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Inhaler लेने के बाद भी Asthma पूरी तरह control क्यों नहीं होता?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आप रात को गहरी नींद में सो रहे हैं और अचानक आपकी साँस उखड़ने लगती है। छाती में भयंकर जकड़न, खाँसी का दौरा और हवा के लिए तड़प—आप तुरंत अपना इनहेलर (Inhaler) ढूँढते हैं, एक पफ लेते हैं और कुछ ही मिनटों में साँस वापस आ जाती है। आपको लगता है कि आपने बीमारी को हरा दिया। ज़्यादातर लोग अस्थमा (Asthma) को महज़ साँस फूलने की एक आम दिक्कत समझकर सिर्फ इनहेलर के भरोसे अपनी पूरी ज़िंदगी निकाल देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर इनहेलर सच में इलाज है, तो आपको इसकी ज़रूरत बार-बार क्यों पड़ती है? साल-दर-साल आपके पंप की डोज़ क्यों बढ़ती जाती है? सच तो यह है कि इनहेलर लेने के बाद भी अस्थमा पूरी तरह कंट्रोल नहीं होता क्योंकि यह सिर्फ एक अस्थायी राहत है, बीमारी का पक्का इलाज नहीं। आजकल प्रदूषण, खराब लाइफस्टाइल और तनाव के कारण युवाओं में भी इनहेलर की निर्भरता तेज़ी से बढ़ रही है। आइए गहराई से समझते हैं कि इनहेलर असल में क्या करता है, यह बीमारी को जड़ से क्यों नहीं मिटा पाता, और कैसे आयुर्वेद की मदद से आप हमेशा के लिए अपने फेफड़ों को मज़बूत कर एक खुलकर साँस लेने वाली ज़िंदगी की ओर लौट सकते हैं।

Inhaler लेने के बाद भी asthma पूरी तरह control क्यों नहीं होता?

आधुनिक चिकित्सा में अस्थमा के लिए दिए जाने वाले इनहेलर मुख्य रूप से ब्रोंकोडायलेटर्स (Bronchodilators) और स्टेरॉयड्स (Steroids) होते हैं। जब आपको अस्थमा का अटैक आता है, तो आपकी साँस की नलियों में सूजन आ जाती है और वे सिकुड़ जाती हैं। इनहेलर का काम सिर्फ इतना है कि वह तुरंत उन सिकुड़ी हुई नलियों को ज़बरदस्ती फैला देता है ताकि हवा अंदर जा सके। लेकिन यह नलियों के अंदर जमा हुए गहरे कफ (Mucus), शरीर के कमज़ोर हो चुके इम्यून सिस्टम (Allergy) और खराब मेटाबॉलिज़्म को बिल्कुल ठीक नहीं करता। जैसे ही इनहेलर का असर खत्म होता है, नलियाँ फिर से सिकुड़ जाती हैं। यानी आप सिर्फ बीमारी के 'लक्षणों' को दबा रहे हैं, उस आग (बीमारी की जड़) को नहीं बुझा रहे जो आपके फेफड़ों को अंदर से कमज़ोर कर रही है।

लोग इस भयंकर चेतावनी को नज़रअंदाज़ क्यों करते हैं?

लक्षणों का कुछ ही देर में गायब हो जाना (Temporary Relief)

इनहेलर की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह मरीज़ को एक झूठा भ्रम देता है। एक पफ लेते ही छाती की जकड़न गायब हो जाती है और व्यक्ति सोचता है कि "चलो, अब तो बिल्कुल ठीक हूँ।" तुरंत मिलने वाली इस राहत के कारण लोग बीमारी की गंभीरता को भूल जाते हैं और अंदर ही अंदर डैमेज हो रहे फेफड़ों का कोई स्थायी इलाज नहीं कराते।

