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Nadi Pariksha (Pulse Diagnosis) — क्या यह Blood Test से आगे देखता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

हम अक्सर शरीर की किसी भी परेशानी या बीमारी का पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट, एमआरआई MRI और एक्स-रे जैसी आधुनिक मशीनों पर पूरा भरोसा करते हैं। हमें लगता है कि शरीर में क्या चल रहा है, इसका सटीक जवाब केवल एक लैबोरेटरी Laboratory की रिपोर्ट ही बता सकती है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि हज़ारों साल पहले जब ये स्कैनिंग मशीनें नहीं थीं, तब शरीर की हर एक सूक्ष्म बीमारी का पता कैसे लगाया जाता था? कलाई पर तीन उँगलियाँ रखकर शरीर के अंदरूनी रहस्यों को पढ़ने का वह प्राचीन विज्ञान, जिसे आज की दुनिया भी हैरानी से देखती है, हमारे शरीर के उन असंतुलनों को बहुत पहले पकड़ लेता है जो शायद मशीनों की पकड़ में महीनों या सालों बाद आते हैं।

नाड़ी परीक्षा शरीर की गहराई में क्या और कैसे पढ़ती है?

नाड़ी विज्ञान केवल दिल की धड़कन या पल्स गिनने का तरीका नहीं है। यह शरीर में बहने वाली प्राण ऊर्जा, खून के प्रवाह और धातुओं के पैटर्न को डिकोड करने की एक बेहद जटिल और वैज्ञानिक प्रक्रिया है:

  • दोषों का सटीक संचार: हमारी कलाई पर रखी गई वैद्य की तीन उँगलियाँ तर्जनी, मध्यमा और अनामिका क्रमशः वात, पित्त और कफ दोषों के संतुलन या असंतुलन को पढ़ती हैं।
  • आम Toxins की मौजूदगी: क्या आपके शरीर में अनपचा भोजन 'आम' Toxins बनकर घूम रहा है? नाड़ी का भारीपन इस पाचन संबंधी समस्याएं की जड़ को ब्लड रिपोर्ट से बहुत पहले बता देता है।
  • अंगों की कार्यक्षमता Organ Health: नाड़ी के अलग-अलग लेवल Levels से यह पता चलता है कि आपका लिवर, किडनी या हृदय अंदर से कितनी ऊर्जा के साथ काम कर रहे हैं।
  • मानसिक स्थिति का दर्पण: आपकी नाड़ी आपके तनाव और भावनाओं को भी पढ़ लेती है। एंग्जायटी या डिप्रेशन के कारण नाड़ी की चाल पूरी तरह बदल जाती है।

नाड़ी की गति के आधार पर शरीर में असंतुलन कितने प्रकार के होते हैं?

एक अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर जब आपकी कलाई पर उँगलियाँ रखता है, तो उसे हर दोष की एक अलग चाल और गूँज महसूस होती है। आयुर्वेद में मुख्य रूप से नाड़ी की गति को तीन प्रकार के जीवों की चाल से समझा जाता है:

  • वात नाड़ी सर्प गति: जब शरीर में वात दोष भड़कता है, तो नाड़ी सांप Snake की तरह टेढ़ी-मेढ़ी और तेज़ चलती है। यह शरीर में भयंकर खुश्की, नसों की कमज़ोरी और जोड़ों के दर्द का साफ इशारा होती है।
  • पित्त नाड़ी मंडूक गति: पित्त के बढ़ने पर नाड़ी एक मेंढक Frog की तरह उछल-उछल कर चलती है। यह रक्त में अत्यधिक गर्मी, एसिडिटी और लिवर से जुड़ी समस्याओं को दर्शाती है।
  • कफ नाड़ी हंस गति: जब शरीर में कफ बढ़ता है, तो नाड़ी हंस Swan की तरह बहुत धीमी और भारी चलती है। यह धीमे मेटाबॉलिज़्म, सुस्ती और वजन बढ़ने का संकेत देती है।

क्या आपका शरीर भी नाड़ी बिगड़ने के ये चेतावनी वाले संकेत दे रहा है?

