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55 साल की Urmila Ray को लंबे समय से जोड़ों का दर्द था — क्या यह सिर्फ उम्र का असर था?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 16 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 16 Apr, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5010

दर्द अक्सर धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बन जाता है, और हम उसे सामान्य समझकर अनदेखा करते रहते हैं, जब तक कि वह हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित न करने लगे। ऐसी ही एक कहानी है उर्मिला राय की, जिन्हें पैरों में लगातार दर्द रहता था, घुटनों में तीव्र पीड़ा थी और उनका बायाँ हाथ भी ठीक से उठ नहीं पाता था। इसके साथ ही गैस की समस्या ने उनकी परेशानी को और बढ़ा दिया था। धीरे-धीरे ये तकलीफें इतनी बढ़ गईं कि रोज़मर्रा के साधारण काम भी कठिन लगने लगे और जीवन की सामान्य गति कहीं खोती हुई महसूस होने लगी।

कई उपाय करने के बाद उन्हें वास्तविक राहत तब मिली जब उन्होंने जीवा आयुर्वेद में उपचार लिया। वहाँ उपचार केवल दवाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि रहने की सुविधा, संतुलित आहार, योग और सही जीवनशैली का समग्र ध्यान रखा गया। इसी समग्र देखभाल ने उनके दर्द को कम करने, शरीर को मजबूत बनाने और उन्हें फिर से एक बेहतर, सक्रिय और आत्मनिर्भर जीवन की ओर लौटने में मदद की।

सालों पुराने घुटने और हाथ के दर्द ने उर्मिला जी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को कैसे प्रभावित किया?

लगातार बना रहने वाला दर्द केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे जीवन को प्रभावित कर देता है। उर्मिला जी के साथ भी यही हुआ। लगभग दस वर्षों तक घुटनों का दर्द, पैरों में कमज़ोरी और बाएँ हाथ को न उठा पाने की समस्या ने उनके हर दिन को कठिन बना दिया था। सुबह उठने से लेकर रात तक, हर काम के साथ दर्द जुड़ा रहता था।

समय के साथ उनकी चलने-फिरने की क्षमता कम होने लगी। घर के काम, बाज़ार जाना, सीढ़ियाँ चढ़ना या थोड़ा चलना भी भारी लगने लगा। इसका असर केवल शरीर पर ही नहीं, बल्कि उनके मन और आत्मविश्वास पर भी पड़ा। धीरे-धीरे वे पहले जैसी सक्रिय नहीं रह पाती थीं और कई बार उन्हें लगता था कि यह समस्या अब शायद कभी ठीक नहीं होगी।

परिवार के साथ समय बिताना भी सीमित हो गया था। साधारण काम जैसे हाथ उठाना, सामान लेना या खुद की देखभाल करना भी चुनौती बन गए थे। यही लंबे समय तक रहने वाले दर्द की सबसे बड़ी समस्या है, यह धीरे-धीरे व्यक्ति के आत्मविश्वास और जीवन की गुणवत्ता को कम कर देता है।

क्या उर्मिला जी के लक्षण किसी बड़ी अंदरूनी समस्या की ओर इशारा कर रहे थे?

कई बार जो दर्द बाहर दिखाई देता है, उसकी जड़ शरीर के अंदर छिपी समस्याओं में होती है। उर्मिला जी के साथ भी ऐसा ही था। उन्हें घुटनों के दर्द के साथ गैस की समस्या, पैरों में भारीपन और बाएँ हाथ को उठाने में कठिनाई थी, जो आयुर्वेद के अनुसार आपस में जुड़े लक्षण हैं।

जब पाचन कमजोर होता है, तो शरीर में आम बनने लगता है, जो जोड़ों में जाकर दर्द, सूजन और जकड़न बढ़ाता है। यही कारण है कि गैस और जोड़ों का दर्द अक्सर साथ दिखाई देते हैं।

उर्मिला जी के लक्षण भी यही दर्शाते थे: गैस से भारीपन, पैरों में कमज़ोरी और बाएँ हाथ की समस्या, जो नसों और वात के असंतुलन से जुड़ी थी।

इसीलिए जीवा आयुर्वेद में उनके इलाज को केवल दर्द तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि पाचन, वात और नसों के संतुलन पर ध्यान दिया गया। इस समग्र दृष्टिकोण से उन्हें बेहतर और स्थायी राहत मिली।

