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Breastfeeding के बाद Period अनियमित क्यों? हार्मोन और आयुर्वेद

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 30 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 15 Jun, 2026
  • category-iconWomen's Health
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डिलीवरी के बाद और ब्रेस्टफीडिंग के दिनों में पीरियड्स का रुक जाना या उनका समय पर न आना एक बिलकुल नॉर्मल बात है। कई महिलाओं को बच्चे के जन्म के कुछ महीनों बाद तक पीरियड्स होते ही नहीं हैं, वहीं कुछ महिलाओं में ये बहुत जल्दी शुरू तो हो जाते हैं, लेकिन उनकी साइकिल काफी समय तक ऊपर-नीचे होती रहती है।

चिकित्सीय दृष्टिकोण से, स्तनपान के दौरान शरीर का पूरा ध्यान शिशु के पोषण (दूध के निर्माण) पर होता है। इस दौरान अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System) में विशिष्ट हार्मोनल बदलाव होते हैं जो अस्थायी रूप से प्रजनन प्रणाली (Reproductive System) को रोक देते हैं। हालांकि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन जब स्तनपान कम करने या बंद करने के बाद भी पीरियड्स लंबे समय तक अनियमित रहें, तो यह अंतर्निहित हार्मोनल असंतुलन या पोषण की कमी का संकेत हो सकता है।

स्तनपान और मासिक धर्म का विज्ञान: प्रोलैक्टिन का प्रभाव

स्तनपान के दौरान मासिक धर्म के रुकने या अनियमित होने के पीछे मुख्य कारण प्रोलैक्टिन (Prolactin) हार्मोन है।

  • प्रोलैक्टिन और ओव्यूलेशन: जब शिशु स्तनपान करता है, तो महिला के मस्तिष्क (पिट्यूटरी ग्रंथि) से प्रोलैक्टिन हार्मोन अधिक मात्रा में स्रावित होता है। यह हार्मोन स्तन के दूध के निर्माण के लिए आवश्यक है।
  • GnRH का अवरोध: प्रोलैक्टिन का उच्च स्तर हाइपोथैलेमस से निकलने वाले GnRH को दबा देता है। इसके परिणामस्वरूप ओवरी से अंडे को विकसित करने वाले और बाहर निकालने वाले हार्मोन्स का स्राव रुक जाता है।
  • लैक्टेशनल एमेनोरिया (Lactational Amenorrhea): अंडे का निर्माण न होने के कारण मासिक धर्म रुक जाता है। इसे लैक्टेशनल एमेनोरिया कहा जाता है।
  • असंतुलन की स्थिति: जब शिशु ठोस आहार खाना शुरू करता है और स्तनपान कम हो जाता है, तो प्रोलैक्टिन का स्तर गिरना चाहिए और पीरियड्स नियमित होने चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो इसका अर्थ है कि शरीर का एंडोक्राइन सिस्टम सामान्य स्थिति में वापस नहीं लौट पा रहा है।

इस असंतुलन के शारीरिक प्रभाव

जब शरीर लंबे समय तक प्राकृतिक हार्मोनल चक्र में वापस नहीं लौटता, तो इसके कुछ स्पष्ट प्रभाव दिखाई देते हैं:

  • थकान और कमज़ोरी: एस्ट्रोजन का स्तर कम रहने और शरीर के लगातार दूध बनाने की प्रक्रिया में लगे रहने से हड्डियों का घनत्व प्रभावित हो सकता है और अत्यधिक थकान महसूस होती है।
  • मूड स्विंग्स: हार्मोनल उतार-चढ़ाव, विशेषकर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन की कमी, प्रसवोत्तर अवसाद (Postpartum depression) और चिड़चिड़ापन का कारण बन सकती है।
  • इंसुलिन रेजिस्टेंस: कुछ मामलों में, प्रसव के बाद का बढ़ा हुआ वज़न और हार्मोनल तनाव शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा करता है, जो आगे चलकर PCOD या थायरॉयड असंतुलन का कारण बन सकता है।

आयुर्वेद इस स्थिति को कैसे समझता है? (सूतिका काल और रस धातु)

