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Gut Microbiome और 12 बीमारियाँ — Latest Research आयुर्वेदिक नज़र से

Information By Dr. Keshav Chauhan

आजकल की लेटेस्ट रिसर्च बताती है कि हमारे पेट का 'गट माइक्रोबायोम' (Gut Microbiome) 12 से ज़्यादा गंभीर बीमारियों (जैसे थायरॉइड, डायबिटीज़, मोटापा, डिप्रेशन और ऑटोइम्यून रोग) की जड़ है। लोग इन बीमारियों के लिए रोज़ाना अलग-अलग दवाएँ खाते हैं। आयुर्वेद में इसे बहुत पहले ही 'अग्नि' और 'गट फ्लोरा' के रूप में पहचाना गया था। जब खराब खान-पान से शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनता है और वात-पित्त-कफ बिगड़ते हैं, तो आँतों के अच्छे बैक्टीरिया कम हो जाते हैं। जीवा आयुर्वेद प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और सही दिनचर्या से गट को हील कर इन 12 बीमारियों को जड़ से खत्म करने में मदद करता है।

Gut Microbiome और 12 बीमारियाँ क्या हैं?

गट माइक्रोबायोम हमारी आँतों में मौजूद खरबों बैक्टीरिया और सूक्ष्म जीवों का एक पूरा संसार है। जब ये अच्छे बैक्टीरिया संतुलन में रहते हैं, तो ये खाना पचाते हैं, विटामिन्स बनाते हैं और हमारी इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को कंट्रोल करते हैं। लेकिन खराब लाइफस्टाइल, बहुत ज़्यादा एंटीबायोटिक्स और स्ट्रेस के कारण अच्छे बैक्टीरिया मर जाते हैं और बुरे बैक्टीरिया बढ़ जाते हैं (Dysbiosis)। लेटेस्ट मेडिकल रिसर्च के अनुसार, इसी गट इंबैलेंस के कारण शरीर में सूजन (Inflammation) बढ़ती है, जो सीधे 12 गंभीर बीमारियों को जन्म देती है। लोग इन बीमारियों के लिए जीवन भर अलग-अलग दवाएँ लेते हैं, जो कुछ समय के लिए लक्षणों को सुन्न करती हैं, लेकिन गट को हील नहीं करतीं। बिना डॉक्टर की सलाह के सिर्फ भारी दवाओं पर निर्भर रहना आँतों को हमेशा के लिए कमज़ोर कर देता है।

Gut  इंबैलेंस और 12 बीमारियों से जुड़ी मुख्य स्थितियाँ कौन सी हैं?

गट माइक्रोबायोम के बिगड़ने से आधुनिक चिकित्सा और रिसर्च में मुख्य रूप से ये 12 बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • मोटापा और डायबिटीज़: गट बैक्टीरिया सीधे ब्लड शुगर और फैट स्टोरेज को कंट्रोल करते हैं।
  • थायरॉइड (Thyroid): हार्मोन्स का सही कनवर्ज़न न होना गट की कमज़ोरी से जुड़ा है।
  • पीसीओएस (PCOS): गट का असंतुलन महिलाओं में एण्ड्रोजन हार्मोन बढ़ा देता है।
  • डिप्रेशन और एंग्जायटी: 90% सेरोटोनिन (हैप्पी हार्मोन) आँतों में ही बनता है।
  • इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS): आँतों की गति बिगड़ना और कब्ज़ या दस्त होना।
  • ऑटोइम्यून रोग (Autoimmune Diseases): जैसे रूमेटाइड अर्थराइटिस, जहाँ इम्युनिटी खुद पर हमला करती है।
  • फैटी लिवर (Fatty Liver): टॉक्सिन्स का सीधा लिवर पर भारी ओवरलोड पड़ना।
  • अस्थमा और एलर्जी: कमज़ोर गट इम्युनिटी के कारण फेफड़ों की भयंकर एलर्जी
  • स्किन की बीमारियाँ: एक्ने, सोरायसिस और एक्ज़िमा सीधा गट की गर्मी (पित्त) से जुड़े हैं।
  • क्रोनिक फैटीग (थकान): शरीर का खाने से ऊर्जा न बना पाना।
  • माइग्रेन: गट में गैस और एसिडिटी के कारण लगातार भयंकर सिरदर्द।
  • लीकी गट (Leaky Gut): आँतों की परत का कमज़ोर होना, जिससे टॉक्सिन्स खून में मिल जाते हैं।

