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क्या लंबे समय तक बैठकर काम करने से आपकी कब्ज़ लगातार बढ़ रही है? आयुर्वेदिक दृष्टिकोण देखें

Information By Dr. Keshav Chauhan

सुबह उठते ही अगर आपका पहला ख्याल यह होता है कि आज पेट साफ़ होगा या नहीं, तो यक़ीन मानिए आप अकेले नहीं हैं। कुर्सी पर बैठकर दिन गुज़ारने वाले लाखों लोग रोज़ इसी उलझन के साथ दिन की शुरुआत करते हैं। ऑफिस पहुँचते ही काम का दबाव, मीटिंग्स और समय की कमी इतनी बढ़ जाती है कि शरीर की ज़रूरतें पीछे छूट जाती हैं।

आप शायद ध्यान भी नहीं देते कि घंटों बिना हिले-डुले बैठे रहना, समय पर पानी न पीना और शौच की इच्छा को टालना धीरे-धीरे आपके पाचन को कमजोर बना रहा है। शुरुआत में यह सिर्फ भारीपन या गैस जैसा लगता है, लेकिन कुछ ही समय में कब्ज़ आपकी रोज़मर्रा की परेशानी बन जाती है।

यह लेख आपको यह समझने में मदद करेगा कि बैठकर काम करने की आदत कैसे आपके पेट के दुश्मन बनती जा रही है, आयुर्वेद इसे किस नज़र से देखता है और आप अपनी दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव करके पाचन को फिर से सही दिशा में कैसे ला सकते हैं।

क्यों आज ऑफिस में काम करने वाले लोगों में कब्ज़ की समस्या ज़्यादा देखी जा रही है?

आज का कामकाजी जीवन पहले जैसा नहीं रहा। ज़्यादातर लोग सुबह से शाम तक कुर्सी पर बैठे रहते हैं। आप भी अगर ऑफिस, लैपटॉप या मोबाइल के सामने घंटों बैठे रहते हैं, तो इसका असर सिर्फ आपकी पीठ या आँखों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि सीधे आपके पेट और पाचन पर भी पड़ता है।

पहले के समय में लोगों की दिनचर्या में चलना-फिरना, शारीरिक मेहनत और समय पर भोजन शामिल होता था। लेकिन आज की जीवनशैली में

ये सभी आदतें धीरे-धीरे कब्ज़ को जन्म देती हैं। जब आप लगातार बैठे रहते हैं, तो शरीर की अंदरूनी गतिविधियाँ भी सुस्त पड़ने लगती हैं। आँतों को सही तरह से काम करने के लिए हलचल चाहिए, लेकिन बैठकर काम करने से यह हलचल कम हो जाती है।

इसके अलावा, ऑफिस में काम करते समय आप अक्सर शौच की इच्छा को टाल देते हैं। मीटिंग, कॉल या काम का दबाव इतना होता है कि आप शरीर के संकेतों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यही आदत आगे चलकर कब्ज़ को पुरानी समस्या बना सकती है।

घंटों बैठने से आपका पाचन तंत्र कैसे सुस्त पड़ने लगता है?

आपका पाचन तंत्र शरीर की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो तभी सही चलता है जब शरीर में नियमित गति हो। जब आप चलते हैं, खड़े होते हैं या हल्की गतिविधि करते हैं, तो पेट और आँतों की मांसपेशियाँ भी सक्रिय रहती हैं। इससे मल आगे की ओर बढ़ता है और मल त्याग आसानी से होता है।

लेकिन जब आप घंटों एक ही जगह बैठे रहते हैं, तो

जब मल ज़्यादा देर तक आँतों में रहता है, तो शरीर उससे पानी सोख लेता है। इससे मल सख़्त हो जाता है और बाहर निकलने में परेशानी होती है। यही कारण है कि बैठकर काम करने वाले लोगों को अक्सर ज़ोर लगाना पड़ता है या अधूरी सफ़ाई महसूस होती है।

इसके साथ-साथ मानसिक तनाव भी पाचन को प्रभावित करता है। लगातार काम का दबाव, समय की कमी और बेचैनी सीधे पेट पर असर डालती है। जब मन तनाव में होता है, तो शरीर पाचन को प्राथमिकता नहीं देता। नतीजा यह होता है कि आपको पेट भारी लगने लगता है, गैस बनती है और कब्ज़ की समस्या बढ़ने लगती है।

आयुर्वेद में बैठकर काम करने और कब्ज़ को कैसे देखा जाता है?