आयुर्वेद में प्रसव के बाद की अवधि को सूतिका काल कहा जाता है। इस दौरान महिला के शरीर में विशेष शारीरिक और संरचनात्मक परिवर्तन होते हैं।

  • रस धातु का विभाजन: आयुर्वेद के अनुसार, हमारे द्वारा खाए गए भोजन से सबसे पहले रस धातु का निर्माण होता है। महिलाओं में स्तन्य (Breast milk) और आर्तव (Menstrual blood) दोनों ही इस रस धातु के उपधातु (By-products) हैं।
  • स्तन्य (दूध) का निर्माण: जब महिला स्तनपान कराती है, तो शरीर का अधिकांश रस धातु दूध (स्तन्य) बनाने में उपयोग हो जाता है। इसलिए आर्तव (मासिक धर्म) के निर्माण के लिए पर्याप्त पोषण नहीं बचता। यही कारण है कि आयुर्वेद में स्तनपान के दौरान पीरियड्स रुकने को पूरी तरह प्राकृतिक माना गया है।
  • वात प्रकोप: प्रसव की शारीरिक प्रक्रिया, रक्तस्राव और रातों की नींद खराब होने के कारण शरीर में वात दोष अत्यधिक बढ़ जाता है। बढ़ा हुआ वात शरीर में रूखापन लाता है और हार्मोन्स के सामान्य प्रवाह को बाधित करता है, जिससे बाद में भी पीरियड्स अनियमित रहते हैं।

हार्मोन के लिए औषधियाँ

  • शतावरी: यह एक बेहतरीन गैलेक्टागोग है जो स्तन के दूध की गुणवत्ता और मात्रा बढ़ाता है। साथ ही, यह महिला हार्मोन्स को संतुलित कर प्रजनन तंत्र को शक्ति प्रदान करता है।
  • अशोका और लोध्र: ये दोनों जड़ी-बूटियाँ गर्भाशय को प्राकृतिक रूप से टोन करती हैं और रुके हुए या अनियमित मासिक धर्म को सामान्य करने में मदद करती हैं।
  • दशमूल: यह 10 जड़ी-बूटियों का मिश्रण है जो प्रसव के बाद वात दोष को शांत करने और पेल्विक हिस्से की मांसपेशियों को आराम देने के लिए सबसे प्रभावी है।

प्रसवोत्तर/Postpartum रिकवरी और हार्मोनल संतुलन डाइट टेबल

स्तनपान और डिलीवरी के बाद शरीर में रस धातु (पोषण) की कमी और वात दोष का भारी प्रकोप होता है। इस डाइट का उद्देश्य वात को शांत करना, शरीर को अंदरूनी गर्माहट (नमी) देना और स्तन के दूध (स्तन्य) व मासिक धर्म (आर्तव) दोनों के निर्माण के लिए पोषण प्रदान करना है। 

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - वात शामक और धातु वर्धक) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - वात वर्धक और रूखे)
अनाज (Grains) पुराना चावल, दलिया, ओट्स, मूंग दाल की खिचड़ी, साबूदाना। रूखे और सूखे अनाज, मैदा, बासी रोटियां, चिप्स/बिस्किट।
डेयरी और मेवे (Dairy & Nuts) गर्म दूध, गाय का शुद्ध घी (अति आवश्यक), भीगे हुए बादाम, अखरोट, गोंद के लड्डू। फ्रिज का ठंडा दूध, कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम, भारी चीज़।
सब्ज़ियां (Vegetables) लौकी, तरोई, गाजर, पालक (सब्ज़ियां हमेशा अच्छी तरह पकाकर और घी में छौंक कर खाएं)। कच्चा सलाद, कच्ची पत्तागोभी, ब्रोकली, फूलगोभी (ये भयंकर वात और गैस बनाती हैं)।
फल (Fruits) पपीता, सेब (छिलका उतारकर या हल्का पकाकर), केला, अनार। फ्रिज में रखे बहुत ठंडे फल, अत्यधिक खट्टे फल (जो शिशु को नुकसान दे सकते हैं)।
मसाले (Spices) अजवाइन, जीरा, सौंफ, सोंठ, मेथी (ये दूध भी बढ़ाते हैं और वात को तुरंत शांत करते हैं)। बहुत तीखी लाल मिर्च, भारी गरम मसाले, सिरका (Vinegar)।
पेय पदार्थ (Beverages) हल्का गुनगुना पानी, अजवाइन-जीरे का पानी, गर्म सूप। कैफीन (चाय/कॉफी की अधिकता), बर्फ का ठंडा पानी।

