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Hormonal changes (especially in women) IBS symptoms क्यों बढ़ाते हैं?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

हमारी बॉडी बिल्कुल एक टीम की तरह काम करती है। हमारे हार्मोन्स, हमारा पेट (आंतें) और हमारा दिमाग ये तीनों आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। आप खुद सोचिए, जब दिमाग में बहुत ज्यादा टेंशन होती है, तो सबसे पहले हमारा पाचन ही तो बिगड़ता है। और हमें खुश रखने वाला हार्मोन (जिसे सेरोटोनिन कहते हैं) सबसे ज्यादा हमारे पेट में ही बनता है। अगर पेट ठीक नहीं रहेगा, तो न तो आपका मूड अच्छा रहेगा और न ही शरीर के हार्मोन्स बैलेंस में रहेंगे। इन तीनों का सही तालमेल ही हमें फिट और खुश रखता है।

IBS क्या है?

IBS (इरिटेबल बोवेल सिंड्रोम) कोई अल्सर, घाव या गांठ जैसी बीमारी नहीं है जो किसी अल्ट्रासाउंड या एक्स-रे की रिपोर्ट में पकड़ में आ जाए। डॉक्टर इसे 'फंक्शनल डिसऑर्डर' कहते हैं। इसका मतलब है कि अंदर से आपकी आंतें बिल्कुल ठीक दिख रही हैं, लेकिन उनके काम करने का तरीका बिगड़ चुका है। आम भाषा में समझें तो, आपके दिमाग और पेट के बीच का कनेक्शन हिल गया है। इसमें क्या होता है? कभी अचानक से पेट में मरोड़ उठेगी, कभी पेट गुब्बारे की तरह फूल जाएगा, तो कभी कब्ज और कभी दस्त लग जाएंगे। क्योंकि टेस्ट की सारी रिपोर्ट नॉर्मल आती हैं, इसलिए लोग इसे अक्सर समझ ही नहीं पाते। लेकिन यह अंदर ही अंदर इंसान की मानसिक शांति और रोज़मर्रा की जिंदगी को बुरी तरह डिस्टर्ब कर देता है।

महिलाओं में IBS अधिक क्यों देखा जाता है? 

अक्सर देखा गया है कि यह दिक्कत महिलाओं में कहीं ज्यादा होती है। इसकी सबसे बड़ी वजह है उनके शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव। पीरियड्स के दौरान, प्रेगनेंसी में या मेनोपॉज़ के वक्त महिलाओं के शरीर में हार्मोन्स बहुत तेजी से ऊपर-नीचे होते हैं। इन बदलावों का सीधा असर उनके पाचन और आंतों की स्पीड पर पड़ता है। आयुर्वेद के नजरिए से देखें तो इन दिनों शरीर में वात और पित्त बिगड़ जाते हैं, जिससे पेट में गैस, मरोड़ या कब्ज की शिकायत शुरू हो जाती है। इसके अलावा, महिलाओं की आंतें थोड़ी ज्यादा सेंसिटिव होती हैं, इसलिए किसी भी स्ट्रेस या इमोशनल टेंशन का असर तुरंत उनके पेट पर दिखता है। इसीलिए IBS को महिलाओं के मामले में सिर्फ पेट की बीमारी नहीं, बल्कि दिमाग, हार्मोन्स और पाचन तीनों की एक उलझन माना जाता है।

हार्मोनल बदलाव क्या होते हैं? 

हार्मोनल बदलाव का मतलब है शरीर में एस्ट्रोजन (Estrogen) और प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) जैसे हार्मोन्स का कभी कम तो कभी ज्यादा होना। महिलाओं में हर महीने पीरियड्स के आस-पास ये उतार-चढ़ाव होना एकदम कुदरती बात है। लेकिन जब ये हार्मोन्स बदलते हैं, तो ये सिर्फ यूट्रस पर ही असर नहीं डालते, बल्कि इनका पूरा असर हमारे पेट के सिस्टम पर भी होता है। यही वजह है कि पीरियड्स के दिनों में अक्सर महिलाओं को पेट में गैस, मरोड़, भारीपन या कब्ज जैसी दिक्कतें बाकी दिनों के मुकाबले कहीं ज्यादा महसूस होती हैं।

