Diseases Search
Close Button
 
 

थायरॉइड की दवा सालों से ले रहे हैं? बंद करते ही TSH क्यों बढ़ जाता है – आयुर्वेदिक जड़ कारण

Information By Dr. Keshav Chauhan

क्या आपके साथ भी रोज़ सुबह ऐसा ही होता है कि बिस्तर से उठते ही सबसे पहले एक छोटी सी सफेद गोली (Thyroxine) खानी पड़ती है? सालों से आप खाली पेट थायराइड की यह दवा ले रहे हैं। अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि क्या जीवन भर यह दवा खानी पड़ेगी? कई बार आप सोचते हैं कि चलो कुछ दिन दवा बंद करके देखते हैं कि शरीर कैसा महसूस करता है। लेकिन जैसे ही आप कुछ हफ्तों के लिए गोली लेना छोड़ते हैं और दोबारा अपना ब्लड टेस्ट करवाते हैं, तो TSH (Thyroid Stimulating Hormone) का स्तर अचानक बहुत तेज़ी से बढ़ जाता है। इसके बाद डॉक्टर फिर से आपकी दवा की डोज़ बढ़ा देते हैं (जैसे 50mcg से 75mcg या 100mcg) और आप उसी मेडिकल चक्र में वापस फंस

दवा बंद करते ही TSH का बढ़ जाना क्या है?

थायराइड की गोली सालों तक खाने से आपकी थायराइड ग्रंथि 'आलसी' हो जाती है और खुद हॉर्मोन बनाना बंद कर देती है। जैसे ही आप अचानक दवा छोड़ते हैं, शरीर में हॉर्मोन का स्तर तेज़ी से गिरता है। दिमाग की मास्टर ग्रंथि (पिट्यूटरी) घबराकर सोई हुई थायराइड ग्रंथि को जगाने के लिए भारी मात्रा में TSH छोड़ती है। इसी वजह से ब्लड रिपोर्ट में TSH बढ़ा हुआ आता है।

आयुर्वेद के अनुसार, गोली केवल हॉर्मोन की भरपाई करती है, बीमारी की जड़ (कफ-वात की रुकावट और कमज़ोर अग्नि) को ठीक नहीं करती। जैसे ही भरपाई रुकती है, बीमारी तुरंत वापस आ जाती है।

थायराइड विकारों के मुख्य प्रकार

हाइपोथायरायडिज्म: इसमें ग्रंथि पर्याप्त हॉर्मोन नहीं बनाती, मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, और वज़न तेज़ी से बढ़ने लगता है। आयुर्वेद इसे वात-कफ दोष से जोड़ता है।

हाइपरथायरायडिज्म: इसमें ग्रंथि ज़रूरत से ज़्यादा काम करती है, जिससे वज़न गिरता है और घबराहट होती है; यह पित्त-वात का परिणाम है।

हाशिमोटो थायरोडाइटिस: यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जहां शरीर की अपनी इम्युनिटी ही गलती से थायराइड ग्रंथि पर हमला करके उसे नष्ट करने लगती है।

गोइटर (घेंघा): इसमें आयोडीन की कमी या अन्य कारणों से थायराइड ग्रंथि का आकार बहुत बढ़ जाता है, जिससे गले में भारी सूजन आ जाती है।

लक्षण और संकेत

बिना वजह वज़न बढ़ना या कम होना: हाइपोथायरायडिज्म में आप कितना भी कम खाएं, वज़न तेज़ी से बढ़ता है।

अत्यधिक थकान और सुस्ती: रात भर अच्छी नींद लेने के बाद भी सुबह भारी थकान और शरीर में ऊर्जा की कमी बनी रहती है।

बालों का झड़ना और रूखी त्वचा: शरीर में वात बढ़ने के कारण बाल तेज़ी से झड़ने लगते हैं और त्वचा बिल्कुल रूखी हो जाती है।

माहवारी में अनियमितता: महिलाओं में मासिक धर्म की भारी अनियमितता बहुत आम है, जिससे गर्भधारण करने में भी काफी परेशानी होती है।

कब्ज़ और मानसिक तनाव: पाचन कमज़ोर होने से गंभीर कब्ज़ रहता है और मूड स्विंग्स, डिप्रेशन या चिड़चिड़ापन लगातार महसूस होता है।