बीमारी ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट में आने से बहुत पहले ही आपकी नाड़ी और शरीर के लक्षणों में नज़र आने लगती है। अगर आप शरीर के इन शुरुआती सिग्नल्स को पहचान लें, तो गंभीर रोगों से बचा जा सकता है:

  • बिना वजह की गहरी थकावट: 8 घंटे की नींद के बाद भी उठने का मन न करना और दिन भर क्रोनिक फटीग Chronic fatigue महसूस होना नाड़ी में 'आम' के भारीपन का संकेत है।
  • पेट और पाचन की लगातार खराबी: खाना खाने के बाद पेट का फूलना या लगातार रहने वाली कब्ज़ का बने रहना, जो बताता है कि जठराग्नि सुस्त पड़ चुकी है।
  • लगातार रहने वाला मानसिक तनाव: छोटी-छोटी बातों पर घबराहट होना, पैनिक करना और रातों को नींद न आना प्राण वात के असंतुलन की चेतावनी है।
  • शरीर में भारी जकड़न और दर्द: विशेष रूप से सुबह उठते समय मांसपेशियों या जोड़ों में जकड़न रहना, जो वात और कफ के दूषित होने का इशारा है।

बीमारी की पहचान में लोग क्या बड़ी गलतियाँ करते हैं और उनकी जटिलताएँ?

आधुनिक लाइफस्टाइल में हम अक्सर केवल लक्षणों Symptoms को दबाने की कोशिश करते हैं और असली जड़ तक पहुँचने में बड़ी गलतियाँ कर बैठते हैं:

  • केवल ब्लड रिपोर्ट पर 100% निर्भरता: लोग सोचते हैं कि अगर ब्लड टेस्ट नॉर्मल है, तो वे पूरी तरह स्वस्थ हैं, भले ही उन्हें रोज़ाना भयंकर एसिडिटी या थकावट रहती हो। रिपोर्ट अक्सर बीमारी के बहुत गहरा होने पर ही बिगड़ती है।
  • लक्षणों को अलग-अलग देखना: सिरदर्द के लिए अलग डॉक्टर और पेट के लिए अलग डॉक्टर के पास जाना। लोग यह नहीं समझते कि पाचन और मस्तिष्क का संबंध एक ही नाड़ी से जुड़ा हुआ है।
  • बीमारी पनपने का इंतज़ार करना: लोग तब तक अपनी सुविधाजनक जीवनशैली नहीं बदलते जब तक कि शरीर पूरी तरह काम करना बंद न कर दे।
  • भविष्य की जटिलताएँ: नाड़ी के शुरुआती सिग्नल्स को इग्नोर करने से यही छोटे असंतुलन आगे चलकर डायबिटीज, थायरॉइड और ऑटोइम्यून Autoimmune जैसी लाइलाज बीमारियों का रूप ले लेते हैं।

आयुर्वेद नाड़ी और रोग की जड़ के इस गहरे विज्ञान को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जहाँ बीमारी पैदा होने के बाद उसे ढूंढता है, वहीं आयुर्वेद शरीर में होने वाले उस असंतुलन Imbalance को समझता है जहाँ से बीमारी जन्म लेने वाली होती है।

  • रोग की छह अवस्थाएँ: आयुर्वेद के अनुसार बीमारी 6 चरणों में शरीर में फैलती है। ब्लड टेस्ट अक्सर 4थे या 5वें चरण जब बीमारी पूरी तरह फैल चुकी हो में उसे पकड़ता है, जबकि नाड़ी परीक्षा उसे पहले या दूसरे चरण संचय में ही पकड़ लेती है।
  • प्राण और अग्नि का कनेक्शन: आपकी कलाई पर धड़कने वाली नाड़ी सीधे आपकी जठराग्नि से जुड़ी है। अगर आपका पाचन और आयुर्वेद का संतुलन बिगड़ता है, तो नाड़ी की लय तुरंत टूट जाती है।
  • स्रोतस Channels का विज्ञान: जब शरीर के सूक्ष्म चैनल्स 'आम' से ब्लॉक हो जाते हैं, तो खून और प्राण का प्रवाह रुक जाता है, जिसे एक कुशल वैद्य नाड़ी की गति में आए भारीपन से तुरंत पहचान लेता है।