महिलाओं में IBS के प्रमुख लक्षण 

महिलाओं में IBS के लक्षण अक्सर हार्मोनल उतार-चढ़ाव की वजह से पुरुषों की तुलना में अधिक संवेनदशील और कष्टकारी हो सकते हैं। इसका मुख्य प्रभाव आंतों की गति और मानसिक स्थिति पर पड़ता है:

  • अपूर्ण मल त्याग (Incomplete Evacuation): शौचालय जाने के बाद भी यह महसूस होना कि पेट पूरी तरह साफ नहीं हुआ है। यह भारीपन और मानसिक बेचैनी का सबसे बड़ा कारण बनता है।
  • पेट में मरोड़ और दर्द: पेट के निचले हिस्से में तीव्र ऐंठन या मरोड़ उठना, जो अक्सर मल त्याग के बाद थोड़ा शांत होता है।
  • ब्लोटिंग और भारीपन: पेट का गुब्बारे की तरह फूल जाना। पीरियड्स के आसपास यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। 
  • बदलते पैटर्न: कभी हफ़्तों तक कब्ज (Constipation) रहना और फिर अचानक दस्त (Diarrhea) शुरू हो जाना।
  • पीरियड्स के दौरान बढ़ते लक्षण: हार्मोनल बदलाव के कारण मासिक धर्म के दौरान दर्द, गैस और थकान का सामान्य से कहीं ज्यादा बढ़ जाना। 
  • मानसिक थकान: पेट की लगातार गड़बड़ी के कारण चिड़चिड़ापन, चिंता (Anxiety) और नींद की कमी होना।

हार्मोनल बदलाव और IBS पर उनका असर

IBS और हार्मोनल बदलावों के बीच एक गहरा संबंध होता है, जो महिलाओं के पाचन तंत्र को लगातार प्रभावित करता है। हर चरण, ओव्यूलेशन, प्रेग्नेंसी और मेनोपॉज़, में शरीर के हार्मोन बदलते हैं, जिससे IBS के लक्षण भी बदलते रहते हैं।

  • ओव्यूलेशन फेज (Ovulation): इस दौरान हार्मोन अपने उच्चतम स्तर (Peak) पर होते हैं, जिससे शरीर में मेटाबॉलिक हलचल तेज़ हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप कुछ महिलाओं को अचानक ब्लोटिंग, गैस और पेट में भारीपन महसूस होता है। 
  • गर्भावस्था (Pregnancy): प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) हार्मोन बढ़ने के कारण आंतों की मांसपेशियों की गति धीमी हो जाती है। इससे भोजन पचने में अधिक समय लगता है, जिससे कब्ज और भारीपन की समस्या बढ़ जाती है। 
  • मेनोपॉज (Menopause): एस्ट्रोजन का स्तर गिरने से आंतों की संवेदनशीलता (Sensitivity) बढ़ जाती है। इसी कारण पाचन के लक्षण अनियमित हो जाते हैं और पुरानी समस्याएं फिर से उभर सकती हैं।
  • गट-ब्रेन एक्सिस (Gut-Brain Axis): आंत और दिमाग के बीच सीधा संवाद होता है। हार्मोन इस मार्ग को प्रभावित करते हैं, जिससे तनाव बढ़ने पर पाचन तंत्र तुरंत प्रतिक्रिया देता है और लक्षण बिगड़ जाते हैं।

आयुर्वेद का नज़रिया: हार्मोन्स और पाचन का आपस में क्या कनेक्शन है?