थायराइड असंतुलन – मुख्य कारण

गलत खानपान: अत्यधिक ठंडी, बासी, जंक फूड और मैदे से बनी चीज़ें खाने से शरीर में विषैले तत्व (आम) बनते हैं।

तनाव और चिंता: अत्यधिक मानसिक तनाव और दबाव सीधे तौर पर वात दोष को भड़काते हैं, जिससे हॉर्मोनल संतुलन बिगड़ता है।

शारीरिक निष्क्रियता: दिन भर बैठे रहना और व्यायाम ना करने से शरीर में कफ बढ़ता है और मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है।

नींद की कमी: देर रात तक जागने और गलत समय पर सोने से शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक टूट जाती है।

जेनेटिक्स: पारिवारिक इतिहास भी खराब लाइफस्टाइल के साथ मिलकर इस बीमारी को ट्रिगर करने में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

थायराइड को नज़रअंदाज़ करने के जोखिम और जटिलताएं:

अगर थायराइड का सही से इलाज न हो या अचानक एलोपैथिक दवा छोड़ दी जाए, तो शरीर में निम्नलिखित गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं:

हृदय रोग: बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, दिल की अनियमित धड़कन और हार्ट फेलियर का खतरा काफी बढ़ जाता है।

मानसिक समस्याएं: गंभीर डिप्रेशन, एंग्जायटी और याददाश्त कमज़ोर (Brain fog) होना।

प्रजनन और गर्भावस्था: महिलाओं में बांझपन (Infertility), अनियमित माहवारी और गर्भपात (Miscarriage) का भारी जोखिम रहता है।

 नसों का नुकसान: लंबे समय तक हॉर्मोन की कमी से हाथ-पैरों की नसों में दर्द व सुन्नपन (Neuropathy) हो सकता है।

 मिक्सडेमा कोमा: यह एक जानलेवा स्थिति है, जिसमें शरीर का तापमान और पल्स बहुत नीचे गिर जाते हैं।

 गले में गोइटर (घेंघा): ग्रंथि के अत्यधिक बढ़ने से सांस लेने और खाना निगलने में दिक्कत होती है।

आधुनिक चिकित्सा में पहचान कैसे होती है?

TSH टेस्ट: यह सबसे अहम जांच है। इसका बढ़ा हुआ स्तर थायराइड के कम काम करने (हाइपो) और घटा हुआ स्तर ज़्यादा काम करने का संकेत देता है।

T3 और T4 टेस्ट: ये रक्त में मौजूद मुख्य थायराइड हॉर्मोन्स की सटीक मात्रा और ग्रंथि की कार्यक्षमता को विस्तार से बताते हैं।

Anti-TPO टेस्ट: अगर डॉक्टर को हाशिमोटो जैसी ऑटोइम्यून बीमारी का शक होता है, तो एंटीबॉडी जांचने के लिए यह विशेष टेस्ट किया जाता है।

अल्ट्रासाउंड: गले में गांठ या भारी सूजन महसूस होने पर ग्रंथि के आकार और अंदरूनी संरचना को देखने के

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

आयुर्वेद में थायराइड की समस्या को केवल हॉर्मोन की कमी नहीं माना जाता। इसका मुख्य कारण शरीर में 'अग्निमांद्य' (कमज़ोर पाचन तंत्र और धीमा मेटाबॉलिज्म) और वात-कफ दोषों का गहरा असंतुलन है। गलत खानपान, खराब जीवनशैली और मानसिक तनाव से शरीर में 'आम' (विषैले तत्व) बनते हैं। ये विषैले तत्व ग्रंथि तक जाने वाली सूक्ष्म नसों (स्रोतों) को ब्लॉक कर देते हैं, जिससे थायराइड ग्रंथि अपना प्राकृतिक काम करना भूल जाती है।

आधुनिक दवाएं सिर्फ बाहर से हॉर्मोन देकर काम चलाती हैं, रुकावट दूर नहीं करतीं। इसके विपरीत, आयुर्वेद बीमारी की इस जड़ पर प्रहार करता है। कचनार, अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियों, सही आहार और पंचकर्म के जरिए 'पाचक अग्नि' को तेज़ किया जाता है। नसों की यह रुकावट खुलते ही थायराइड ग्रंथि दोबारा एक्टिव हो जाती है और खुद हॉर्मोन बनाने में सक्षम हो जाती है।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण

