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हार्मोनल दवा सालों से चल रही है —क्या प्राकृतिक संतुलन संभव है? आयुर्वेद से जड़ से समाधान

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 24 Mar, 2026
  • category-iconUpdated on 24 Mar, 2026
  • category-iconWomen's Health
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सालों से हार्मोनल गोलियां (जैसे थायराइड या पीसीओडी की दवा) चल रही हैं, तो इसे अनदेखा नहीं कर सकते। यह सिर्फ एक रूटीन नहीं है, ये एक क्रॉनिक स्थिति बन चुकी है—और आयुर्वेद में इसे वात, पित्त और कफ दोष के लंबे समय तक असंतुलित रहने से जोड़ते हैं। जब शरीर में हार्मोन्स बिगड़ते हैं, तो वज़न बेकाबू होने लगता है, पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं, बाल झड़ते हैं और अकारण थकान बनी रहती है। ये गोलियां अक्सर सिर्फ लक्षणों को दबाती हैं, लेकिन शरीर के अंदर की असली गड़बड़ी वैसे ही रहती है। ज़रूरी है कि आप इसके मूल कारण को समझें और प्राकृतिक इलाज जल्द शुरू करें, तभी जीवनभर दवाओं पर निर्भरता से राहत मिलेगी।

हार्मोनल असंतुलन क्या है?

क्रॉनिक हार्मोनल असंतुलन यानी जब शरीर का एंडोक्राइन सिस्टम (ग्रंथियां) सही मात्रा में हार्मोन्स नहीं बना पाता और यह दिक्कत लंबे समय तक बनी रहती है। आयुर्वेद कहता है कि जब दोष असंतुलित होते हैं और पाचन (अग्नि) कमज़ोर पड़ जाती है, तो शरीर का प्राकृतिक तालमेल टूट जाता है। फिर क्या होता है? अचानक वज़न बढ़ना, पीसीओडी (PCOD), थायराइड की गड़बड़ी, नींद न आना और मूड स्विंग्स—ये सब परेशानियाँ सामने आती हैं।

अक्सर ये समस्या बहुत ज़्यादा तनाव, गलत खान-पान, खराब दिनचर्या या रसायनों वाली चीज़ों की ज़्यादा खपत से बढ़ जाती है। लंबे समय तक ऐसा चले तो हम पूरी तरह दवाओं पर निर्भर हो जाते हैं। सही आहार, बेहतर जीवनशैली और वक्त पर आयुर्वेदिक इलाज मिलता रहे, तो इस समस्या से प्राकृतिक रूप से राहत पाना आसान है।

हार्मोनल असंतुलन के प्रकार 

थायराइड असंतुलन—इसमें मेटाबॉलिज्म धीमा या बहुत तेज़ हो जाता है, जिससे अचानक वज़न बढ़ता या घटता है और सुस्ती पीछा नहीं छोड़ती।

पीसीओडी / पीसीओएस (PCOD/PCOS)—महिलाओं में प्रजनन हार्मोन्स बिगड़ जाते हैं। माहवारी अनियमित होती है और चेहरे पर अनचाहे बाल या मुहांसे आ जाते हैं।

इंसुलिन रेजिस्टेंस—ब्लड शुगर को कंट्रोल करने वाला हार्मोन ठीक से काम नहीं करता, जिससे सुस्ती आती है और आगे चलकर डायबिटीज का खतरा रहता है।

कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) असंतुलन—लगातार तनाव लेने से यह हार्मोन बढ़ जाता है। इसके साथ अक्सर घबराहट, एंग्जायटी और नींद न आने की दिक्कत रहती है।

एस्ट्रोजन/प्रोजेस्टेरोन असंतुलन—अक्सर मेनोपॉज़ के आसपास या कमज़ोर पोषण की वजह से ये हार्मोन्स बिगड़ते हैं, जिससे हॉट फ्लैशेस और हड्डियां कमज़ोर होती हैं।