"पंप तो सब लेते हैं" वाली गलत सोच

समाज में यह बात बहुत आम हो गई है कि "अस्थमा है तो पंप तो लेना ही पड़ेगा, इसका कोई इलाज नहीं है।" ज़्यादातर लोग यह मान बैठते हैं कि इनहेलर उनकी ज़िंदगी का हिस्सा है। वे ठंडी चीज़ें खाने, धूल में जाने या खराब दिनचर्या को बदलने के बजाय सिर्फ अपनी जेब में इनहेलर रखना ज़्यादा आसान समझते हैं, जो अंततः फेफड़ों को पूरी तरह खोखला कर देता है।

एक्शन न लेने के भयंकर परिणाम: इन्हें बिल्कुल नज़रअंदाज़ न करें

अगर आप यह मानकर बैठे हैं कि इनहेलर के सहारे पूरी ज़िंदगी आसानी से कट जाएगी, तो आप अनजाने में अपने शरीर को बहुत बड़े खतरे में डाल रहे हैं।

  • स्थायी लंग डैमेज (COPD): सालों तक सिर्फ इनहेलर के भरोसे रहने से और बार-बार नलियों के सिकुड़ने-फैलने से फेफड़ों की लोच (Elasticity) हमेशा के लिए खत्म हो जाती है, जो सीओपीडी (COPD) जैसी जानलेवा बीमारी बन जाती है।
  • स्टेरॉयड्स के भयंकर साइड इफेक्ट्स: लगातार स्टेरॉयड वाले इनहेलर का उपयोग करने से हड्डियाँ कमज़ोर होने लगती हैं, वज़न बेतहाशा बढ़ता है, और फंगल इन्फेक्शन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
  • हार्ट फेलियर का खतरा: जब फेफड़े शरीर को पूरी ऑक्सीजन नहीं दे पाते, तो दिल पर खून पंप करने का बहुत ज़्यादा अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे कम उम्र में ही हार्ट की गंभीर समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।

आयुर्वेद अस्थमा को कैसे समझता है? (तमक श्वास)

आयुर्वेद में अस्थमा को सिर्फ फेफड़ों की बीमारी नहीं माना जाता; इसे 'तमक श्वास' (Tamak Shwasa) कहा जाता है, जिसका सीधा संबंध आपके पेट और पाचन से है। आयुर्वेद के अनुसार, जब खराब जीवनशैली, ठंडे और कफ बढ़ाने वाले भोजन (जैसे फ्रिज का पानी, दही, जंक फूड) के कारण शरीर की 'पाचन अग्नि' (Digestion) कमज़ोर हो जाती है, तो शरीर में 'आम' (गंदगी/Toxins) बनने लगता है। यह आम और बढ़ा हुआ 'कफ दोष' (Kapha Dosha) जब छाती और साँस की नलियों (Pranavaha Srotas) में जाकर जम जाता है, तो वात दोष (Vata) के प्रवाह को रोक देता है। इसी रुकावट के कारण इंसान को साँस लेने में भयंकर तकलीफ होती है। जब तक शरीर की अंदरूनी अग्नि ठीक नहीं होगी और जमा हुआ कफ जड़ से बाहर नहीं निकलेगा, सिर्फ इनहेलर से हवा का रास्ता खोलने से बीमारी जड़ से खत्म नहीं होगी।

अस्थमा से बचाव और राहत के लिए कुछ बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें फेफड़ों को मज़बूत बनाने और साँस की नली की सूजन को खत्म करने के लिए बहुत ही जादुई जड़ी-बूटियाँ दी हैं।

  • पुष्करमूल (Pushkarmool): इसे आयुर्वेद में प्राकृतिक ब्रोंकोडायलेटर कहा जाता है। यह साँस की नलियों को खोलता है और छाती के दर्द व जकड़न को तुरंत शांत करता है।
  • वासा/अडूसा (Vasa): यह कफ को पतला करके बाहर निकालने की सबसे शक्तिशाली जड़ी-बूटी है। यह पुरानी से पुरानी खाँसी और अस्थमा में अचूक काम करती है।
  • मुलेठी (Mulethi) और कंटकारी (Kantakari): ये गले और फेफड़ों की अंदरूनी सूजन को खत्म करती हैं और साँस लेने की प्रक्रिया को बेहद आसान बनाती हैं।

आयुर्वेदिक थेरेपी अस्थमा (श्वास रोग) में कैसे काम करती है?

