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Virechan Therapy: शरीर का वो Detox जो Juice Cleanse कभी नहीं कर सकता

Information By Dr. Keshav Chauhan

आजकल की भागदौड भरी जिंदगी में खुद को फिट और स्वस्थ रखना एक बडी चुनौती बन गया है| शरीर को साफ और डिटॉक्स करने के नाम पर लोग अक्सर सोशल मीडिया पर दिखने वाले महंगे जूस क्लींज या फैंसी डाइट प्लान्स की तरफ आकर्षित होते हैं लोगों को लगता है कि कुछ दिनों तक केवल फलों और सब्जियों का जूस पीने से उनके शरीर की सारी गंदगी बाहर निकल जाएगी और वे पूरी तरह अंदर से साफ हो जाएंगे।

लेकिन क्या सचमुच यह जूस क्लींज हमारे शरीर के कोने-कोने में जमा जहरीले तत्वों को बाहर निकाल पाता है? हकीकत इसके बिल्कुल उलट है, क्योंकि यह केवल एक सतही सफाई है जो कुछ समय के लिए वजन कम कर सकती है, लेकिन जडों में जमे दोषों को दूर नहीं कर पाती। आयुर्वेद में शरीर की गहरी और कोशिकीय स्तर पर सफाई के लिए एक बेहद वैज्ञानिक और असरदार तरीका बताया गया है, जिसे हम विरेचन के नाम से जानते हैं।

विरेचन थेरेपी क्या है और यह शरीर के लिए क्यों ज़रूरी है?

आधुनिक जीवन में डिटॉक्स शब्द बहुत लोकप्रिय हो चुका है, लेकिन वास्तविक और वैज्ञानिक डिटॉक्स का अर्थ समझने के लिए हमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को जानना होगा। विरेचन आयुर्वेद के पंचकर्म चिकित्सा का एक मुख्य हिस्सा है जो शरीर को अंदर से पूरी तरह रीबूट कर देता है

  • कोशिकाओं की गहरी सफाई: विरेचन थेरेपी (Virechana therapy) का मुख्य लक्ष्य शरीर के अंगों और कोशिकाओं में गहराई से जमे टॉक्सिन्स यानी 'आम' को बाहर निकालना है, जिसे आधुनिक जूस क्लींज कभी छू भी नहीं पाते।
  • लोअर जीआई ट्रैक्ट से विषाक्त पदार्थों का निष्कासन: इस प्रक्रिया में औषधियों के माध्यम से पेट और आँतों की सफाई की जाती है, जिससे शरीर के निचले मार्ग से सारे दूषित पदार्थ बाहर निकल जाते हैं।
  • अंगों को नया जीवन देना: यह थेरेपी मुख्य रूप से लिवर, पित्ताशय (Gallbladder) और छोटी आँत को साफ करती है, जिससे मेटाबॉलिज्म मजबूत होता है और पाचन तंत्र सुचारू रूप से काम करने लगता है।
  • लंबे समय तक रहने वाले लाभ: जूस क्लींज का असर केवल कुछ दिनों तक रहता है, जबकि विरेचन कराने से शरीर महीनों और सालों तक बीमारियों से मुक्त रहता है क्योंकि यह मूल कारण पर काम करता है।

विरेचन थेरेपी के प्रकार क्या हैं?

आयुर्वेद एक व्यक्तिगत चिकित्सा विज्ञान है, जहाँ हर व्यक्ति के शरीर की प्रकृति और दोषों की स्थिति अलग होती है। इसी वजह से विरेचन की प्रक्रिया को भी मरीज़ की शारीरिक क्षमता और जरूरत के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है।