हार्मोनल असंतुलन के लक्षण और संकेत 

अचानक वज़न में बदलाव – लाख कोशिशों के बाद भी वज़न का तेजी से बढ़ना या कम होना।

अनियमित माहवारी – पीरियड्स का समय पर न आना, बहुत दर्द होना या हैवी ब्लीडिंग।

अत्यधिक थकान – सुबह उठने पर भी शरीर में भारीपन, कमज़ोरी और सुस्ती महसूस होना।

बाल और त्वचा की समस्या – बालों का गुच्छों में गिरना, पिगमेंटेशन और चेहरे पर मुहांसे।

मूड स्विंग्स – बिना किसी खास वजह के चिड़चिड़ापन, उदासी या गुस्सा आना।

नींद की कमी – रात में नींद न आना (इंसोम्निया) या कच्ची नींद आना।

पाचन की गड़बड़ी – खाना ठीक से न पचना, कब्ज़ रहना या पेट फूलना (ब्लोटिंग)।

गर्मी या ठंड ज़्यादा लगना – मौसम सामान्य होने पर भी अचानक बहुत पसीना आना या ठंड लगना।

हार्मोनल असंतुलन के मुख्य कारण 

तनावपूर्ण जीवनशैली – बहुत ज़्यादा मानसिक तनाव और भागदौड़ कोर्टिसोल हार्मोन को बढ़ाकर पूरे सिस्टम को बिगाड़ देती है।

कमज़ोर पाचन शक्ति (अग्नि) – आयुर्वेद के अनुसार, जब पाचन सही नहीं होता, तो शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनता है जो ग्रंथियों के काम में रुकावट डालता है।

गलत खान-पान – अधिक जंक फूड, रिफाइंड चीनी, और प्रिजर्वेटिव वाली चीजों का ज़्यादा सेवन हार्मोन्स को असंतुलित करता है।

नींद की कमी – रात को देर तक जागना और गहरी नींद न लेना शरीर के रिपेयर सिस्टम को रोक देता है।

शारीरिक निष्क्रियता – कम चलना-फिरना और व्यायाम न करने से मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है।

रसायनों का प्रभाव – प्लास्टिक के बर्तनों का इस्तेमाल और केमिकल वाले कॉस्मेटिक्स का असर भी हार्मोन्स पर पड़ता है।

हार्मोनल असंतुलन के जोखिम और जटिलताएं 

बांझपन (Infertility) – हार्मोन्स के लंबे समय तक बिगड़े रहने से गर्भधारण करने में भारी परेशानी आ सकती है।

मेटाबॉलिक सिंड्रोम – इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण टाइप-2 डायबिटीज और मोटापे का खतरा काफी बढ़ जाता है।

हड्डियों की कमज़ोरी – लंबे समय तक असंतुलन से ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियां भुरभुरी होना) हो सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर – क्रॉनिक असंतुलन से डिप्रेशन और गंभीर एंग्जायटी की स्थिति बन सकती है।

हृदय रोग का खतरा – कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना और ब्लड प्रेशर की समस्याएं शुरू हो सकती हैं।

दैनिक जीवन पर असर – लगातार थकान और शारीरिक बदलावों से काम करने और सामान्य दिनचर्या में परेशानी आ सकती है।

आधुनिक चिकित्सा में हार्मोनल असंतुलन की पहचान कैसे करते हैं?

आधुनिक चिकित्सा में डॉक्टर सबसे पहले मरीज़ से बात करते हैं—लक्षण पूछते हैं, वज़न का इतिहास, पीरियड्स की साइकिल और जीवनशैली के बारे में जानते हैं। इसके बाद ब्लड टेस्ट कराए जाते हैं (जैसे थायराइड पैनल, FSH, LH, प्रोलैक्टिन या इंसुलिन)। ज़रूरत पड़ने पर ओवरी या यूट्रस की स्थिति देखने के लिए अल्ट्रासाउंड कराते हैं। इन सबका हिसाब-किताब मिलाकर डॉक्टर तय करते हैं कि कौन सा हार्मोन कम या ज़्यादा है, और फिर सिंथेटिक हार्मोन रिप्लेसमेंट गोलियां (जैसे थायरॉक्सिन या गर्भनिरोधक गोलियां) शुरू कर दी जाती हैं।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

