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बवासीर की समस्या का आयुर्वेदिक उपचार: कारण, लक्षण और इलाज

जीवा आयुर्वेद में आपके लक्षणों, रोग की अवस्था और शारीरिक प्रकृति के आधार पर व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार की जाती है। इसमें शामिल होते हैं उपयुक्त आयुर्वेदिक औषधियाँ, प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ, कब्ज को नियंत्रित करने वाला संतुलित आहार और जीवनशैली में आवश्यक सुधार। अगर मल त्याग के समय दर्द, खून आना, जलन या सूजन जैसी समस्या हो रही है, तो इसे नजरअंदाज न करें। आज ही जीवा के अनुभवी आयुर्वेदिक विशेषज्ञों से निःशुल्क परामर्श बुक करें और स्वस्थ जीवन की ओर पहला कदम बढ़ाएँ।

शरीर कुछ समस्याओं के बारे में हमें पहले ही संकेत दे देता है, लेकिन हम अक्सर उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। बवासीर भी ऐसी ही एक समस्या है। शुरुआत में हल्की जलन, शौच के समय दर्द या कभी‑कभी खून की बूंदें दिखना ये संकेत मामूली लग सकते हैं। कई लोग सोचते हैं कि यह अस्थायी परेशानी है और अपने आप ठीक हो जाएगी। लेकिन जब बैठना मुश्किल हो जाए, शौच से डर लगने लगे या दर्द रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तब समझ आता है कि समस्या को हल्के में लेना सही नहीं था।

बवासीर केवल गुदा क्षेत्र की तकलीफ नहीं है। यह पाचन तंत्र, खान‑पान, दिनचर्या और लंबे समय से चली आ रही कब्ज जैसी आदतों से जुड़ी होती है। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि बवासीर क्यों होती है, इसके प्रकार और लक्षण क्या हैं, कब इसे गंभीर मानना चाहिए, और आयुर्वेदिक उपचार किस तरह जड़ पर काम करके राहत देने में मदद कर सकता है।

बवासीर क्या है?

बवासीर (Piles या Hemorrhoids) वह स्थिति है जिसमें गुदा और मलाशय के निचले हिस्से की नसें सूज जाती हैं। जब इन नसों पर लंबे समय तक दबाव पड़ता है, तो वे फूल जाती हैं और दर्द, जलन या रक्तस्राव का कारण बन सकती हैं।

आमतौर पर यह समस्या लंबे समय की कब्ज, शौच के दौरान ज्यादा जोर लगाने, लंबे समय तक बैठने, गर्भावस्था या बढ़ते वजन से जुड़ी होती है। शुरुआत में लक्षण हल्के हो सकते हैं, लेकिन समय के साथ स्थिति बढ़ सकती है। आयुर्वेद में बवासीर को "अर्श" कहा गया है। इसे केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि शरीर के भीतर बने असंतुलन का परिणाम माना गया है। जब पाचन ठीक नहीं रहता और मल सख्त बनने लगता है, तो गुदा क्षेत्र की नसों पर दबाव बढ़ता है। यही दबाव आगे चलकर बवासीर का रूप ले सकता है। 

बवासीर के प्रकार

बवासीर मुख्य रूप से दो प्रकार की मानी जाती है:

1. आंतरिक बवासीर

यह गुदा के अंदर होती है। शुरुआत में दर्द कम होता है, लेकिन शौच के समय खून आ सकता है। कई बार मरीज को केवल रक्तस्राव से ही इसका पता चलता है।

2. बाहरी बवासीर

यह गुदा के बाहर दिखाई दे सकती है। इसमें दर्द, सूजन और बैठने में परेशानी अधिक होती है। कभी‑कभी इसमें खुजली और जलन भी रहती है। कुछ मामलों में सूजी हुई नस के अंदर खून जम सकता है, जिससे तेज दर्द होता है। ऐसी स्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