Jiva Ayurveda में थायराइड का इलाज सिर्फ खून की रिपोर्ट में TSH को सामान्य करने या जीवन भर गोली खिलाने तक सीमित नहीं है। हमारा मुख्य फोकस शरीर की 'पाचक अग्नि' को ठीक करने और बढ़े हुए कफ-वात दोष को संतुलित करने पर रहता है। हर मरीज़ की व्यक्तिगत प्रकृति—चाहे वह वात, पित्त या कफ प्रधान हो—और बीमारी की वर्तमान स्टेज के आधार पर खास आयुर्वेदिक दवाएं तय की जाती हैं। हमारे इलाज में शरीर के अंदरूनी रास्तों की सफाई के लिए पंचकर्म थेरेपी शामिल है। इसके अलावा, औषधीय जड़ी-बूटियां, सही खानपान, विशिष्ट योग आसन और दिनचर्या में सुधार के ज़रिए ग्रंथि को पोषण देकर उसे प्राकृतिक रूप से हॉर्मोन बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है।

इस रोग के लिए महत्वपूर्ण जड़ी बूटियाँ

कचनार (Kanchnar): यह थायराइड की सबसे बेहतरीन औषधि है, जो ग्रंथियों की सूजन कम कर हॉर्मोन संतुलित करती है।

अश्वगंधा (Ashwagandha): अत्यधिक तनाव घटाकर नसों को मज़बूत करता है और पिट्यूटरी के सिग्नल्स सुधारता है।

पुनर्नवा (Punarnava): शरीर में जमा अतिरिक्त पानी (water retention) और वज़न को कम करने में मदद करता है।

गुग्गुलु (Guggulu): जमे हुए फैट और विषैले तत्वों (आम) को पिघलाकर ग्रंथि की कार्यक्षमता को तेज़ करता है।

ब्राह्मी (Brahmi): मानसिक शांति प्रदान करती है और बीमारी से जुड़े ब्रेन फॉग को हटाती है।

शंखपुष्पी: नर्वस सिस्टम को शांत करके शरीर के बढ़े हुए वात दोष को पूरी तरह संतुलित करने में असरदार है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी

जब समस्या बहुत सालों पुरानी हो और खून तक में गर्मी घुल चुकी हो, तो जीवा आयुर्वेद में विरेचन नामक पंचकर्म चिकित्सा की जाती है। यह शरीर की गहरी अंदरूनी सफ़ाई की प्रक्रिया है। इसमें विशेष औषधियों के माध्यम से पेट को साफ़ किया जाता है, जिससे लिवर और आंतों में गहराई तक जमा हुआ सारा खट्टा और दूषित पित्त दस्त के माध्यम से शरीर से हमेशा के लिए बाहर निकल जाता है। इसके अलावा तनाव कम करने के लिए माथे पर तेल की धारा गिराने वाली विधि और शरीर की गर्मी निकालने के लिए विशेष मालिश का भी प्रयोग किया जाता है।

मरीज़ के लिए शुद्ध आहार

क्या खाएं

गर्म, पचने में आसान भोजन: हल्का भोजन जैसे दलिया, मूंग दाल खिचड़ी और ताज़ा सूप का सेवन करें।

मसाले: खाने में अदरक, लहसुन, काली मिर्च और धनिया के बीजों का उपयोग बहुत लाभकारी है।

फल और घी: सेब, पपीता और नियमित रूप से शुद्ध देसी गाय का घी मेटाबॉलिज्म को सुचारू बनाते हैं।

क्या न खाएं

गॉइट्रोजन सब्ज़ियां: पत्तागोभी, फूलगोभी और ब्रोकोली को कच्चा खाने से बिल्कुल बचें।

ठंडी चीजें: फ्रिज का ठंडा पानी, बासी खाना और आइसक्रीम पूरी तरह बंद करें।

मैदा और प्रोसेस्ड फूड: चीनी, बेकरी उत्पाद और सोया उत्पाद मेटाबॉलिज्म बहुत धीमा करते हैं, इन्हें न खाएं।