पंचकर्म थेरेपी: प्रसवोत्तर रिकवरी

पंचकर्म थेरेपी शरीर को उसके प्राकृतिक संतुलन में वापस लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

  • अभ्यंग: औषधीय तेलों (जैसे बाला तेल या क्षीरबला तेल) से पूरे शरीर की मालिश वात को शांत करती है, नसों को पोषण देती है और शारीरिक थकान को दूर करती है।
  • बस्ती: अपान वात (जो मासिक धर्म और प्रजनन अंगों को नियंत्रित करता है) को संतुलित करने के लिए बस्ती (एनिमा थेरेपी) अत्यंत लाभकारी है।
  • नस्य: हार्मोनल संतुलन के लिए पिट्यूटरी ग्रंथि को उत्तेजित करने के लिए नाक के माध्यम से औषधीय तेल दिया जाता है, जो प्रसवोत्तर अवसाद और मूड स्विंग्स में भी मदद करता है।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

शरीर के प्राकृतिक एंडोक्राइन सिस्टम को रीसेट होने में एक निश्चित समय लगता है।

  • शुरुआती 1-2 महीने: पाचन सुधरेगा, शरीर की थकान और कमज़ोरी कम होगी। वात शांत होने से नींद में सुधार आएगा।
  • 3 से 4 महीने तक: रस धातु का निर्माण सही होने से ओव्यूलेशन की प्रक्रिया शुरू होगी।
  • 6 महीने के भीतर: हार्मोनल स्तर सामान्य होगा और मासिक चक्र (Menstrual cycle) प्राकृतिक रूप से नियमित होना शुरू हो जाएगा।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेद
इलाज का मुख्य लक्ष्य लक्षणों के आधार पर हार्मोनल गोलियाँ (जैसे प्रोजेस्टेरोन पिल्स) देकर ब्लीडिंग प्रेरित करना। रस धातु' को पोषण देकर और 'वात' को शांत करके प्राकृतिक चक्र को बहाल करना।
शरीर को देखने का नज़रिया इसे केवल प्रोलैक्टिन और एस्ट्रोजन के असंतुलन के रूप में देखता है। स्तन्य (दूध) और आर्तव (पीरियड्स) को एक ही 'रस धातु' का हिस्सा मानकर समग्र पोषण पर ध्यान देता है।
डाइट और जीवनशैली की भूमिका आहार पर सीमित ध्यान। प्रसवोत्तर वात-शामक आहार (जैसे घी, गोंद, मेवे) को उपचार का आधार मानता है।
लंबा असर दवा बंद करने पर अनियमितता वापस आ सकती है। शरीर को अंदरूनी पोषण मिलने से स्थायी और प्राकृतिक हार्मोनल संतुलन प्राप्त होता है।

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए?

स्तनपान के दौरान पीरियड्स का रुकना सामान्य है, लेकिन निम्नलिखित स्थितियों में चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है:

  • यदि स्तनपान पूरी तरह बंद करने के 3 से 4 महीने बाद भी पीरियड्स न आएं।
  • यदि पीरियड्स शुरू हो गए हों, लेकिन ब्लीडिंग अत्यधिक हो और 7-10 दिनों से ज़्यादा चले।
  • यदि पेल्विक हिस्से में लगातार और तेज़ दर्द बना रहे।
  • यदि आपको अत्यधिक बाल झड़ने, अचानक वज़न बढ़ने या भयंकर मानसिक अवसाद (Severe Postpartum Depression) का अनुभव हो।