नाड़ी को शुद्ध और दोषों को संतुलित रखने वाली आयुर्वेदिक डाइट

आपकी नाड़ी का स्पंदन Pulse सीधे तौर पर आपके भोजन से प्रभावित होता है। अपनी नाड़ी और दोषों को शांत रखने के लिए आपको इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनाना चाहिए।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - नाड़ी को शुद्ध और ऊर्जावान बनाने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - नाड़ी को ब्लॉक और दूषित करने वाले)
अनाज (Grains) पुराना जौ, रागी, दलिया, ओट्स, मूंग दाल की खिचड़ी। वाइट ब्रेड, मैदा, पैकेटबंद नूडल्स, बासी पिज़्ज़ा और पास्ता।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, परवल, कद्दू, पालक (हल्के मसालों में पकी हुई)। कच्चा सलाद रात में, बहुत अधिक आलू, भारी कटहल और डिब्बाबंद सब्ज़ियाँ।
फल (Fruits) पपीता, सेब, अनार, अमरूद, मीठे अंगूर। बिना मौसम के फल, कोल्ड स्टोरेज के फल, पैकेटबंद मीठे जूस।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी, कच्ची घानी सरसों का तेल, तिल का तेल। किसी भी प्रकार का रिफाइंड तेल, डालडा, बाज़ार का बार-बार जला हुआ तेल।
पेय पदार्थ (Beverages) ताज़ा मट्ठा, पित्त शांत करने वाले आहार (Pitta pacifying foods) के रूप में नारियल पानी, जीरे का पानी। कोल्ड ड्रिंक्स, बहुत ज़्यादा कैफीन (कॉफी), और बर्फ का ठंडा पानी।

नाड़ी की गति सुधारने वाली जड़ी-बूटियाँ

हमारी इस कुदरत के पास कुछ ऐसी जड़ी-बूटियाँ और दिव्य तत्व मौजूद हैं, जो कमाल का असर दिखाते हैं। ये जड़ी-बूटियाँ हमारे शरीर के भीतर बिगड़े हुए दोषों को फिर से बराबर करने का काम करती हैं:

  • अश्वगंधा: यह हमारे शरीर के भीतर बैठी भारी कमजोरी को बिल्कुल खींचकर बाहर निकाल देता है। इसके साथ ही, यह हमारे प्राण वात को भी एकदम शांत करने का काम करता है।
  • गिलोय: नाड़ी में मौजूद रक्त की अशुद्धि और पित्त की गर्मी को जड़ से खत्म करने के लिए गिलोय एक बेहतरीन ब्लड प्यूरीफायर Blood purifier का काम करती है।
  • ब्राह्मी: तनाव के कारण जब नाड़ी बहुत तेज़ और अनियमित चलने लगती है, तो ब्राह्मी दिमाग और नर्वस सिस्टम को जादुई शांति और ठंडक प्रदान करती है।
  • त्रिफला: आंतों से भयंकर ज़हरीले कचरे 'आम' को बाहर निकालकर नाड़ी के प्रवाह को हल्का करने के लिए त्रिफला का सेवन सबसे सुरक्षित और असरदार उपाय है।
  • शतावरी: शरीर के सूखते हुए तरल पदार्थों को दोबारा हाइड्रेट करने और शरीर में सौम्यता लाने के लिए शतावरी एक बेहतरीन रसायन है।

नाड़ी और नर्वस सिस्टम को शांत करने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

कई बार ऐसा होता है कि गलत रहन-सहन की वजह से शरीर के अंदर का वात या पित्त दोष बहुत ज्यादा भड़क जाता है। जब ऐसा होता है, तो हमारी नाड़ी की चाल भी बहुत ज्यादा तेज या फिर एकदम भारी होने लगती है। ऐसी गंभीर हालत में, पंचकर्म की थेरेपीज़ हमारे बहुत काम आती हैं:

