क्या आपके साथ ऐसा कभी हुआ है कि पूरे दिन की भागदौड़ और थकान के बाद आप रात में अपने बिस्तर पर लेटते हैं आराम करने के लिए और नींद आने का नाम ही नहीं लेती। इसकी वजह सिर्फ चाय या कॉफी ही नहीं होती, अन्य कारणों की वजह से भी यह समस्या हो सकती है। जैसे, स्क्रीन पर काम करना भी इसका एक कारण हो सकता है।
रात में मोबाइल या लैपटॉप पर काम करने से उसमे से निकलने वाली रोशनी हमारी नींद को और दिमाग को प्रभावित कर सकती है , रात में काम करने से हमारा दिमाग ये समझ ही नहीं पता की अब काम का समय है या आराम का।
स्क्रीन-ब्राइटनेस और लेट-नाइट वर्क नींद पर क्या प्रभाव डालते हैं?
जब हम देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल करते है, तो उससे हमारी नींद पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे निकलने वाली रोशनी आपकी जैविक घड़ी को बिगाड़ देती है जिससे बिस्तर पर लेटने के बाद भी नींद नहीं आती है और नींद आने में काफी समय लगता है।
जानिए ऐसा क्यों होता है:
- जब रात के अँधेरे में हम स्क्रीन पर काम करते है तो उससे निकलने वाली नीली रोशनी हमारी दिमाग को भ्रमित कर देती है की अभी दिन ही का समय है, जिससे मेलाटोनिन नामक हॉर्मोन कम हो जाता हैं, यह हमारी शरीर को सोने का संकेत देता हैं।
- लगातार देर रात तक काम करने से स्लीप-वेक चक्र बिगड़ जाता है, जिससे नींद देरी से आती है। फलस्वरूप अगले दिन उठने में भारी परेशानी महसूस हो सकती है।
- देर रात तक काम करने से दिमाग लंबे समय तक अलर्ट रहता है जो नींद में बाधा डालता है और तनाव को बढ़ता हैं
क्या स्क्रीन-ब्राइटनेस मायने रखती हैं?
हां, स्क्रीन ब्राइटनेस मायने रखती है, हमारी शरीर में स्लीप-वेक चक्र होता है जो हमारी सोने और जागने की क्रिया का संचालन करता है। दिन में मिलने वाली रोशनी से हमारा शरीर सक्रिय रहके काम करता है पर जब रात में यह रोशनी नहीं मिलती तो वो हमारी शरीर को धीरे-धीरे नींद की स्थिति में ले जाती है। किन्तु, स्क्रीन पर काम करने की वजह से उससे निकलने वाली नीली रोशनी हमारी दिमाग को भ्रमित करती है जिससे हमारे दिमाग को लगता है की अभी दिन ही है और वो मेलाटोनिन नामक हॉर्मोन के उत्पादन को रोक देता है, यह हॉर्मोन हमारे शरीर को सोने का संकेत देता है, इस हॉर्मोन के उत्पादन न होने के वजह से हमे रात में सोने में बाधा आती है।
देर रात काम करने से दिमाग क्यों सक्रिय रहता है?
मान लीजिये आप रात 10.30 बजे लैपटॉप खोलकर बैठते है, अपना काम करते है, मैसेज का जवाब देते है, ईमेल का जवाब देते है या मीटिंग-अटेंड करते है और अपना सारा काम खत्म करने के बाद, आप थक कर अपने बिस्तर पर सोने जाते हैं लेकिन आपको नींद नहीं आती है। जानते हैं ऐसा क्यों? क्योंकि आपका शरीर बेशक थक गया है पर आपका दिमाग अब भी सक्रिय है, आपके दिमाग में अब भी दफ्तर की गतिविधियां चल रही होती है। यही कारण है कि आपको सोने के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सोने के लिए शांत वातावरण की आवश्यकता होती है, और जब तक आपका शरीर और दिमाग शांत नहीं होगा आपको नींद नहीं आएगी किसी कारणवश आपको नींद आ भी जाती है, पर जब आप उठेंगे तो आप थकान और भारीपन महसूस करेंगे।
नींद के लिए क्या बदलाव किए जा सकते हैं ?
यदि आपका काम देर रात में ही खत्म होता है, तो अपनी दिनचर्या में सामान्य बदलाव करके आप अपनी नींद को संतुलित रख सकते हैं।
- स्क्रीन की ब्राइटनेस को एडजस्ट करे और हो सके तो वार्म डिस्प्ले का प्रयोग करे ये आपके मस्तिष्क पर कम प्रभाव डालेगा।
- काम की लिमिट सेट करें और निर्धारित समय पर अपना काम खत्म करें।
- अनावश्यक स्क्रॉलिंग न करें। यदि काम खत्म हो जाता है, तो दिमाग को शांत रखने के लिए स्क्रीन को अवॉइड करें।
- बिस्तर पर बैठकर काम न करें, कोशिश करें कि काम करने की जगह और सोने की जगह में अंतर हो।
- सोते वक़्त वातावरण शांत रखे किताब पढ़े, स्ट्रेचिंग आदि का प्रयास करे।
ऐसा करने से मस्तिष्क शांत होता है और जल्दी नींद आने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
आयुर्वेद में दिन और रात को एक लय में रख कर, संतुलित दिनचर्या रखने के लिए ज़ोर दिया जाता है। रात का समय शांति और आराम का होता है उस समय देर तक काम करने से शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे नींद न आने जैसी समस्या हो सकती है। आयुर्वेद के अनुसार देर रात तक तेज़ स्क्रीन ब्राइटनेस और काम करने की आदत हमारी शरीर के वात और पित्त दोष को असंतुलित करते है। रात का समय पित्त दोष का माना जाता है, उस समय हमारा शरीर खुद को डिटॉक्स और रिपेयर करता हैं। जब हम तेज़ रोशनी में देर रात तक काम करते है तो ये प्रक्रिया बाधित हो जाती है। स्लीप रेडीनेस को बढ़ाने के लिए, काम को सोने से 30-60 मिनट पहले खत्म कर ले, आँखों को आराम दे और प्राणायाम आदि का प्रयास करे।
निष्कर्ष
रात में नींद न आने की समस्या केवल स्क्रीन टाइम या चाय या कॉफ़ी की वजह से ही नहीं होती बल्कि स्क्रीन ब्राइटनेस या देर रात तक काम करने की वजह से भी हो सकती है। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी हमे यह एहसास दिलाती है की अभी भी दिन ही है जिससे हमारा मस्तिष्क सतर्क रहता है और हम सो नहीं पाते है। आयुर्वेद के अनुसार भी ऐसा करने से वात और पित्त दोष भी असंतुलित हो जाते है। आपकी दिनचर्या में कुछ बदलाव करने से स्लीप रेडीनेस ठीक की जा सकती है। जैसे सोने से थोड़ी देर पहले काम खत्म कर लेना, आँखों को आराम देना और प्राणायाम आदि से असंतुलित दोषो को संतुलित किया जा सकता है।













