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क्या Ayurvedic medicine का कोई side effect नहीं होता? सच जानना जरूरी है

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अक्सर हम मानते हैं कि देसी या जड़ी-बूटियों वाली दवाओं का कोई नुकसान नहीं होता। यह सोच पूरी तरह से सही नहीं है। किसी भी चीज़ की अति या गलत इस्तेमाल शरीर को नुकसान पहुँचा सकता है। आयुर्वेदिक दवाइयाँ प्राकृतिक होती हैं, लेकिन वे भी एक तरह की औषधि ही हैं। अगर इन्हें बिना किसी वैद्य या डॉक्टर की सलाह के लिया जाए, तो ये शरीर में गर्मी, पेट की खराबी या लिवर से जुड़ी परेशानियाँ पैदा कर सकती हैं। सही बीमारी के लिए सही दवा और सही मात्रा का होना बहुत ज़रूरी है। इसलिए यह जानना बेहद अहम है कि आयुर्वेद का इस्तेमाल कब और कैसे करना चाहिए ताकि आप सुरक्षित रहें।

एक्सपर्ट क्या कहते हैं

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट रूप से मानना है कि आयुर्वेद एक विज्ञान है, कोई जादू नहीं। डॉक्टर हमेशा यह चेतावनी देते हैं कि इंटरनेट पर वायरल होने वाले नुस्खों को देखकर कभी भी अपना इलाज नहीं करना चाहिए। हर इंसान का वात, पित्त और कफ का स्तर अलग होता है। जो काढ़ा आपके दोस्त को फायदा कर रहा है, वह आपके लिवर में  गर्मी पैदा कर सकता है। एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि दवा हमेशा मान्यता प्राप्त फार्मेसी या क्लिनिक से ही खरीदें और आयुष मंत्रालय का मार्क ज़रूर देखें। सही वैद्य की राय ही आपकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।

आयुर्वेदिक दवाएं कैसे काम करती हैं और नुकसान क्यों होता है

आयुर्वेद वात, पित्त और कफ यानी त्रिदोष के सिद्धांत पर काम करता है। जब इन तीनों में संतुलन बिगड़ता है, तो बीमारियाँ जन्म लेती हैं। आयुर्वेदिक दवाइयाँ इसी संतुलन को वापस लाती हैं। लेकिन समस्या तब होती है जब लोग अपनी प्रकृति जाने बिना दवा खाना शुरू कर देते हैं। मान लीजिए आपके शरीर में पहले से पित्त यानी गर्मी बढ़ी हुई है और आप कोई गर्म तासीर वाली भस्म या जड़ी-बूटी खा लें। इससे फायदा होने के बजाय सीने में जलन, मुँह में छाले या घबराहट जैसी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। बिना सही पहचान के इलाज करना ही गलत असर का सबसे बड़ा कारण बनता है।

क्या हर जड़ी-बूटी और देसी दवा पूरी तरह से सुरक्षित होती है

यह एक बहुत बड़ा भ्रम है कि पेड़-पौधों से बनी हर चीज़ सौ प्रतिशत सुरक्षित है।

  • कुछ जड़ी-बूटियाँ बहुत गर्म होती हैं, जो लिवर को भारी नुकसान पहुँचा सकती हैं।
  • कई दवाओं में सोना, चाँदी और पारा जैसी धातुएं होती हैं। इन्हें सही तरीके से न बनाया जाए तो ये ज़हर बन जाती हैं।
  • बिना एक्सपायरी डेट देखे पुरानी दवा खाने से शरीर में एलर्जी हो सकती है।
  • हर इंसान का शरीर अलग होता है। जो आंवला एक के लिए अमृत है, वह दूसरे को सर्दी-खाँसी दे सकता है।
  • सड़क किनारे मिलने वाले चूर्ण या पुड़िया पर भूलकर भी भरोसा न करें।

आयुर्वेदिक दवा से होने वाले नुकसान के लक्षणों को कैसे पहचानें

अगर कोई दवा आपको सूट नहीं कर रही है, तो शरीर तुरंत इसके इशारे देने लगता है। सबसे पहले पेट में भारीपन, गैस या कब्ज की शिकायत हो सकती है। कई बार लोगों को त्वचा पर लाल दाने, खुजली या रैशेज भी होने लगते हैं। अगर किसी दवा में भस्म की मात्रा ज़्यादा हो, तो पेशाब में जलन या चक्कर आने जैसी समस्या भी दिख सकती है। जी मिचलाना और सिरदर्द होना भी आम लक्षण हैं। अगर नई दवा शुरू करने के दो या तीन दिन के भीतर आपके शरीर में ऐसे कोई भी नए बदलाव दिखें, तो यह दवा के नुकसान का संकेत हो सकता है।