जीवा आयुर्वेद में हम थायराइड के मरीज़ों की जांच कैसे करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में थायराइड के मरीज़ की जांच बहुत ही गहराई और व्यक्तिगत स्तर पर की जाती है। हमारे डॉक्टर सबसे पहले मरीज़ की दिनचर्या, खानपान, वज़न बढ़ने की गति, और मानसिक स्थिति को अच्छी तरह समझते हैं। 'नाड़ी परीक्षा' (Pulse Diagnosis) के ज़रिए, और जीभ, आंख, त्वचा देखकर यह पता लगाया जाता है कि शरीर में 'अग्निमांद्य' और वात-पित्त-कफ का असंतुलन किस स्तर तक पहुँच चुका है। फिजिकल जांच के दौरान गले की बनावट और बालों के रूखेपन को भी परखा जाता है। मरीज़ की पुरानी TSH, T3, T4 ब्लड रिपोर्ट्स को गहराई से जांचने के बाद ही एक 'पर्सनल ट्रीटमेंट प्लान' (Ayunique Plan) तैयार किया जाता है, जिसमें सटीक दवाइयां और लाइफस्टाइल बदलाव शामिल होते हैं।

जीवा आयुर्वेद में उपचार और देखभाल की प्रक्रिया

जीवा आयुर्वेद में इलाज बिल्कुल व्यवस्थित और आसान तरीके से होता है, जिससे आपको पूरी तरह निजी और असरदार आयुर्वेदिक अनुभव मिलता है।

पहला कदम—अपनी जानकारी दें: आप हमें कॉल कर सकते हैं, बातचीत की शुरुआत के लिए 0129 4264323 पर सीधे संपर्क करें।

मिलने का समय तय करें: हमारे अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टरों के साथ अपॉइंटमेंट तय होता है। बातचीत का तरीका आप खुद चुन सकते हैं—

क्लिनिक: जीवा आयुर्वेद के 88 से ज़्यादा क्लिनिक अलग-अलग शहरों में हैं। आपके सबसे नज़दीकी क्लिनिक में जाइये और आमने-सामने डॉक्टर से मिलिये।

वीडियो कॉल—सिर्फ 49 रुपये में: अगर आपके शहर में क्लिनिक नहीं है, तो घर बैठे डॉक्टर से ऑनलाइन वीडियो कॉल पर बात कर सकते हैं। ये सेवा भारी छूट के साथ सिर्फ 49 रुपये में मिलती है (पहले कीमत 299 रुपये थी)। बस 0129 4264323 पर फोन करें और आरा __ म से डॉक्टर से जुड़िए।

समस्या की गहराई से पहचान: हमारे डॉक्टर आपके लक्षण और परेशानी को पूरी तरह समझने की कोशिश करते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुंचा जा सके।

जड़ से इलाज: समस्या पता चलने के बाद, आपके लिए खास इलाज की योजना बनती है, जिसमें प्राकृतिक जड़ी-बूटियों वाली दवाएं दी जाती हैं।

नज़र रखते हैं सुधार पर: हम लगातार संपर्क में रहते हैं और आपके बदलते स्वास्थ्य के हिसाब से इलाज में ज़रूरी बदलाव भी करते हैं।

ठीक होने में लगने वाला समय

थायराइड की बीमारी कितनी जल्दी ठीक होगी और एलोपैथिक दवा कब बंद होगी, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि समस्या कितनी पुरानी है और मौजूदा TSH स्तर क्या है। अगर बीमारी नई है और दवा शुरू किए कुछ ही महीने हुए हैं, तो सही आयुर्वेदिक इलाज से अक्सर 2 से 4 महीने में ग्रंथि प्राकृतिक रूप से काम करने लगती है। मध्यम मामलों में 6 से 12 महीने का समय लग सकता है। लेकिन अगर आप 10-15 साल से दवा खा रहे हैं या हाशिमोटो जैसी जटिल ऑटोइम्यून स्थिति है, तो इलाज एक से डेढ़ साल तक चल सकता है। इस दौरान आयुर्वेदिक डॉक्टर की देखरेख में धीरे-धीरे एलोपैथिक दवा की डोज़ सुरक्षित रूप से कम की जाती है।

मरीज़ों का अनुभव -सुनील सिंह 

मैंने अपने वज़न में तेज़ी से और बहुत बड़ा बदलाव देखा, जो 80 kg से बढ़कर 115 kg हो गया। कुछ टेस्ट के बाद, मुझे थायरॉइड की प्रॉब्लम का पता चला। मेरे डॉक्टर ने मुझे 75 mg थायरोक्सिन टैबलेट दी; लेकिन, इससे मुझे मनचाहा रिज़ल्ट नहीं मिला। बाद में, मेरी तबीयत और खराब हो गई क्योंकि मुझे सीने में जलन महसूस हुई और बताया गया कि मुझे फैटी लिवर और किडनी की प्रॉब्लम है। इन घटनाओं की वजह से मैं स्ट्रेस में आ गया, और मैं कन्फ्यूज़ हो गया कि आगे क्या करूँ।

