Diseases Search
Close Button
 
 

वीकेंड पर meal timing पूरी तरह बदलना सोमवार को पेट क्यों बिगाड़ सकता है?

Information By Dr. VD Aggarwal     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

एक मंजोरंजन से भरपूर वीकेंड का आनंद लेने के बाद सोमवार को वापस दफ्तर जाना लोगों को अक्सर एक कठिन कार्य लगता है। रविवार के आराम के बाद सोमवार को उठ कर काम करने में अधिक संघष महसूस होता हैं, और इसके लिए केवल मन ही नहीं बल्कि हमारा पेट भी ज़िम्मेदार होता है। कई बार हमारी पाचन क्रिया इतनी मज़बूत नहीं होती की वह अचानक हो रहे इस बदलाव को बार बार झेल सके, जिससे परेशानियाँ बढ़ती है। हमारा पेट कार्य और अवकाश का अर्थ नहीं समझता है, उसे केवल उसकी जैविक भाषा समझ आती है, इसीलिए यह हमारी ज़िम्मेदारी हो जाती है की हम उसको संतुलन में रखें।

वीकेंड आहार और जीवनशैली 

वीकेंड में व्यक्ति आराम, मनोरंजन, सामाजिक संपर्क, आदि पर अधिक ध्यान देता है, और यही वृत्ति उसके खाने पीने की गतिविधियों तथा चयन को भी दर्शाती है। व्यक्ति इन दिनों में जो भी खाता है तथा जिस समय पर खाता है, वह हफ्ते के बाकी दिनों से काफी अलग होता है। 

वीकेंड पर लोग अधिकतर देर से या टाल कर खाना खाते है, शाम के नाश्ते का भी कोई तय समय नहीं होता, कुछ लोग बहार का खाना भी अधिक मात्रा में खाते है, शारीरिक श्रम तथा भाग दौड़ भी रुक सा जाता है, कई लोग रात में देर से खाना खाते है, स्क्रीन देखते हुए खाना, अधिक नमकीन या मीठा खाना, यह वीकेंड की कुछ आम आदतें हैं। कोल्ड ड्रिंक या शराब का सेवन करना इस स्थिति को और अधिक खराब बनाता है।

सोमवार को क्या बदलाव होते है?

सोमवार, और बाकी के सक्रीय दिनों में भी, दिनचर्या काफी सीधी और कुछ हद्द तक नियमित होती है, यहाँ हमे पता होता है की कब खाने का समय होगा और कब नाश्ता करना है। अक्सर इन दिनों में लोग पहले से सोचे समझे हुए खाद्य पदार्थों का सेवन करते है और इस बात का ख्याल रखते है की जो भी वो खा रहे है वह उनके दिन भर के कार्य में बाधा न डाले। आमतौर पर इन दिनों में लोग वीकेंड से अधिक स्वस्थ भोजन करते हैं। उनकी सोच यह होती है की अब वापस घर में बनी या बाहर बने घर जैसे स्वस्थ भोजन करने का समय आ गया है, क्योकि प्रतिदिन चमकदार भोजन नहीं खरीदा जा सकता।

इस बड़े बदलाव से पाचन तंत्र को जो झटका लगता है, उसका लंबे समय में कोई दुष्प्रभाव भी हो सकता है।

इस बदलाव का पाचन क्रिया पर क्या असर होता है?

अस्वस्थ बाहर का भोजन करते हुए अचानक अगले दिन स्वस्थ और समय पर भोजन करने से और फिर बार बार यह चक्र दोहराने से पाचन क्रिया में एक रुकाव उत्त्पन्न होता है, जिससे पेट में छोटी से बड़ी समस्या तक होना संभव है।

ये वह कुछ परेशानियाँ हैं जो इस आदत से हो सकती हैं:

  • जैविक घड़ी पर प्रभाव: पेट और उसके एन्ज़इम्स एक नियमित घड़ी के अनुसार काम करते है, देर रात भारी भोजन करना उस जैविक काल के नियमों को उलंघित करके पाचन को बुरी तरह प्रभावित करता है, क्योकि रात के वक्त पाचन अग्नि कमज़ोर होती है।
  • पाचन पर बोझ: जब हम अपने पेट में अधिक मीठे पकवान या मदिरा को भर लेते है तो हमारी मंदाग्नि उसे झेल नहीं पाती है, पाचन क्रिया धीमी हो जाती है, जिससे गैस, ब्लोटिंग, और एसिड रिफ्लक्स की समस्या उत्त्पन्न होती है।
  • बैक्टीरिया पर संकट: पेट के लाभकारी बैक्टीरिया को निरंतर फाइबर की आवश्यकता होती है जो उनके जीवन को बढ़ावा देता है। हमारे बदल रहे भोजन से उनकी इस फाइबर की सप्लाई पर बाधा आ जाती है और पाचन धीमा होने लगता है।

भोजन के समय पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण 

आयुर्वेद आहार को दिनचर्या का एक आवश्यक हिस्सा मानता है। आयुर्वेद केवल इस बात पर ध्यान नहीं देता की खाने की कौन सी वस्तु कितनी लाभकारी है, पर इस बात पर भी दृष्टि डालता है की कौन सी खाने की चीज़ किस प्रकृति के व्यक्ति को कब खानी चाहिए, तथा किन्न दोषों को संतुलित करने के लिए कैसा भोजन करना चाहिए, वह भी समय को ध्यान में रखते हुए।