Gut  इंबैलेंस (Gut Microbiome असंतुलन) के लक्षण और संकेत

दवाओं से आराम मिलने के बाद बीमारी का बार-बार लौट आना कई आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • पेट का लगातार खराब रहना: रोज़ाना गैस, ब्लोटिंग (पेट फूलना), कब्ज़ या एसिडिटी होना।
  • अचानक वज़न का बढ़ना या घटना: बिना डाइट बदले भी वज़न पर कोई कंट्रोल न रहना।
  • भयंकर थकान और कमज़ोरी: रात भर सोने के बाद भी शरीर का टूटा हुआ महसूस होना।
  • मीठा खाने की तेज़ लालसा: आँतों में बुरे बैक्टीरिया हमेशा मीठा या जंक फूड खाने की लालसा (Craving) पैदा करते हैं।
  • स्किन पर रैशेज़ या मुँहासे: पेट साफ न होने से चेहरे पर अचानक भारी पिंपल्स आना।
  • मूड स्विंग्स: बिना किसी कारण के गुस्सा आना, रोने का मन करना या डिप्रेशन महसूस होना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार Gut फ्लोरा बिगड़ने के कारण (वात, पित्त और कफ वृद्धि)

गट माइक्रोबायोम बिगड़ने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं:

  • एंटीबायोटिक्स का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल: भारी एंटीबायोटिक्स बीमारी के साथ-साथ आँतों के सारे अच्छे बैक्टीरिया भी मार देते हैं।
  • जंक फूड और चीनी का सेवन: मैदा और रिफाइंड चीनी बुरे बैक्टीरिया का सबसे बड़ा भोजन है, जो उन्हें तेज़ी से बढ़ाता है।
  • कमज़ोर पाचक अग्नि: आयुर्वेद के अनुसार जठराग्नि के कमज़ोर होने से शरीर में विषैला 'आम' बनता है, जो गट को सड़ा देता है।
  • तनाव और एंग्जायटी: मानसिक तनाव गट-ब्रेन एक्सिस को बिगाड़ता है, जिससे आँतों का खून का दौरा कम हो जाता है।
  • नींद की कमी: सही नींद न लेने से शरीर का प्राकृतिक रिपेयर सिस्टम काम करना बंद कर देता है।

Gut इंबैलेंस के जोखिम और गंभीर जटिलताएँ

इस असंतुलन को अगर अनदेखा किया जाए या सिर्फ बाहरी दवाओं के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • पोषण की भारी कमी (Malnutrition): गट के खराब होने से शरीर विटामिन और मिनरल्स (जैसे B12 और आयरन) को सोख नहीं पाता।
  • लीकी गट सिंड्रोम (Leaky Gut Syndrome): आँतों की परत फट जाती है और बिना पचे हुए भोजन के कण खून में चले जाते हैं।
  • कैंसर का खतरा: लगातार आँतों में सूजन (Inflammation) रहने से कोलोन कैंसर (Colon Cancer) का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
  • इम्युनिटी का पूरी तरह खत्म होना: शरीर हमेशा बीमार रहने लगता है और मौसमी इन्फेक्शन जल्दी पकड़ते हैं।

