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Chronic pain में चिड़चिड़ापन क्यों बढ़ जाता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि शरीर में लगातार दर्द रहने की वज़ह से आप छोटी-छोटी बातों पर झल्लाने लगे हों? क्रॉनिक पेन यानी पुराना दर्द सिर्फ आपके शरीर को ही नहीं, बल्कि आपके दिमाग को भी पूरी तरह से थका देता है। जब इंसान हफ्तों, महीनों या सालों तक लगातार दर्द बर्दाश्त करता है, तो उसकी सहनशक्ति बिल्कुल खत्म होने लगती है। ऐसे में आस-पास के लोगों को लगता है कि आपका स्वभाव खराब हो गया है, जबकि असल में आपका शरीर अंदर ही अंदर एक बड़ी जंग लड़ रहा होता है। इस ब्लॉग में हम समझेंगे कि आखिर पुराने दर्द के कारण इंसान इतना चिड़चिड़ा क्यों हो जाता है और इस मानसिक उलझन से बाहर निकलने का सबसे सही रास्ता क्या है।

एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं?

मेडिकल फील्ड के बड़े मनोवैज्ञानिकों और दर्द विशेषज्ञों का साफ मानना है कि क्रॉनिक पेन और हमारी भावनाओं का आपस में बहुत गहरा कनेक्शन है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि जब शरीर में लगातार दर्द रहता है, तो दिमाग का नर्वस सिस्टम हमेशा 'अलर्ट मोड' में रहता है। इससे दिमाग बहुत ज़्यादा थक जाता है। डॉक्टरों की राय में, जब मरीज़ बहुत ज़्यादा गुस्से या चिड़चिड़ेपन की शिकायत लेकर आते हैं, तो उसे खराब बर्ताव नहीं बल्कि मेडिकल भाषा में 'पेन फटीग' कहा जाता है। दिमाग की सारी ऊर्जा जब लगातार दर्द सहने में ही खर्च हो जाएगी, तो ज़ाहिर सी बात है कि इंसान को छोटी बातों पर भी भयानक गुस्सा आएगा।

दर्द सहते-सहते इंसान का स्वभाव क्यों बदल जाता है?

यह एक बहुत ही लाज़मी सवाल है कि दर्द सहते-सहते आखिर इंसान का स्वभाव इतना क्यों बदल जाता है। दरअसल, पुराना दर्द कोई एक या दो दिन की बात नहीं है। जब यह लगातार बना रहता है, तो आपके दिमाग से 'सेरोटोनिन' और 'एंडोर्फिन' जैसे खुशी देने वाले रसायनों का स्तर तेज़ी से नीचे गिर जाता है। खुशी के हॉर्मोन्स कम होने से दिमाग में हमेशा एक उदासी और तनाव छाया रहता है। इसके अलावा, लगातार दर्द आपकी रातों की नींद को पूरी तरह से बर्बाद कर देता है। जब नींद ही पूरी नहीं होगी, तो इंसान का चिड़चिड़ा होना और बात-बात पर झल्लाना एक बिल्कुल स्वाभाविक सी प्रतिक्रिया बन जाती है।

आँकड़े क्या कहते हैं: कितने लोग इस चिड़चिड़ेपन के शिकार हैं?

यह जानना बहुत ही दिलचस्प है कि क्रॉनिक पेन से जूझ रहे कितने लोग इस मानसिक परेशानी का शिकार होते हैं। हाल ही के स्वास्थ्य सर्वेक्षणों के आँकड़े बताते हैं कि पुराने दर्द से परेशान लगभग अस्सी प्रतिशत लोग भयंकर चिड़चिड़ेपन और मूड स्विंग्स की शिकायत करते हैं। अगर हम इन कारणों को प्रतिशत में बाँटें, तो लगभग पैंतालीस प्रतिशत मामलों में इसका सीधा कारण रातों की खराब नींद और थकान होता है। तीस प्रतिशत मामलों में यह दिमाग के हॉर्मोन्स बिगड़ने का नतीजा होता है। वहीं बचे हुए पच्चीस प्रतिशत मामलों में समाज और परिवार का सहयोग न मिलना इस चिड़चिड़ेपन को और ज़्यादा बढ़ा देता है।

दर्द कम होने पर भी बेचैनी और गुस्सा क्यों आता है?