  • शिरोधारा: माथे पर औषधीय तेल की लगातार धारा गिराने की यह शिरोधारा प्रक्रिया नर्वस सिस्टम को शांत करती है और प्राण वात की बिगड़ी हुई नाड़ी को तुरंत अपनी लय में ले आती है।
  • अभ्यंग: शुद्ध वात-शामक औषधीय तेलों से की जाने वाली यह अभ्यंग मालिश सूखी हुई मांसपेशियों में खून का संचार बढ़ाती है और वात दोष कम करने का अचूक काम करती है।
  • विरेचन: यह थेरेपी असल में हमारे लिवर और हमारी आंतों की अंदर से पूरी तरह सफाई करने के लिए अपनाई जाती है। इसे आप एक तरह की बहुत ही गहरी डीप-क्लीनिंग कह सकते हैं। यह अनोखी प्रक्रिया हमारे शरीर के अंदर जमा हो चुके उस फालतू के पित्त को और जहरीले 'आम' को पूरी तरह से बाहर निकाल फेंकती है।
  • नस्य: नाक के ज़रिए औषधीय तेल डालने की यह नस्य थेरेपी सीधे दिमाग की ब्लॉक हुई नसों को खोलती है और सिर का भारीपन खींच लेती है।

नाड़ी के प्रवाह को पूरी तरह संतुलित होने में कितना समय लगता है?

शरीर के भीतर जो बरसों पुराना असंतुलन या गड़बड़ी चल रही है, उसे कुदरती तरीके से पूरी तरह ठीक करने में थोड़ा समय तो लगेगा ही। हमारी नाड़ी को फिर से अपनी पुरानी और सही लय में लौटने के लिए थोड़े नियम-कायदे और लगातार सब्र की जरूरत होती है। यह सब कुछ रातोंरात नहीं हो जाता है।

  • शुरुआती 1-2 महीने: इस शुरुआती समय में सबसे पहले आपके पेट की जो पाचन अग्नि है, यानी आपकी जठराग्नि, वो धीरे-धीरे मजबूत होने लगेगी। आपकी आंतों के अंदर जो 'आम' यानी जहरीला कचरा जमा हो गया था, वो भी धीरे-धीरे कम होने लगेगा। इसके साथ ही, शरीर में जो एक अजीब सा भारीपन बना रहता था, वो भी दूर होना शुरू हो जाएगा।
  • 3-4 महीने: नाड़ी का स्पंदन प्राकृतिक होने लगेगा। वात या पित्त का प्रकोप शांत होगा और आपकी पुरानी बीमारियों के लक्षणों में उल्लेखनीय कमी आएगी।
  • 5-6 महीने: आपका मेटाबॉलिज़्म और नर्वस सिस्टम पूरी तरह से रीबूट हो जाएगा। नाड़ी बिल्कुल शुद्ध और शांत चलेगी, और आपका शरीर भविष्य की बीमारियों से लड़ने के लिए अंदर से फौलादी बन जाएगा।

नाड़ी परीक्षा और मॉडर्न ब्लड टेस्ट आधुनिक विज्ञान में अंतर

बीमारी को पहचानने के इन दोनों तरीकों प्राचीन और आधुनिक में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है। आइए इसे स्पष्ट रूप से समझते हैं:

श्रेणी मॉडर्न ब्लड टेस्ट / स्कैन (आधुनिक विज्ञान) नाड़ी परीक्षा (आयुर्वेदिक विज्ञान)
बीमारी की पहचान का समय बीमारी शरीर में पूरी तरह फैलने और केमिकल बदलाव होने के बाद (Late Stage) पकड़ में आती है। बीमारी पनपने के पहले या दूसरे चरण (संचय अवस्था) में ही शरीर के असंतुलन को पकड़ लेती है।
शरीर को देखने का नज़रिया शरीर को केवल रसायनों (Chemicals) और अंगों का एक ढांचा मानता है। शरीर को ऊर्जा (प्राण), दोषों (वात, पित्त, कफ) और मन के एक संपूर्ण कॉम्बिनेशन (System) के रूप में देखता है।
डायग्नोसिस (Diagnosis) का आधार मशीनें केवल बीमारी का नाम और संख्या (Numbers) बताती हैं, मूल कारण नहीं। यह व्यक्ति की प्रकृति और बीमारी की असली जड़ (Root cause) को स्पष्ट रूप से बता देती है।
रोकथाम (Prevention) बीमारी होने के बाद ही इलाज शुरू किया जा सकता है। बीमारी होने से बहुत पहले ही जीवनशैली और डाइट में सुधार करके उसे रोका जा सकता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