आयुर्वेद साफ कहता है कि IBS (संग्रहणी) और हमारे हार्मोन्स के बदलने का सीधा कनेक्शन पेट की आग, दोषों और हमारे दिमाग की स्थिति से जुड़ा होता है। चलिए इसे आसान भाषा में समझते हैं:

  • पाचन और पीरियड्स (Digestion & Periods): पीरियड्स के दिनों में महिलाओं के शरीर में 'अपान वायु' बहुत ज्यादा एक्टिव हो जाती है। इस दौरान हार्मोन्स के ऊपर-नीचे होने से पेट की आग (पाचन शक्ति) सुस्त पड़ जाती है। इसी वजह से खाना ठीक से नहीं पचता और पेट फूला-फूला या भारी लगने लगता है।
  • बढ़ा हुआ पित्त और पेट की सेंसिटिविटी: महीने के बीच में (ओव्यूलेशन के समय) शरीर का पित्त यानी गर्मी बढ़ जाती है। यह गर्मी आंतों को बहुत ज्यादा सेंसिटिव बना देती है और उनमें हल्की जलन पैदा करती है। यही कारण है कि इस वक्त अचानक दस्त लगने या पेट में मरोड़ उठने की शिकायत बढ़ जाती है।
  • गैस (वात) और दिमागी टेंशन: जब हार्मोन्स बिगड़ते हैं, तो शरीर में 'वात' (गैस) भी भड़क जाता है। यह बिगड़ा हुआ वात सीधा आपके दिमाग और आंतों के कनेक्शन को हिला देता है। नतीजा? बिना बात की टेंशन, रातों की नींद उड़ना और कभी कब्ज तो कभी दस्त की परेशानी।
  • शरीर में आम इकट्ठा होना: जब पाचन कमजोर होता है और हार्मोन्स का स्ट्रेस पड़ता है, तो ये दोनों मिलकर पेट में एक ज़हरीला 'आम' बनाते हैं। यह 'आम' आंतों के रास्तों को ब्लॉक कर देता है, और इसी वजह से सुबह पेट खुलकर साफ नहीं हो पाता।

इलाज का सही तरीका (Treatment Approach)

आयुर्वेद में हार्मोन्स की गड़बड़ी और IBS का इलाज सिर्फ गोलियां देकर ऊपर-ऊपर से नहीं किया जाता। यहाँ हर मरीज को एक अलग केस माना जाता है, और बीमारी को कुछ दिन के लिए दबाने के बजाय उसकी जड़ पर वार किया जाता है:

  • आपकी बॉडी के हिसाब से इलाज: हम सब जानते हैं कि हर महिला के शरीर का नेचर (वात, पित्त या कफ) एकदम अलग होता है। आयुर्वेद के डॉक्टर सबसे पहले आपकी इसी 'प्रकृति' और आपके हार्मोनल साइकिल को बारीकी से समझते हैं। इसके बाद सिर्फ आपके लिए एक खास इलाज तय किया जाता है।
  • पेट की आग को तेज़ करना (Metabolism Fix): इलाज की सबसे पहली सीढ़ी है उस सुस्त पड़े पाचन को वापस तेज़ करना। जब पेट की आग सही से काम करेगी, तो अंदर नया आम बनना अपने आप रुक जाएगा और आंतें फिर से अपनी पूरी ताकत से काम करने लगेंगी।
  • दोषों को वापस बैलेंस करना: हार्मोन्स के बिगड़ने से जो वात और पित्त भड़क गए थे, उन्हें शांत करने के लिए कुछ बहुत ही असरदार देसी औषधियाँ दी जाती हैं। इनमें शतावरी, अशोक और पुनर्नवा जैसी दवाइयां शामिल होती हैं, जो शरीर को अंदर से ठंडा और रिलैक्स करती हैं।
  • दिमाग और पेट का कनेक्शन सुधारना: क्योंकि हमारी आंतें और दिमाग आपस में गहराई से जुड़े हैं, इसलिए दिमागी टेंशन को खत्म करना बहुत जरूरी है। इसके लिए कुछ खास 'मेध्य औषधियाँ' (दिमाग को शांत करने वाली जड़ी-बूटियां) दी जाती हैं और सादे खान-पान (सात्विक लाइफस्टाइल) की सलाह दी जाती है।
  • पंचकर्म और बस्ती (डीप क्लीनिंग): शरीर के बहुत अंदर तक जमे हुए ज़हर (Toxins) को बाहर निकालने के लिए 'बस्ती' (आयुर्वेदिक एनीमा) जैसी खास थेरेपी का सहारा लिया जाता है। यह आंतों को फौलादी मजबूती देती है और बिगड़ी हुई हार्मोनल साइकिल को वापस पटरी पर ले आती है।