आयुर्वेद के हिसाब से क्रॉनिक हार्मोनल असंतुलन वात, पित्त और कफ दोष में गड़बड़ी और 'रस' व 'रक्त' धातु के दूषित होने की वजह से होता है। जब पाचन तंत्र कमज़ोर पड़ता है (अग्नि मंद होती है), तो शरीर में विषैले तत्व (आम) जमा होने लगते हैं, जो ग्रंथियों (Glands) के पोषण को रोक देते हैं।

आयुर्वेद सिर्फ बाहर से कृत्रिम हार्मोन्स देकर लक्षणों को दबाने का तरीका नहीं अपनाता—वो असली वजह ढूंढता है। इलाज के लिए संतुलित खाना, सही दिनचर्या, ग्रंथियों को ताक़त देने वाली जड़ी-बूटियां, और ज़रूरत हो तो पंचकर्म जैसी प्रक्रियाएं चलती हैं। मकसद साफ है: शरीर के अपने सिस्टम को इतना सक्षम बनाना कि वह खुद हार्मोन्स का सही निर्माण शुरू कर दे और दवाओं पर निर्भरता कम हो।

जीवा आयुर्वेद  का उपचार दृष्टिकोण

 जीवा आयुर्वेद में हार्मोनल समस्या को सुलझाने के लिए पहले मरीज़ की पूरी सेहत का जायज़ा लिया जाता है। हर इंसान की प्रकृति, तनाव का स्तर और जीवनशैली अलग होती है, तो इलाज भी बिल्कुल उसी हिसाब से तय होता है। आयुर्वेदिक डॉक्टर यह जानने की कोशिश करते हैं कि हार्मोन्स बिगड़ने की असली वजह क्या है—कहीं लिवर कमज़ोर तो नहीं, तनाव ज़्यादा तो नहीं, या फिर सोने-जागने का रूटीन गलत है?

इसके बाद इलाज में ऐसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां दी जाती हैं, जो ग्रंथियों को स्वस्थ करें, साथ में खाने-पीने और दिनचर्या में बदलाव की सलाह भी मिलती है। कई बार शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालने और मेटाबॉलिज्म को रीसेट करने के लिए पंचकर्म जैसे उपाय भी अपनाए जाते हैं। जीवा आयुर्वेद की सोच यही है कि सिर्फ बीमारी को मैनेज न किया जाए, बल्कि शरीर में जो मूल असंतुलन है, उसे भी जड़ से ठीक किया जाए।

हार्मोनल संतुलन के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ 

शतावरी – महिला हार्मोन्स को संतुलित करने और प्रजनन तंत्र को मज़बूत बनाने में सहायक।

अश्वगंधा – तनाव (कोर्टिसोल) को कम करता है और थायराइड व नर्वस सिस्टम को ताक़त देता है।

कांचनार गुग्गुल – ग्रंथियों की सूजन कम करने और पीसीओडी (PCOD) में बेहद असरदार।

गिलोय – शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालता है और इम्यूनिटी व मेटाबॉलिज्म सुधारता है।

अशोक – गर्भाशय की सेहत सुधारने और अनियमित पीरियड्स में राहत देने में मदद करता है।

मेथी दाना – इंसुलिन रेजिस्टेंस को कम करने और शुगर लेवल को संतुलित रखने में आराम देता है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी

जब समस्या बहुत सालों पुरानी हो और खून तक में गर्मी घुल चुकी हो, तो जीवा आयुर्वेद में विरेचन नामक पंचकर्म चिकित्सा की जाती है। यह शरीर की गहरी अंदरूनी सफ़ाई की प्रक्रिया है। इसमें विशेष औषधियों के माध्यम से पेट को साफ़ किया जाता है, जिससे लिवर और आंतों में गहराई तक जमा हुआ सारा खट्टा और दूषित पित्त दस्त के माध्यम से शरीर से हमेशा के लिए बाहर निकल जाता है। इसके अलावा तनाव कम करने के लिए माथे पर तेल की धारा गिराने वाली विधि और शरीर की गर्मी निकालने के लिए विशेष मालिश का भी प्रयोग किया जाता है।

 रोगी के लिए सही आहार

ताज़ा और सुपाच्य भोजन – घर का बना ताज़ा खाना, जो पचने में आसान हो, अग्नि को दुरुस्त रखता है।

