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Diabetes में पैरों में जलन और सुन्नपन: इसे हल्के में क्यों नहीं लेना चाहिए

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जो हमारे शरीर को अंदर ही अंदर कई तरीकों से नुकसान पहुंचाती है। अक्सर आपने सुना होगा या खुद भी महसूस किया होगा कि डायबिटीज के मरीजों के पैरों में अचानक से बहुत तेज जलन होने लगती है या फिर पैर बिल्कुल सुन्न पड़ जाते हैं। यह कोई आम थकान या कमजोरी नहीं है। रात के टाइम यह दिक्कत इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि लोगों की नींद तक खुल जाती है। अगर आप या आपके घर में कोई इस परेशानी से गुजर रहा है, तो इसे मामूली बात मानकर इग्नोर करने की गलती बिल्कुल न करें। यह शरीर का एक इशारा है जो बता रहा है कि अंदर कुछ बड़ी गड़बड़ चल रही है। आइए इस बात को थोड़ा गहराई से समझते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है 

Diabetes में पैरों में जलन और सुन्नपन क्यों होता है?

जब शरीर में ब्लड शुगर का लेवल लंबे समय तक बढ़ा रहता है, तो इसका सीधा असर हमारी नसों (Nerves) पर पड़ता है। पैरों में जलन और सुन्नपन का सबसे मुख्य कारण नसों का डैमेज होना है। बढ़ा हुआ शुगर लेवल खून की नलियों को नुकसान पहुँचाता है, जिससे पैरों की नसों तक सही मात्रा में ऑक्सीजन और ज़रूरी पोषक तत्व नहीं पहुँच पाते। पोषण की कमी के कारण नसें कमज़ोर होकर डैमेज होने लगती हैं। जब ये नसें मस्तिष्क को सही संदेश नहीं भेज पातीं, तो हमें पैरों में चींटियाँ चलने, सुन्न होने या आग जैसी जलन का एहसास होता है। यह एक धीमी लेकिन बेहद गंभीर प्रक्रिया है, जिसे समय रहते कंट्रोल करना बहुत ज़रूरी है।

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

मेडिकल एक्सपर्ट्स और डॉक्टर्स का साफ तौर पर मानना है कि डायबिटीज़ में पैरों का सुन्न होना या जलन होना एक सीरियस मेडिकल कंडीशन है जिसे 'पेरिफेरल न्यूरोपैथी' (Peripheral Neuropathy) कहा जाता है। एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि अगर इस स्थिति को शुरुआत में ही नहीं संभाला गया, तो मरीज़ अपने पैरों की महसूस करने की क्षमता पूरी तरह खो सकता है। इसका मतलब है कि अगर पैर में कोई चोट लग जाए या छाला पड़ जाए, तो मरीज़ को दर्द का एहसास ही नहीं होगा। यही वजह है कि एक्सपर्ट्स हमेशा सलाह देते हैं कि शुगर को कंट्रोल में रखें और पैरों की नियमित जाँच करवाएँ ताकि किसी बड़े खतरे से बचा जा सके।

आँकड़े क्या कहते हैं: कितने प्रतिशत डायबिटीज़ के मरीज़ होते हैं इसके शिकार?

अगर हम आँकड़ों की बात करें, तो यह समस्या बहुत ही आम और चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और कई बड़ी मेडिकल रिसर्च के अनुसार, डायबिटीज़ के लगभग 50 प्रतिशत (50%) मरीजों को अपने जीवन में कभी न कभी नर्व डैमेज यानी न्यूरोपैथी का सामना करना ही पड़ता है। इसका मतलब है कि हर दो में से एक डायबिटिक इंसान पैरों में जलन, सुन्नपन या झुनझुनी की परेशानी से जूझ रहा है। इसके अलावा, लगभग 15 से 25 प्रतिशत मरीजों में पैरों में अल्सर (घाव) होने का खतरा बना रहता है, जो आगे चलकर बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। ये आँकड़े हमें चेताते हैं कि डायबिटीज़ में पैरों की सेहत से कोई भी समझौता नहीं किया जा सकता।

आयुर्वेद डायबिटीज़ में पैरों की जलन को किस नज़रिए से देखता है?