जीवा आयुर्वेद के साथ उर्मिला जी का पहला संपर्क

लगातार घुटनों का दर्द, पैरों में भारीपन और बाएँ हाथ को न उठा पाने की समस्या के कारण उर्मिला जी काफी परेशान रहने लगी थीं। अन्य उपचारों से उन्हें केवल अस्थायी राहत मिल रही थी, लेकिन समस्या बार-बार वापस आ रही थी। इसी वजह से उन्होंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क करने का फैसला किया। शुरुआत में उन्हें भी संदेह था कि क्या आयुर्वेद उनकी इस समस्या में मदद कर पाएगा, लेकिन जब लक्षण रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करने लगे, तो उन्होंने आगे कदम बढ़ाया।

उन्होंने 0129 4264323 पर कॉल करके घर बैठे परामर्श लिया। जीवा के डॉक्टरों ने उनकी पूरी स्थिति को ध्यान से समझा, उनके लक्षण, जीवनशैली और दर्द के पैटर्न को विस्तार से जाना। इसी आधार पर उनके केस की गहरी समझ बनी और सही इलाज की दिशा तय की गई।

पुराने घुटने और हाथ के दर्द में आयुर्वेद क्या समझता है?

जब दर्द सालों तक बना रहे, तो यह समझना ज़रूरी है कि शरीर अंदर से क्या संकेत दे रहा है। आयुर्वेद के अनुसार ऐसे पुराने दर्द अक्सर वात असंतुलन का परिणाम होते हैं। वात के बढ़ने से जोड़ों में सूखापन, जकड़न और दर्द की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।

पुराना घुटने या हाथ का दर्द केवल जोड़ों की समस्या नहीं होता; इसके साथ शरीर में कई और बदलाव भी होते हैं।

आयुर्वेद की दृष्टि से ऐसे दर्द में मुख्य कारण यह हो सकते हैं:

  • वात का बढ़ जाना:  जिससे जोड़ों में खिंचाव, सूखापन और असहजता महसूस होती है।
  • जोड़ों का पोषण कम होना: जब शरीर में धातुएँ कमज़ोर होती हैं, तो जोड़ों की शक्ति घटती है।
  • पाचन की कमज़ोरी: आयुर्वेद मानता है कि पाचन बिगड़ने से शरीर में अपशिष्ट जमा होते हैं, जो जोड़ों में सूजन और दर्द बढ़ा सकते हैं।
  • नसों और मांसपेशियों का असंतुलन: इससे हाथ या पैर की गति सीमित हो सकती है।

दस साल पुराने दर्द के मामले में यह समझना ज़रूरी है कि समस्या सिर्फ एक जगह नहीं होती; पूरा शरीर संतुलन खो देता है। उर्मिला जी के मामले में भी यही देखने को मिला। घुटनों और हाथ का दर्द भले ही मुख्य समस्या दिखाई देता था, पर भीतर वात, पाचन और स्नायु, तीनों प्रभावित थे। आयुर्वेद ऐसे मामलों में केवल दर्द पर ध्यान नहीं देता, बल्कि पूरे शरीर, उसकी आदतों, उसकी ऊर्जा और उसकी गति को समझकर समाधान खोजता है।

आयुर्वेदिक जाँच में उर्मिला जी की समस्या का मूल कारण कैसे समझा गया?

दस साल पुराने दर्द को समझने के लिए केवल जोड़ों की जाँच काफी नहीं होती। आयुर्वेद पूरे शरीर, आदतों और अंदरूनी संतुलन को देखता है। उर्मिला जी की जाँच भी इसी तरह व्यापक तरीके से की गई।

जाँच के मुख्य निष्कर्ष:

  • उनके लक्षणों ने बताया कि वात काफी बढ़ा हुआ था, जिससे जोड़ों में सूखापन और जकड़न हुई।
  • पाचन अग्नि कमजोर थी, जिससे शरीर में आम जमा होकर सूजन और दर्द बढ़ा रहा था।
  • स्नायु और मांसपेशियों में तनाव और कमज़ोरी दिखी, खासकर बाएँ हाथ की गति सीमित थी।
  • पैरों में दर्द और भारीपन ने संकेत दिया कि जोड़ों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल रहा था।
  • जाँच में यह भी समझ आया कि समस्या केवल एक जगह नहीं, बल्कि पूरे शरीर का संतुलन बिगड़ा हुआ था।

आयुर्वेदिक दृष्टि से यही समझ महत्वपूर्ण थी,  इलाज दर्द का नहीं, बल्कि उस असंतुलन का होना चाहिए जिसने दर्द पैदा किया।