  • मृदु विरेचन (Mradu Virechana): यह विरेचन का सबसे सौम्य प्रकार है, जिसमें बहुत ही हल्की और प्राकृतिक औषधियों का उपयोग किया जाता है। यह कमजोर पाचन शक्ति वाले लोगों, बुजुर्गों या नाजुक प्रकृति के व्यक्तियों के लिए उपयुक्त होता है।
  • मध्य विरेचन (Madhya Virechana): इस प्रकार में मध्यम बल वाली औषधियों का प्रयोग किया जाता है, जो शरीर के मध्यम स्तर के दोषों को बाहर निकालने में मदद करती हैं। यह सामान्य स्वास्थ्य वाले लोगों के लिए बहुत असरदार है।
  • तीक्ष्ण विरेचन (Teekshna Virechana): यह एक बहुत ही गहरी और तीव्र सफाई प्रक्रिया है, जिसका उपयोग केवल मजबूत शारीरिक बल वाले व्यक्तियों और शरीर में अत्यधिक मात्रा में जमा गंभीर दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है। इसे हमेशा सख्त चिकित्सीय देखरेख में ही किया जाता है।

कैसे पहचानें कि आपके शरीर को विरेचन की ज़रूरत है?

हमारा शरीर जब अंदरूनी गंदगी या दोषों के असंतुलन से जूझ रहा होता है, तो वह हमें कई प्रकार के संकेत और अलार्म देता है। इन संकेतों को सही समय पर पहचानकर अगर विरेचन करा लिया जाए, तो भविष्य की बडी बीमारियों से बचा जा सकता है।

  • त्वचा से जुडी गंभीर समस्याएं: अगर आप लगातार एक्जिमा, सोरायसिस (Psoriasis), या शरीर पर अचानक होने वाली पित्ती या अर्टिकेरिया (Urticaria) जैसी समस्याओं से परेशान हैं, तो यह साफ संकेत है कि आपके खून में पित्त और टॉक्सिन्स बढ चुके हैं।
  • पाचन की पुरानी गड़बड़ियाँ: पेट में हर वक्त भारीपन रहना, एसिडिटी, गैस बनना और लगातार रहने वाली कब्ज़ (Chronic constipation) होना यह दर्शाता है कि आपकी आँतों की दीवारों पर गंदा मल चिपक चुका है।
  • हर वक्त थकान और सुस्ती: पर्याप्त नींद लेने के बाद भी अगर आप दिन भर क्रोनिक फटीग (Chronic fatigue) यानी भयंकर सुस्ती और कमजोरी महसूस करते हैं, तो इसका मतलब है कि शरीर का एनर्जी फ्लो ब्लॉक है।
  • तनाव और मानसिक अशांति: इसके अलावा, लगातार रहने वाला मानसिक तनाव (Mental stress) और अत्यधिक एंग्जायटी (Anxiety) भी पाचन रस को प्रभावित करते हैं, जिससे शरीर में भारीपन और विषाक्तता बढती है।

बॉडी डिटॉक्स के नाम पर की जाने वाली गलतियाँ और उनके नुकसान

आजकल इंटरनेट पर मिलने वाली आधी-अधूरी जानकारी के कारण लोग डिटॉक्स के नाम पर ऐसी भयंकर गलतियाँ कर बैठते हैं, जो उनकी आँतों और पाचन तंत्र को हमेशा के लिए कमजोर कर देती हैं। आइए जानते हैं कि लोग कहाँ चूक जाते हैं।

जूस क्लींज की लत और उससे होने वाले नुकसान

जब लोग लगातार कई दिनों तक केवल कच्चा जूस पीते हैं, तो उनके शरीर में जठराग्नि की कमज़ोरी (Weak digestion) पैदा हो जाती है। कच्चा रस तासीर में ठंडा और रूखा होता है, जो पेट की पाचक अग्नि को पूरी तरह बुझा देता है, जिससे बाद में खाया गया सामान्य भोजन भी ठीक से नहीं पचता।

बाजार के रेडीमेड डिटॉक्स किट्स का अंधाधुंध इस्तेमाल

लोग अक्सर बिना सोचे-समझे केवल मोटापा घटाने (Reduce fat) के चक्कर में फैशनेबल डिटॉक्स डाइट चुनने लगते हैं। आजकल की सुविधाजनक जीवनशैली (Convenient lifestyle) में लोग शॉर्टकट ढूंढते हैं और बाजार से केमिकल युक्त लैक्सेटिव खरीदकर पीने लगते हैं। ये उत्पाद आँतों के प्राकृतिक म्यूकोसा को छील देते हैं, जिससे आँतें हमेशा के लिए कमजोर हो जाती हैं।