बाद में, मैंने जीवा आयुर्वेद के बारे में सुना और डॉ. प्रताप चौहान से कंसल्ट किया। उन्होंने प्रॉब्लम को जड़ से समझने के लिए मेरे लाइफस्टाइल और खाने की आदतों के बारे में मुझसे बहुत सारे सवाल पूछे। अब मैं बहुत बेहतर महसूस करता हूँ। पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि मुझे जीवा आयुर्वेद से बहुत पहले कॉन्टैक्ट करना चाहिए था, क्योंकि इससे मैं इन सारी परेशानियों से बच सकता था।

लोग जीवा आयुर्वेदा  पर भरोसा क्यों करते है ?

लोग Jiva Ayurveda पर इस वजह से भरोसा करते हैं, क्योंकि यहाँ सिर्फ लक्षण दबाने का नहीं, बल्कि बीमारी की जड़ तक पहुंच कर इलाज करने का नज़रिया है। सालों से Jiva अपनी अनुभवी डाक्टरों की टीम और व्यक्तिगत इलाज के कारण हज़ारो लोगों की मदद कर रहा है, खासकर श्वसन समस्याओं, बार-बार होने वाली ब्रोंकाइटिस जैसी परेशानियों में।

यहां आयुर्वेद के उस मुख्य सिद्धांत को अपनाया जाता है, जिसमें बीमारी का मूल कारण समझा जाता है। मरीज़ की प्रकृति, उसकी लाइफस्टाइल और उसकी सेहत—हर चीज़ को ध्यान में रखते हुए ही इलाज तय किया जाता है। Jiva का “Ayunique” तरीका यही है कि हर इंसान की ज़रूरत अलग होती है, तो इलाज भी अलग होना चाहिए।

Jiva की थेरेपी सिर्फ दवा देने तक सीमित नहीं रहती। यहां खाने-पीने की सलाह, श्वसन के अभ्यास, लाइफस्टाइल में ज़रूरी बदलाव, और तनाव कम करने के लिए अलग तकनीकें दी जाती हैं। इससे पूरे शरीर और मन का संतुलन बेहतर होता है। यही वजह है कि देश भर के हजारों मरीज़ Jiva Ayurveda की सलाह और इलाज को सबसे ज़्यादा भरोसेमंद मानते आए हैं।

कई मरीज़ों ने खुद माना है कि सिर्फ तीन महीने में ही उन्होंने सेहत में बड़ा बदलाव महसूस किया। लगभग 95% मरीज़ों को इतनी जल्दी फर्क नजर आया, और करीब 88% लोगों को समय के साथ दूसरी दवाएं कम करनी पड़ीं। यही भरोसा Jiva Ayurveda को अलग बनाता है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च 

  • अपना इलाज करवाने से पहले खर्च की बात तो हर किसी को जानना चाहिए जीवा आयुर्वेद में, हम सब कुछ साफ-साफ बताते हैं, ताकि आप बिना किसी झंझट के अपने लिए सही इलाज चुन सकें.अगर आपको रेगुलर दवा और डॉक्टर से सलाह चाहिए, तो महीने भर का खर्च करीब ₹3,000 से ₹3,500 के बीच आता है. यह बस एक औसत है — असली रकम आपके केस की गंभीरता और ज़रूरतों पर निर्भर करती है.

  • अब अगर आप थोड़ा ज़्यादा गहराई से इलाज करवाना चाहते हैं, तो हमारे पास खास पैकेज प्रोटोकॉल मिलते हैं. इनमें सिर्फ दवा और परामर्श ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य सेशन, योग-ध्यान और खानपान सब शामिल रहता है. ऐसे पैकेज का खर्च ₹15,000 से ₹40,000 तक है, जो पूरे 3 से 4 महीने के इलाज को कवर करता है.

  • कुछ लोगों को तो और भी ज़्यादा ध्यान और देखभाल चाहिए होती है. ऐसे में हमारा जीवाग्राम सेंटर आगे आता है. यहाँ आपको असली पंचकर्म थेरेपी, सात्विक खाना, मॉडर्न ट्रीटमेंट, आरामदायक जगह और और भी कई सुविधाएँ मिलती हैं. सात दिन का स्टे करीब ₹1 लाख का होता है — और आपका बॉडी-माइंड दोनों एकदम रिफ्रेश हो जाता है.

