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पेट की समस्या का असर दिमाग पर कैसे पड़ता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan

जब हमें किसी बात का डर लगता है या हम बहुत नर्वस होते हैं, तो पेट में अजीब सी हलचल क्यों होने लगती है? या जब हम भयंकर तनाव में होते हैं, तो अचानक हमारी भूख क्यों मर जाती है या हमें बार-बार वॉशरूम क्यों भागना पड़ता है? हम अक्सर इन चीज़ों को महज़ 'टेंशन' मानकर इग्नोर कर देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपका पेट और आपका दिमाग आपस में एक बहुत ही हाई-स्पीड केबल से जुड़े हुए हैं? विज्ञान की भाषा में इसे 'गट-ब्रेन एक्सिस' (Gut-Brain Axis) कहते हैं। हमारा पेट असल में शरीर का "दूसरा दिमाग" है। जिन छोटे-छोटे संकेतों को हम सिर्फ गैस, कब्ज़ या घबराहट समझकर नींद की गोली से दबा देते हैं, वे असल में शरीर की चीख-पुकार होते हैं जो बताते हैं कि अंदर का पूरा नर्वस सिस्टम और पाचन तंत्र फेल हो रहा है। इस खामोशी से बढ़ने वाले खतरे को समय रहते पहचानना ही एक शांत और स्वस्थ जीवन की असली चाबी है।

पेट और दिमाग की बातचीत: वेगस नर्व (Vagus Nerve) का खेल

हमारा पेट और दिमाग 'वेगस नर्व' नाम की एक बहुत लंबी नस के ज़रिए चौबीसों घंटे आपस में बात करते हैं। जब पेट खराब होता है, तो दिमाग को स्ट्रेस के सिग्नल जाते हैं, और जब दिमाग स्ट्रेस में होता है, तो पेट का सिस्टम फेल हो जाता है।

  • हैप्पी हार्मोन (Serotonin) का निर्माण: आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमारे शरीर का 90% 'सेरोटोनिन' (जो हमें खुश और शांत रखता है) दिमाग में नहीं, बल्कि हमारी आँतों (Gut) में बनता है। अगर आँतें खराब हैं, तो डिप्रेशन और एंग्जायटी होना तय है।
  • गट फ्लोरा (Gut Flora) और स्ट्रेस: हमारी आँतों में करोड़ों अच्छे बैक्टीरिया होते हैं जो हमारे मूड को कंट्रोल करते हैं। जब हम बाहर का जंक फूड या ज़्यादा एंटीबायोटिक्स खाते हैं, तो ये बैक्टीरिया मर जाते हैं, जिससे दिमाग को भयंकर स्ट्रेस सिग्नल जाते हैं और हम बिना बात के चिड़चिड़े हो जाते हैं।
  • ब्रेन फॉग और भारीपन: अगर भारी खाना खाने के बाद आपका दिमाग सुन्न हो जाता है, आप फोकस नहीं कर पाते या नींद आने लगती है, तो यह इस बात का सबूत है कि पेट की सारी ऊर्जा खाने को पचाने में लग रही है और दिमाग को सही ऑक्सीजन नहीं मिल पा रही है।

जब पेट का अलार्म दिमाग में बजता है: वॉर्निंग के संकेत

अगर आप रोज़ाना इन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, तो यह सिर्फ मौसम का बदलाव या काम की थकान नहीं है, बल्कि आपके 'गट-ब्रेन कनेक्शन' के डैमेज होने का सीधा अलार्म है।

  • इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS): अगर कोई ज़रूरी मीटिंग या एग्जाम होने से पहले आपको अचानक मरोड़ उठती है और बार-बार वॉशरूम जाना पड़ता है, तो यह सीधा दिमाग के तनाव का पेट पर भयंकर असर है।
  • स्ट्रेस ईटिंग (Emotional Eating): जब आप उदास या परेशान होते हैं और आपको अचानक बहुत ज़्यादा मीठा या जंक फूड खाने की क्रेविंग (Craving) होती है, तो यह पेट के बैक्टीरिया द्वारा दिमाग को कंट्रोल करने का संकेत है।
  • लगातार कब्ज़ और डिप्रेशन: आयुर्वेद और विज्ञान दोनों मानते हैं कि जो व्यक्ति लंबे समय तक कब्ज़ का शिकार रहता है, उसके दिमाग में लगातार भारीपन, उदासी और नेगेटिव विचार (Depression) आते रहते हैं।