आयुर्वेद के अनुसार विरेचन और त्रिदोष का विज्ञान

आयुर्वेद का पूरा विज्ञान वात, पित्त और कफ इन तीन दोषों पर आधारित है, और जब ये दोष असंतुलित होते हैं, तभी बीमारियाँ जन्म लेती हैं। विरेचन मुख्य रूप से पित्त दोष को संतुलित करने की सबसे बडी और अचूक चिकित्सा मानी गई है।

  • पित्त दोष का मुख्य स्थान: शरीर में पित्त का मुख्य केंद्र अमाशय और छोटी आँत है, और विरेचन सीधे इसी क्षेत्र पर काम करके बढे हुए और दूषित पित्त को शरीर से बाहर खदेड देता है।
  • त्रिदोषों का तालमेल: यद्यपि यह पित्त के लिए सर्वोपरि है, लेकिन यह शरीर के वात दोष (Vata dosha) और कफ दोष (Kapha dosha) के मार्ग को भी साफ करता है, जिससे तीनों दोष अपने प्राकृतिक संतुलन में आ जाते हैं।
  • पाचन अग्नि को प्रदीप्त करना: जब दूषित दोष बाहर निकल जाते हैं, तो पाचन और आयुर्वेद (Ayurveda and digestion) के नियमों के अनुसार जठराग्नि फिर से फौलादी हो जाती है, जिससे खाया हुआ अन्न सही से पचता है।
  • मन की निर्मलता: चूंकि दिमाग और आंतों का संबंध (Gut-brain connection) बेहद गहरा होता है, इसलिए आंतों की शुद्धि से मन भी प्रसन्न होता है और बढे हुए पित्त के कारण होने वाला चिडचिडापन दूर हो जाता है।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण

जीवा आयुर्वेद में हमारा लक्ष्य केवल मरीज़ को कोई रेडीमेड चूर्ण या दवा देना नहीं है, बल्कि हम समस्या के मूल कारण तक पहुँचकर उसका स्थायी समाधान करते हैं। विरेचन जैसी गहन चिकित्सा को हमारे यहाँ बेहद वैज्ञानिक और व्यक्तिगत तरीके से संपन्न किया जाता है।

  • व्यक्तिगत दोषों का विश्लेषण: हर मरीज़ के शरीर की बनावट और दोषों की स्थिति को समझकर ही विरेचन की औषधियों और दिनों का निर्धारण किया जाता है, ताकि कोई साइड इफेक्ट न हो।
  • जड से सफाई का लक्ष्य: हम केवल लक्षणों को नहीं दबाते, बल्कि पाचन तंत्र की बीमारियाँ (Digestive diseases) के गहरे कारणों जैसे मंदाग्नि और आंतों के रूखेपन को पूरी तरह ठीक करते हैं।
  • सुरक्षित और प्रामाणिक जडी-बूटियाँ: हमारे यहाँ उपयोग की जाने वाली सभी औषधियाँ जीवा की अपनी शुद्ध निर्माण इकाइयों से आती हैं, जो पूरी तरह प्राकृतिक और सुरक्षित होती हैं।
  • संपूर्ण रीबूट: विरेचन के माध्यम से हम मरीज़ के पूरे गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट को रीबूट करते हैं, जिससे शरीर पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से सोखने के काबिल बनता है।

