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Depression के मरीज़ क्यों खाना नहीं खाते या ज़्यादा खाते? आयुर्वेदिक नज़रिया

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 13 May, 2026
  • category-iconUpdated on 13 May, 2026
  • category-iconMental Health
  • blog-view-icon5006

डिप्रेशन (Depression) या अवसाद सिर्फ मन की उदासी नहीं है, बल्कि यह हमारे शरीर और भूख पर भी गहरा असर डालता है। आपने देखा होगा कि डिप्रेशन के मरीज़ या तो बिल्कुल खाना छोड़ देते हैं या फिर तनाव कम करने के लिए बहुत ज़्यादा (Binge eating) खाने लगते हैं। आधुनिक विज्ञान इसे हार्मोनल बदलाव मानता है, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार यह 'मनोवह स्रोतस' (दिमाग की नसों) और 'जठराग्नि' (पाचन तंत्र) के बीच का तालमेल बिगड़ने का नतीजा है। सही इलाज से मन और पाचन दोनों को प्राकृतिक रूप से संतुलित किया जा सकता है।

Depression में भूख का बदलना क्या है?

जब इंसान मानसिक तनाव या डिप्रेशन से गुज़रता है, तो उसके शरीर का नर्वस सिस्टम (Nervous system) लगातार एक दबाव में रहता है। ऐसे में कुछ लोगों का पाचन तंत्र एकदम सुस्त पड़ जाता है और उन्हें बिल्कुल भूख नहीं लगती। वहीं दूसरी ओर, कुछ लोग अपनी उदासी, अकेलापन और खालीपन भरने के लिए मीठा, फास्ट फूड या भारी खाना ज़्यादा खाने लगते हैं। इसे इमोशनल ईटिंग (Emotional eating) कहते हैं। आमतौर पर लोग इसका शिकार खराब लाइफस्टाइल, अकेलेपन या किसी गहरे सदमे के कारण होते हैं। एंटीडिप्रेसेंट (Antidepressants) गोलियाँ खाने पर कुछ समय के लिए मन सुन्न हो जाता है, लेकिन ये शरीर के अंदर मौजूद उस दोष को ठीक नहीं करतीं जिसके कारण भूख बिगड़ती है।

भूख बदलने के मुख्य लक्षण और संकेत

आम उदासी और डिप्रेशन में बहुत फर्क होता है। डिप्रेशन में भूख से जुड़े मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • भूख का बिल्कुल खत्म होना: पेट खाली होने पर भी कुछ खाने की इच्छा न होना और भोजन बेस्वाद लगना।
  • इमोशनल ईटिंग: पेट भरा होने के बावजूद लगातार कुछ न कुछ चबाने या मीठा खाने की तेज़ इच्छा होना।
  • वज़न में अचानक बदलाव: बिना किसी डाइटिंग के वज़न का तेज़ी से गिर जाना या बहुत ज़्यादा बढ़ जाना।
  • रात में ज़्यादा खाना: आधी रात को नींद खुलना और तनाव कम करने के लिए जंक फूड या मीठा खोजना।
  • पाचन की खराबी: खाना न पचना, गैस बनना और पुरानी कब्ज़ की शिकायत रहना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

मरीज़ खाना क्यों छोड़ देते हैं या ज़्यादा क्यों खाते हैं?