जब इनहेलर की डोज़ लगातार बढ़ती जा रही हो और आराम न मिल रहा हो, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी फेफड़ों की गहराई में जाकर काम करती है।

  • उरो बस्ती और स्वेदन (Uro Basti & Swedana): छाती पर गर्म औषधीय तेलों का प्रयोग और हर्बल भाप (Steam) देने से साँस की नलियों में जमा हुआ सख्त कफ तुरंत पिघलने लगता है और छाती का भारीपन खत्म होता है।
  • नस्य (Nasya) और वमन (Vamana): नाक में खास औषधीय तेल डालना और उल्टी के ज़रिए (चिकित्सक की देखरेख में) पेट व छाती के सारे कफ को एक झटके में बाहर निकाल देना, अस्थमा के लिए एक जीवनदायी चिकित्सा है।

अस्थमा से बचने के लिए कफ-शामक डाइट प्लान क्या हो?

आप जो खाते हैं, वही आपके फेफड़ों में या तो साँस बनाता है या रुकावट। अस्थमा से बचने और इनहेलर छोड़ने के लिए कफ-शामक डाइट लेना बहुत ज़्यादा ज़रूरी है।

श्रेणी क्या करें (Do’s) क्या न करें (Don’ts)
आहार का सिद्धांत गर्म, ताज़ा और हल्का सुपाच्य भोजन लें ठंडा, बासी और कफ बढ़ाने वाला भोजन
क्या खाएँ पुराने चावल, मूंग दाल, परवल, लौकी, लहसुन भारी, तला-भुना और प्रोसेस्ड फूड
परहेज़ ठंडा पानी, दही, केला, आइसक्रीम, बेकरी, जंक फूड
दैनिक पेय गुनगुना पानी, अदरक-तुलसी-शहद का पानी कोल्ड ड्रिंक्स, फ्रिज का पानी

ठीक होने (Recovery) में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद डैमेज हो रहे फेफड़ों को प्राकृतिक रूप से रिपेयर करता है। आपके रेस्पिरेटरी सिस्टम को दोबारा साफ होने और नई ताकत मिलने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपके शरीर में जमा हुआ कफ पतला होकर बाहर निकलेगा; छाती का भारीपन कम होने लगेगा और साँस लेना थोड़ा आसान होगा।
  • 1 से 3 महीने तक: फेफड़ों की नलियों की सूजन कम हो जाएगी। डॉक्टर की सलाह से आपके इनहेलर के पफ की संख्या और डोज़ में भारी कमी आने लगेगी।
  • 3 से 6 महीने तक: आपके फेफड़े काफी हद तक रिपेयर हो जाएँगे। इम्युनिटी इतनी सुधर जाएगी कि मौसम बदलने पर भी आपको अटैक नहीं आएगा और आप एक अनुशासित जीवनशैली के साथ इनहेलर से आज़ाद हो सकेंगे।

मरीज़ों के अनुभव

मैं मोनिका दीक्षित हूँ और मुझे अस्थमा की गंभीर समस्या थी। मैंने इसके लिए कई एलोपैथिक डॉक्टरों को दिखाया और बहुत से अस्पतालों के चक्कर काटे। डॉक्टरों ने मुझे नेबुलाइज़र और नेजल स्प्रे का उपयोग करने की सलाह दी थी। लेकिन इन सबके बावजूद मेरी परेशानी कम नहीं हुई, बल्कि दिन-ब-दिन बढ़ती ही गई।