आंतों और शरीर को डिटॉक्स करने वाली आयुर्वेदिक डाइट

विरेचन थेरेपी के दौरान और उसके बाद खानपान का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है, क्योंकि इस समय आपकी पाचन अग्नि बहुत नाजुक होती है। यदि आपके शरीर में गर्मी और एसिडिटी अधिक रहती है, तो विशेष रूप से पित्त शांत करने वाले आहार (Pitta pacifying foods) को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - आंतों को चिकनाई देने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर Foods - मल को सुखाने और चिपकाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, मूंग दाल की पतली खिचडी, दलिया, ओट्स (दूध या घी के साथ)। मैदा, वाइट ब्रेड, पैकेटबंद नूडल्स, सूखे बिस्कुट।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी, तिल का तेल, बादाम का तेल। रिफाइंड ऑयल, डालडा घी, बहुत ज्यादा रूखा भोजन (Zero-fat diet)।
सब्जियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, कद्दू, परवल, टिंडा (अच्छी तरह पकी हुई और घी में छौंकी हुई)। कच्चा सलाद, भारी कटहल, अरबी, कच्ची गोभी।
फल (Fruits) पका हुआ पपीता, उबला हुआ सेब (Stewed Apple), मीठे अंगूर, भीगी हुई मुनक्का। कच्चे या खट्टे फल, ठंडे और बिना मौसम के फल, केला।
पेय पदार्थ (Beverages) गुनगुना पानी, धनिए और जीरे का उबला हुआ पानी, रात को गुनगुना दूध। बर्फ का पानी, बहुत ज्यादा कडक चाय या डार्क काफी, कोल्ड ड्रिंक्स।

विरेचन और रक्त शुद्धि में मददगार चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसी कई शक्तिशाली जडी-बूटियाँ दी हैं जो हमारे लिवर को डिटॉक्स करने और आँतों की सफाई करने में मदद करती हैं। इन जडी-बूटियों का सही संतुलन ही विरेचन प्रक्रिया को सफल बनाता है।

  • त्रिफला (Triphala): यह अद्भुत रसायन आँतों की दीवारों को मजबूत बनाता है और बिना किसी लत के पेट को साफ रखने में मदद करता है, आप इसके बारे में त्रिफला (Triphala) के विशेष लाभों में जान सकते हैं।
  • गिलोय (Giloy): शरीर की इम्युनिटी बढाने और खून से एसिडिटी व टॉक्सिन्स को साफ करने के लिए गिलोय (Giloy) एक सर्वोपरि औषधि मानी जाती है।
  • नीम (Neem): त्वचा रोगों को जड से खत्म करने और खून की अशुद्धियों को दूर करने के लिए नीम (Neem) का कड़वा रस लिवर को अंदर से पूरी तरह साफ कर देता है।
  • मंजिष्ठा (Manjistha): यह जडी-बूटी विशेष रूप से रक्त शोधन का काम करती है, त्वचा की चमक बढाने और पित्त को शांत करने के लिए मंजिष्ठा (Manjistha) का उपयोग बेहद गुणकारी है।

विरेचन प्रक्रिया के सहायक अंग और बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

विरेचन की मुख्य दवा देने से पहले शरीर को तैयार करना पडता है, जिसे पूर्वकर्म कहा जाता है। इसके लिए कुछ विशेष बाह्य थेरेपीज़ की जाती हैं जो शरीर के कोने-कोने से टॉक्सिन्स को पिघलाकर पेट तक लाती हैं।

  • अभ्यंग मालिश (Abhyanga massage): औषधीय तेलों से पूरे शरीर की विशेष अभ्यंग मालिश (Abhyanga massage) की जाती है, जिससे त्वचा के रोमछिद्र खुलते हैं और माँसपेशियों का तनाव दूर होता है।
  • स्वेदन थेरेपी (Swedana therapy): मालिश के तुरंत बाद औषधीय भाप द्वारा स्वेदन थेरेपी (Swedana therapy) दी जाती है, जिससे पसीने के माध्यम से त्वचा की गंदगी बाहर निकलती है और दोष पिघलकर कोष्ठ (पेट) में आ जाते हैं।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ों की जाँच की प्रक्रिया