आयुर्वेदिक दवा खाते समय किन चीज़ों से परहेज़ करना ज़रूरी है

दवा का पूरा असर तभी होता है जब आप कुछ खास चीज़ों से दूरी बनाकर रखें।

  • बहुत ज़्यादा मसालेदार, तला-भुना और बासी खाना बिल्कुल न खाएं।
  • खट्टी चीज़ें जैसे इमली, अचार और नींबू का ज़्यादा इस्तेमाल दवा का असर कम कर सकता है।
  • चाय, कॉफी और कोल्ड ड्रिंक जैसी चीज़ों से इलाज के दौरान पूरी तरह दूर रहें।
  • शराब और सिगरेट का सेवन आयुर्वेदिक इलाज के दौरान सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाता है।
  • रात को देर से खाना खाने और दिन में सोने की आदत से पूरी तरह बचें।
  • मैदे से बनी चीज़ें और पैकेटबंद खाना पेट की गर्मी बढ़ा देते हैं।

किस स्थिति में दवा का गलत असर होने का खतरा ज़्यादा रहता है

सबसे बड़ा खतरा तब होता है जब लोग इंटरनेट देखकर या किसी की बात सुनकर खुद ही अपना इलाज शुरू कर देते हैं। गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को बिना डॉक्टरी सलाह के ये दवाइयाँ देने पर नुकसान की आशंका बहुत बढ़ जाती है। इसके अलावा जिन लोगों की किडनी या लिवर कमज़ोर है, उनके लिए भारी धातुओं वाली भस्म बहुत खतरनाक साबित हो सकती है। अगर आप पहले से ब्लड प्रेशर या शुगर की कोई एलोपैथिक दवा खा रहे हैं और साथ में बिना बताए देसी चूर्ण भी लेना शुरू कर दें, तो दवाओं के आपस में टकराने का खतरा सबसे ज़्यादा रहता है।

आयुर्वेदिक इलाज के दौरान डाइट में क्या शामिल करें

आयुर्वेद में दवा से ज़्यादा महत्व सही खानपान को दिया जाता है। सही डाइट आपकी रिकवरी को तेज़ करती है।

  • ताज़ा और हल्का भोजन करें। खिचड़ी, दलिया और मूंग दाल सूप पेट के लिए सबसे अच्छे होते हैं।
  • दिन भर में पर्याप्त मात्रा में गुनगुना पानी पिएँ। इससे शरीर की गंदगी बाहर निकल जाती है।
  • मौसमी फलों और हरी सब्जियों को अपने भोजन का अहम हिस्सा बनाएँ।
  • गाय का घी और दूध शरीर की तासीर को शांत रखने में बहुत मदद करते हैं।
  • खाने में जीरा, धनिया और सौंफ का इस्तेमाल बढ़ाएं, ये पेट को ठंडक और आराम देते हैं।

कब तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए

कुछ खास परिस्थितियों में आपको तुरंत दवा रोककर अस्पताल जाना पड़ सकता है।

  • अगर दवा खाने के कुछ ही घंटों के भीतर पूरे शरीर पर लाल चकत्ते या खुजली होने लगे।
  • जब अचानक से दिल की धड़कन तेज़ हो जाए या सीने में भारीपन महसूस होने लगे।
  • अगर लगातार उल्टी हो रही हो और पेट में बहुत भयंकर दर्द शुरू हो जाए।
  • पेशाब का रंग बहुत गहरा पीला या लाल हो जाए और भयंकर जलन महसूस हो।
  • साँस लेने में दिक्कत होने लगे या चेहरे और होंठों पर अचानक से सूजन आ जाए।
  • चक्कर आकर आँखों के सामने अंधेरा छाने लगे तो बिल्कुल भी लापरवाही न करें।

आयुर्वेदिक और अंग्रेजी दवाओं के दुष्प्रभाव में क्या अंतर है

पहलू आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
दवाओं की सुरक्षा दवाओं के संभावित दुष्प्रभावों की जानकारी दी जाती है और उनका उपयोग चिकित्सकीय निगरानी में किया जाता है। आयुर्वेदिक औषधियाँ भी सही गुणवत्ता की हों और योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से ही ली जानी चाहिए।
दुष्प्रभाव कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव जल्दी दिखाई दे सकते हैं, जबकि कुछ लंबे समय बाद भी सामने आ सकते हैं। गलत दवा, गलत मात्रा या मिलावटी उत्पादों के उपयोग से दुष्प्रभाव हो सकते हैं, जो कभी तुरंत तो कभी बाद में दिखाई दे सकते हैं।
उपचार का तरीका वैज्ञानिक परीक्षणों और रोग की स्थिति के अनुसार दवाइयाँ दी जाती हैं। व्यक्ति की प्रकृति, रोग की अवस्था और समग्र स्वास्थ्य के अनुसार उपचार तय किया जाता है।
जानकारी और सावधानी दवाओं के उपयोग, सावधानियों और संभावित दुष्प्रभावों की जानकारी उपलब्ध होती है। आयुर्वेदिक दवाओं का भी केवल विश्वसनीय स्रोत से और विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही उपयोग करना चाहिए।
मुख्य संदेश किसी भी दवा का उपयोग बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं करना चाहिए। "प्राकृतिक" का अर्थ हमेशा "पूरी तरह सुरक्षित" नहीं होता; आयुर्वेदिक दवाओं का भी सही मार्गदर्शन में ही सेवन करना चाहिए।