डिप्रेशन में भूख के इस उतार-चढ़ाव के पीछे सिर्फ उदासी कारण नहीं, बल्कि शरीर के अंदर चल रहे कई बड़े बदलाव ज़िम्मेदार होते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • खाना छोड़ने का कारण (Cortisol): बहुत ज़्यादा तनाव और चिंता के कारण शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है, जो जठराग्नि (पाचन अग्नि) को बुझा देता है। शरीर 'फाइट या फ्लाइट' मोड में होने से भूख का अहसास खत्म हो जाता है।
  • ज़्यादा खाने का कारण (Dopamine): उदासी और सुस्ती के कारण शरीर में खुशी देने वाले हार्मोन (सेरोटोनिन और डोपामाइन) की कमी हो जाती है। दिमाग इस कमी को पूरा करने के लिए मीठा और जंक फूड खाने का सिग्नल देता है, जिससे कुछ पल के लिए अच्छा महसूस होता है।
  • वात और कफ की अशुद्धि (Ayurvedic Cause): गलत खान-पान से शरीर में टॉक्सिन्स (आम) बनता है। यह दिमाग की नसों (मनोवह स्रोतस) को ब्लॉक कर देता है और मानसिक असंतुलन पैदा करता है।

Depression और भूख बदलने पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से डिप्रेशन सिर्फ दिमाग की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे वात और कफ दोष के बिगड़ने तथा ओजस (Immunity/Vitality) के कमज़ोर होने की श्रेणी में रखा जाता है। आयुर्वेद मानता है कि मानसिक सेहत का सीधा संबंध हमारे पेट यानी 'जठराग्नि' से होता है।

  • वात (Vata) का असर: जब इंसान में चिंता, डर और घबराहट बढ़ती है, तो वात दोष बिगड़ता है। यह पेट की अग्नि को सुखा देता है, जिससे इंसान का खाना-पीना छूट जाता है और वह कमज़ोर हो जाता है।
  • कफ (Kapha) का असर: जब इंसान में उदासी, सुस्ती और खालीपन हावी होता है, तो कफ दोष बिगड़ता है। इंसान खुद को शांत करने के लिए भारी और मीठा खाना शुरू कर देता है। आयुर्वेद में बस मन को सुन्न करना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि जठराग्नि तेज़ हो, शरीर से 'आम' (गंदगी) बाहर निकले और मन प्राकृतिक रूप से शांत हो।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर इंसान का मन और शरीर अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके शरीर के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: मरीज़ भूख न लगने से परेशान है या ज़्यादा खाने से, इसकी बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: पहले खायी गई नींद की गोलियों और एंटीडिप्रेसेंट दवाओं का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: मरीज़ के रोज़ाना के खान-पान, सोने के समय और मानसिक तनाव के कारणों को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: इन सभी बातों का अच्छे से विश्लेषण करने और बिगड़े हुए वात या कफ को पकड़ने के बाद ही प्राकृतिक इलाज शुरू किया जाता है।

Depression और भूख के लिए महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में दिमाग को शांत करने, जठराग्नि बढ़ाने और हॉर्मोन्स को बैलेंस करने के लिए ये जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह स्ट्रेस हार्मोन (कोर्टिसोल) को कम करती है। यह नसों को ताक़त देती है और बिगड़े हुए वात को शांत कर भूख को सामान्य करती है।
  • ब्राह्मी (Brahmi): यह दिमाग के लिए सबसे बेहतरीन टॉनिक है। यह सेरोटोनिन के स्तर को प्राकृतिक रूप से बढ़ाती है जिससे इमोशनल ईटिंग की आदत छूटती है।
  • जटामांसी (Jatamansi): यह मन की बेचैनी, डर और घबराहट को जड़ से खत्म करती है और गहरी नींद लाने में मदद करती है।
  • शंखपुष्पी (Shankhpushpi): यह दिमाग की नसों को ठंडा रखती है और जठराग्नि को सुधारती है ताकि खाना शरीर में लगे।

आयुर्वेदिक पंचकर्म: मन की शांति और शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, जमे हुए टॉक्सिन्स को बाहर निकालकर बेदाग मन पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • शिरोधारा (Shirodhara): इसमें औषधीय तेल या काढ़े की लगातार धारा माथे पर डाली जाती है। यह नर्वस सिस्टम को तुरंत रिलैक्स करती है और डिप्रेशन को जड़ से काटती है।
  • अभ्यंग (Abhyanga): औषधीय तेलों से पूरे शरीर की मालिश की जाती है, जिससे जड़ों में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है और वात दोष शांत होता है।
  • विरेचन (Virechan): पेट में जमा टॉक्सिन्स (आम) को बाहर निकालने के लिए आँतों की गहरी सफाई की जाती है, जिससे जठराग्नि तेज़ होती है।