निष्कर्ष

प्रसव और स्तनपान के दौरान मासिक धर्म का रुकना शरीर का एक प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र है। प्रोलैक्टिन हार्मोन का उच्च स्तर यह सुनिश्चित करता है कि शिशु को पर्याप्त पोषण मिले और माँ का शरीर तुरंत दूसरे गर्भधारण के दबाव से बचा रहे। आयुर्वेद इस प्रक्रिया को रस धातु के विभाजन के रूप में बड़ी ही स्पष्टता से समझाता है। हालांकि, जब शरीर का यह प्राकृतिक चरण पूरा हो जाए और स्तनपान कम होने पर भी मासिक चक्र वापस न लौटे, तो यह शरीर में वात दोष की अधिकता और पोषण की कमी का संकेत है। इस स्थिति में हार्मोनल पिल्स लेकर शरीर को कृत्रिम रूप से प्रेरित करने के बजाय, आयुर्वेद के माध्यम से धातुओं को पोषण देना अधिक तार्किक और सुरक्षित है। शतावरी और दशमूल जैसी औषधियों तथा सही आहार के माध्यम से आप अपने शरीर के प्राकृतिक हार्मोनल संतुलन को पुनः प्राप्त कर सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप स्तनपान करा रही हैं या नहीं। जो महिलाएं स्तनपान नहीं कराती हैं, उन्हें 6 से 8 सप्ताह में पीरियड्स आ सकते हैं। एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग (Exclusive breastfeeding) कराने वाली महिलाओं को 6 महीने से लेकर 1 साल या उससे अधिक समय तक पीरियड्स नहीं आते।

प्रोलैक्टिन हार्मोन मस्तिष्क से निकलने वाले GnRH हार्मोन को दबा देता है। इसके कारण ओवरी को अंडे विकसित करने (Ovulation) का संकेत नहीं मिलता। जब अंडा नहीं बनता, तो मासिक धर्म (Periods) भी नहीं आता।

हाँ, बिल्कुल। पीरियड आने से 14 दिन पहले ही ओव्यूलेशन (अंडे का निकलना) हो जाता है। यदि आप स्तनपान करा रही हैं और आपको पीरियड्स नहीं आए हैं, तब भी यह संभव है कि आपका पहला ओव्यूलेशन हो जाए और यदि उसी समय संबंध बनें, तो गर्भधारण हो सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार, हमारे भोजन से रस धातु बनती है। महिलाओं में स्तन का दूध (स्तन्य) और मासिक धर्म (आर्तव) दोनों इसी रस धातु से बनते हैं। स्तनपान के दौरान रस धातु दूध बनाने में लग जाती है, इसलिए पीरियड्स के लिए पर्याप्त रस नहीं बचता।

प्रसव (Delivery) के दौरान शरीर में रक्त और तरल पदार्थों की कमी होती है, और अत्यधिक शारीरिक ऊर्जा लगती है। इसके अलावा रात में जागने और थकान से शरीर में प्राकृतिक रूप से वात (हवा और रूखापन) बढ़ जाता है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर का हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी-ओवेरियन (HPO) एक्सिस अभी भी पूरी तरह से रिसेट नहीं हुआ होता है। साथ ही, पोषण की कमी, तनाव या थायरॉयड की समस्या भी इसका कारण हो सकती है।

यदि आप स्तनपान करा रही हैं, तो एस्ट्रोजन युक्त OCP सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि वे दूध की मात्रा को कम कर सकती हैं। इसके बजाय, आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के माध्यम से प्राकृतिक संतुलन लाना अधिक सुरक्षित है।

शतावरी एक रसायन है जो दूध की मात्रा और गुणवत्ता बढ़ाता है (Galactagogue)। साथ ही, यह महिला प्रजनन अंगों को शक्ति देता है और हार्मोन्स को संतुलित करने में मदद करता है।

बस्ती (एनिमा थेरेपी) सीधे अपान वात पर कार्य करती है, जो पेल्विक क्षेत्र और प्रजनन अंगों को नियंत्रित करता है। यह प्रसव के बाद बढ़े हुए वात को शांत करती है और प्रजनन तंत्र को सामान्य स्थिति में लाती है।

वात को शांत करने के लिए आहार स्निग्ध (चिकनाई युक्त), गर्म और सुपाच्य होना चाहिए। गाय का घी, दूध, बादाम, अजवाइन, सौंठ और गोंद के लड्डू शरीर को अंदरूनी शक्ति और पोषण देने के लिए बहुत उपयोगी माने जाते हैं।

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