आयुर्वेद इस कनेक्शन को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे आज 'गट-ब्रेन एक्सिस' कहता है, आयुर्वेद ने उसे हज़ारों साल पहले ही शरीर के 'वात दोष' और 'मनोवह स्रोतस' के रूप में बहुत गहराई से समझा था।

  • प्राण वात और अपान वात का सीधा रिश्ता: आयुर्वेद के अनुसार, हमारे दिमाग को 'प्राण वात' चलाता है और हमारी आँतों व मल-मूत्र को 'अपान वात' कंट्रोल करता है। जब कब्ज़ या खराब डाइट से अपान वात बिगड़ता है, तो वह ऊपर की ओर उछलकर प्राण वात (दिमाग) को डिस्टर्ब कर देता है, जिससे एंग्जायटी और सिरदर्द होता है।
  • आम (Toxins) का दिमाग तक पहुँचना: जब कमज़ोर पाचन ('अग्नि') के कारण खाना पेट में सड़ता है, तो वह 'आम' (ज़हर) बनाता है। यह आम खून में घुलकर 'मनोवह स्रोतस' (दिमाग की नसों) को ब्लॉक कर देता है, जिससे याददाश्त कमज़ोर होती है और सुस्ती आती है।
  • अग्नि और ओजस का कनेक्शन: शरीर की 'अग्नि' (पाचन) जितनी अच्छी होगी, शरीर में उतना ही अच्छा ओजस (Immunity और मानसिक ताकत) बनेगा। पेट खराब होने पर ओजस सूख जाता है और इंसान दिमागी रूप से कमज़ोर पड़ जाता है।

जीवा आयुर्वेद का समग्र प्रबंधन क्या है?

  • हम आपको सिर्फ नींद की गोलियाँ या गैस का चूर्ण देकर इन चेतावनियों को दबाने का काम नहीं करते। हमारा लक्ष्य आपके शरीर की असली पुकार को सुनकर उसकी जड़ को हमेशा के लिए ठीक करना है।
  • नाड़ी से बीमारी की पहचान: हम लक्षणों के आधार पर नहीं, बल्कि नाड़ी परीक्षा से शरीर के अंदर चल रहे वात, पित्त और कफ के असली असंतुलन को पकड़ते हैं और देखते हैं कि स्ट्रेस का असर पेट पर है या पेट की खराबी का असर दिमाग पर है।
  • अग्नि दीपन और डिटॉक्स: सबसे पहले आपकी पाचन शक्ति (Agni) को मज़बूत किया जाता है और शरीर व दिमाग में फैले हुए 'आम' (गंदगी) को जड़ी-बूटियों के ज़रिए बाहर निकाला जाता है।
  • मेध्य रसायन (Brain Tonics): जब आँतें साफ हो जाती हैं, तब दिमाग की नसों को दोबारा ताकत देने और एंग्जायटी दूर करने के लिए विशेष आयुर्वेदिक रसायन औषधियाँ दी जाती हैं।

पेट और दिमाग दोनों को ताकत देने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें पेट की गैस और दिमागी तनाव को सिर्फ दबाने के बजाय जड़ से खत्म करने के लिए बहुत ही जादुई और सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं।

  • ब्राह्मी (Brahmi): बार-बार होने वाले दिमागी तनाव, एंग्जायटी और पेट की घबराहट को दूर करने के लिए यह सीधा नर्वस सिस्टम पर काम करती है और दिमाग को भारी शांति देती है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह स्ट्रेस हार्मोन (कॉर्टिसोल) को तुरंत कम करता है। यह न सिर्फ दिमाग को शांत करता है, बल्कि स्ट्रेस के कारण कमज़ोर हुई आँतों को भी भारी ताकत देता है।
  • त्रिफला (Triphala): पेट को साफ रखकर और 'गुड बैक्टीरिया' को बढ़ाकर यह डिप्रेशन और भारीपन को जड़ से खत्म करने का सबसे बेहतरीन रसायन है।
  • जटामांसी (Jatamansi): अगर स्ट्रेस और खराब पेट के कारण रातों की नींद उड़ गई है, तो यह जड़ी-बूटी दिमाग की नसों को शांत कर गहरी नींद लाती है और पेट की मरोड़ को कम करती है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी शरीर और दिमाग को कैसे नया बनाती है?