वैसे तो नाड़ी की जांच करके शरीर की बड़ी से बड़ी बीमारियों की गहराई का बहुत पहले ही पता लगाया जा सकता है। लेकिन इन सब बातों के बीच एक बात का ख्याल रखना हर इंसान के लिए बेहद जरूरी है। अगर आपको अचानक अपने शरीर के अंदर कुछ बहुत ही गंभीर या अजीब से बदलाव दिखाई देने लगें, तो फिर बिना कोई पल गंवाए तुरंत डॉक्टर के पास जाकर अपनी जांच करवानी चाहिए।

  • अचानक दिल की धड़कन का बहुत तेज़ या बहुत धीमा होना: अचानक आपके सीने में एक अजीब सा भारीपन या दबाव महसूस होने लगे। बदन से ठंडा पसीना छूटने लगे। और आपकी धड़कन एकदम बेकाबू या अनियंत्रित महसूस होने लगे। अगर ऐसा कुछ होता है, तो तुरंत सचेत हो जाइए। यह सीधे-सीधे हार्ट अटैक का एक बहुत बड़ा और खतरनाक संकेत हो सकता है।
  • बिना वजह अचानक तेज़ी से वज़न गिरना: अगर आपकी डाइट वही है, फिर भी एक ही महीने में आपका वज़न कई किलो गिर जाए और भयंकर कमज़ोरी आ जाए।
  • अचानक शरीर के किसी हिस्से का सुन्न पड़ना: अगर मुँह टेढ़ा होने लगे या हाथ-पैरों में लकवे Paralysis जैसी सुन्नता आ जाए यह स्ट्रोक का इशारा है।
  • लगातार तेज़ बुखार और असहनीय दर्द: कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है कि मरीज को बहुत ही तेज बुखार चढ़ जाता है। और वह बुखार ऐसा होता है कि दुनिया भर की दवाइयाँ खा लेने के बाद भी बिल्कुल कम होने का नाम ही नहीं लेता है। इसके साथ ही, अगर शरीर के किसी भी हिस्से या अंग में बहुत ही तेज, सुई जैसा चुभने वाला ऐसा दर्द हो रहा हो जो बर्दाश्त से बिल्कुल बाहर हो जाए। तो ऐसी हालत में इंसान को तुरंत संभल जाना चाहिए और इसे मामूली नहीं मानना चाहिए।

निष्कर्ष

आधुनिक विज्ञान ने हमें शरीर की जांच करने के लिए बहुत सी मशीनें दी हैं, लेकिन ब्लड टेस्ट और एमआरआई MRI अक्सर बीमारी के उस आखिरी स्टेज को पकड़ते हैं, जब शरीर का सिस्टम पूरी तरह डैमेज हो चुका होता है। इसके विपरीत, नाड़ी परीक्षा Pulse Diagnosis वह प्राचीन 'सुपर-स्कैनर' है जो बीमारी के पनपने से महीनों पहले ही आपके वात, पित्त और कफ में आए असंतुलन की कहानी पढ़ लेता है। जब आप केवल ब्लड रिपोर्ट के नॉर्मल आने पर खुद को स्वस्थ मान लेते हैं, लेकिन दिन भर भयंकर थकावट, एसिडिटी या घबराहट से जूझते रहते हैं, तो आप अपने शरीर के उन शुरुआती अलार्म्स को नज़रअंदाज़ कर रहे होते हैं। इस भ्रम से बाहर निकलें। अपनी नाड़ी के विज्ञान को समझें। अपनी डाइट में प्राकृतिक और ताज़ा भोजन शामिल करें। अश्वगंधा, त्रिफला और गिलोय जैसी दिव्य जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और पंचकर्म की शिरोधारा व अभ्यंग मालिश से अपनी नाड़ी के प्रवाह को शुद्ध करें। अपने शरीर के छिपे हुए रहस्यों को जानने और किसी भी गंभीर बीमारी को पनपने से पहले ही रोकने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद में आकर अपनी नाड़ी परीक्षा करवाएं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेद के अनुसार नाड़ी परीक्षा करवाने का सबसे उत्तम समय सुबह खाली पेट होता है। इस समय शरीर की जठराग्नि और दोष अपने प्राकृतिक रूप में होते हैं और भोजन या बाहरी काम का नाड़ी की गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा होता है।