बवासीर होने के मुख्य कारण

बवासीर अचानक नहीं होती। इसके पीछे रोजमर्रा की आदतें और लंबे समय से चली आ रही समस्याएँ जिम्मेदार होती हैं।

लंबे समय की कब्ज

जब मल सख्त होता है और शौच के दौरान जोर लगाना पड़ता है, तो नसों पर दबाव बढ़ता है। यही दबाव धीरे‑धीरे सूजन का कारण बनता है। मेडिकल रिसर्च के अनुसार chronic constipation बवासीर के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक है।

पानी कम पीना

शरीर में पानी की कमी होने पर मल सूख जाता है। इससे शौच कठिन हो जाता है और दबाव बढ़ता है।

लंबे समय तक बैठना

ऑफिस में घंटों बैठे रहना या शौचालय में ज्यादा देर बैठना गुदा क्षेत्र की नसों पर दबाव डालता है।

गर्भावस्था

गर्भावस्था के दौरान बढ़ता वजन और हार्मोनल बदलाव नसों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं।

मोटापा

अधिक वजन से पेट के निचले हिस्से पर दबाव बढ़ता है, जो बवासीर की संभावना बढ़ा सकता है।

फाइबर की कमी वाला भोजन

रूखा, तला‑भुना और कम फाइबर वाला भोजन कब्ज को बढ़ाता है।

ये सभी कारण मिलकर धीरे‑धीरे स्थिति को बिगाड़ सकते हैं। इसलिए केवल लक्षण दबाना पर्याप्त नहीं होता, कारणों को समझना जरूरी है।

बवासीर को नजरअंदाज करने से क्या हो सकता है?

अगर लंबे समय तक बवासीर का इलाज न किया जाए, तो दर्द और रक्तस्राव बढ़ सकता है। लगातार खून निकलने से शरीर में खून की कमी हो सकती है। कुछ मामलों में सूजन इतनी बढ़ जाती है कि सामान्य गतिविधियाँ भी कठिन हो जाती हैं।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि व्यक्ति शौच से डरने लगता है। वह कम खाना शुरू कर देता है ताकि शौच कम हो। इससे कमजोरी और पाचन की नई समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। इसलिए समय पर सही कदम उठाना जरूरी है।

बवासीर के चरण 

बवासीर के 4 चरण (स्टेज) क्या होते हैं? बवासीर को उसकी गंभीरता के आधार पर चार चरणों में बांटा जाता है:

ग्रेड 1:
नसों में हल्की सूजन होती है। बाहर से दिखाई नहीं देती। केवल रक्तस्राव हो सकता है।

ग्रेड 2:
शौच के समय बाहर आती है लेकिन खुद अंदर चली जाती है।

ग्रेड 3:
बाहर आने के बाद हाथ से अंदर करना पड़ता है।

ग्रेड 4:
हमेशा बाहर रहती है। तीव्र दर्द और सूजन होती है। इस अवस्था में सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है।

Symptoms

क्या आप इनमें से किसी लक्षण से जूझ रहे हैं?

 

बवासीर की जांच कैसे की जाती है?

  • शारीरिक परीक्षण
  • डिजिटल रेक्टल एग्जाम
  • एनोस्कोपी
  • गंभीर मामलों में कोलोनोस्कोपी

अगर लगातार रक्तस्राव हो रहा हो, तो अन्य गंभीर कारणों को भी जांचना जरूरी है।

आयुर्वेद बवासीर को किस तरह समझता है?