जब शरीर में 'आम' (गंदगी) बहुत ज़्यादा भर जाता है और रोज़ाना का स्ट्रेस IBS या डिप्रेशन का रूप लेने लगता है, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी शरीर की डीप क्लीनिंग करती है।

  • शिरोधारा (Shirodhara): नींद न आना, भयंकर एंग्जायटी और स्ट्रेस के लिए यह एक जादुई थेरेपी है। माथे पर औषधीय तेल की लगातार धारा गिराने से वेगस नर्व शांत होती है और दिमाग का सारा तनाव बहकर निकल जाता है।
  • बस्ती (Basti): आयुर्वेद में वात रोगों, कब्ज़ और स्ट्रेस का आधा इलाज 'बस्ती' को माना गया है। औषधीय तेलों का एनीमा देकर आँतों से सारा फँसा हुआ वात और ज़हरीला मल बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे दिमाग तुरंत हल्का महसूस करता है।
  • विरेचन (Virechana): यह फैटी लिवर और खून की गंदगी के लिए सबसे अचूक इलाज है। इसमें दस्त लगाकर शरीर की सारी एसिडिटी बाहर निकाल दी जाती है, जिससे हैप्पी हार्मोन्स दोबारा बनने लगते हैं।

गट-ब्रेन (Gut-Brain) को संतुलित रखने के लिए सात्विक डाइट प्लान

आप जो खाते हैं, वह सीधा आपके मूड और विचारों को तय करता है। एंग्जायटी और पेट की इस खतरनाक वॉर्निंग को रोकने के लिए सही डाइट का पालन करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

आहार का सिद्धांत:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): सात्विक, हल्का, गर्म और ताज़ा भोजन लें जो पचने में आसान हो और दिमाग को शांति दे।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): बासी, फ्रिज में रखा ठंडा खाना और बहुत ज़्यादा तीखा या तामसिक भोजन जो गुस्सा और एसिडिटी बढ़ाता है।

प्राकृतिक पोषण:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): गाय का शुद्ध घी (दिमाग के लिए बेहतरीन), मूंग की दाल, लौकी, ताज़े फल और भीगे हुए बादाम शामिल करें।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): बहुत ज़्यादा मैदा, रिफाइंड चीनी, और बाहर का जंक फूड जो आँतों के गुड बैक्टीरिया को मार देता है।

विरुद्ध आहार से बचें:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): संतुलित और संगत (Compatible) खाद्य संयोजन अपनाएँ।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): दूध के साथ खट्टे फल, मछली या नमक का सेवन जो शरीर में सीधा 'आम' (ज़हर) बनाता है।

जीवा आयुर्वेद में हम मरीज़ों की जाँच कैसे करते हैं?

जब आप इन छोटे-छोटे संकेतों को इग्नोर करके किसी बड़ी बीमारी का शिकार हो जाते हैं और दवाइयाँ काम नहीं करतीं, तब हम आपकी परेशानी की जड़ तक पहुँचने के लिए गहराई से जाँच करते हैं।