आयुर्वेद वीकेंड और व्यस्त दिनों में भेदभाव नहीं करता, वह ये नहीं मानता की हमे क्या और कब खाना चाहिए यह हम इसे देख कर निश्चित करे की हमे किस दिन कितना काम है, बल्कि एक सात्त्विक दिनचर्या का हमे हर दिन एक समान पालन करना चाहिए। आधुनिक जीवन की ज़रूरतों का अपना महत्व है, किन्तु उसके कारण अपने शरीर और स्वास्थ को खतरे में नहीं डालना चाहिए। पाचन अग्नि के संतुलन को हम वीकेंड काल में हलके में नहीं ले सकते, क्योंकि यही पाचन क्रिया हमे हर दिन ऊर्जा देती है, इसीलिए हमे जीवन के प्राकृतिक लय को बिगाड़ना नहीं चाहिए। 

पाचन को संतुलित कैसे करें?

जब पाचन क्रिया को संतुलित करने की बात आती है, तो हमे इस बात पर ध्यान देना होगा की वीकेंड और सोमवार की आहारशैली के बीच के अंतर को कम कैसे किया जाए। 

यह कुछ आयुर्वेदिक सिद्धांत है जो इस संतुलन को प्राप्त करने में सहायता करते है:

  • आहार के उपयुक्ता की जाँच: आयुर्वेद में इसे सात्म्य कहते है। किसी भी खाद्य पदार्थ को अपने आहार में शामिल करने से पहले यह निश्चित करना आवश्यक होता है की वह हमारे शरीर पर कोई गलत प्रभाव न डालता हो तथा लाभकारी हो।
  • विरुद्ध आहार से बचाव: कुछ ऐसी चीज़ें होती है जिन्हे एक साथ खाना हानिकारक होता है, इसे पहचानना और बचाव करना अधिक आवश्यक है। 
  • समान दिनचर्या: चाहे दिन कोई भी हो, यदि हम एक ही आयुर्वेद से प्रमाणित दिनचर्या का पालन करे तो यह अचानक हो रहे बदलाव नहीं होंगे और पाचन क्रिया सुरक्षित रहेगी।

निष्कर्ष 

आधुनिक काल में भी अपने शरीर और मन की रक्षा करना संभव है, और यह करने का रास्ता हमारे पाचन क्रिया से होकर गुज़रता है। जब पाचन क्रिया की रक्षा करने की बात आती है, तो नियम और दिनचर्या सबसे लाभकारी तरीके होते हैं। और यह नियमित दिनचर्या हर दिन के लिए आवश्यक होती है। आयुर्वेद हमे संतुलन के बारे में बताता है, वह बताता है की चाहे हमारे आस पास की परिस्थितियाँ बदलती रहे, हम स्वयं को स्वस्थ बनाये रख सकते है। संतुलन की ओर बढ़ाये गए छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।

References:

Ahara (Diet) in Ayurveda: Principles of a Balanced Meal

Weekday and Weekend Differences in Eating Habits, Physical Activity and Screen Time Behavior among a Sample of Primary School Children: The “Seven Days for My Health” Project - PMC

Weekday–Weekend Differences in Chrononutritional Variables Depend on Urban or Rural Living - PMC

What Is the Ayurvedic Diet? Benefits, Downsides, and More

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC4815005/

Vegetarian Diets, Ayurveda, and the Case for an Integrative Nutrition Science - PMC

Fundamental Principles | Directorate of AYUSH

Relationships among classifications of ayurvedic medicine diagnostics for imbalances and western measures of psychological states: An exploratory study - PMC

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

क्योंकि वीकेंड पर ज़िम्मेदारियाँ कम होती हैं, इसलिए लोग आराम और मौज-मस्ती में समय बिताते हैं, जिसका सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है।

कुछ बदलावों और बातों का ध्यान रखकर कामकाजी लोग भी दिनचर्या अपना सकते हैं। बिना किसी रूटीन या नियम के जीना और बे-वक्त खाना खाने से तो यह कहीं बेहतर है।

पकी हुई गर्म सब्ज़ियाँ और मौसम के फल एक अच्छी शुरुआत हो सकते हैं, साथ ही साबुत अनाज और गर्म पानी भी।

खाने की चीज़ों का मेल यह तय करने में मदद करता है कि कौन सी चीज़ें किसी व्यक्ति के शरीर के लिए सबसे ज़्यादा फायदेमंद हैं, और फिर उन चीज़ों को हफ़्ते के किसी भी दिन सही समय और सही मात्रा में खाया जा सकता है।

हाँ, खाना खाने का समय उतना ही ज़रूरी है जितना कि खुद खाना। दिन के समय के हिसाब से खाना खाने से पहले खाने की चीज़ की प्रकृति और शरीर की पाचन शक्ति का ध्यान रखना चाहिए।

आयुर्वेदिक जीवनशैली शरीर को कम तनाव वाला माहौल देती है, जिससे शरीर बेहतर तरीके से ठीक होता है और धीरे-धीरे इम्यून सिस्टम मज़बूत होता है।

हाँ। जहाँ प्राकृतिक अनाज खाना पूरी तरह ठीक है, वहीं बहुत ज़्यादा प्रोसेस्ड, रिफाइंड सफेद मैदे में प्राकृतिक फाइबर और नमी बिल्कुल नहीं होती।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us