बीज और मेवे – अलसी (Flaxseeds), कद्दू के बीज और बादाम हार्मोन्स को प्राकृतिक फैट्स देते हैं।

हरी पत्तेदार सब्जियां – फाइबर से भरपूर सब्जियां शरीर से अतिरिक्त एस्ट्रोजन और टॉक्सिन्स बाहर निकालती हैं।

स्वस्थ वसा (Healthy Fats) – शुद्ध देसी घी और नारियल का तेल ग्रंथियों के सही काम करने के लिए ज़रूरी हैं।

हर्बल चाय – सौंफ, जीरा और धनिया की चाय मेटाबॉलिज्म और पाचन को राहत दे सकती है।

चीनी और पैक्ड फूड से परहेज़– रिफाइंड चीनी, कैफीन और मैदे वाली चीजें बिल्कुल कम लेना बेहतर रहता है।

जीवा आयुर्वेद में हार्मोनल असंतुलन के मरीज़ों की जांच कैसे करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में क्रॉनिक हार्मोनल असंतुलन की जांच पूरी तरह से मरीज़ की हालत, मासिक धर्म का इतिहास, वज़न में बदलाव और मानसिक स्थिति पर ध्यान देकर की जाती है। डॉक्टर पहले मरीज़ से पूछते हैं कि दवाएं कब से चल रही हैं, तनाव कितना है, और बाकी लक्षण क्या हैं। वो उसकी दिनचर्या, खाने-पीने की आदतें और जीवनशैली भी समझते हैं। नाड़ी परीक्षा, जीभ की जांच, और पाचन शक्ति देखकर पता लगाया जाता है कि कौन सा दोष कितना बढ़ गया है। फिर इसी आधार पर सही आयुर्वेदिक इलाज, खान-पान और दिनचर्या की सलाह दी जाती है।

जीवा आयुर्वेद में उपचार और देखभाल की प्रक्रिया

जीवा आयुर्वेद में इलाज बिल्कुल व्यवस्थित और आसान तरीके से होता है, जिससे आपको पूरी तरह निजी और असरदार आयुर्वेदिक अनुभव मिलता है।

पहला कदम—अपनी जानकारी दें: आप हमें कॉल कर सकते हैं, बातचीत की शुरुआत के लिए 0129 4264323 पर सीधे संपर्क करें।

मिलने का समय तय करें: हमारे अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टरों के साथ अपॉइंटमेंट तय होता है। बातचीत का तरीका आप खुद चुन सकते हैं—

क्लिनिक: जीवा आयुर्वेद के 88 से ज़्यादा क्लिनिक अलग-अलग शहरों में हैं। आपके सबसे नज़दीकी क्लिनिक में जाइये और आमने-सामने डॉक्टर से मिलिये।

वीडियो कॉल—सिर्फ 49 रुपये में: अगर आपके शहर में क्लिनिक नहीं है, तो घर बैठे डॉक्टर से ऑनलाइन वीडियो कॉल पर बात कर सकते हैं। ये सेवा भारी छूट के साथ सिर्फ 49 रुपये में मिलती है (पहले कीमत 299 रुपये थी)। बस 0129 4264323 पर फोन करें और आराम से डॉक्टर से जुड़िए।

समस्या की गहराई से पहचान: हमारे डॉक्टर आपके लक्षण और परेशानी को पूरी तरह समझने की कोशिश करते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुंचा जा सके।

जड़ से इलाज: समस्या पता चलने के बाद, आपके लिए खास इलाज की योजना बनती है, जिसमें प्राकृतिक जड़ी-बूटियों वाली दवाएं दी जाती हैं।

नज़र रखते हैं सुधार पर: हम लगातार संपर्क में रहते हैं और आपके बदलते स्वास्थ्य के हिसाब से इलाज में ज़रूरी बदलाव भी करते हैं।