  • नाड़ी परीक्षा: सबसे पहले पल्स चेक करके यह गहराई से समझना कि आपके अंदर 'वात', 'पित्त', और 'कफ' का स्तर कितना बिगड़ चुका है और स्ट्रेस का असर किस अंग पर पड़ रहा है।
  • शारीरिक मूल्याँकन: डॉक्टर आपकी जीभ, आँखें, और त्वचा का रूखापन बहुत बारीकी से चेक करते हैं ताकि अंदरूनी मेटाबॉलिज़्म और नर्वस सिस्टम का सही पता चल सके।
  • पाचन का विश्लेषण: यह देखना कि आपका पेट साफ रहता है या नहीं, क्योंकि कब्ज़ और कमज़ोर आँतें ही दिमाग में नेगेटिव विचार पैदा करती हैं।
  • लाइफस्टाइल चेक: आपके सोने का समय, ऑफिस का तनाव, और एंटी-डिप्रेसेंट या गैस की गोलियाँ खाने की पुरानी आदत को बहुत गहराई से समझा जाता है, क्योंकि बीमारी का ट्रिगर यहीं है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई ऐसी जादुई नींद की गोली या पेनकिलर नहीं है जो एक रात में आपके शरीर की सालों की कमज़ोरी को खत्म कर दे। शरीर और दिमाग की अंदरूनी मशीनरी को दोबारा रिसेट होने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपका पेट साफ होगा; गैस, एसिडिटी और शरीर का भारीपन काफी कम होने लगेगा। दिमाग शांत होगा और रात को नींद पहले से गहरी आएगी।
  • 1 से 3 महीने तक: वेगस नर्व और गट फ्लोरा सुधरने से बिना कारण घबराहट होना (Anxiety) रुक जाएगा। एकाग्रता (Focus) बढ़ेगी और स्ट्रेस के समय पेट में मरोड़ उठना बंद हो जाएगा।
  • 3 से 6 महीने और उससे अधिक: आपका पूरा शरीर और दिमाग अंदर से डिटॉक्स हो जाएगा। मानसिक ताकत (ओजस) इतनी मज़बूत हो जाएगी कि छोटी-मोटी परेशानियाँ आपको डिस्टर्ब नहीं कर पाएंगी और आप एक स्वस्थ जीवन जी सकेंगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

पेट और दिमाग के इस कनेक्शन के इलाज के लिए सही चिकित्सा पद्धति का चुनाव करना बहुत ज़रूरी है। आइए समझते हैं कि प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को लेकर दोनों दृष्टिकोण कैसे अलग हैं।

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य एंटी-डिप्रेसेंट और एंटासिड से लक्षणों को दबाना ‘अग्नि’ और ‘प्राण वात’ को संतुलित कर जड़ से समाधान
शरीर को देखने का नजरिया पेट और दिमाग को अलग-अलग अंग मानकर अलग विशेषज्ञों से इलाज ‘गट-ब्रेन एक्सिस’ के रूप में शरीर को एक इकाई मानकर उपचार
डाइट और जीवनशैली मामूली बदलाव, मुख्य ज़ोर दवाइयों पर सात्विक आहार, योग, ध्यान और डिटॉक्स को मुख्य आधार
इलाज का तरीका दवाओं के माध्यम से लक्षणों का नियंत्रण आहार, जीवनशैली और जड़ी-बूटियों से समग्र संतुलन
लंबा असर दवाइयों की निर्भरता, साइड इफेक्ट्स और लत का खतरा ‘मेध्य रसायन’ से दीर्घकालिक मानसिक और शारीरिक संतुलन

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए?

घबराहट या पेट खराब होने को सिर्फ स्ट्रेस मानकर इग्नोर न करें। अगर आपको शरीर में ये गंभीर और अचानक होने वाले संकेत दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

  • सीने में भारीपन जो बायीं बाँह तक जाए: अगर पैनिक अटैक या गैस के साथ सीने में भयंकर जकड़न हो और दर्द बाएँ हाथ या जबड़े की तरफ जा रहा हो, तो यह एंग्जायटी नहीं बल्कि हार्ट अटैक का स्पष्ट संकेत है।
  • अचानक सुन्नपन या लड़खड़ाना: अगर भयंकर स्ट्रेस के बीच अचानक आँखों से दिखना बंद हो जाए, आवाज़ लड़खड़ाने लगे या शरीर का एक हिस्सा सुन्न पड़ जाए (यह ब्रेन स्ट्रोक का संकेत हो सकता है)।
  • मल या उल्टी में खून आना: अगर स्ट्रेस और पेट दर्द के साथ मल का रंग बिल्कुल काला हो जाए या उल्टी में ताज़ा खून आए, तो यह अल्सर फटने की निशानी है।
  • भयंकर नेगेटिव विचार: अगर स्ट्रेस इतना बढ़ गया है कि खुद को नुकसान पहुँचाने के विचार लगातार आ रहे हैं और पूरी-पूरी रात नींद नहीं आती, तो इसे इग्नोर न करें, तुरंत मदद लें।

