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PCOD में Period आता है, Pregnancy क्यों नहीं?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 01 May, 2026
  • category-iconUpdated on 01 May, 2026
  • category-iconWomen's Health
  • blog-view-icon5006

महिलाओं में यह भ्रांति बहुत आम है कि यदि मासिक धर्म आ रहा है, तो गर्भधारण आसानी से हो जाना चाहिए। PCOD या PCOS के मामलों में, कई महिलाओं को दवाइयों की मदद से या अनियमित रूप से पीरियड्स आते हैं, फिर भी उन्हें कंसीव करने में कठिनाई होती है। यह स्थिति अक्सर मानसिक तनाव का कारण बनती है।

चिकित्सीय दृष्टिकोण से, केवल रक्तस्राव होने का अर्थ यह नहीं है कि शरीर गर्भधारण के लिए तैयार है। गर्भधारण के लिए 'मासिक धर्म' से अधिक महत्वपूर्ण 'ओव्यूलेशन' (Ovulation - अंडे का निकलना) का होना है।

मासिक धर्म (Period) और ओव्यूलेशन (Ovulation) के बीच का अंतर

इस समस्या को समझने के लिए पीरियड और ओव्यूलेशन के बीच के अंतर को समझना आवश्यक है:

  • ओव्यूलेशन (अंडे का निकलना): एक सामान्य मासिक चक्र के बीच में , ओवरी (अंडाशय) से एक परिपक्व अंडा निकलता है। यदि यह अंडा स्पर्म (शुक्राणु) के संपर्क में आता है, तो फर्टिलाइजेशन (Fertilization) होता है और महिला गर्भधारण करती है।
  • मासिक धर्म (Period): यदि अंडा फर्टिलाइज़ नहीं होता है, तो गर्भाशय अपनी अंदरूनी परत को कुछ दिनों बाद शरीर से बाहर निकाल देता है। इसे ही मासिक धर्म या पीरियड कहते हैं।

PCOD में Period आता है, लेकिन Pregnancy क्यों नहीं?

PCOD में हार्मोनल असंतुलन के कारण ओव्यूलेशन की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। इसे 'एनोव्यूलेटरी साइकिल' (Anovulatory Cycle) कहा जाता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • अंडे का परिपक्व न होना: PCOD में ओवरी के अंदर कई फॉलिकल्स (छोटे पानी के बुलबुले) बनते हैं, जिनमें अंडे होते हैं। लेकिन हार्मोनल असंतुलन के कारण कोई भी अंडा पूरी तरह से परिपक्व (Mature) नहीं हो पाता और ओवरी से बाहर नहीं आ पाता।
  • बिना अंडे के ब्लीडिंग: जब अंडा बाहर नहीं आता, तब भी एस्ट्रोजन हार्मोन के प्रभाव में गर्भाशय की परत मोटी होती रहती है। एक समय के बाद यह परत अपने आप टूटकर गिरने लगती है, जिसे महिलाएँ पीरियड समझ लेती हैं। यह ब्लीडिंग है, लेकिन क्योंकि इसमें अंडा (Egg) नहीं है, इसलिए प्रेग्नेंसी संभव नहीं है।
  • एंड्रोजन (Androgen) की अधिकता: PCOD में शरीर में पुरुष हार्मोन (Androgen/Testosterone) का स्तर बढ़ जाता है, जो ओव्यूलेशन को सीधे तौर पर रोकता है।
  • इंसुलिन रेजिस्टेंस: शरीर में इंसुलिन का सही से काम न करना ओवरी के कार्य को प्रभावित करता है, जिससे अंडों की गुणवत्ता और ओव्यूलेशन दोनों बाधित होते हैं।

आयुर्वेद इस स्थिति को कैसे समझता है? 

