़ा हुआ वात और कमज़ोर पाचन शक्ति से शुरू होती है। इसलिए आयुर्वेद लक्षण दबाने के बजाय यह समझने की कोशिश करता है कि कफ क्यों बढ़ रहा है और श्वास का रास्ता बार-बार क्यों रुक रहा है।

क्यों बार-बार दवा लेने पर भी परेशानी लौट आती है? 

अगर आप लंबे समय से दवाइयाँ ले रहे हैं, तो आपने यह ज़रूर महसूस किया होगा कि दवा छोड़ते ही परेशानी बढ़ जाती है। इसका कारण यह है कि इलाज अस्थायी राहत तक सीमित रहता है। 

आयुर्वेद का दृष्टिकोण थोड़ा अलग है। इसमें धीरे-धीरे शरीर को संतुलन में लाने पर ध्यान दिया जाता है। इसका उद्देश्य यह होता है कि आने वाले समय में अस्थमा के दौरे कम हों, सर्दियों में परेशानी न बढ़े और आपको बार-बार दवा पर निर्भर न रहना पड़े।

शरीर की प्राकृतिक क्षमता पर फोकस 

आयुर्वेद मानता है कि आपके शरीर में खुद को ठीक करने की शक्ति मौजूद है। सही भोजन, सही दिनचर्या और उचित औषधियों से इस शक्ति को मज़बूत किया जा सकता है। जब शरीर अंदर से मज़बूत होता है, तो साँस अपने आप बेहतर चलने लगती है। यही वजह है कि आयुर्वेद केवल बीमारी नहीं, बल्कि पूरे शरीर की देखभाल पर ज़ोर देता है।

कौन-सी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ फेफड़ों को मज़बूत बनाती हैं?

कुछ आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ ऐसी हैं जो फेफड़ों को अंदर से मज़बूत बनाती हैं और श्वास को सहज बनाने में मदद करती हैं।

  • तुलसी: तुलसी श्वास तंत्र के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है। यह कफ को ढीला करती है और गले की सूजन को कम करती है। सर्दियों में तुलसी का काढ़ा पीने से साँस लेना आसान हो सकता है।
  • वासा (अडूसा): वासा श्वास नलियों में जमा कफ को बाहर निकालने में सहायक होता है। यह फेफड़ों की सफाई में मदद करता है और लंबे समय से चली आ रही खाँसी में राहत देता है।
  • हल्दी: हल्दी शरीर की सूजन को कम करने में मदद करती है। सर्दियों में हल्दी मिला गरम दूध लेने से श्वास नलियों की जकड़न कम हो सकती है और फेफड़ों को ताकत मिलती है।
  • मुलेठी: मुलेठी गले और श्वास नलियों को आराम देती है। यह खाँसी को शांत करती है और कफ को पतला करने में मदद करती है। नियमित और सीमित मात्रा में इसका उपयोग फेफड़ों के लिए लाभकारी माना जाता है।

निष्कर्ष

जब सर्दियों में दवाइयों के बावजूद भी आपकी साँस पूरी नहीं खुलती, तो यह संकेत होता है कि समस्या केवल अस्थायी नहीं है। ठंड, कफ, प्रदूषण और कमज़ोर श्वास तंत्र मिलकर अस्थमा को और परेशान कर देते हैं। ऐसे समय में सिर्फ तुरंत राहत पर निर्भर रहना आपको बार-बार उसी जगह ला खड़ा करता है। 

आयुर्वेद आपको यह समझने में मदद करता है कि अस्थमा की जड़ कहाँ है और शरीर के अंदर क्या असंतुलन चल रहा है। जब कफ कम किया जाता है, श्वास नलियों को मज़बूत बनाया जाता है और शरीर की प्राकृतिक क्षमता को सहारा मिलता है, तब साँस लेना धीरे-धीरे सहज होने लगता है। यह रास्ता थोड़ा समय ले सकता है, लेकिन असर गहराई से करता है। 

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FAQs

  1. क्या अस्थमा पूरी तरह ठीक हो सकता है?

अस्थमा को पूरी तरह खत्म करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन सही देखभाल, जीवनशैली और आयुर्वेदिक इलाज से इसे लंबे समय तक नियंत्रण में रखा जा सकता है।

  1. क्या अस्थमा बच्चों से बड़ों में अलग तरह से असर करता है?

हाँ, बच्चों में अस्थमा ज़्यादातर एलर्जी से जुड़ा होता है, जबकि बड़ों में यह कफ, प्रदूषण और पुरानी जीवनशैली की वजह से बढ़ता है।

  1. क्या सर्दियों में व्यायाम करना अस्थमा मरीज़ों के लिए सुरक्षित है?

हल्का और नियंत्रित व्यायाम सुरक्षित हो सकता है, लेकिन ठंडी हवा में ज़ोरदार गतिविधि से बचना चाहिए क्योंकि इससे साँस की परेशानी बढ़ सकती है।

  1. क्या बार-बार खाँसी होना हमेशा अस्थमा का संकेत होता है?

ज़रूरी नहीं। खाँसी सर्दी, कफ या संक्रमण से भी हो सकती है, लेकिन लंबे समय तक बनी रहे तो जाँच कराना ज़रूरी होता है।

  1. क्या अस्थमा में वज़न बढ़ना समस्या को और बढ़ा देता है?

हाँ, अधिक वज़न होने से फेफड़ों पर दबाव बढ़ता है, जिससे साँस लेना कठिन हो सकता है और अस्थमा की परेशानी बढ़ सकती है।

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