निष्कर्ष

अंत में यही बात सामने आती है कि आयुर्वेद दुनिया की सबसे बेहतरीन और पुरानी चिकित्सा पद्धतियों में से एक है। लेकिन प्राकृतिक होने का मतलब यह कतई नहीं है कि आप इसे बिना नियम के खा सकते हैं। दवा चाहे कोई भी हो, अगर उसे सही व्यक्ति, सही मात्रा और सही समय पर न लिया जाए, तो वह शरीर को नुकसान ही पहुँचाएगी। अपनी सेहत के साथ खुद डॉक्टर बनने का खेल न खेलें। हमेशा एक योग्य और डिग्री-वाला वैद्य से सलाह लें। सही खानपान, अच्छी जीवनशैली और विशेषज्ञ की निगरानी ही आपको स्वस्थ रख सकती है।

References

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Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। आयुर्वेद प्राकृतिक जरूर है, लेकिन यह भी एक औषधि (दवा) ही है। यदि इसे बिना डॉक्टर की सलाह के, गलत मात्रा में या गलत बीमारी के लिए लिया जाए, तो इसके भी गंभीर साइड इफेक्ट्स जैसे—लिवर की खराबी, पेट में अत्यधिक गर्मी या भयंकर एलर्जी हो सकती है।

आयुर्वेद का पूरा विज्ञान वात, पित्त और कफ (त्रिदोष) पर आधारित है। हर इंसान के शरीर की तासीर (प्रकृति) अलग होती है। जो दवा या काढ़ा एक व्यक्ति के लिए अमृत समान है, वही दवा दूसरे व्यक्ति के शरीर की तासीर के अनुकूल न होने पर नुकसान पहुँचा सकती है।

कई आयुर्वेदिक दवाओं में सोना, चाँदी, लोहा और पारा जैसी धातुओं की भस्म का उपयोग होता है। यदि इन भस्मों को सही और शुद्ध तरीके से न बनाया जाए, या इन्हें बिना डॉक्टर की देखरेख के लंबे समय तक लिया जाए, तो ये शरीर में जाकर ज़हर का काम कर सकती हैं और किडनी-लिवर को भारी नुकसान पहुँचा सकती हैं।

दवा शुरू करने के बाद यदि पेट में भारीपन, गैस, कब्ज, त्वचा पर लाल दाने या खुजली, चक्कर आना, जी मिचलाना, सिरदर्द या पेशाब में जलन जैसे नए लक्षण दिखने लगें, तो समझ जाएं कि यह दवा आपको सूट नहीं कर रही है।

डॉक्टरों के अनुसार यह बेहद असुरक्षित है। इंटरनेट पर वायरल होने वाले नुस्खे सामान्य होते हैं, वे आपके शरीर की स्थिति, उम्र या पुरानी बीमारियों को देखकर नहीं बनाए जाते। किसी की देखा-देखी इलाज शुरू करना आपके लिवर और पेट को बीमार कर सकता है।

गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों, और कमज़ोर किडनी या लिवर वाले मरीजों को बिना डॉक्टर की लिखित सलाह के कोई भी आयुर्वेदिक दवा नहीं लेनी चाहिए। इसके अलावा जो लोग पहले से बीपी या शुगर की एलोपैथिक दवा खा रहे हैं, उन्हें भी विशेष सावधानी की जरूरत होती है।

अंग्रेजी दवाओं के साइड इफेक्ट्स बहुत तेज़ होते हैं और तुरंत (जैसे दस्त या रैशेज के रूप में) सामने आ जाते हैं। इसके विपरीत, आयुर्वेदिक दवाओं के गलत असर बहुत धीरे-धीरे और लंबे समय में उभरते हैं, इसलिए लोग शुरुआत में इन्हें पहचान नहीं पाते जो बाद में बड़ी समस्या बन जाता है।

इलाज के दौरान ज्यादा मसालेदार व तला-भुना खाना, बासी भोजन, मैदा, पैकेटबंद चीजें, शराब, सिगरेट, चाय-कॉफी और खट्टी चीजें (जैसे अचार, इमली, नींबू) का सेवन बंद या बेहद कम कर देना चाहिए, क्योंकि ये दवाओं के असर को खत्म या कम कर देती हैं।

आपको ताज़ा और हल्का भोजन जैसे खिचड़ी, दलिया या मूंग दाल का सूप लेना चाहिए। भोजन में गाय का घी, दूध, जीरा, धनिया और सौंफ शामिल करें क्योंकि ये पेट को ठंडक देते हैं। साथ ही दिनभर में पर्याप्त मात्रा में गुनगुना पानी पीते रहें।

यदि दवा खाने के कुछ ही घंटों में पूरे शरीर पर तेज खुजली या चकत्ते हो जाएं, दिल की धड़कन अचानक बढ़ जाए, सीने में भारीपन लगे, लगातार उल्टियां हों, पेट में असहनीय दर्द हो, पेशाब का रंग गहरा पीला या लाल आए, या चेहरे और होठों पर सूजन के साथ सांस लेने में तकलीफ हो, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।

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