आयुर्वेद में PCOD और ओव्यूलेशन न होने की स्थिति को 'आर्तव दृष्टि' (Artava Dushti) और 'ग्रंथि' (Cysts) के निर्माण के रूप में देखा जाता है।

  • कफ और वात दोष का असंतुलन: जब शरीर में 'कफ दोष' बढ़ता है, तो वह 'वात' के मार्ग को अवरुद्ध कर देता है। ओवरी से अंडे को बाहर धकेलने का कार्य 'अपान वात' का है। कफ के भारीपन के कारण वात अपना काम नहीं कर पाता और अंडा ओवरी में ही फँसकर सिस्ट (ग्रंथि) बन जाता है।
  • आम का निर्माण: कमज़ोर पाचन (अग्निमांद्य) के कारण शरीर में 'आम' बनता है। यह आम प्रजनन अंगों में जाकर रुकावट पैदा करता है, जिससे ओवरी तक सही पोषण नहीं पहुँच पाता।
  • रस और आर्तव धातु की कमज़ोरी: आयुर्वेद के अनुसार, भोजन से रस धातु बनती है और रस से ही 'आर्तव' (मासिक धर्म और अंडा) का निर्माण होता है। मेटाबॉलिज़्म सुस्त होने से स्वस्थ अंडे का निर्माण नहीं हो पाता।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण

हमारा उद्देश्य केवल पीरियड्स लाने वाली कृत्रिम दवाइयाँ देना नहीं है। हमारा मुख्य लक्ष्य ओवरी के प्राकृतिक कार्य (ओव्यूलेशन) को पुनर्स्थापित करना है।

  • अग्नि दीपन और स्रोतोशोधन: सबसे पहले प्राकृतिक औषधियों से पाचन अग्नि को ठीक किया जाता है ताकि शरीर में जमा 'आम' साफ हो और प्रजनन चैनलों की रुकावट दूर हो सके।
  • ग्रंथि भेदन (Cyst Resolution): ओवरी में बने छोटे-छोटे सिस्ट्स को घोलने और कफ दोष को कम करने के लिए विशेष चिकित्सा दी जाती है।
  • अपान वात का अनुलोमन: वात की दिशा को सही किया जाता है ताकि ओवरी से परिपक्व अंडा समय पर प्राकृतिक रूप से बाहर आ सके।

हार्मोनल संतुलन और ओव्यूलेशन के लिए आयुर्वेदिक औषधियाँ

आयुर्वेद में महिला स्वास्थ्य को संतुलित करने के लिए सुरक्षित और प्रभावी औषधियाँ उपलब्ध हैं:

  • कांचनार गुग्गुलु: यह ओवरी में बनी गांठों (Cysts) को पिघलाने और कफ दोष को संतुलित करने की एक प्रमुख औषधि है।
  • शतावरी: यह एक बेहतरीन रसायन है जो महिला हार्मोन्स (एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन) को संतुलित करता है और स्वस्थ अंडे के निर्माण में सहायक है।
  • अशोका: यह गर्भाशय (Uterus) को शक्ति प्रदान करता है और एंडोमेट्रियम की परत को स्वस्थ बनाता है ताकि फर्टिलाइज़्ड अंडा सही से स्थापित हो सके।
  • कुमारी: यह रुकी हुई माहवारी को नियमित करने और ओव्यूलेशन को प्रेरित करने में अत्यंत लाभकारी है।

PCOD और ओव्यूलेशन के लिए आयुर्वेदिक डाइट

PCOD में अंडे का न बनना (Anovulation) मुख्य रूप से इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance) और शरीर में 'कफ दोष' के बढ़ने का परिणाम है। इस डाइट का उद्देश्य कफ को कम करना, मेटाबॉलिज़्म को तेज़ करना और हार्मोनल संतुलन वापस लाना है।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - कफ शामक और लो-GI) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - कफ वर्धक और हाई-GI)
अनाज (Grains) जौ (PCOD के लिए सबसे बेहतरीन), ज्वार, बाजरा, रागी, ओट्स। मैदा, सफेद चावल, वाइट ब्रेड, पास्ता, नूडल्स।
सब्ज़ियां (Vegetables) लौकी, करेला, पालक, मेथी, ब्रोकली, बीन्स, सहजन (Moringa)। ज़्यादा स्टार्च वाली सब्ज़ियां जैसे आलू, अरबी, शकरकंद (सीमित मात्रा में लें)।
दालें और बीज (Pulses & Seeds) मूंग दाल, मसूर दाल, कद्दू के बीज (Pumpkin seeds), अलसी (Flaxseeds)। भारी और पचने में मुश्किल दालें जैसे उड़द, राजमा, छोले (रात में बिल्कुल न खाएं)।
डेयरी और वसा (Dairy & Fats) गाय का शुद्ध घी (सीमित मात्रा में), ताज़ा मट्ठा (छाछ)। कमर्शियल पैकेटबंद दूध, भारी पनीर, चीज़, रिफाइंड तेल, जंक फूड।
फल (Fruits) सेब, पपीता, नाशपाती, जामुन, अमरूद (फाइबर युक्त फल)। अत्यधिक मीठे फल (आम, चीकू), पैकेटबंद फ्रूट जूस (शुगर स्पाइक करते हैं)।