Depression के रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद के अनुसार, डिप्रेशन की समस्या को दूर करने के लिए हल्का, ताज़ा और सात्विक आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • सात्विक और ताज़ा भोजन: ताज़े फल, पुरानी मूंग की दाल और दलिया का इस्तेमाल बढ़ाएँ, यह मन को शांति देते हैं।
  • गाय का घी: रोज़ाना भोजन में शुद्ध गाय का घी शामिल करें, यह वात दोष को शांत करता है और दिमाग को ताक़त देता है।
  • हर्बल चाय: कैमोमाइल (Chamomile), सौंफ या तुलसी की चाय पिएँ, यह घबराहट और भूख की कमी को ठीक करती है।

क्या न खाएँ?

  • फास्ट फूड और जंक फूड: पिज़्ज़ा, बर्गर और बाहर का तला हुआ खाना बिल्कुल बंद कर दें, यह शरीर में कफ और आलस बढ़ाते हैं।
  • मैदा और रिफाइंड चीनी: बाज़ार की मिठाइयाँ और कोल्ड ड्रिंक्स का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, ये इमोशनल ईटिंग को भड़काते हैं।
  • कैफीन और शराब: बहुत ज़्यादा चाय, कॉफी या शराब का सेवन दिमाग की नसों को कमज़ोर करता है।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच सिर्फ लक्षणों को देखकर नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है।

  • सबसे पहले आपकी मानसिक परेशानी, उदासी और भूख में आए बदलाव को आराम से सुना जाता है।
  • आपकी पुरानी दवाओं (जैसे Antidepressants) के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके खाने-पीने और जंक फूड लेने की आदतों को समझा जाता है।
  • आपकी नींद, कब्ज़ और पेट साफ होने की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की वात-पित्त-कफ प्रकृति को जाना जाता है।

इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो आपके मन और पेट दोनों को पूरी तरह स्वस्थ करे।

इलाज के लिए जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में डिप्रेशन की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है:

  • हल्की समस्या में सुधार: अगर तनाव की शुरुआत है, तो आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही नींद अच्छी आने लगती है और भूख सामान्य होने लगती है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर डिप्रेशन सालों पुराना है और मरीज़ दवाओं पर निर्भर है, तो हॉर्मोन्स को सेट होने और मन को शांत होने में 3 से 6 महीने का समय लग सकता है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य एंटीडिप्रेसेंट दवाओं से मूड और दिमागी केमिकल्स को नियंत्रित करना वात दोष और पाचन सुधारकर मन व शरीर को भीतर से संतुलित करना
नज़रिया समस्या को केवल मानसिक और न्यूरोकेमिकल असंतुलन मानना वात असंतुलन, ‘आम’ और कमजोर अग्नि को मूल कारण मानना
उपचार तरीका Antidepressants और दवाओं पर निर्भरता जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म और प्राकृतिक चिकित्सा से मानसिक शांति बढ़ाना
डाइट और लाइफस्टाइल दवाओं के साथ सीमित लाइफस्टाइल सलाह सात्विक आहार, योग, ध्यान और नियमित दिनचर्या पर ज़ोर
लंबा असर दवाओं पर निर्भरता, वज़न बढ़ना और दवा छोड़ने पर लक्षण लौटना प्राकृतिक रूप से संतुलित मन, बेहतर पाचन और दीर्घकालिक मानसिक शांति मिलना