समय पर डॉक्टर से परामर्श लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

Gut माइक्रोबायोम (अग्नि और आम) पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से गट माइक्रोबायोम का बिगड़ना कोई नई बात नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'अग्निमांद्य', 'ग्रहणी दोष' और 'आम' (टॉक्सिन्स) के संचय की श्रेणी में रखा जाता है। जब हमारी पाचक अग्नि (Digestion) कमज़ोर होती है, तो शरीर में वात, पित्त और कफ दोष असंतुलित हो जाते हैं। यह दोष आँतों में रहने वाले प्राकृतिक जीवों ('सहज कृमि' या अच्छे बैक्टीरिया) के संतुलन को बिगाड़ देता है। डॉक्टर नाड़ी देखकर ढूँढते हैं कि शरीर में 'आम' कहाँ जमा है। आयुर्वेद में बस बीमारियों के लक्षणों को दबाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि पाचक अग्नि सुधरे, टॉक्सिन्स बाहर निकलें और आँतों का माइक्रोबायोम प्राकृतिक रूप से अपना काम दोबारा शुरू करे।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके शरीर के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: कब्ज़, वज़न बढ़ने और थकान के लक्षणों की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: पिछली बीमारियाँ और खायी जा रही भारी एंटीबायोटिक्स का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: रोज़ाना के खान-पान, सोने के समय और तनाव को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: अग्निमांद्य और गट असंतुलन को पकड़ने के बाद ही गट फ्लोरा को रिसेट करने का सबसे सटीक इलाज शुरू किया जाता है।

Gut फ्लोरा सुधारने और बीमारियाँ दूर करने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में आँतों को ताकत देने, 'आम' पचाने और अच्छे बैक्टीरिया बढ़ाने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • त्रिफला (Triphala): यह आँतों के लिए सबसे बेहतरीन 'प्रीबायोटिक' (Prebiotic) है, जो अच्छे बैक्टीरिया को भोजन देकर उन्हें प्राकृतिक रूप से बढ़ाता है।
  • कुटज (Kutaj): यह आँतों की भयंकर सूजन को कम करता है और आईबीएस (IBS) जैसी समस्या में जादुई रूप से गट को हील करता है।
  • सौंफ और जीरा (Fennel & Cumin): यह पाचक अग्नि को तेज़ करते हैं, गैस को बाहर निकालते हैं और गट के माहौल को ठंडा रखते हैं।
  • गिलोय (Giloy): यह लीकी गट और 12 बीमारियों से लड़ने के लिए इम्युनिटी को अंदर से मज़बूत करता है।

आँतों को ताकत देने के लिए पंचकर्म: दोष शोधन और गट हीलिंग

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, गट माइक्रोबायोम को नया जीवन देने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • विरेचन और बस्ती: जब 12 बीमारियाँ शरीर में घर कर चुकी हों और गट पूरी तरह खराब हो, तो पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली आँतों की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • लिवर और पित्त का डिटॉक्स (विरेचन): इसमें औषधीय घी पिलाकर आँतों में जमे हुए टॉक्सिन्स (आम) को मल के रास्ते पूरी तरह बाहर निकाला जाता है।
  • गट को रिपेयर करने के लिए बस्ती: गुदा मार्ग से औषधीय तेल या काढ़ा डाला जाता है, जो आँतों के रूखेपन को मिटाता है और गट फ्लोरा को तुरंत रिसेट (Reset) करता है।

गट माइक्रोबायोम (Gut Microbiome) के रोगी के लिए सही आहार

गट को वापस स्वस्थ करने के लिए वात-पित्त को शांत करने वाला, सुपाच्य और प्रोबायोटिक युक्त आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • ताज़ा छाछ (Buttermilk): खाने के बाद भुना जीरा डालकर ताज़ा छाछ पिएँ, यह आयुर्वेद का सबसे बेहतरीन 'प्रोबायोटिक' है जो अच्छे बैक्टीरिया बढ़ाता है।
  • फाइबर और पुराना चावल: हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, लौकी और पुराना चावल गट के बैक्टीरिया को ताकत देते हैं।
  • गाय का शुद्ध घी: रोज़ाना डाइट में एक चम्मच घी ज़रूर शामिल करें, यह आँतों की डैमेज लाइनिंग को रिपेयर करता है।

क्या न खाएँ?