पंचकर्म थेरेपी: प्रजनन तंत्र की डीप क्लींजिंग

PCOD के पुराने मामलों में जहाँ केवल औषधियाँ पर्याप्त नहीं होतीं, पंचकर्म थेरेपी सीधे प्रजनन अंगों पर कार्य करती है।

  • उत्तर बस्ती: महिला बांझपन (Infertility) और PCOD के लिए यह सबसे प्रभावी चिकित्सा है। इसमें विशेष औषधीय तेल या घी को सीधे गर्भाशय मार्ग में प्रविष्ट कराया जाता है, जो ओवरी और फेलोपियन ट्यूब्स की रुकावटों को साफ करता है।
  • विरेचन: शरीर से अतिरिक्त पित्त और टॉक्सिन्स को बाहर निकालकर लिवर के कार्य को सुधारा जाता है, जो हार्मोनल संतुलन के लिए आवश्यक है।
  • बस्ती: अपान वात को संतुलित करने के लिए औषधीय एनिमा दिया जाता है, जो ओव्यूलेशन की प्रक्रिया को नियमित करता है।

जीवा आयुर्वेद में हम मरीज़ों की जाँच कैसे करते हैं?

हम केवल अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देखकर चिकित्सा शुरू नहीं करते; हम शरीर के मूल असंतुलन का मूल्याँकन करते हैं।

  • नाड़ी परीक्षा: पल्स के माध्यम से शरीर में वात, पित्त और कफ के स्तर तथा प्रजनन अंगों में मौजूद ब्लॉकेज का पता लगाया जाता है।
  • शारीरिक मूल्याँकन: वज़न में वृद्धि, चेहरे पर अनचाहे बाल (Hirsutism) और इंसुलिन रेजिस्टेंस के लक्षणों का सीधा विश्लेषण किया जाता है।
  • मासिक चक्र का विश्लेषण: आपके पीरियड्स की अवधि, रक्तस्राव की मात्रा और दर्द की स्थिति का तथ्यात्मक अध्ययन किया जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

हम आपको एक व्यवस्थित और तार्किक चिकित्सा योजना प्रदान करते हैं।

  • जीवा से संपर्क करें: सीधे हमारे नंबर 0129 4264323 पर कॉल करें।
  • अपॉइंटमेंट फिक्स करें: आप हमारे 80 से भी ज़्यादा क्लिनिक में आकर डॉक्टर से व्यक्तिगत रूप से मिल सकते हैं।
  • ऑनलाइन वीडियो कंसल्टेशन: सुविधानुसार आप घर बैठे वीडियो कॉल के माध्यम से भी डॉक्टर से परामर्श कर सकते हैं।
  • व्यक्तिगत प्लान: आपकी प्रकृति और सिस्ट्स के आकार के आधार पर कस्टमाइज़्ड औषधियाँ और आहार योजना तैयार की जाती है।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

ओवरी के प्राकृतिक कार्य को बहाल करने में एक निश्चित और अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती 1-2 महीने: पाचन सुधरेगा, वज़न में कमी आनी शुरू होगी और शरीर का भारीपन कम होगा।
  • 3 से 4 महीने तक: ओवरी के सिस्ट्स का आकार कम होने लगेगा। मासिक चक्र का अंतराल प्राकृतिक रूप से नियमित होना शुरू होगा।
  • 6 महीने और उससे अधिक: हार्मोनल स्तर सामान्य होगा, ओव्यूलेशन की प्रक्रिया शुरू होगी और गर्भधारण की संभावनाएं स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएंगी।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय जरूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएं शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

  • प्रामाणिक पंचकर्म चिकित्सा
  • सात्विक भोजन
  • आधुनिक उपचार सेवाएं
  • आरामदायक आवास
  • जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने वाली कई अन्य सुविधाएं

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताजा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