जीवा आयुर्वेद में हम केवल मरीज़ के बाहरी लक्षणों को देखकर कोई इलाज शुरू नहीं करते, बल्कि हमारे विशेषज्ञ डॉक्टर मरीज़ के संपूर्ण स्वास्थ्य का गहराई से आंकलन करते हैं। इसके लिए कुछ विशेष प्रामाणिक आयुर्वेदिक विधियों का पालन किया जाता है।

  • नाड़ी परीक्षा: हमारे डॉक्टर मरीज़ की कलाई की नाड़ी (Pulse) चेक करके यह समझते हैं कि शरीर में वात, पित्त और कफ की वास्तविक स्थिति क्या है और आँतों में कितना 'आम' जमा है।
  • शारीरिक मूल्याँकन: मरीज़ के पेट का कडापन, जीभ पर जमी सफेद परत (जो टॉक्सिन्स की निशानी है), आँखों का रंग और त्वचा की प्रकृति की बहुत बारीकी से जाँच की जाती है।
  • लाइफस्टाइल ऑडिट: मरीज़ के सोने और जागने का समय, उनके काम का तरीका, खानपान की आदतें और मानसिक स्थिति का गहराई से विश्लेषण किया जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

जीवा आयुर्वेद में इलाज की प्रक्रिया बेहद पारदर्शी और सहयोगी होती है। हम मरीज़ को पूरी यात्रा के दौरान अकेला नहीं छोडते और हर कदम पर उनका मार्गदर्शन करते हैं ताकि वे पूरी तरह स्वस्थ हो सकें।

  • जीवा से संपर्क करें: आप बेझिझक होकर सीधे हमारे नंबर +919266714040 पर कॉल कर सकते हैं और अपनी पुरानी बीमारियों व बॉडी डिटॉक्स की इच्छा के बारे में बात कर सकते हैं।
  • अपॉइंटमेंट फिक्स करें: आप पूरे देश में फैले हमारे 80 से भी ज्यादा क्लिनिक्स में से किसी भी पास के क्लिनिक में आकर आराम से डॉक्टर से आमने-सामने मिल सकते हैं।
  • Online वीडियो कंसल्टेशन: अगर काम की व्यस्तता या दूरी के कारण क्लिनिक आना मुश्किल है, तो आप अपने घर बैठे वीडियो कॉल के माध्यम से हमारे विशेषज्ञ डॉक्टरों से परामर्श ले सकते हैं।
  • व्यक्तिगत प्लान: आपकी नाड़ी और शारीरिक प्रकृति के अनुसार आपके लिए खास आयुर्वेदिक औषधियाँ, पंचकर्म थेरेपी (जैसे विरेचन) और एक विशेष डाइट चार्ट तैयार किया जाता है।

विरेचन और शरीर के पूर्ण रिपेयर में कितना समय लगता है?

सालों से गलत खानपान और जीवनशैली के कारण शरीर में जमा हुए दोषों को एक दिन में साफ नहीं किया जा सकता। विरेचन और शरीर के पूर्ण रिपेयर के लिए एक अनुशासित समय और धैर्य की जरूरत होती है।

  • शुरुआती 1-2 महीने: इस दौरान औषधियों और स्नेहन (घी के सेवन) से आपकी जठराग्नि सुधरेगी, शरीर के टॉक्सिन्स पिघलना शुरू होंगे और पेट का भारीपन धीरे-धीरे कम होने लगेगा।
  • 3-4 महीने: मुख्य विरेचन प्रक्रिया संपन्न होने के बाद, दोषों का संतुलन पूरी तरह स्थापित हो जाता है। त्वचा के पुराने रोग, एसिडिटी और कब्ज की समस्या जड से खत्म होने लगती है।
  • 5-6 महीने: इस समय तक आपका पूरा पाचन तंत्र और कोशिकाएं पूरी तरह पोषित हो जाती हैं। आप बिना किसी बाहरी सहारे के खुद को बेहद हल्का, ऊर्जावान और मानसिक रूप से शांत महसूस करेंगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय जरूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएं शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। पैकेज में शामिल हैं: दवा, परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सत्र, योग और ध्यान मार्गदर्शन, आहार योजना, थेरेपी। इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है। कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं: प्रामाणिक पंचकर्म चिकित्सा, सात्विक भोजन, आधुनिक उपचार सेवाएं, आरामदायक आवास, जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने वाली कई अन्य सुविधाएं। जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग Rs.1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताजा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