  • मैदा और पैकेटबंद फूड: बिस्किट, चिप्स और जंक फूड अच्छे बैक्टीरिया को तेज़ी से मारते हैं, इनका सेवन बिल्कुल बंद कर दें।
  • सफेद चीनी (Refined Sugar): चीनी बुरे बैक्टीरिया और यीस्ट (Candida) का सबसे बड़ा खाना है, जो गट को सड़ाती है।
  • बासी और रूखा खाना: फ्रिज का रखा हुआ ठंडा या कई दिन पुराना खाना शरीर में भारी वात और टॉक्सिन्स पैदा करता है।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच कैसे होती है

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच पूरी समझ के साथ की जाती है। यहाँ कोशिश होती है कि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी और 12 बीमारियों से जुड़े किसी भी लक्षण को आराम से सुना जाता है।
  • आपके एंटीबायोटिक्स खाने के इतिहास और पुरानी दवाओं के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके खाने-पीने और जंक फूड लेने की आदतों को समझा जाता है।
  • आपकी नींद, मानसिक तनाव और पेट साफ होने की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जाना जाता है।

इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो गट माइक्रोबायोम को पूरी तरह रिसेट कर सके।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

पूरी तरह ठीक होने में कितना समय लगता है?

गट की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त इस बात पर निर्भर करता है कि गट का असंतुलन कितना पुराना है और कितनी गंभीर बीमारियाँ शरीर में हैं।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर पेट खराब रहने या गैस की शुरुआत है, तो आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही गट फ्लोरा सुधरने लगता है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर थायरॉइड, डिप्रेशन या लीकी गट सालों पुराना है, तो आँतों को पूरी तरह प्राकृतिक रूप से हील होने में 6 महीने से 1 साल लग सकता है।
  • स्थायी परिणाम: डाइट का कड़ाई से पालन करने पर आँतें मज़बूत हो जाती हैं और ये 12 बीमारियाँ भविष्य में दोबारा लौटकर नहीं आतीं।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक उपचार और दोष-आधारित आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य अलग-अलग बीमारियों के लिए कई दवाओं से लक्षण दबाना गट को हील कर सभी समस्याओं की जड़ पर काम करना
नज़रिया हर बीमारी को अलग समस्या मानना गट माइक्रोबायोम और पाचन तंत्र को पूरे स्वास्थ्य की जड़ मानना
उपचार तरीका एंटीबायोटिक्स और भारी दवाओं पर निर्भरता त्रिफला, छाछ और प्राकृतिक उपायों से गट फ्लोरा सुधारना
डाइट और लाइफस्टाइल सीमित डाइट सलाह, दवाओं पर अधिक फोकस सात्विक भोजन, छाछ, फाइबर और प्राकृतिक दिनचर्या पर ज़ोर
लंबा असर दवाओं से गट माइक्रोबायोम और कमजोर होने का खतरा गट रिपेयर होकर दीर्घकालिक स्वास्थ्य और प्राकृतिक संतुलन प्राप्त होना

Gut की समस्या बढ़ने पर डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • पेट में लगातार दर्द, ऐंठन या भारी गैस रहने लगे जो किसी दवा से ठीक न हो।
  • बिना किसी कारण के वज़न बहुत तेज़ी से बढ़ने या घटने लगे।
  • डिप्रेशन, एंग्जायटी और ब्रेन फॉग इतना बढ़ जाए कि काम करना मुश्किल हो जाए।
  • मल में खून आने लगे या खाना पचना बिल्कुल बंद हो जाए।