हार्मोन्स और पाचन को बैलेंस करने वाली कुछ खास आयुर्वेदिक औषधियाँ

आयुर्वेद में कुछ ऐसी देसी औषधियाँ हैं, जो महिलाओं के शरीर में होने वाले हार्मोन्स के उतार-चढ़ाव और IBS (पेट की दिक्कतों) दोनों को एक साथ ठीक करने में बहुत काम आती हैं:

  • शतावरी (Shatavari): इसे महिलाओं के लिए सबसे अच्छा 'हार्मोन बैलेंसर' माना जाता है। हार्मोन्स बदलने की वजह से पेट में जो जलन या खुश्की होती है, शतावरी आंतों को अंदर से चिकनाई देकर उसे बिल्कुल शांत कर देती है।
  • अशोक (Ashoka): अशोक की छाल का सबसे बड़ा काम है महिलाओं के मासिक चक्र (पीरियड्स) को सही टाइम पर लाना। जब आपके हार्मोन्स बैलेंस में आ जाते हैं, तो पीरियड्स या ओव्यूलेशन के दिनों में पेट फूलने (ब्लोटिंग) की परेशानी अपने आप खत्म हो जाती है।
  • ब्राह्मी और शंखपुष्पी: ये दोनों दिमाग को ताकत देने वाली जड़ी-बूटियाँ हैं। चूंकि हमारी आंतों और दिमाग का सीधा कनेक्शन है, इसलिए जब इन औषधियों से आपकी दिमागी टेंशन कम होती है, तो पाचन खुद-ब-खुद पटरी पर आ जाता है।

हार्मोन्स और पाचन सुधारने वाली असरदार आयुर्वेदिक थेरेपी

आयुर्वेद में सिर्फ दवाइयां ही नहीं, बल्कि कुछ ऐसी खास थेरेपी भी हैं जो शरीर की अंदर से डीप क्लीनिंग करती हैं। इससे हार्मोन्स का बैलेंस और पाचन दोनों एकदम सेट हो जाते हैं:

  • अभ्यंग और स्वेदन (मालिश और भाप): इसमें खास जड़ी-बूटियों वाले तेल से पूरे शरीर की मालिश की जाती है और फिर भाप (Steam) दी जाती है। इससे नसों में खून का फ्लो तेज होता है और शरीर के अंदर जमा सारा ज़हरीला कचरा ('आम') पिघलकर पसीने के रास्ते बाहर निकल जाता है। यह आपके सुस्त पाचन को फिर से तेज़ करने में बहुत मददगार है।
  • शिरोधारा (Shirodhara): इसमें माथे के बीचों-बीच हल्के गर्म तेल की धार लगातार गिराई जाती है, जो आपके नर्वस सिस्टम को एकदम रिलैक्स कर देती है। हार्मोन्स के बिगड़ने से जो बार-बार चिड़चिड़ापन (मूड स्विंग) आता है या पेट खराब होता है, उसे ठीक करने का यह बहुत ही बेहतरीन तरीका है।
  • मात्रा बस्ती: यह बस्ती (आयुर्वेदिक एनीमा) का ही एक हल्का रूप है जिसमें जड़ी-बूटियों वाले खास तेल का इस्तेमाल होता है। यह आंतों के अंदर के सूखेपन को खत्म करती है, जिससे सुबह बिना किसी जोर या तकलीफ के पेट एकदम खुलकर साफ होने लगता है।

आहार: हार्मोनल एवं पाचन संतुलन

हार्मोनल उतार-चढ़ाव के दौरान आंतों को शांत रखने और मेटाबॉलिज्म को मजबूत बनाने के लिए ये बदलाव अनिवार्य हैं:

  • अमृत समान छाछ: भुने जीरे और हींग के साथ छाछ (Buttermilk) पिएं; यह आंतों के लिए सबसे अच्छा प्रोबायोटिक है। 
  • सुपाच्य भोजन: मूंग की दाल, पुराना चावल और लौकी-तोरई जैसी हल्की सब्जियां खाएं। कच्चा सलाद कम करें क्योंकि यह 'वात' और गैस बढ़ा सकता है।
  • मसालों का जादू: अदरक, सौंफ और धनिया को शामिल करें, जो हार्मोनल ब्लोटिंग को कम करने में सहायक हैं।
  • परहेज: मैदा, अत्यधिक कैफीन (कॉफी/चाय) और ठंडे पेय पदार्थों से बचें, क्योंकि ये पाचन अग्नि को मंद करते हैं। 

डॉक्टर से कब सलाह लें?