जीवा आयुर्वेद में उर्मिला जी की व्यक्तिगत उपचार-योजना (Treatment Approach)

उर्मिला जी के मामले में दर्द को केवल एक जगह की समस्या नहीं माना गया, बल्कि इसे शरीर में फैले समग्र असंतुलन का संकेत समझा गया। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण का उद्देश्य यहाँ केवल दर्द कम करना नहीं, बल्कि शरीर के मूल कारणों को पहचानकर उन्हें संतुलित करना था।

  • पाचन सुधार और आम का निष्कासन: उर्मिला जी को गैस की समस्या थी, जो कमजोर पाचन की ओर इशारा करती है। आयुर्वेद के अनुसार, यही आम शरीर में जमा होकर जोड़ों में दर्द और जकड़न बढ़ाता है। इसलिए पाचन को मजबूत करने और आम को बाहर निकालने पर विशेष ध्यान दिया गया।
  • वात संतुलन और जोड़ों की देखभाल: घुटनों का पुराना दर्द और पैरों में भारीपन वात के असंतुलन का संकेत था। इसे संतुलित करके जोड़ों में लचीलापन लाने और दर्द को धीरे-धीरे कम करने पर काम किया गया।
  • नसों और मांसपेशियों को मजबूती: बाएँ हाथ को न उठा पाना नसों और मांसपेशियों की कमजोरी से जुड़ा था। इनके पोषण और मजबूती के लिए ऐसा उपचार अपनाया गया जिससे हाथ की गति में सुधार हो और शरीर की ताकत वापस आए।
  • जीवनशैली और आहार में सुधार: गलत दिनचर्या और असंतुलित खानपान भी समस्या को बढ़ा रहे थे। इसलिए संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या और हल्की गतिविधियों को शामिल किया गया, जिससे शरीर की रिकवरी तेज हो और लंबे समय तक लाभ बना रहे।

यह सिर्फ उर्मिला जी की कहानी नहीं है। पुराने दर्द से जूझ रहे कई लोग आयुर्वेदिक देखभाल से राहत पाते हैं। जब शरीर को सही दिशा, सही भोजन और सही संतुलन मिलता है, तो वह अपनी ताकत फिर से हासिल कर लेता है।

क्या आयुर्वेदिक दवाइयाँ वाकई सुरक्षित हैं?

उर्मिला जी को भी शुरुआत में यही डर था कि कहीं आयुर्वेदिक दवाइयों से कोई दुष्प्रभाव न हो या उनकी पुरानी समस्या और न बढ़ जाए। लंबे समय से दर्द झेलने के कारण उनका भरोसा कम हो गया था।

लेकिन जीवा आयुर्वेद के चिकित्सकों ने समझाया कि आयुर्वेदिक दवाइयाँ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों पर आधारित होती हैं और शरीर के संतुलन को सुधारने पर काम करती हैं। सही उपचार से पाचन, वात और जोड़ों की समस्या पर मूल स्तर से असर होता है, बिना अतिरिक्त बोझ डाले।

उर्मिला जी के उपचार में अपनाई गई आयुर्वेदिक थेरेपीज़

उर्मिला जी के मामले में उपचार का उद्देश्य केवल दर्द कम करना नहीं था, बल्कि जोड़ों, नसों और पाचन—तीनों को संतुलित करना था। इसके लिए दवाइयों के साथ कुछ प्रभावी आयुर्वेदिक थेरेपीज़ भी शामिल की गईं, जिनसे धीरे-धीरे दर्द और जकड़न में राहत मिली।

    • अभ्यंग (औषधीय तेल मालिश): विशेष जड़ी-बूटियों से बने तेलों से घुटनों, पैरों और हाथ पर मालिश की गई, जिससे जकड़न कम हुई, नसों को आराम मिला और दर्द धीरे-धीरे घटने लगा।
    • जानु बस्ती (घुटनों के लिए विशेष उपचार): घुटनों के आसपास गर्म औषधीय तेल को एक निश्चित समय तक रखा गया, जिससे जोड़ों को गहराई से पोषण मिला और दर्द व सूजन में राहत आई।
    • पिचु (स्थानीय तेल उपचार): बाएँ हाथ और प्रभावित हिस्सों पर औषधीय तेल में भिगोकर कपड़ा रखा गया, जिससे उस क्षेत्र में गर्माहट पहुँची और नसों की जकड़न कम हुई।
  • स्वेदन (भाप चिकित्सा): हल्की हर्बल भाप दी गई, जिससे शरीर की अकड़न कम हुई, रक्त संचार बेहतर हुआ और चलने-फिरने में आसानी हुई।