समय पर सलाह लेने से शरीर को बड़ी और जानलेवा जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद और लेटेस्ट रिसर्च दोनों मानते हैं कि 'गट माइक्रोबायोम' (Gut Microbiome) का असंतुलन ही शरीर में 12 से ज़्यादा गंभीर बीमारियों की मुख्य वजह है। गलत खान-पान, तनाव और भारी एंटीबायोटिक्स से आँतों के अच्छे बैक्टीरिया मर जाते हैं और विषैला 'आम' बनने लगता है। सिर्फ बाहरी दवाएँ खाने से ये बीमारियाँ नहीं मिटतीं। इलाज में पाचक अग्नि को सुधारना और आँतों को चिकनाई देना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। त्रिफला, छाछ और बस्ती पंचकर्म जैसी आयुर्वेदिक विधियों को अपनाकर हम गट फ्लोरा को पूरी तरह रिसेट कर सकते हैं और एक रोग मुक्त जीवन जी सकते हैं।

FAQs

हाँ, मेडिकल रिसर्च के अनुसार जब गट में बुरे बैक्टीरिया हावी हो जाते हैं, तो वे शरीर के मेटाबॉलिज़्म (अग्नि) को धीमा कर देते हैं और खाने से ज़्यादा कैलोरी सोखकर उसे पेट की चर्बी (Belly fat) में बदल देते हैं।

बिल्कुल, पेट और दिमाग 'गट-ब्रेन एक्सिस' के ज़रिए जुड़े होते हैं। शरीर का लगभग 90% खुशी का हार्मोन (सेरोटोनिन) आँतों में ही बनता है। गट खराब होते ही इंसान सीधा डिप्रेशन और चिड़चिड़ेपन का शिकार हो जाता है।

हाँ, भारी एंटीबायोटिक्स बीमारी के बैक्टीरिया के साथ-साथ आँतों के उन ट्रिलियन्स अच्छे बैक्टीरिया को भी खत्म कर देते हैं जो हमारी इम्युनिटी चलाते हैं, जिससे गट पूरी तरह बर्बाद हो जाता है।

छाछ (ताज़ा मट्ठा) एक बेहतरीन और प्राकृतिक 'प्रोबायोटिक' (Probiotic) है। यह आँतों में वात और पित्त को शांत करता है और अच्छे बैक्टीरिया की कॉलोनी को तेज़ी से बसाने का काम करता है।

जब बुरे बैक्टीरिया और 'आम' के कारण आँतों की नाज़ुक अंदरूनी परत डैमेज हो जाती है, तो उसमें छोटे-छोटे छेद हो जाते हैं। इससे विषैले टॉक्सिन्स सीधे खून में मिल जाते हैं, जिसे लीकी गट कहते हैं।

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार बहुत ज़्यादा रूखा, बासी या जंक फूड खाने से वात भड़कता है। यह आँतों की प्राकृतिक नमी और गट फ्लोरा को सुखा देता है, जिससे भयंकर कब्ज़ और गैस बनती है।

त्रिफला सिर्फ पेट साफ नहीं करता, बल्कि यह एक बेहतरीन 'प्रीबायोटिक' है। यह आँतों को बिना कमज़ोर किए अच्छे बैक्टीरिया को पोषण देता है और गट की डैमेज लाइनिंग को रिपेयर करता है।

रिफाइंड चीनी, मैदा, बहुत ज़्यादा चाय-कॉफी और पैकेटबंद प्रोसेस फूड को तुरंत छोड़ देना चाहिए। ये चीज़ें बुरे बैक्टीरिया का भोजन हैं जो गट को सड़ा कर सूजन पैदा करती हैं।

हाँ, शरीर के एक्टिव थायरॉइड हार्मोन (T3) का लगभग 20% हिस्सा गट में ही एक्टिवेट होता है। अगर गट फ्लोरा खराब है, तो हार्मोन सही से काम नहीं करेगा और थायरॉइड की बीमारी बढ़ जाएगी।

बिल्कुल, विरेचन और बस्ती जैसी पंचकर्म थेरेपी आँतों में जमे हुए सालों पुराने 'आम' और टॉक्सिन्स को बाहर खींच लेती हैं, जिससे गट बिल्कुल साफ होकर अपना काम प्राकृतिक रूप से दोबारा शुरू कर देता है।

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