मरीज़ों के अनुभव

“मैं पीसीओडी से पीड़ित थी, जिसके लक्षणों में चेहरे पर अनचाहे बाल आना, अनियमित मासिक धर्म और वजन बढ़ना शामिल थे। मैंने एलोपैथिक और होम्योपैथिक डॉक्टरों से परामर्श लिया और हिर्सुटिज़्म के लिए लेज़र थेरेपी भी करवाई, लेकिन सब व्यर्थ रहा। मैंने यूट्यूब पर जिवा के कुछ वीडियो देखे और डॉक्टर से परामर्श लिया। उन्होंने धैर्यपूर्वक मेरी समस्या सुनी और पूरे उपचार के दौरान मेरा पूरा सहयोग किया। मैंने अपनी जीवनशैली में भी कुछ बदलाव किए, जिससे मेरी स्वास्थ्य स्थिति में सुधार हुआ। धन्यवाद जिवा आयुर्वेद!”

डॉ. खुशबू गुप्ता

फरीदाबाद

मरीज़ जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

हम केवल कृत्रिम रूप से पीरियड्स लाने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, बल्कि प्रजनन तंत्र की कार्यप्रणाली को सुधारते हैं।

  • जड़ से इलाज: हम ओव्यूलेशन की प्रक्रिया में बाधा डालने वाले मूल कारणों (इंसुलिन रेजिस्टेंस, कफ दोष) को दूर करते हैं।
  • विशेषज्ञ डॉक्टर: हमारे चिकित्सकों के पास स्त्री रोग (Gynecology) और PCOD प्रबंधन का व्यापक अनुभव है।
  • कस्टमाइज्ड केयर: हर महिला के हार्मोनल असंतुलन का स्तर अलग होता है, इसलिए हमारा उपचार पूर्णतः व्यक्तिगत होता है।
  • प्राकृतिक और सुरक्षित: आयुर्वेदिक औषधियाँ शरीर के एंडोक्राइन सिस्टम को बिना किसी दुष्प्रभाव के संतुलित करती हैं।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेद
इलाज का मुख्य लक्ष्य ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स (OCP) से पीरियड्स लाना और ओव्यूलेशन के लिए हार्मोनल इंजेक्शन देना। कफ और वात दोष को संतुलित कर ओवरी को प्राकृतिक रूप से स्वस्थ अंडे बनाने के लिए सक्षम करना।
शरीर को देखने का नज़रिया मुख्य रूप से केवल ओवरी और हार्मोन्स के स्तर पर केंद्रित। संपूर्ण मेटाबॉलिज़्म (अग्नि) और प्रजनन अंगों के आपसी संबंध पर केंद्रित।
डाइट और जीवनशैली की भूमिका वज़न कम करने की सामान्य सलाह। कफ-शामक आहार और विशेष जीवनशैली (जैसे दिन में न सोना) को अनिवार्य माना जाता है।
लंबा असर दवाएं बंद करने पर समस्या अक्सर वापस आ जाती है। मेटाबॉलिज़्म और दोषों के संतुलित होने से समस्या का स्थायी समाधान होता है।

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए?

यदि आप PCOD से पीड़ित हैं, तो निम्नलिखित लक्षणों के दिखने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें:

  • यदि आपको एक महीने में कई बार भारी रक्तस्राव (Heavy Bleeding) हो रहा हो।
  • यदि पेल्विक क्षेत्र (Pelvic area) में अचानक और बहुत तेज़ दर्द उठे (यह ओवेरियन सिस्ट के फटने या मुड़ने का संकेत हो सकता है)।
  • यदि आपको लगातार 3-4 महीने तक बिल्कुल भी पीरियड्स न आएं।
  • यदि शरीर के अन्य हिस्सों (चेहरे, छाती) पर बहुत तेज़ी से अनचाहे बाल आने लगें और आवाज़ में भारीपन महसूस हो।