आयुर्वेद के अनुसार, हमारा शरीर वात, पित्त और कफ इन तीन दोषों पर काम करता है। आयुर्वेद डायबिटीज़ (जिसे प्रमेह या मधुमेह कहा जाता है) को मुख्य रूप से कफ और वात दोष के असंतुलन का परिणाम मानता है। जब बात पैरों में जलन की आती है, तो आयुर्वेद इसे 'पित्त' और 'वात' के दूषित होने से जोड़कर देखता है। बढ़ा हुआ शुगर शरीर में 'आम' (Toxins) पैदा करता है। यह विषैला पदार्थ जब खून के साथ पैरों की तरफ जाता है, तो वहाँ पित्त (गर्मी) को भड़का देता है, जिससे पैरों के तलवों में भयंकर जलन होती है। वहीं, वात दोष के बिगड़ने से नसों में रूखापन आता है, जिससे सुन्नपन महसूस होता है।

क्या यह Diabetic Neuropathy का शुरुआती संकेत हो सकता है?

जी हाँ, पैरों में जलन और सुन्नपन 'डायबिटिक न्यूरोपैथी' के बिल्कुल शुरुआती और सबसे अहम संकेत हो सकते हैं। इसे पहचानने के लिए इन बातों पर गौर करें:

  • झुनझुनी महसूस होना: पैरों की उँगलियों और तलवों में ऐसा लगना जैसे बहुत सारी चींटियाँ रेंग रही हों।
  • दर्द और ऐंठन: रात के समय पैरों की मांसपेशियों में अचानक से तेज़ खिंचाव और दर्द होना।
  • स्पर्श का पता न चलना: नंगे पाँव ज़मीन पर चलने पर भी ज़मीन की ठंडक या गर्माहट महसूस न होना।
  • सुई चुभने जैसा एहसास: बैठे-बैठे अचानक पैरों में बारीक सुई या पिन चुभने जैसा तीखा दर्द होना।
  • बैलेंस बिगड़ना: चलते समय पैरों पर सही से वज़न न पड़ना और बार-बार लड़खड़ाना।

पैरों में जलन और सुन्नपन के साथ दिखने वाले अन्य Warning Signs

इस समस्या के साथ-साथ अगर पैरों में कुछ और बदलाव दिखें, तो वे खतरे की घंटी (Warning Signs) हो सकते हैं:

  • घाव का न भरना: पैरों में छोटा सा कट या छाला हो जाना और हफ्तों तक उसका ठीक न होना।
  • त्वचा के रंग में बदलाव: पैरों या उँगलियों का रंग लाल, नीला या काला पड़ना शुरू होना।
  • पैरों का रूखापन: स्किन का बहुत ज़्यादा ड्राई होना, फटना और एड़ियों में गहरी दरारें पड़ना।
  • नाखूनों का खराब होना: पैरों के नाखूनों का मोटा होना, पीला पड़ना या फंगस लग जाना।
  • पैर ठंडे रहना: शरीर का तापमान सामान्य होने के बावजूद पैरों का लगातार बर्फ जैसा ठंडा रहना।

किन लोगों में यह समस्या होने का खतरा अधिक रहता है?

डायबिटीज़ के हर मरीज़ को न्यूरोपैथी हो, ऐसा ज़रूरी नहीं है, लेकिन कुछ खास लोगों में इसका रिस्क बहुत ज़्यादा होता है:

  • अनियंत्रित शुगर वाले मरीज़: जो लोग अपना ब्लड शुगर लेवल लंबे समय तक कंट्रोल नहीं कर पाते हैं।
  • पुराने डायबिटिक मरीज़: जिन्हें डायबिटीज़ हुए कई साल बीत चुके हैं (खासकर 10 साल से ज़्यादा समय)।
  • धूम्रपान करने वाले: जो लोग सिगरेट या बीड़ी पीते हैं, उनकी नसें जल्दी कमज़ोर होती हैं और ब्लड सर्कुलेशन खराब होता है।
  • मोटापे के शिकार: जिन लोगों का वज़न ज़्यादा है, उनके पैरों की नसों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
  • किडनी की बीमारी वाले: किडनी ठीक से काम न करे तो खून में टॉक्सिन्स बढ़ते हैं, जो नसों को तेज़ी से डैमेज करते हैं।

Diabetes में पैरों की देखभाल क्यों है बेहद ज़रूरी?

डायबिटीज में पैरों का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है जितना शरीर के किसी और हिस्से का। पैरों में सुन्नपन होने के कारण कई बार चोट लगने पर पता ही नहीं चलता। कभी जूते में पड़ा छोटा सा कंकड़ या निकली हुई कील भी पैर में बड़ा जख्म बना सकती है।जब शुगर बढ़ी हुई होती है, तो जख्म जल्दी सूखता नहीं है और उसमें इंफेक्शन फैलने का खतरा काफी बढ़ जाता है। अगर वक्त रहते ध्यान न दिया जाए तो यह इंफेक्शन हड्डियों तक पहुंच सकता है, जिसे 'गैंग्रीन' कहते हैं। ऐसी नौबत आने पर मरीज की जान बचाने के लिए पैर तक काटना पड़ जाता है। इसीलिए रोज पैरों को धोना-सुखाना और अच्छे से देखना बहुत जरूरी है। 

किन लक्षणों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए?