कई बार ऐसा होता है कि दर्द की दवा खाने के बाद शरीर का दर्द थोड़ा कम हो जाता है, फिर भी मन में एक अजीब सी बेचैनी और गुस्सा भरा रहता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आपका दिमाग 'पेन मेमोरी' बना लेता है। दिमाग को हमेशा यह डर सताता रहता है कि कहीं यह भयानक दर्द दोबारा से न उठ जाए। यह आने वाले दर्द का डर और भविष्य की चिंता इंसान को कभी रिलैक्स नहीं होने देती। इसके अलावा, बीमारी के कारण जब आप अपने मनपसंद काम नहीं कर पाते या दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं, तो यह लाचारी अंदर ही अंदर एक गहरी बेचैनी को जन्म देती है।

स्वभाव के किन बदलावों को बिल्कुल हल्के में न लें?

यह बिल्कुल सच है कि पुराने दर्द में थोड़ा बहुत झल्लाना या गुस्सा आना एक आम बात है। लेकिन जब दिमाग कुछ गंभीर इशारे देने लगे, तो हमें तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। इन मानसिक बदलावों को कभी भी अनदेखा न करें:

  • डिप्रेशन में जाना: अगर आप खुद को कमरे में बंद कर लें और किसी से भी बात करने का बिल्कुल मन न करे।
  • खुद को नुकसान पहुँचाना: अगर दर्द और गुस्से की वज़ह से मन में अपनी ज़िंदगी खत्म करने के बुरे खयाल आने लगें।
  • अचानक बहुत रोना: बात करते-करते या अकेले बैठे हुए अचानक फूट-फूट कर रोने लगना और खुद पर कंट्रोल न रहना।
  • रिश्तों का टूटना: जब चिड़चिड़ापन इतना ज़्यादा बढ़ जाए कि आपके परिवार वाले आपसे डरने या बात करने से कतराने लगें।

क्या दर्द की तेज़ दवाइयाँ आपका गुस्सा बढ़ा रही हैं?

जी हाँ, कई बार पुराने दर्द को दबाने के लिए हम जो तेज़ दवाइयाँ खाते हैं, वे भी हमारे स्वभाव को खराब करने का एक बहुत बड़ा कारण बन जाती हैं। बहुत से लोगों को स्टेरॉयड्स या तेज़ पेनकिलर्स दिए जाते हैं। इन दवाइयों का काम दर्द के सिग्नल को रोकना होता है, लेकिन इनके गंभीर साइड इफेक्ट्स भी होते हैं। लगातार ऐसी दवाइयाँ खाने से पेट में भयंकर गैस और एसिडिटी बनती है, जो सीधे दिमाग पर चढ़ती है। इसके अलावा, कई दवाइयाँ हमारे नर्वस सिस्टम को सुन्न करती हैं, जिसके असर से इंसान हमेशा कन्फ्यूज़ रहता है और बात-बात पर उसे बहुत ज़्यादा गुस्सा आने लगता है।

पुराने दर्द और मानसिक तनाव पर आयुर्वेदिक नज़रिया

आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, हमारा पूरा शरीर वात, पित्त और कफ इन तीन दोषों पर ही चलता है। क्रॉनिक पेन और उसके साथ आने वाला गुस्सा, मुख्य रूप से 'वात' और 'पित्त' दोष के भयंकर असंतुलन का नतीजा है। जब शरीर में दर्द होता है, तो वात दोष बढ़ता है जिससे नसों में रूखापन आता है। वहीं जब इंसान दर्द सहते हुए फ्रस्ट्रेट होता है, तो उसका पित्त दोष (यानी शरीर की गर्मी) बहुत तेज़ हो जाता है। पित्त के बेकाबू होने से ही दिमाग में चिड़चिड़ापन और गुस्सा भर जाता है। आयुर्वेद कहता है कि सिर्फ दर्द को दबाना काफी नहीं है, बल्कि बढ़े हुए पित्त और वात को शांत करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