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

डिप्रेशन और भूख की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • लगातार कई दिनों तक बिल्कुल भी भूख न लगे और वज़न तेज़ी से गिर जाए।
  • बहुत ज़्यादा खाने के बाद उल्टी करने का मन करे (Bulimia)।
  • रात भर नींद न आए और बेचैनी बनी रहे।
  • मन में लगातार नकारात्मक विचार आएँ और घर से बाहर निकलने का मन न करे।
  • एंटीडिप्रेसेंट खाने के बावजूद वज़न बढ़ता जाए और सुस्ती बनी रहे।

समय पर सलाह लेने से मानसिक स्वास्थ्य को स्थायी रूप से डैमेज होने से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के अनुसार डिप्रेशन में भूख का बिल्कुल खत्म हो जाना या बहुत ज़्यादा खाना, शरीर के वात और कफ दोषों के असंतुलन का सीधा परिणाम है। यह सिर्फ एक मानसिक बीमारी नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध हमारी जठराग्नि (पाचन) से जुड़ा है। सिर्फ नींद की गोलियाँ या एंटीडिप्रेसेंट खाने से भूख की यह समस्या जड़ से खत्म नहीं होती। अश्वगंधा, ब्राह्मी जैसी जड़ी-बूटियों, शिरोधारा (पंचकर्म) और सही आहार को अपनाकर मन को शांत किया जा सकता है और जठराग्नि को प्राकृतिक रूप से ठीक किया जा सकता है।

FAQs

बहुत ज़्यादा तनाव होने पर शरीर में वात दोष और कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ जाता है जो पेट की पाचन अग्नि को बुझा देता है जिससे भूख का अहसास बिल्कुल खत्म हो जाता है।

हाँ जब शरीर में खुशी देने वाले हार्मोन कम हो जाते हैं तो दिमाग तुरंत अच्छा महसूस करने के लिए मीठे और फास्ट फूड की माँग करता है जिसे इमोशनल ईटिंग कहते हैं।

बिल्कुल आयुर्वेद मानता है कि मानसिक सेहत और जठराग्नि आपस में जुड़े हैं कब्ज़ रहने से शरीर में टॉक्सिन्स बनते हैं जो नसों को ब्लॉक करके दिमाग में भारीपन और उदासी लाते हैं।

रात में वात दोष का समय होता है और जो लोग डिप्रेशन में होते हैं उनकी नींद अक्सर रात में टूट जाती है इस खालीपन और घबराहट को दूर करने के लिए वे ज़्यादा खाना खाते हैं।

हाँ अश्वगंधा तनाव को कम करने वाली बेहतरीन औषधि है यह दिमाग को शांत करती है और नर्वस सिस्टम को ताक़त देकर प्राकृतिक रूप से भूख को सामान्य करती है।

हाँ शिरोधारा एक आयुर्वेदिक पंचकर्म है जिसमें माथे पर तेल गिराया जाता है यह दिमाग को गहराई से रिलैक्स करता है जिससे जंक फूड खाने की लालसा और तनाव तुरंत कम हो जाता है।

हाँ कई एंटीडिप्रेसेंट दवाओं का सीधा असर मेटाबॉलिज़्म पर पड़ता है जिससे शरीर में सुस्ती आती है और बिना ज़्यादा खाए भी वज़न तेज़ी से बढ़ने लगता है।

तुलसी कैमोमाइल या सौंफ की हर्बल चाय पीना बहुत फायदेमंद है यह दिमाग को शांत करती है और पाचन को ठीक कर भूख के असंतुलन को प्राकृतिक रूप से सुधारती है।

हाँ बाज़ार का तला हुआ और मैदा युक्त जंक फूड शरीर में कफ दोष और आलस को बढ़ाता है जिससे दिमाग को सही पोषण नहीं मिलता और उदासी ज़्यादा गहरी हो जाती है।

हाँ रोज़ाना अनुलोम विलोम और भ्रामरी प्राणायाम करने से दिमाग में ऑक्सीजन का प्रवाह बढ़ता है जिससे मन की बेचैनी खत्म होती है और जठराग्नि मज़बूत होती है।

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