यदि आपको निम्नलिखित समस्याएं महसूस हो रही हैं, तो इन्हें नजरअंदाज न करें:

  • हफ्तों से कब्ज और दस्त का अनियमित सिलसिला बना रहना।
  • मल में सफेद चिपचिपा पदार्थ (Mucus/आंव) आना।
  • रिपोर्ट्स नॉर्मल होने के बावजूद पेट में लगातार भारीपन, मरोड़ या थकान रहना।
  • भोजन के तुरंत बाद शौचालय जाने की तीव्र इच्छा होना।

निष्कर्ष

हार्मोन और आंतों का यह अदृश्य संवाद इस बात का प्रमाण है कि हमारा शरीर खंडों में नहीं, बल्कि एक इकाई के रूप में काम करता है। महिलाओं के लिए, IBS केवल एक शारीरिक विकार नहीं है, बल्कि यह उनके हार्मोनल चक्र, मानसिक स्थिति और पाचन तंत्र के बीच बिगड़े हुए तालमेल का संकेत है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, पीरियड्स से ठीक पहले प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन के स्तर में गिरावट आती है। इसके कारण आंतों की संवेदनशीलता बढ़ जाती है, जिससे ब्लोटिंग, दस्त या कब्ज की समस्या अधिक महसूस होती है।

ओव्यूलेशन (Ovulation) के समय शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर अपने उच्चतम शिखर (Peak) पर होता है। यह हार्मोन शरीर में पानी को रोकता है (Water retention), जिससे पेट में भारीपन और गैस महसूस होती है। 

यह हर महिला के लिए अलग होता है। कुछ को राहत मिलती है, लेकिन अधिकांश महिलाओं में प्रोजेस्टेरोन बढ़ने के कारण पाचन धीमा हो जाता है, जिससे कब्ज (IBS-C) की समस्या बढ़ सकती है।

जी हाँ। तनाव के दौरान निकलने वाला 'कोर्टिसोल' हार्मोन सीधे आंतों की मांसपेशियों को प्रभावित करता है। चूंकि दिमाग और आंतें (Gut-Brain Axis) जुड़ी हैं, तनाव बढ़ते ही मरोड़ और दर्द शुरू हो जाता है। 

आयुर्वेद केवल लक्षणों को नहीं रोकता, बल्कि 'पाचन अग्नि' को ठीक करता है और वात-पित्त को संतुलित करता है। यदि आप डाइट और जड़ी-बूटियों का सही पालन करें, तो आंतों की कार्यक्षमता में स्थायी सुधार आ सकता है।

मेनोपॉज में एस्ट्रोजन कम होने से आंतों की सुरक्षात्मक परत संवेदनशील हो जाती है। इससे पुरानी पाचन समस्याएं फिर से उभर सकती हैं या लक्षणों में अनियमितता आ सकती है।

 हाँ। जब आंतें खराब होती हैं, तो शरीर भोजन से पोषक तत्व (Nutrients) नहीं सोख पाता। इसके अलावा, शरीर का 90% सेरोटोनिन (हैप्पी हार्मोन) आंतों में बनता है, जिसकी कमी से मानसिक और शारीरिक थकान रहती है। 

जीवा आयुर्वेद का लक्ष्य शरीर को 'स्वयं ठीक' होने के योग्य बनाना है। एक बार जब आपकी अग्नि और दोष संतुलित हो जाते हैं और आप सही जीवनशैली अपना लेते हैं, तो दवाओं पर निर्भरता धीरे-धीरे खत्म हो जाती है।

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