उसके बाद मैंने टीवी पर डॉक्टर प्रताप चौहान का शो देखा और जीवा क्लीनिक आई। पिछले 3 सालों से मैं यहाँ अपना इलाज करा रही हूँ और आज स्थिति यह है कि मेरा नेबुलाइजर और नेजल स्प्रे दोनों छूट गए हैं। मुझे अपनी समस्या में 80% तक राहत मिली है और मेरी दवाइयां भी अब धीरे-धीरे कम हो रही हैं। इसके लिए मैं जीवा आयुर्वेद का बहुत धन्यवाद करना चाहती हूँ।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

अस्थमा से निपटने के लिए हम अक्सर जल्दबाज़ी में कदम उठाते हैं और तुरंत राहत ढूँढते हैं। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि सिर्फ इनहेलर लेना और आयुर्वेद की गहराई को अपनाना कितना अलग है।

तुलना का आधार आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
मुख्य लक्ष्य ब्रोंकोडायलेटर/स्टेरॉयड से तुरंत राहत अग्नि सुधारकर कफ को जड़ से हटाना
नज़रिया अस्थमा को क्रॉनिक मानकर इनहेलर पर निर्भरता डिटॉक्स और इम्युनिटी बढ़ाकर हीलिंग
डाइट/लाइफस्टाइल सीमित भूमिका कफ-शामक डाइट और प्राणायाम मुख्य
लंबा असर डोज़ बढ़ती है, साइड इफेक्ट संभव फेफड़े मजबूत, दीर्घकालिक सुधार

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए? 

अस्थमा अटैक को महज़ एक आम खाँसी समझकर घर पर घरेलू नुस्खों से ठीक करने की कोशिश हमेशा नहीं करनी चाहिए। कई बार यह भयंकर रूप ले लेता है। अगर आपको ये गंभीर संकेत दिखें, तो तुरंत मेडिकल इमरजेंसी या डॉक्टर से संपर्क करें:

  • अगर आप लगातार इनहेलर का उपयोग कर रहे हैं लेकिन साँस की नली बिल्कुल नहीं खुल रही है और जकड़न बढ़ती जा रही है (Status Asthmaticus)।
  • अगर साँस न आने की वजह से होंठ, चेहरे या नाखूनों का रंग नीला या भूरा पड़ने लगे।
  • अगर साँस लेने में इतनी भयंकर तकलीफ हो रही हो कि आप एक पूरा वाक्य (Sentence) भी न बोल पा रहे हों।
  • अगर छाती में बहुत तेज़ दर्द हो रहा हो और साँस लेते वक्त बहुत तेज़ सीटी जैसी (Wheezing) आवाज़ आ रही हो।
  • अगर खाँसी में अचानक बहुत ज़्यादा पीला, हरा या खून मिला हुआ कफ आने लगे।

निष्कर्ष

इनहेलर लेने के बाद भी अस्थमा का पूरी तरह कंट्रोल न होना इस बात का सीधा संकेत है कि आप सिर्फ धुएँ को हटाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अंदर लगी बीमारी की आग को बुझा नहीं रहे हैं। लगातार खराब खान-पान, ठंडी चीज़ों का सेवन, तनाव और बढ़ता प्रदूषण आपके फेफड़ों को एक गंभीर खतरे में डाल चुका है। जब इनहेलर की डोज़ बढ़ने लगे, तो यह घबराने का नहीं, बल्कि सही इलाज चुनने का समय है। इनहेलर कुछ समय के लिए साँस ज़रूर दे सकता है, लेकिन वह समस्या की जड़ यानी आपके कमज़ोर पाचन और जमे हुए कफ को ठीक नहीं कर सकता। आयुर्वेद आपको इस बीमारी को जड़ से मिटाने का एक स्थायी और प्राकृतिक समाधान देता है। सही आयुर्वेदिक उपचार, पंचकर्म थेरेपी, और कफ-शामक जीवनशैली अपनाकर आप न केवल इनहेलर की गुलामी से आज़ाद हो सकते हैं, बल्कि भविष्य में लंग डैमेज जैसी गंभीर जटिलताओं से भी खुद को बचा सकते हैं। अपने शरीर के संकेतों को सुनें, सही समय पर सही कदम उठाएँ, और जीवा आयुर्वेद के साथ खुलकर साँस लेने वाली ज़िंदगी जिएँ।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