मरीज़ जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

हम जीवा आयुर्वेद में मरीज़ों को केवल तात्कालिक राहत देने वाली दवाइयों का आदी नहीं बनाते, बल्कि उनके शरीर की आंतरिक उपचार शक्ति को जागृत करते हैं। यही कारण है कि लाखों मरीज़ हम पर अटूट भरोसा करते हैं।

  • जड से इलाज: हम बीमारी के बाहरी लक्षणों को दबाने के बजाय, शरीर के त्रिदोषों को संतुलित करके बीमारी को जड से समाप्त करने का काम करते हैं।
  • विशेषज्ञ डॉक्टर: हमारे पास अनुभवी डॉक्टरों की एक विशाल टीम है, जिन्होंने सालों के शोध और अभ्यास से हजारों मरीज़ों को क्रोनिक और असाध्य रोगों से परमानेंट मुक्ति दिलाई है।
  • कस्टमाइज्ड केयर: हमारे डॉक्टर हर व्यक्ति के लिए बिल्कुल उसकी शारीरिक स्थिति और वात, पित्त या कफ प्रधान प्रकृति के अनुसार पूरी तरह से व्यक्तिगत इलाज की योजना बनाते हैं।
  • प्राकृतिक और सुरक्षित: बाजार की केमिकल युक्त डिटॉक्स दवाओं के विपरीत, हमारे आयुर्वेदिक रसायन और थेरेपीज़ पूरी तरह सुरक्षित हैं जो आँतों को बिना नुकसान पहुँचाए शरीर को बल देती हैं।

आधुनिक डिटॉक्स और आयुर्वेदिक विरेचन दृष्टिकोण में अंतर

शरीर की शुद्धि को लेकर आधुनिक चिकित्सा या आजकल के ट्रेंडी जूस क्लींज और आयुर्वेद के पारंपरिक विरेचन के नजरिए में एक बहुत बडा और बुनियादी अंतर है। आइए इस अंतर को करीब से समझते हैं।

श्रेणी आधुनिक डिटॉक्स (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य केवल फलों का रस देकर या लैक्सेटिव्स के जरिए पेट को कुछ समय के लिए साफ करना। बढे हुए पित्त को शांत करना, जठराग्नि को मजबूत बनाना और 'आम' को पिघलाकर कोशिकाओं से बाहर निकालना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल एक सतही अशुद्धि या वजन घटाने का एक आसान जरिया मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगडे हुए दोषों और गहराई में जमे टॉक्सिन्स का एक संपूर्ण सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल केवल भारी मात्रा में तरल पदार्थ या कच्चे जूस पीने की सामान्य सलाह दी जाती है। खानपान में सही स्नेहन (घी/तेल), ऋतुचर्या का पालन और पाचक अग्नि के अनुसार पके हुए सात्विक आहार पर जोर।
लंबा असर जूस क्लींज छोडने पर वजन फिर से बढ जाता है और जठराग्नि हमेशा के लिए सुस्त पड जाती है। शरीर की आंतरिक प्रणालियाँ अंदर से इतनी मजबूत हो जाती हैं कि वे प्राकृतिक रूप से खुद को साफ रखना सीख जाती हैं।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि विरेचन एक बेहद सुरक्षित और प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन अगर आप बिना किसी विशेषज्ञ डॉक्टर की देखरेख के घर पर ही कोई तीव्र डिटॉक्स करने की कोशिश करते हैं, तो शरीर में कुछ गंभीर लक्षण दिख सकते हैं जिनके दिखने पर तुरंत मेडिकल जाँच जरूरी है।