उर्मिला जी की दिनचर्या और आहार में किए गए बदलाव

पुराने दर्द और गैस की समस्या को ध्यान में रखते हुए उनके खानपान और जीवनशैली में भी जरूरी बदलाव किए गए, ताकि उपचार का असर लंबे समय तक बना रहे।

  • हल्का और सुपाच्य भोजन: ऐसा आहार दिया गया जो पाचन को मजबूत करे और शरीर में भारीपन न बढ़ाए।
  • तैलीय और भारी भोजन में कमी: ऐसी चीज़ों से बचने की सलाह दी गई जो गैस और जोड़ों के दर्द को बढ़ा सकती हैं।
  • हल्की गतिविधि और योग: नियमित हल्की गतिविधियों और योग से शरीर में लचीलापन बढ़ा और धीरे-धीरे ताकत वापस आने लगी।

उर्मिला जी को उपचार से क्या लाभ मिला?

उर्मिला जी के मामले में उपचार का उद्देश्य केवल दर्द को दबाना नहीं, बल्कि शरीर के असंतुलन को ठीक करके धीरे-धीरे स्थायी सुधार लाना था। समग्र देखभाल के बाद उन्हें कई स्तरों पर सकारात्मक बदलाव महसूस हुए।

  • घुटनों और पैरों के दर्द में राहत: लगातार रहने वाला दर्द धीरे-धीरे कम होने लगा, जिससे चलना-फिरना पहले से आसान हो गया।
  • बाएँ हाथ की गतिशीलता में सुधार: जो हाथ पहले ठीक से उठ नहीं पाता था, उसमें धीरे-धीरे हलचल और ताकत वापस आने लगी।
  • भारीपन और गैस की समस्या में कमी: पाचन सुधरने से शरीर का भारीपन कम हुआ और अंदर से हल्कापन महसूस होने लगा।
  • दैनिक कामों में आसानी: घर के छोटे-छोटे काम, जो पहले कठिन लगते थे, अब बिना ज्यादा परेशानी के होने लगे।
  • आत्मविश्वास और ऊर्जा में वृद्धि: दर्द कम होने के साथ उनका आत्मविश्वास बढ़ा और वे खुद को पहले से ज्यादा सक्रिय और सहज महसूस करने लगीं।

रिकवरी का सफर: कैसे जीवा ने उर्मिला जी को धीरे-धीरे राहत दी

आयुर्वेद में उपचार धीरे-धीरे शरीर के अंदर के असंतुलन को ठीक करता है, ताकि जोड़ों, नसों और पाचन, तीनों को सही तरह से सुधारने का समय मिल सके। उर्मिला जी के मामले में भी सुधार क्रमिक रूप से हुआ, लेकिन इसका असर स्थायी रहा।

शुरुआती कुछ हफ्तों में: घुटनों के दर्द और पैरों के भारीपन में हल्की कमी महसूस होने लगी। गैस की समस्या भी थोड़ी नियंत्रित हुई और शरीर पहले से थोड़ा हल्का लगने लगा।

1 से 3 महीनों के दौरान: चलने-फिरने में पहले से ज्यादा आसानी आने लगी। बाएँ हाथ की हलचल में सुधार दिखने लगा और रोज़मर्रा के काम कम कठिन महसूस होने लगे।

3 से 6 महीनों में: दर्द की तीव्रता काफी कम हो गई और बार-बार होने वाली परेशानी में कमी आई। शरीर में ताकत और संतुलन वापस आने लगा, जिससे उर्मिला जी पहले से ज्यादा सक्रिय और आत्मनिर्भर महसूस करने लगीं।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च और पारदर्शिता 

कई लोग सोचते हैं कि ऐसा कस्टमाइज्ड आयुर्वेद बहुत महंगा होगा। लेकिन आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है । जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें ।

  • जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है । (यह एक अनुमानित आधार है और अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।)
  • अधिक व्यापक दृष्टिकोण के लिए विशेष पैकेज प्रोटोकॉल भी हैं, जिन्हें शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है ।
  • इन पैकेज में दवा, परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सत्र, योग और ध्यान मार्गदर्शन, आहार योजना और थेरेपी शामिल हैं । इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है ।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।
  • दवाइयों पर निर्भरता कम: 88% मरीजों ने धीरे-धीरे एलोपैथिक दवाओं और हार्मोनल सपोर्ट पर निर्भरता कम की है।