निष्कर्ष

PCOD में केवल पीरियड्स का आना इस बात की पुष्टि नहीं करता कि आपका प्रजनन तंत्र पूरी तरह से स्वस्थ है। गर्भधारण के लिए ओव्यूलेशन (अंडे का निकलना) अनिवार्य है। जब हार्मोनल असंतुलन के कारण अंडा ओवरी से बाहर नहीं आ पाता, तो महिला 'एनोव्यूलेटरी साइकिल' का अनुभव करती है, जहाँ ब्लीडिंग तो होती है लेकिन प्रेग्नेंसी संभव नहीं होती। केवल कृत्रिम हार्मोनल पिल्स खाकर पीरियड्स लाना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। आयुर्वेद इस समस्या को जड़ से समझता है और शरीर के मेटाबॉलिज़्म, 'अग्नि' और दोषों को संतुलित करके ओवरी को पुनः प्राकृतिक रूप से कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। कांचनार गुग्गुलु, शतावरी जैसी जड़ी-बूटियों और 'उत्तर बस्ती' जैसी पंचकर्म थेरेपी की मदद से इस स्थिति को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है। सही आहार, जीवनशैली और जीवा आयुर्वेद के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ PCOD के बावजूद प्राकृतिक गर्भधारण पूर्णतः संभव है।

FAQs

यह एक ऐसा मासिक चक्र है जिसमें महिला को ब्लीडिंग (पीरियड) तो होती है, लेकिन उसकी ओवरी से अंडा (Egg) बाहर नहीं निकलता। अंडे के बिना गर्भधारण (Pregnancy) संभव नहीं है। PCOD में यह एक सामान्य स्थिति है।

ओव्यूलेशन न होने के कुछ संकेत हैं—लगातार अनियमित पीरियड्स आना, बेसल बॉडी टेम्परेचर (BBT) में कोई बदलाव न होना, और सर्वाइकल म्यूकस (Cervical mucus) में बदलाव का अभाव। सटीक जानकारी के लिए डॉक्टर फॉलिक्युलर मॉनिटरिंग (अल्ट्रासाउंड) की सलाह देते हैं।

PCOD में पुरुष हार्मोन (Androgens) का स्तर बढ़ जाता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस उत्पन्न होता है। इसके कारण ओवरी में फॉलिकल्स विकसित तो होते हैं, लेकिन वे अंडे को परिपक्व करके बाहर निकालने में विफल रहते हैं।

यह एक मिथक है। PCOD का अर्थ बांझपन (Infertility) नहीं है। उचित जीवनशैली, वज़न प्रबंधन और आयुर्वेदिक चिकित्सा द्वारा ओव्यूलेशन को पुनः शुरू किया जा सकता है, जिससे प्राकृतिक गर्भधारण संभव हो जाता है।

आयुर्वेद में सिस्ट्स को कफ और वात के असंतुलन से बना हुआ माना जाता है। इसे घोलने (Cyst resolution) के लिए कांचनार गुग्गुलु और वरुणादी कषाय जैसी कफ-शामक और भेदन (भेदन करने वाली) औषधियों का प्रयोग किया जाता है।

नहीं। ओसीपी (OCP) केवल कृत्रिम रूप से आपके मासिक चक्र को नियंत्रित करती हैं। जैसे ही आप इन गोलियों को लेना बंद करती हैं, हार्मोनल असंतुलन और अनियमित पीरियड्स की समस्या अक्सर वापस आ जाती है।

शरीर में अतिरिक्त वज़न (विशेषकर पेट की चर्बी) इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाता है, जो PCOD के लक्षणों को और गंभीर करता है। केवल 5-10% वज़न कम करने से ओव्यूलेशन की प्रक्रिया में उल्लेखनीय सुधार देखा जा सकता है।

उत्तर बस्ती में औषधीय तेल या घी को योनि मार्ग से सीधे गर्भाशय में पहुँचाया जाता है। यह प्रक्रिया प्रजनन अंगों की रुकावटों को साफ करती है, एंडोमेट्रियम को मजबूत बनाती है और ओवरी के कार्य को सुचारू करती है।

आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों के अनुसार, वाणिज्यिक डेयरी उत्पादों में मौजूद अतिरिक्त हार्मोन्स PCOD के लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। आयुर्वेद में केवल शुद्ध और असंसाधित गाय के दूध या घी का सीमित मात्रा में उपयोग करने की सलाह दी जाती है।

अपने आहार में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (Low GI) वाले खाद्य पदार्थ, फाइबर युक्त सब्जियाँ, बीज (जैसे कद्दू और अलसी के बीज), और दालचीनी शामिल करें। मैदे, रिफाइंड चीनी और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से पूर्णतः बचें।

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