अगर आपको अपने पैरों में नीचे बताए गए कोई भी लक्षण दिखें, तो तुरंत अलर्ट हो जाएँ:

  • गहरा घाव या छाला: अगर पैर में कोई ऐसा छाला है जिसमें मवाद भर गया हो या खून आ रहा हो।
  • बुखार आना: पैरों में सूजन या लालिमा के साथ अगर आपको तेज़ बुखार आ रहा हो।
  • भयंकर बदबू: पैर के किसी भी हिस्से से या घाव से अजीब और गंदी बदबू आना।
  • अचानक दर्द बढ़ना: ऐसा दर्द जो किसी भी पेनकिलर से कम न हो रहा हो और नींद हराम कर दे।
  • पैर का काला पड़ना: अगर उँगलियों या पैर के किसी हिस्से का रंग अचानक से काला पड़ने लगे, तो यह टिश्यू के डेड होने का संकेत है।

इस समस्या को कम करने के लिए कौन-सी दिनचर्या और खानपान अपनाएं?

आयुर्वेद के अनुसार, इस परेशानी से राहत पाने के लिए आपको अपनी डाइट और लाइफस्टाइल में कुछ खास बदलाव करने होंगे। खानपान में करेला, जामुन, मेथी, नीम, और आँवला जैसी कड़वी और कसैली चीज़ों को शामिल करें। ये चीज़ें शरीर से बढ़े हुए कफ और शुगर को कम करती हैं। मीठे, खट्टे और ज़्यादा नमक वाले भोजन से बचें। दिनचर्या की बात करें तो, सुबह जल्दी उठकर हल्की एक्सरसाइज़ या योगासन करना काफी फायदेमंद है। पैरों को आरामदायक सूती मोज़े पहनाकर रखें। रात को सोने से पहले पैरों को हल्के गुनगुने पानी से धोकर अच्छे से सुखाएँ। तनाव से दूर रहें क्योंकि तनाव वात दोष को बढ़ाता है, जो नसों के लिए नुकसानदायक है।

किन आयुर्वेदिक उपचारों और पंचकर्म से मिल सकती है सहायता?

आयुर्वेद में नसों को दोबारा ताक़त देने और जलन कम करने के लिए कई बेहतरीन उपाय मौजूद हैं:

  • अभ्यंग (Oil Massage): पैरों पर तिल के तेल या महानारायण तेल से हल्के हाथों से मालिश करने से वात शांत होता है।जलन ज़्यादा हो तो चंदन या नारियल का तेल इस्तेमाल करें।
  • पादभ्यंग: काँसे की कटोरी और शुद्ध गाय के घी से पैरों के तलवों की मालिश करने से जलन तुरंत शांत होती है।
  • शिरोधारा: यह तनाव को कम करने और नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करने की सबसे बेहतरीन पंचकर्म विधि है।
  • बस्ती कर्म: आयुर्वेद में बस्ती को वात रोगों की आधी चिकित्सा माना गया है। यह शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालता है।
  • औषधियाँ: गिलोय, अश्वगंधा, शिलाजीत और चंद्रप्रभा वटी जैसी आयुर्वेदिक दवाएँ नसों को अंदरूनी मज़बूती देती हैं ।

तुरंत डॉक्टर से कब मिलना चाहिए?

कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनमें घरेलू उपाय आज़माने का इंतज़ार बिल्कुल नहीं करना चाहिए:

  • जब पैरों में कुछ भी महसूस होना पूरी तरह से बंद हो जाए।
  • घाव तेज़ी से बढ़ने लगे और उसका आकार अचानक बड़ा हो जाए।
  • पैर में लालिमा और सूजन इतनी ज़्यादा बढ़ जाए कि चलना-फिरना मुश्किल हो जाए।
  • बुखार के साथ-साथ चक्कर आ रहे हों या उल्टी महसूस हो रही हो।
  • जब पैरों का रंग बदलकर नीला या काला होने लगे।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में क्या अंतर है