दर्द और गुस्से से तुरंत राहत पाने के आसान तरीके

जब आपको दर्द के साथ-साथ बहुत तेज़ गुस्सा आने लगे, तो तेज़ दवाइयों के अलावा कुछ प्राकृतिक और घरेलू तरीके आज़माने चाहिए। ये तरीके आपके दिमाग और शरीर दोनों को तुरंत आराम पहुँचाते हैं:

  • लंबी और गहरी साँसें लें: खुली हवा में बैठें और अपनी आँखें बंद करके गहरी साँसें लें, इससे दिमाग को तुरंत ऑक्सीजन मिलती है।
  • हल्की गुनगुनी सिकाई: दर्द वाली जगह पर गर्म पानी की थैली या हीटिंग पैड से सिकाई करें, इससे नसों का तनाव कम होता है।
  • हर्बल चाय पिएँ: दूध वाली चाय छोड़कर ताज़ी कैमोमाइल चाय पिएँ, यह आपके भड़के हुए नर्वस सिस्टम को तुरंत शांत करती है।
  • दिमाग को डायवर्ट करें: अपनी पसंद का हल्का संगीत सुनें या कोई अच्छी किताब पढ़ें, जिससे दर्द से आपका ध्यान पूरी तरह हट जाए।

क्या बढ़ता हुआ मानसिक तनाव इसका मुख्य कारण है?

दोनों को बहुत ज्यादा बढ़ा देती है। जब आप अपनी बीमारी, नौकरी या घर-परिवार को लेकर लगातार सोचते और परेशान रहते हैं, तो शरीर में 'कोर्टिसोल' नाम का स्ट्रेस हार्मोन काफी बढ़ जाता है। इस हार्मोन के बढ़ने की वजह से शरीर की मांसपेशियां हमेशा खिंची और अकड़ी रहती हैं। एक तरफ मांसपेशियों की इस अकड़न से दर्द बहुत बढ़ जाता है, तो दूसरी तरफ यह हार्मोन दिमाग को शांत ही नहीं होने देता। सच कहें तो, यह दिमागी तनाव और शरीर का दर्द मिलकर इंसान का मूड और स्वभाव पूरी तरह खराब कर देते हैं। 

क्रॉनिक पेन में दिमाग शांत रखने के रोज़मर्रा के उपाय

अगर आप चाहते हैं कि पुराने दर्द की वज़ह से आपके घर का माहौल खराब न हो और आप अंदर से शांत रहें, तो आपको अपनी दिनचर्या में कुछ छोटे लेकिन असरदार बदलाव करने होंगे:

  • अच्छी और गहरी नींद लें: रोज़ाना एक ही समय पर सोने की पक्की आदत डालें, सात घंटे की नींद दिमाग को रीचार्ज करती है।
  • ध्यान (Meditation) करें: रोज़ सुबह सिर्फ पंद्रह मिनट आँखें बंद करके ध्यान लगाएँ, इससे गुस्से पर कंट्रोल करना बहुत आसान हो जाता है।
  • हल्का व्यायाम करें: अगर संभव हो तो बहुत हल्की स्ट्रेचिंग करें, जिससे शरीर में अच्छे और खुशी देने वाले हॉर्मोन्स रिलीज़ हो सकें।
  • परिजनों से खुलकर बात करें: अपनी तकलीफ को अंदर ही अंदर न घोंटें, अपने परिवार को बताएँ कि आपको असल में कैसा महसूस हो रहा है।

आयुर्वेद और एलोपैथी: इलाज के तरीकों में क्या अंतर है?