आयुर्वेद के अनुसार बवासीर का संबंध मुख्य रूप से पाचन तंत्र और दोषों के असंतुलन से है। जब पाचन शक्ति कमजोर होती है, तो भोजन ठीक से नहीं पचता। इससे शरीर में अपचित पदार्थ जमा होने लगते हैं। यह स्थिति कब्ज को जन्म देती है।

कब्ज बढ़ने पर मल सख्त होता है और शौच के समय अधिक दबाव पड़ता है। आयुर्वेद मानता है कि यह स्थिति विशेष रूप से वात और पित्त के असंतुलन से जुड़ी होती है।

  • वात बढ़ने पर सूखापन और कठोर मल बनते हैं।
  • पित्त बढ़ने पर जलन और रक्तस्राव हो सकते हैं।

इसलिए आयुर्वेदिक उपचार केवल सूजन कम करने पर नहीं, बल्कि पाचन सुधारने और संतुलन बहाल करने पर ध्यान देता है।

आयुर्वेदिक उपचार बवासीर में कैसे मदद करता है?

आयुर्वेदिक उपचार धीरे‑धीरे काम करता है। इसका उद्देश्य शरीर को मजबूर करना नहीं, बल्कि उसे संतुलन में लौटने का अवसर देना है। सबसे पहले कब्ज को नियंत्रित करने पर ध्यान दिया जाता है। मल को नरम और नियमित बनाना जरूरी है ताकि नसों पर दबाव कम हो। इसके लिए हल्के और संतुलित औषधीय संयोजन दिए जाते हैं। कुछ पारंपरिक जड़ी‑बूटियाँ जैसे त्रिफला, हरड़ और इसबगोल पाचन सुधारने में सहायक मानी जाती हैं। वहीं कुछ औषधियाँ सूजन और जलन कम करने में मदद करती हैं। कई मामलों में स्थानीय लेप या तेल भी दिए जाते हैं, जो गुदा क्षेत्र की असहजता कम करने में सहायक होते हैं। लेकिन यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति की स्थिति अलग होती है। इसलिए स्वयं दवा लेने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है।

आयुर्वेदिक उपचार का विस्तृत दृष्टिकोण

आयुर्वेद में बवासीर (अर्श) का उपचार केवल लक्षणों को दबाने तक सीमित नहीं होता, बल्कि रोग की अवस्था, दोष की प्रकृति और रोगी की शारीरिक संरचना (प्रकृति) को ध्यान में रखकर किया जाता है। यही कारण है कि आयुर्वेदिक उपचार व्यक्ति-विशेष के अनुसार बदल सकता है।

1 रोग की अवस्था का मूल्यांकन

उपचार शुरू करने से पहले यह देखा जाता है:

  • बवासीर आंतरिक है या बाहरी
  • रक्तस्राव हो रहा है या नहीं
  • सूजन कितनी है
  • कब्ज की अवधि कितनी पुरानी है
  • रोगी की प्रकृति (वात, पित्त, कफ) क्या है

इस आधार पर उपचार योजना बनाई जाती है।

2  पाचन तंत्र की पुनर्स्थापना (गैस्ट्रो-इंटेस्टाइनल बैलेंस)

आयुर्वेद के अनुसार अर्श का मूल कारण कमजोर अग्नि और मलावरोध है। इसलिए उपचार की शुरुआत आंतों की कार्यप्रणाली को संतुलित करने से की जाती है।

  • आंतों की गतिशीलता (bowel movement) नियमित करना
  • मल को स्वाभाविक रूप से मुलायम बनाना
  • आंतों में जमा विषाक्त पदार्थों (आम) को कम करना

इस चरण का उद्देश्य गुदा क्षेत्र पर दबाव कम करना है।

3 सूजन और रक्तस्राव नियंत्रण

जब नसों में सूजन अधिक हो या रक्तस्राव हो रहा हो, तो विशेष औषधीय संयोजन दिए जाते हैं जो:

  • सूजन कम करें
  • जलन घटाएँ
  • रक्तस्राव को नियंत्रित करें
  • नसों की दीवार को मजबूत करें

यह उपचार रोग की गंभीरता के अनुसार निर्धारित होता है।

4 स्थानीय प्रबंधन (Local Therapeutic Support)

कुछ मामलों में बाहरी असुविधा को कम करने के लिए:

  • औषधीय तेल
  • शीतल लेप
  • गुनगुने जल में बैठने की सलाह
  • स्वच्छता संबंधी निर्देश