ठीक होने में लगने वाला समय

हार्मोनल असंतुलन ठीक करने में सबसे अहम है नियमितता और धैर्य। दवाओं के भरोसे मत बैठिए—सही खाना, भरपूर नींद और तनाव कम करना ज़रूरी है। हर दिन एक ही वक्त पर सोना-जागना, हल्का और ताज़ा खाना शरीर को संतुलन में लाता है। हल्का योग या व्यायाम भी फ़ायदेमंद रहता है। असर धीरे-धीरे दिखता है: पहले 1–3 महीने में ऊर्जा और नींद बेहतर होती है, 3–6 महीने में पीरियड्स और वज़न सुधरते हैं, और 6–12 महीने में हार्मोन संतुलन आने लगता है। बस इस सबको लगातार अपनाइए, तभी अच्छा और स्थायी सुधार मिलता है।

मरीज़ों के अनुभव 

कुछ दिन ऐसे भी थे जब मुझे अनियमित और भारी पीरियड्स की समस्या थी। मुझे बहुत ज़्यादा दर्द होता था। एलोपैथिक इलाज करवाने पर, मेरा वज़न बढ़ गया और मुझे डिप्रेशन भी हो गया। मेरी एक दोस्त, जो पहले Jiva की मरीज़ रह चुकी थी, ने मुझे Jiva जाने की सलाह दी। मैं अपने नज़दीकी Jiva क्लिनिक गई और आयुर्वेदिक इलाज करवाया। स्त्री रोग विशेषज्ञों की एक टीम ने मेरी मेडिकल हिस्ट्री के बारे में पूछताछ की। मैंने PCOD के लिए आयुर्वेदिक इलाज लेना शुरू किया, और मेरे पीरियड्स नियमित रूप से आने लगे, और मेरा डिप्रेशन भी कम हो गया।

वैजयंती


लोग जीवा आयुर्वेदा पर भरोसा क्यों करते है ?

लोग Jiva Ayurveda पर इस वजह से भरोसा करते हैं, क्योंकि यहाँ सिर्फ लक्षण दबाने का नहीं, बल्कि बीमारी की जड़ तक पहुंच कर इलाज करने का नज़रिया है। सालों से Jiva अपनी अनुभवी डाक्टरों की टीम और व्यक्तिगत इलाज के कारण हज़ारो लोगों की मदद कर रहा है, खासकर श्वसन समस्याओं, बार-बार होने वाली ब्रोंकाइटिस जैसी परेशानियों में।

यहां आयुर्वेद के उस मुख्य सिद्धांत को अपनाया जाता है, जिसमें बीमारी का मूल कारण समझा जाता है। मरीज़ की प्रकृति, उसकी लाइफस्टाइल और उसकी सेहत—हर चीज़ को ध्यान में रखते हुए ही इलाज तय किया जाता है। Jiva का “Ayunique” तरीका यही है कि हर इंसान की ज़रूरत अलग होती है, तो इलाज भी अलग होना चाहिए।

Jiva की थेरेपी सिर्फ दवा देने तक सीमित नहीं रहती। यहां खाने-पीने की सलाह, श्वसन के अभ्यास, लाइफस्टाइल में ज़रूरी बदलाव, और तनाव कम करने के लिए अलग तकनीकें दी जाती हैं। इससे पूरे शरीर और मन का संतुलन बेहतर होता है। यही वजह है कि देश भर के हजारों मरीज़ Jiva Ayurveda की सलाह और इलाज को सबसे ज़्यादा भरोसेमंद मानते आए हैं।

कई मरीज़ों ने खुद माना है कि सिर्फ तीन महीने में ही उन्होंने सेहत में बड़ा बदलाव महसूस किया। लगभग 95% मरीज़ों को इतनी जल्दी फर्क नजर आया, और करीब 88% लोगों को समय के साथ दूसरी दवाएं कम करनी पड़ीं। यही भरोसा Jiva Ayurveda को अलग बनाता है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च 

अपना इलाज करवाने से पहले खर्च की बात तो हर किसी को जानना चाहिए जीवा आयुर्वेद में, हम सब कुछ साफ-साफ बताते हैं, ताकि आप बिना किसी झंझट के अपने लिए सही इलाज चुन सकें.

अगर आपको रेगुलर दवा और डॉक्टर से सलाह चाहिए, तो महीने भर का खर्च करीब ₹3,000 से ₹3,500 के बीच आता है. यह बस एक औसत है — असली रकम आपके केस की गंभीरता और ज़रूरतों पर निर्भर करती है.