डॉक्टर की सलाह कब लें?

TSH लेवल लगातार और तेज़ी से बढ़ रहा हो या 10 से अधिक हो गया हो।

थायराइड की दवा लेने के बावजूद अनियंत्रित रूप से वज़न बढ़ या घट रहा हो।

गले के सामने वाले हिस्से में कोई नई गांठ, सूजन महसूस हो या निगलने में दर्द हो।

महिलाओं में मासिक धर्म (Periods) बहुत ज़्यादा अनियमित हो गए हों या अत्यधिक रक्तस्राव हो।

आराम करने के बावजूद अत्यधिक थकान महसूस होती हो और हाथ-पैरों में हमेशा सुस्ती या कंपन रहता हो।

लगातार डिप्रेशन, घबराहट या भूलने की बीमारी (ब्रेन फॉग) जैसे लक्षण तेज़ी से बढ़ रहे हों।

घरेलू उपायों या केवल डाइट से आपको आराम न मिल रहा

निष्कर्ष

थायराइड की समस्या, खासकर हाइपोथायरायडिज्म, हमारी आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी, गलत खानपान, बढ़ते मानसिक तनाव और निष्क्रिय जीवनशैली का ही एक सीधा परिणाम है। शुरुआत में बिना वजह वज़न बढ़ना, भारी थकान या बालों का झड़ना इसके मुख्य लक्षण होते हैं। अगर हम इसे सिर्फ हॉर्मोन की कमी मानकर जीवन भर बाहरी गोलियों पर निर्भर हो जाते हैं, तो ग्रंथि हमेशा के लिए अपना काम भूल सकती है। आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों (जैसे कचनार), पंचकर्म थेरेपी, शुद्ध सात्विक आहार और योग के माध्यम से इस ग्रंथि को दोबारा जाग्रत किया जा सकता है। निरंतर आयुर्वेदिक देखभाल, थोड़ा धैर्य और सही मार्गदर्शन अपनाने से बाहरी दवाओं पर आपकी निर्भरता पूरी तरह खत्म हो सकती है और आप एक स्वस्थ और ऊर्जामयी जीवन जी सकते हैं।

FAQs

नहीं, इससे TSH तुरंत आसमान छूने लगता है। आयुर्वेद में डॉक्टर की देखरेख में इसे धीरे-धीरे (Taper down) कम किया जाता है।

कमज़ोर 'पाचक अग्नि' (धीमा मेटाबॉलिज्म) और वात-कफ दोषों के कारण शरीर की नसों (स्रोतों) में रुकावट।

हाँ, जड़ी-बूटियों से ग्रंथि को दोबारा एक्टिव करके बाहरी दवा पर निर्भरता को खत्म या काफी कम किया जा सकता है।

कच्ची पत्तागोभी, फूलगोभी, ब्रोकोली (गॉइट्रोजन) और सोया उत्पाद पूरी तरह से अवॉयड करें।

क्योंकि मेटाबॉलिज्म बहुत धीमा हो जाता है, जिससे खाना ऊर्जा में बदलने की जगह सीधा फैट (कफ) के रूप में जमा होने लगता है।

कचनार (सूजन कम करने), अश्वगंधा (नसों की ताकत के लिए) और गुग्गुलु (फैट पिघलाने के लिए)।

हाइपो में हॉर्मोन कम बनता है और वज़न बढ़ता है (वात-कफ)। हाइपर में हॉर्मोन ज़्यादा बनता है और वज़न तेज़ी से घटता है (पित्त-वात)।

हाँ, हॉर्मोन बिगड़ने से पीरियड्स अनियमित होते हैं, जिससे गर्भधारण में मुश्किल और मिसकैरेज का खतरा रहता है।

बिल्कुल। जमे हुए टॉक्सिन्स निकालने (विरेचन) और मानसिक तनाव दूर करने (शिरोधारा) के लिए यह बहुत असरदार है।

नई बीमारी में 2-4 महीने, मध्यम में 6-12 महीने और 10-15 साल पुराने मामलों में 1 से 1.5 साल तक लग सकते हैं।

नई बीमारी में 2-4 महीने, मध्यम में 6-12 महीने और 10-15 साल पुराने मामलों में 1 से 1.5 साल तक लग सकते हैं।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us