दिए जाते हैं, जिससे दर्द और खुजली में राहत मिलती है।

5 उन्नत आयुर्वेदिक हस्तक्षेप (Advanced Ayurvedic Interventions)

गंभीर या पुरानी अवस्था में विशेषज्ञ निम्न विकल्पों पर विचार कर सकते हैं:

  • क्षार आधारित तकनीकें
  • विशेष औषधीय प्रक्रिया
  • नियंत्रित चिकित्सा पद्धतियाँ

ये प्रक्रियाएँ प्रशिक्षित आयुर्वेदिक चिकित्सक द्वारा ही की जानी चाहिए।

6 पुनरावृत्ति रोकने की रणनीति (Recurrence Prevention Plan)

आयुर्वेदिक उपचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि रोग दोबारा न हो। इसके लिए:

  • नियमित आहार योजना
  • फाइबर संतुलन
  • जल सेवन अनुशासन
    दैनिक दिनचर्या सुधार
  • मानसिक तनाव प्रबंधन

पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

बवासीर में क्या खाएं और क्या न खाएं?

आहार इस समस्या में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है।

क्या खाएं

  • फाइबर से भरपूर भोजन
  • हरी सब्जियां (अच्छी तरह पकी हुई)
  • साबुत अनाज
  • पर्याप्त पानी
  • छाछ और हल्का भोजन

क्या न खाएं

  • बहुत ज्यादा तीखा और मसालेदार खाना
  • अत्यधिक तला हुआ भोजन
  • प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड
  • बहुत ज्यादा चाय या कॉफी

संतुलित भोजन से मल नरम रहता है और शौच सहज होता है।

जीवनशैली में किन बदलावों से राहत मिल सकती है?

दवा के साथ‑साथ दिनचर्या में बदलाव जरूरी है।

  • रोजाना एक तय समय पर शौच की आदत डालें
  • शौच के दौरान ज्यादा देर न बैठें
  • लंबे समय तक एक ही जगह न बैठें
  • हल्की सैर या व्यायाम करें
  • तनाव कम करने की कोशिश करें

ये छोटे कदम लंबे समय में बड़ा फर्क डाल सकते हैं।

बवासीर कितने दिन में ठीक होती है?

  • शुरुआती अवस्था: 2–4 सप्ताह में सुधार संभव

  • मध्यम अवस्था: 4–8 सप्ताह

  • गंभीर अवस्था: विशेषज्ञ उपचार आवश्यक

 यह अवधि व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करती है।

कब आयुर्वेदिक डॉक्टर से मिलना चाहिए?

अगर खून आना लगातार जारी है, दर्द बहुत ज्यादा है, सूजन बढ़ रही है या घरेलू उपायों से आराम नहीं मिल रहा, तो विशेषज्ञ से मिलना जरूरी है। आयुर्वेदिक डॉक्टर आपकी प्रकृति, पाचन स्थिति और रोग की अवस्था देखकर उपचार तय करते हैं। इससे इलाज अधिक व्यक्तिगत और प्रभावी बनता है।

निष्कर्ष

बवासीर को छोटी समस्या समझकर टाल देना आगे चलकर परेशानी बढ़ा सकता है। शरीर के संकेतों को समझना और समय पर सही कदम उठाना जरूरी है। आयुर्वेद हमें यह सिखाता है कि केवल लक्षण दबाने के बजाय कारणों को समझकर संतुलन बहाल करना जरूरी है।

सही आहार, संतुलित जीवनशैली और उचित मार्गदर्शन से बवासीर में राहत संभव है। अगर आप या आपके परिवार में कोई इस समस्या से परेशान है, तो समय पर विशेषज्ञ से सलाह लेना समझदारी है। हमारे प्रमाणित जीवा आयुर्वेदिक डॉक्टरों से व्यक्तिगत परामर्श के लिए कॉल करें: 0129-4264323

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