बिल्कुल। आपकी नाड़ी सिर्फ आपके शारीरिक दोषों को नहीं पढ़ती, बल्कि यह आपके मन (मनोवह स्रोतस) की स्थिति को भी बताती है। एक कुशल वैद्य नाड़ी पकड़कर यह बता सकता है कि आप कितने तनाव, एंग्जायटी या डिप्रेशन से गुज़र रहे हैं।

आयुर्वेद के नियम के अनुसार, पुरुषों की हमेशा दाहिनी (Right) कलाई की नाड़ी जांची जाती है, जबकि महिलाओं की हमेशा बायीं (Left) कलाई की नाड़ी पकड़ी जाती है। इसके पीछे शरीर में प्राण ऊर्जा के प्रवाह का प्राकृतिक विज्ञान होता है।

आप सामान्य रूप से पानी पी सकते हैं, लेकिन नाड़ी परीक्षा से ठीक पहले बहुत अधिक पानी पीने, चाय/कॉफी पीने या कोई भारी व्यायाम (Exercise) करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे नाड़ी की गति कृत्रिम रूप से बदल जाती है।

नाड़ी परीक्षा सीधे तौर पर किसी आधुनिक बीमारी का नाम (जैसे कैंसर) नहीं बताती, लेकिन यह शरीर में पनप रहे खतरनाक आम (Toxins), धातुओं के क्षय और भारी सूजन (Inflammation) को पकड़ लेती है, जो ऐसी गंभीर बीमारियों की शुरुआत होते हैं।

जब शरीर में अनपचा भोजन आम बन जाता है, तो नाड़ी की गति बहुत भारी, सुस्त और चिपचिपी महसूस होती है। वैद्य की उंगलियों को ऐसा लगता है जैसे नाड़ी बहुत दबाव के साथ और रुक-रुक कर चल रही है।

हाँ, नाड़ी परीक्षा पूरी तरह से सुरक्षित और गैर-आक्रामक (Non-invasive) प्रक्रिया है। छोटे बच्चों की नाड़ी पकड़कर भी उनके शरीर के कफ दोष (जो बचपन में स्वाभाविक रूप से ज़्यादा होता है) और पाचन की स्थिति का सटीक पता लगाया जा सकता है।

वात की नाड़ी तर्जनी (Index finger) पर सांप की तरह तेज़ महसूस होती है। पित्त की नाड़ी मध्यमा (Middle finger) पर मेंढक की तरह उछलती हुई महसूस होती है। कफ की नाड़ी अनामिका (Ring finger) पर हंस की तरह धीमी और भारी महसूस होती है।

नाड़ी विज्ञान एक अत्यंत गहरा और जटिल विज्ञान है जिसे सीखने में वैद्यों को सालों का समय और अभ्यास लगता है। आप खुद अपनी पल्स रेट (Heartbeat) गिन सकते हैं, लेकिन दोषों का सूक्ष्म असंतुलन पढ़ना केवल एक अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर ही कर सकता है।

ज़्यादातर मामलों में नाड़ी परीक्षा बीमारी की जड़ बताने के लिए काफी होती है। लेकिन जीवा आयुर्वेद में, अगर डॉक्टर को बीमारी के बहुत गहरे स्तर (ऑर्गन डैमेज) का संदेह होता है, तो वे आधुनिक ब्लड टेस्ट का सहारा भी लेते हैं ताकि प्राचीन और आधुनिक विज्ञान दोनों का बेहतरीन लाभ मरीज़ को मिल सके।

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