निष्कर्ष

हमारा शरीर एक बहुत ही स्मार्ट साथी है। जब आप डरे होते हैं तो पेट में दर्द होना या पेट खराब होने पर चिड़चिड़ापन होना कोई इत्तेफाक नहीं है। यह पेट और दिमाग की वो शक्तिशाली केबल (गट-ब्रेन एक्सिस) है जो आपको बता रही है कि अंदर की मशीनरी खराब हो रही है और उसे तुरंत आपकी मदद की ज़रूरत है। जब हम इन संकेतों को नींद की गोलियों या गैस के चूर्ण से दबा देते हैं, तो हम असल में अपनी बीमारी को अंदर ही अंदर फैलने का पूरा मौका दे रहे होते हैं। यही छोटी-छोटी अनदेखियाँ आगे चलकर भयंकर डिप्रेशन और IBS का रूप ले लेती हैं। आयुर्वेद आपको शरीर की भाषा समझने का बेहद सुरक्षित रास्ता दिखाता है। ब्राह्मी, अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियों और जीवा आयुर्वेद के साथ जुड़कर अपने दिमाग और पेट दोनों को हमेशा के लिए शांत और स्वस्थ बनाएं।

FAQs

पेट और दिमाग 'वेगस नर्व' के ज़रिए आपस में जुड़े होते हैं। इसीलिए तनाव होने पर पेट खराब हो जाता है, और जब पेट में गैस या कब्ज़ होती है, तो मूड खराब रहता है या भयंकर सिरदर्द होता है।

तनाव के समय शरीर 'कॉर्टिसोल' रिलीज़ करता है। यह हार्मोन पाचन तंत्र को सुस्त कर देता है जिससे कुछ लोगों की भूख मर जाती है, जबकि कुछ लोगों का दिमाग शांति ढूँढ़ने के लिए जंक फूड माँगने लगता है।

जी हाँ, बिल्कुल! हमें खुश रखने वाला 90% हार्मोन (Serotonin) हमारी आँतों में बनता है। अगर आँतें खराब हैं या कब्ज़ है, तो यह हार्मोन नहीं बनता, जिससे इंसान लगातार उदासी और एंग्जायटी का शिकार हो जाता है।

IBS में आँतें और दिमाग बहुत ज़्यादा सेंसिटिव हो जाते हैं। ज़रा सा भी मानसिक तनाव या डर (जैसे कोई इंटरव्यू या मीटिंग) सीधा आँतों में मरोड़ पैदा करता है और इंसान को तुरंत वॉशरूम भागना पड़ता है।

आयुर्वेद में 'मंदाग्नि' (पाचन) को ठीक करके और 'प्राण वात' (दिमाग) को शांत करके इस कनेक्शन को सुधारा जाता है। इसके लिए ब्राह्मी, अश्वगंधा और जटामांसी जैसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है।

हाँ। कई एंटी-डिप्रेसेंट दवाइयाँ आँतों के प्राकृतिक मूवमेंट को धीमा कर देती हैं और अच्छे बैक्टीरिया को मार देती हैं, जिससे कब्ज़, ब्लोटिंग और वज़न बढ़ने जैसी समस्याएँ पैदा होती हैं।

शिरोधारा सीधे वेगस नर्व और नर्वस सिस्टम को शांत करती है। जब दिमाग से स्ट्रेस के सिग्नल पेट तक जाना बंद हो जाते हैं, तो आँतें रिलैक्स हो जाती हैं और IBS या तनाव के कारण होने वाली मरोड़ ठीक हो जाती है।

हमारी आँतों में मौजूद गुड बैक्टीरिया ही खाने से पोषण निकालकर ऐसे रसायन बनाते हैं जो दिमाग को एक्टिव और खुश रखते हैं। जंक फूड खाने से ये मर जाते हैं और दिमागी सुस्ती आ जाती है।

विरुद्ध आहार (जैसे दूध के साथ नमक) पेट में जाकर सीधा 'आम' (ज़हर) बनाता है। यह ज़हर खून के ज़रिए दिमाग तक पहुँचता है और नसों को ब्लॉक करके सुस्ती, एंग्जायटी और माइग्रेन पैदा करता है।

सही आयुर्वेदिक डाइट और जड़ी-बूटियों के इस्तेमाल से 2 से 3 हफ्तों में ही गैस खत्म होने लगती है और दिमाग शांत महसूस करता है। नर्वस सिस्टम और आँतों को पूरी तरह स्वस्थ होने में 3 से 6 महीने का समय लग सकता है।

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