अब अगर आप थोड़ा ज़्यादा गहराई से इलाज करवाना चाहते हैं, तो हमारे पास खास पैकेज प्रोटोकॉल मिलते हैं. इनमें सिर्फ दवा और परामर्श ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य सेशन, योग-ध्यान और खानपान सब शामिल रहता है. ऐसे पैकेज का खर्च ₹15,000 से ₹40,000 तक है, जो पूरे 3 से 4 महीने के इलाज को कवर करता है.

कुछ लोगों को तो और भी ज़्यादा ध्यान और देखभाल चाहिए होती है. ऐसे में हमारा जीवाग्राम सेंटर आगे आता है. यहाँ आपको असली पंचकर्म थेरेपी, सात्विक खाना, मॉडर्न ट्रीटमेंट, आरामदायक जगह और और भी कई सुविधाएँ मिलती हैं. सात दिन का स्टे करीब ₹1 लाख का होता है — और आपका बॉडी-माइंड दोनों एकदम रिफ्रेश हो जाता है.

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

जब सालों से दवा खाने के बावजूद वजन बेकाबू हो और सुस्ती बनी रहे।

पीरियड्स लगातार मिस होने लगें या बहुत ज़्यादा हैवी ब्लीडिंग हो।

अकारण बालों का झड़ना या चेहरे पर अनचाहे बाल आने लगें।

मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन या डिप्रेशन आपके दैनिक जीवन को खराब कर रहा हो।

जब आप जीवनभर सिंथेटिक दवाओं पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहते हों।

रात में लगातार नींद न आने की समस्या बनी रहे।

अगर अच्छे खान-पान और सामान्य देखभाल से शरीर में कोई राहत न मिले, तो आयुर्वेदिक डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी होता है।

निष्कर्ष

क्रॉनिक हार्मोनल असंतुलन और सालों से चल रही दवाइयां ये साफ संकेत हैं कि हम सिर्फ बीमारी को मैनेज कर रहे हैं, उसे जड़ से खत्म नहीं कर रहे। आयुर्वेद कहता है—दोषों का बिगड़ जाना, अत्यधिक तनाव और कमज़ोरी पाचन इसके बड़े कारण हैं। जो भी परेशानी हो, वक्त रहते उसकी वजह पहचानना ज़रूरी है। थोड़ा खाने-पीने का ध्यान, अच्छी आदतें और खुद को तनावमुक्त रखना, ये सब मिलकर काफी मदद करते हैं। लेकिन अगर गोलियों के डोज़ बढ़ते ही जा रहे हों या साथ में दूसरी दिक्कतें भी दिखें, तो तुरंत किसी जानकार आयुर्वेदिक चिकित्सक से मिलना चाहिए। सही और प्राकृतिक इलाज मिलने पर ही शरीर का अपना सिस्टम दोबारा खड़ा हो सकता है और यह समस्या पूरी तरह दूर हो सकती है।

FAQs

हाँ, सही इलाज, आहार और दिनचर्या से काफी हद तक संतुलन वापस लाया जा सकता है।

आमतौर पर 3–6 महीने में सुधार और 6–12 महीने में अच्छा संतुलन दिखता है।

नहीं, कई मामलों में डॉक्टर की सलाह से धीरे-धीरे दवाएं कम की जा सकती हैं।

वज़न बढ़ना, थकान, अनियमित पीरियड्स, बाल झड़ना और मूड स्विंग्स।

हाँ, ज़्यादा तनाव कोर्टिसोल बढ़ाकर पूरे सिस्टम को प्रभावित करता है।

बहुत ज़्यादा गलत खाना हार्मोन असंतुलन को बढ़ाता है, सही आहार सुधार लाता है।

हाँ, रोज़ हल्का योग और व्यायाम हार्मोन संतुलन में मदद करता है।

हाँ, आयुर्वेद जड़ कारण पर काम करके धीरे-धीरे संतुलन लाता है।

हाँ, खराब नींद हार्मोनल सिस्टम को बिगाड़ सकती है।

जब लक्षण लंबे समय तक बने रहें या दवाओं से भी सुधार न दिखे।

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