  • लगातार होने वाले दस्त और पानी की भयंकर कमी: अगर डिटॉक्स के नाम पर ली गई दवाओं के कारण आपको लगातार दस्त हो रहे हों और शरीर में डिहाइड्रेशन के लक्षण दिखने लगें।
  • पेट में असहनीय मरोड़ और दर्द: अगर पेट के निचले हिस्से में ऐसा भयंकर दर्द उठे जो किसी भी पोजीशन में बैठने या लेटने पर शांत न हो और पेट पूरी तरह कडा लगे।
  • अचानक चक्कर आना या बेहोशी महसूस होना: शरीर से अचानक अत्यधिक तरल पदार्थ और इलेक्ट्रोलाइट्स के बाहर निकल जाने से अगर ब्लड प्रेशर अचानक गिर जाए और कमजोरी महसूस हो।
  • मल के रास्ते खून आना: किसी गलत या तेज केमिकल लैक्सेटिव के सेवन से अगर आँतों में खिंचाव आ जाए और मल त्यागते समय लाल खून आने लगे।

निष्कर्ष

अपने शरीर और आँतों को एक बेहद कीमती संपत्ति मानें। जब आप अपने फोन या कंप्यूटर से जंक फाइल्स को क्लियर करते हैं, तो वह तुरंत फास्ट हो जाता है, लेकिन अगर वही कचरा आपके शरीर की कोशिकाओं और लिवर में फँसा रहे, तो वह हर वक्त आपके खून में ज़हर घोलता रहेगा। इस फैंसी जूस क्लींज के भ्रम और बाजार के तेज केमिकल डिटॉक्स के चक्रव्यूह से बाहर निकलें। कच्ची चीजों के बजाय हमेशा अच्छे से पका हुआ और शुद्ध गाय के घी के साथ सात्विक भोजन खाएं। अपनी जठराग्नि को प्रदीप्त रखने के लिए गुनगुने पानी और जीरे के पानी का इस्तेमाल करें, और आयुर्वेद के वैज्ञानिक विरेचन के जरिए अपनी कोशिकाओं को नया जीवन दें। इस अंदरूनी अशुद्धि और सुस्ती के बोझ को अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा न बनने दें, और अपनी जठराग्नि व नर्वस सिस्टम को स्थायी रूप से फौलादी बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

डॉक्टर की सलाह सीधे अपने फोन पर — WhatsApp Channel से जुड़ें।

FAQs

विरेचन के मुख्य दिन घर पर आराम करना बेहतर माना जाता है क्योंकि बार-बार मोशन हो सकते हैं। तैयारी वाले दिनों में सामान्य काम किए जा सकते हैं।

हाँ, विरेचन शरीर से जमा टॉक्सिन्स बाहर निकालने में मदद कर सकता है। इससे पाचन बेहतर होता है और वजन कम करने में सहायता मिल सकती है।

हाँ, लेकिन बहुत ज्यादा ठंड में विरेचन केवल डॉक्टर की सलाह से ही कराना चाहिए। सही समय और शरीर की स्थिति देखना जरूरी होता है।

हाँ, सिर्फ जूस लेने से शरीर को पूरा पोषण नहीं मिल पाता, इसलिए कमजोरी महसूस हो सकती है।

नहीं, विरेचन के बाद हल्का भोजन लेना चाहिए। शुरुआत में पतला और आसानी से पचने वाला खाना लेना बेहतर माना जाता है।

आमतौर पर छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बहुत कमजोर लोगों को तीव्र विरेचन नहीं कराया जाता।

घी शरीर के अंदर जमा गंदगी को ढीला करने और शरीर को तैयार करने में मदद करता है। इससे प्रक्रिया आसान हो सकती है।

नहीं, गहरा विरेचन हमेशा आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए। गलत तरीके से करने पर नुकसान हो सकता है।

हाँ, कई लोगों में विरेचन के बाद त्वचा साफ दिखने लगती है। यह शरीर की सफाई और पाचन सुधारने में मदद कर सकता है।

हाँ, लंबे समय तक सिर्फ जूस लेने से भूख कम लग सकती है और पाचन कमजोर पड़ सकता है।

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