निष्कर्ष

पुराने दर्द के साथ जीना किसी भी व्यक्ति के लिए थकाने वाला और मन को कमज़ोर करने वाला अनुभव हो सकता है। उर्मिला जी की कहानी यही दिखाती है कि जब सही देखभाल, धैर्य और संपूर्ण उपचार एक साथ मिलते हैं, तो शरीर अपनी क्षमता फिर से पा सकता है। आयुर्वेद की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह आपको सिर्फ दर्द से छुटकारा नहीं दिलाता, बल्कि पूरे शरीर और मन को संतुलित करता है, ताकि आप फिर से सक्रिय, आत्मविश्वासी और सहज महसूस कर सकें।

दस साल की तकलीफ़ के बाद भी जब उनके घुटनों, हाथ और गैस्ट्रिक समस्या में इतना सुधार आ सकता है, तो यह उन सभी के लिए उम्मीद है जो लंबे समय से इसी तरह के दर्द के साथ जी रहे हैं। सही मार्गदर्शन और सही दिनचर्या आपके जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती हैं।

यदि आप भी घुटने, हाथ या किसी पुराने दर्द जैसी समस्या से जूझ रहे हैं, तो हमारे प्रमाणित जीवा वैद्य से आज ही व्यक्तिगत परामर्श लें। कॉल करें: 0129-4264323

FAQs

आयुर्वेद के अनुसार, जोड़ों का दर्द मुख्य रूप से 'वात दोष' के असंतुलन और शरीर में 'आम' (विषाक्त पदार्थों) के जमा होने से होता है। जब पाचन कमजोर होता है, तो यह 'आम' जोड़ों में जाकर जकड़न और दर्द पैदा करता है।

नहीं, जोड़ों का दर्द सिर्फ उम्र पर निर्भर नहीं करता। यह गलत खान-पान, शारीरिक गतिविधि की कमी, चोट या मेटाबॉलिज्म (पाचन अग्नि) के बिगड़ने के कारण युवाओं में भी हो सकता है।

हाँ, आयुर्वेद में इन दोनों का गहरा संबंध है। यदि आपका पाचन खराब है और आपको अक्सर गैस या कब्ज रहती है, तो यह बढ़ा हुआ वात शरीर के विभिन्न जोड़ों में पहुंचकर दर्द और सूजन का कारण बनता है।

एलोपैथी अक्सर पेनकिलर्स के जरिए दर्द के संकेतों को दबाती है, जबकि आयुर्वेद शरीर के दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करता है और दर्द की जड़ (Root Cause) पर काम करता है ताकि राहत स्थायी हो।

अभ्यंग (तेल मालिश) नसों को आराम देती है और रक्त संचार बढ़ाती है। 'जानु बस्ती' में घुटनों पर औषधीय तेल टिकाया जाता है, जो जोड़ों की लुब्रिकेशन (चिकनाई) को वापस लाने और ऊतकों को पोषण देने में मदद करता है।

जी हाँ। आयुर्वेद में 'अन्न' को ही औषधि माना गया है। जोड़ों के दर्द के मरीजों को वात बढ़ाने वाले ठंडे और बासी भोजन से बचना चाहिए और सुपाच्य, ताजा व गर्म भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए।

चूंकि आयुर्वेद बीमारी को जड़ से ठीक करता है, इसलिए इसमें थोड़ा धैर्य आवश्यक है। आमतौर पर 1 से 3 महीनों के नियमित उपचार और सही जीवनशैली के बाद महत्वपूर्ण और स्थायी सुधार दिखने लगता है।

शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित आयुर्वेदिक दवाइयां विशेषज्ञों की देखरेख में लेने पर पूरी तरह सुरक्षित होती हैं। ये शरीर के अन्य अंगों (जैसे लिवर या किडनी) को नुकसान पहुँचाए बिना उपचार करती हैं।

योग और सूक्ष्म व्यायाम जोड़ों के लचीलेपन को बनाए रखने में मदद करते हैं। आयुर्वेदिक दवाओं के साथ विशिष्ट योगासन उपचार की गति को तेज कर देते हैं और शरीर को दोबारा सक्रिय बनाने में सहायक होते हैं।

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