पहलू आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
मुख्य फोकस बीमारी के कारण की पहचान कर दर्द और अन्य लक्षणों का वैज्ञानिक उपचार करना। समग्र स्वास्थ्य, जीवनशैली और शरीर के संतुलन पर ध्यान देना।
उपचार का तरीका दवाइयाँ, फिजियोथेरेपी, आवश्यक जाँच और अन्य चिकित्सकीय उपचार। जड़ी-बूटियाँ, आहार, योग, दिनचर्या और आवश्यकता अनुसार पंचकर्म जैसे आयुर्वेदिक उपाय।
असर होने की गति कई स्थितियों में अपेक्षाकृत जल्दी राहत मिल सकती है। नियमित पालन के साथ धीरे-धीरे समग्र स्वास्थ्य में सुधार पर ज़ोर दिया जाता है।
सुरक्षा दवाओं के संभावित दुष्प्रभावों की निगरानी की जाती है और उनका उपयोग डॉक्टर की सलाह से किया जाता है। आयुर्वेदिक औषधियाँ भी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह और सही मात्रा में ही लेनी चाहिए।
दीर्घकालिक दृष्टिकोण रोग नियंत्रण, पुनर्वास और जटिलताओं की रोकथाम पर ध्यान दिया जाता है। संतुलित आहार, जीवनशैली और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने पर बल दिया जाता है।

निष्कर्ष

डायबिटीज़ में पैरों में जलन और सुन्नपन कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे आप बस बर्दाश्त करते रहें। यह एक स्पष्ट चेतावनी है कि आपका ब्लड शुगर लेवल आपके शरीर के अहम हिस्सों को नुकसान पहुँचा रहा है। पैरों की देखभाल, सही खानपान, रोज़ाना व्यायाम और अपने शुगर लेवल को कंट्रोल में रखकर आप इस भयंकर बीमारी के खतरनाक परिणामों से बच सकते हैं। आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद का ज्ञान इस समस्या को जड़ से समझने और नसों को प्राकृतिक रूप से मज़बूत बनाने में हमारी बहुत मदद करता है। जागरूक बनें, अपने पैरों की सेहत को गंभीरता से लें और किसी भी असामान्य बदलाव को हल्के में न लें।

References

https://www.who.int/news-room/fact-sheets/detail/diabetes

https://www.who.int/india/diabetes

https://applications.emro.who.int/dsaf/dsa509.pdf

https://www.healthline.com/health/diabetes

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

अगर शुरुआत में ही शुगर लेवल कंट्रोल कर लिया जाए और सही इलाज मिले, तो पैरों की जलन को काफी हद तक कम और ठीक किया जा सकता है।

जी हाँ, दिनभर की थकान और रात में तापमान गिरने के कारण रात के समय पैरों में जलन और दर्द बहुत ज़्यादा महसूस होता है।

बिल्कुल नहीं! सुन्नपन के कारण बर्फ से स्किन जल सकती है (Frostbite)। हमेशा ठंडे या गुनगुने पानी का ही इस्तेमाल करें, वो भी पहले तापमान जाँचने के बाद।

विटामिन B12 और B Complex नसों की सेहत के लिए सबसे ज़रूरी माने जाते हैं। डॉक्टर की सलाह पर आप इनके सप्लीमेंट्स ले सकते हैं।

हाँ, सही और आरामदायक जूते पहनकर हल्की सैर करने से पैरों का ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है, जो नसों के लिए बहुत फायदेमंद है।

पैरों के तलवों पर काँसे की कटोरी से शुद्ध गाय का घी मलना (पादभ्यंग) जलन को तुरंत शांत करने का सबसे असरदार और पुराना आयुर्वेदिक उपाय है।

ज़रूर! धूम्रपान छोड़ने से खून की नलियाँ चौड़ी होती हैं और नसों तक ऑक्सीजन का प्रवाह बढ़ता है, जिससे सुन्नपन में कमी आती है।

अगर पैरों में सुन्नपन बहुत ज़्यादा है, तो नंगे पाँव कभी न चलें। घास में छुपे कीड़े, काँटे या पत्थर से घाव हो सकता है जिसका आपको पता भी नहीं चलेगा।

जी हाँ, पैरों को रोज़ हल्के गुनगुने पानी से धोना और उँगलियों के बीच की जगह को अच्छी तरह सुखाना बहुत ज़रूरी है ताकि कोई फंगल इन्फेक्शन न पनपे।

डॉक्टर आमतौर पर पैरों की संवेदनशीलता जाँचने के लिए मोनोफिलामेंट टेस्ट (Monofilament Test) या नर्व कंडक्शन स्टडी (NCS) की सलाह देते हैं।

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