पहलू आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
बीमारी का नज़रिया क्रॉनिक दर्द और मानसिक तनाव के कारणों की पहचान कर वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर उपचार किया जाता है। समग्र स्वास्थ्य, आहार-विहार, जीवनशैली और व्यक्ति की प्रकृति के संतुलन पर ध्यान दिया जाता है।
उपचार का तरीका आवश्यकता के अनुसार दवाइयाँ, फिजियोथेरेपी, मनोवैज्ञानिक उपचार, तनाव प्रबंधन और अन्य चिकित्सकीय उपाय अपनाए जाते हैं। जड़ी-बूटियाँ, योग, ध्यान, संतुलित आहार, दिनचर्या तथा आवश्यकता अनुसार आयुर्वेदिक उपचार पर ज़ोर दिया जाता है।
सुरक्षा दवाइयाँ और उपचार डॉक्टर की सलाह से दिए जाते हैं तथा उनके लाभ व संभावित दुष्प्रभावों की निगरानी की जाती है। आयुर्वेदिक औषधियाँ और उपचार भी केवल योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से ही अपनाने चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य तनाव प्रबंधन के लिए काउंसलिंग, मनोचिकित्सा, जीवनशैली में बदलाव और आवश्यकता अनुसार दवाइयों का उपयोग किया जाता है। ध्यान, योग, दिनचर्या और समग्र स्वास्थ्य के माध्यम से मानसिक संतुलन बनाए रखने पर बल दिया जाता है।
दीर्घकालिक लक्ष्य दर्द नियंत्रण, कार्यक्षमता में सुधार और जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाना। संतुलित जीवनशैली, समग्र स्वास्थ्य और लंबे समय तक शारीरिक व मानसिक संतुलन बनाए रखना।

स्वभाव बिगड़ने पर मनोवैज्ञानिक या डॉक्टर से कब मिलें?

वैसे तो क्रॉनिक पेन में स्वभाव का बदलना एक बहुत ही आम बात है जिसे परिवार के साथ से सुधारा जा सकता है। लेकिन जब स्थिति हाथ से निकलने लगे, तो आपको तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए:

  • दवाइयों की लत लगना: जब आप दर्द और बेचैनी से बचने के लिए तय सीमा से बहुत ज़्यादा पेनकिलर्स खाने लगें।
  • बर्ताव हिंसक हो जाना: अगर गुस्से में आकर आप चीज़ें तोड़ने लगें या किसी को शारीरिक नुकसान पहुँचाने की कोशिश करें।
  • लगातार पैनिक अटैक आना: जब अचानक साँस घुटने लगे, बहुत पसीना आए और किसी अनजाने खतरे का भयानक डर सताने लगे।
  • नींद बिल्कुल उड़ जाना: अगर दर्द और तनाव के कारण आप कई रातों तक बिल्कुल भी न सो पाएँ और हर पल बेचैन रहें।

निष्कर्ष

क्रॉनिक पेन यानी पुराना दर्द इंसान को सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी पूरी तरह तोड़ कर रख देता है। ऐसे में चिड़चिड़ापन बढ़ना या बात-बात पर गुस्सा आना आपकी कोई कमज़ोरी नहीं है, बल्कि यह शरीर का एक सीधा इशारा है कि अब वह बुरी तरह थक चुका है। इसे सिर्फ एक खराब बर्ताव समझने के बजाय बीमारी का ही एक हिस्सा समझना चाहिए। इसे सिर्फ तेज़ दवाइयाँ खाकर ठीक नहीं किया जा सकता है। इसके लिए आपको परिवार के साथ की, सही जीवनशैली की और अपने दिमाग को शांत रखने की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है। अपने शरीर की ज़रूरतों को समझें और मानसिक स्वास्थ्य को कभी नज़रअंदाज़ न करें। पौष्टिक खानपान, नियमित ध्यान और तनाव-मुक्त जीवन ही आपका सच्चा साथी है। अगर परेशानी ज़्यादा तंग करे, तो हमेशा डॉक्टर से सही सलाह लें।