इनहेलर सिर्फ साँस की सिकुड़ी हुई नलियों को ज़बरदस्ती चौड़ा कर देता है जिससे तुरंत हवा अंदर जाने लगती है। लेकिन यह नलियों के अंदर जमा हुए गाढ़े कफ, सूजन और कमज़ोर पाचन को ठीक नहीं करता, इसलिए बीमारी बनी रहती है।

लंबे समय तक स्टेरॉयड वाले इनहेलर का इस्तेमाल करने से फेफड़ों की प्राकृतिक लोच खत्म हो जाती है, हड्डियाँ कमज़ोर हो सकती हैं, और फंगल इन्फेक्शन व वज़न बढ़ने जैसे गंभीर साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं।

बिल्कुल! अगर आप सही आयुर्वेदिक उपचार, कफ-शामक डाइट और प्राणायाम का पालन करते हैं, तो फेफड़ों से पुराना कफ बाहर निकल जाता है और इम्युनिटी मज़बूत हो जाती है, जिससे कई मरीज़ों का इनहेलर पूरी तरह छूट जाता है।

बिल्कुल! अगर आप सही आयुर्वेदिक उपचार, कफ-शामक डाइट और प्राणायाम का पालन करते हैं, तो फेफड़ों से पुराना कफ बाहर निकल जाता है और इम्युनिटी मज़बूत हो जाती है, जिससे कई मरीज़ों का इनहेलर पूरी तरह छूट जाता है।

मरीज़ को हमेशा ताज़ा, हल्का, और गर्म भोजन लेना चाहिए। ठंडी चीज़ें जैसे फ्रिज का पानी, आइसक्रीम, दही, केला, और बहुत ज़्यादा चिकनाई वाला जंक फूड बिल्कुल बंद कर देना चाहिए क्योंकि ये कफ को भयंकर रूप से बढ़ाते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार पुष्करमूल, वासा (अडूसा), कंटकारी और मुलेठी अस्थमा में सबसे बेहतरीन मानी जाती हैं। ये जड़ी-बूटियाँ कफ को पिघलाकर बाहर निकालती हैं और साँस की नलियों की सूजन को कम करती हैं।

जी हाँ, आयुर्वेद मानता है कि अस्थमा की शुरुआत खराब पाचन से ही होती है। जब खाना ठीक से नहीं पचता, तो वह 'आम' (गंदगी) बनाता है जो छाती में जाकर कफ के रूप में जम जाता है और साँस रोकता है।

पंचकर्म की 'उरो बस्ती' और 'स्वेदन' छाती के जमे हुए कफ को पिघलाती हैं, और 'वमन' (उल्टी के ज़रिए सफाई) शरीर से सारे दूषित कफ को एक झटके में बाहर निकालकर फेफड़ों को पूरी तरह साफ कर देती है।

हाँ, लेकिन बहुत भारी व्यायाम (Heavy exercise) से बचना चाहिए जिससे साँस फूले। इसके बजाय अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका और कपालभाति जैसे प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने के लिए बेहद फायदेमंद हैं।

बिल्कुल। जब आप तनाव में होते हैं, तो शरीर में वात दोष बढ़ता है और साँस उखड़ने लगती है। स्ट्रेस के कारण नर्वस सिस्टम साँस की नलियों को और ज़्यादा सिकोड़ देता है, जिससे अटैक आने का खतरा बढ़ जाता है।

शुरुआती 3 से 4 हफ्तों में ही छाती का भारीपन और कफ कम होने लगता है। लेकिन फेफड़ों को पूरी तरह रिपेयर करने, इम्युनिटी बढ़ाने और इनहेलर से आज़ादी पाने में आमतौर पर 3 से 6 महीने का अनुशासित समय लग सकता है।

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