References

https://www.healthline.com/health/chronic-pain

https://www.healthline.com/health/chronic-pain/chronic-pain-treatment-options

https://www.who.int/news/item/01-02-2021-who-issues-new-guidelines-on-the-management-of-chronic-pain-in-children

https://www.who.int/who-revision-of-pain-management-guidelines

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

जी हाँ, जब इंसान लंबे समय तक दर्द सहता है तो दिमाग बुरी तरह थक जाता है। इससे सहनशक्ति खत्म हो जाती है और इंसान का स्वभाव बहुत ज़्यादा चिड़चिड़ा और गुस्सैल बन जाता है।

दर्द के समय आपके दिमाग का अलार्म सिस्टम चालू हो जाता है। नर्वस सिस्टम तनाव में आ जाता है और दिमाग को लगता है कि शरीर खतरे में है, इसी घबराहट की वज़ह से आपको तुरंत तेज़ गुस्सा आता है।

जब भी दर्द उठे तो अपनी आँखें बंद करके कुछ देर लंबी साँसें लें और दर्द वाली जगह पर हल्की गर्म सिकाई करें। इससे आपकी नसें रिलैक्स होंगी और दिमाग का गुस्सा भी अपने आप शांत होने लगेगा।

बिल्कुल नहीं। रोना कोई कमज़ोरी नहीं है, बल्कि यह शरीर का तनाव बाहर निकालने का एक बहुत ही प्राकृतिक तरीका है। रोने से शरीर में रिलैक्स करने वाले हॉर्मोन्स निकलते हैं जिससे आपको काफी हल्का महसूस होता है।

हाँ, क्रॉनिक पेन में सबसे ज़्यादा असर नींद पर ही पड़ता है। जब आप सात-आठ घंटे की अच्छी नींद नहीं लेते हैं, तो दिमाग अपनी मरम्मत नहीं कर पाता और अगले दिन छोटी सी बात पर भी भयंकर झल्लाहट होती है।

आपको अपने परिवार वालों के साथ बैठकर खुलकर बात करनी चाहिए। उन्हें बताएँ कि आप जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहे हैं, बल्कि यह पुराने दर्द की वज़ह से हो रहा है। इससे वे आपकी तकलीफ को बेहतर समझ पाएँगे।

जी हाँ, चाय और कॉफी में बहुत ज़्यादा कैफीन होता है जो आपके नर्वस सिस्टम को ट्रिगर करता है। इससे बेचैनी और तनाव और भी ज़्यादा बढ़ जाता है। इसलिए इनकी जगह हर्बल चाय पीना ज़्यादा फायदेमंद है।

योगा शरीर को लचीला बनाता है और मांसपेशियों का तनाव पूरी तरह दूर करता है। अगर आप रोज़ाना हल्का योग और ध्यान करते हैं, तो शरीर में खुशी देने वाले हॉर्मोन्स बढ़ते हैं जो दर्द और गुस्से दोनों को कम करते हैं।

बिल्कुल, हमारा दिमाग और शरीर गहराई से जुड़े हैं। जब आप अपनी बीमारी के बारे में हर वक्त बुरा सोचते हैं, तो तनाव बढ़ता है। तनाव आपकी नसों को और सिकोड़ देता है जिससे पुराना दर्द अचानक बहुत तेज़ हो जाता है।

जब भी बहुत तेज़ गुस्सा आए, तो सबसे पहले एक गिलास ठंडा पानी पिएँ और एक से दस तक उल्टी गिनती गिनें। अगर हो सके तो उस कमरे से बाहर निकलकर खुली हवा में थोड़ा टहल लें, इससे दिमाग तुरंत शांत हो जाएगा।

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