आयुर्वेद के अनुसार, शरीर की हर क्रिया तीन दोषों के संतुलन पर निर्भर करती है। इनमें से वात दोष शरीर की गति, सूखापन और मल त्याग को नियंत्रित करता है। जब आप लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं, तो सबसे ज़्यादा असर इसी वात दोष पर पड़ता है।

आयुर्वेद मानता है कि

वात दोष को बढ़ा देता है। बढ़ा हुआ वात आँतों को शुष्क बना देता है, जिससे मल सूख जाता है और मल त्याग में कठिनाई होने लगती है।

जब आप समय पर नहीं खाते, पानी कम पीते हैं और शौच की इच्छा को दबाते हैं, तो यह वात असंतुलन और गहरा हो जाता है। आयुर्वेद इसे केवल पेट की समस्या नहीं मानता, बल्कि पूरे शरीर के संतुलन से जोड़कर देखता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से कब्ज़ एक संकेत है कि आपका शरीर आपको रुककर अपनी जीवनशैली सुधारने का संदेश दे रहा है। यह बताता है कि

  • आपकी दिनचर्या असंतुलित हो चुकी है

  • शरीर को पर्याप्त गति नहीं मिल रही

  • मन और पाचन, दोनों तनाव में हैं

इसलिए आयुर्वेद में कब्ज़ का समाधान सिर्फ दवा से नहीं, बल्कि सही दिनचर्या, भोजन, गतिविधि और मानसिक शांति से किया जाता है। जब आप अपने रोज़मर्रा के छोटे-छोटे व्यवहार बदलते हैं, तो शरीर स्वाभाविक रूप से संतुलन की ओर लौटने लगता है।

क्या वात दोष बढ़ने से कब्ज़ लगातार बनी रह सकती है?

आयुर्वेद के अनुसार जब आपके शरीर में वात दोष बढ़ जाता है, तो कब्ज़ सिर्फ कुछ दिनों की परेशानी नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे लगातार बनी रहने वाली समस्या बन सकती है। वात का स्वभाव रूखा, हल्का और गतिशील होता है। जब यही वात असंतुलित हो जाता है, तो शरीर में सूखापन बढ़ने लगता है और आँतों की स्वाभाविक गति प्रभावित होती है।

अगर आप लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं, समय पर भोजन नहीं करते, पानी कम पीते हैं और मानसिक तनाव में रहते हैं, तो यह सभी बातें वात दोष को और बढ़ा देती हैं। बढ़ा हुआ वात आँतों से नमी खींच लेता है, जिससे मल सख़्त हो जाता है। यही कारण है कि आपको रोज़ पेट साफ़ न होने की शिकायत रहने लगती है।

आयुर्वेद मानता है कि जब तक वात दोष को संतुलित नहीं किया जाता, तब तक कब्ज़ बार-बार लौटती रहती है। आप चाहे जितनी भी दवा ले लें, अगर दिनचर्या और खानपान वही रहता है, तो समस्या जड़ से ठीक नहीं होती। इसलिए कब्ज़ को केवल पेट की नहीं, बल्कि पूरे शरीर के संतुलन से जुड़ी समस्या समझना ज़रूरी है।

कब्ज़ बढ़ने पर शरीर आपको कौन-कौन से संकेत देता है?

आपका शरीर हमेशा संकेत देता है, लेकिन अक्सर आप उन्हें हल्के में ले लेते हैं। कब्ज़ बढ़ने पर शरीर सिर्फ शौच से जुड़ी परेशानी ही नहीं दिखाता, बल्कि कई और छोटे-छोटे लक्षण सामने आने लगते हैं।

कुछ आम संकेत जो आप महसूस कर सकते हैं:

  • सुबह पेट भारी और फूला हुआ लगना

  • मल त्याग के बाद भी पूरी सफ़ाई न होने का एहसास

  • बार-बार गैस बनना या पेट में खिंचाव

  • भूख कम लगना या खाने के बाद सुस्ती महसूस होना

  • शौच के समय ज़ोर लगाना

  • दिनभर थकान या चिड़चिड़ापन

जब मल लंबे समय तक शरीर के अंदर रुका रहता है, तो उसका असर पूरे शरीर पर पड़ता है। पेट ठीक से साफ़ न होने पर आपको सिर भारी लग सकता है, त्वचा पर रूखापन आ सकता है और मन भी बेचैन रहने लगता है।

क्या सिर्फ दवा लेने से बैठकर काम करने वाली कब्ज़ ठीक हो सकती है?

यह एक आम धारणा है कि कब्ज़ हुई तो दवा ले ली और समस्या खत्म। लेकिन अगर आप बैठकर काम करने वाली जीवनशैली जी रहे हैं, तो सिर्फ दवा लेना स्थायी समाधान नहीं है। दवा आपको कुछ समय के लिए राहत ज़रूर दे सकती है, लेकिन समस्या की जड़ वहीं बनी रहती है।

जब आप दवा लेते हैं, तो वह ज़बरदस्ती मल त्याग करवा देती है। लेकिन

  • अगर आप दिनभर बैठे रहते हैं

  • पानी कम पीते हैं

  • भोजन अनियमित है

  • और तनाव लगातार बना रहता है

तो कब्ज़ फिर लौट आती है। धीरे-धीरे शरीर दवा पर निर्भर होने लगता है और बिना दवा के पेट साफ़ होना मुश्किल हो जाता है।

आयुर्वेद इस सोच से अलग रास्ता दिखाता है। यहाँ लक्ष्य सिर्फ मल त्याग करवाना नहीं, बल्कि शरीर को फिर से उसकी स्वाभाविक लय में लाना होता है। आयुर्वेद मानता है कि जब आप

  • वात दोष को शांत करते हैं

  • सही समय पर भोजन करते हैं

  • शरीर को हल्की गतिविधि देते हैं

  • और मन को शांत रखते हैं

तो पाचन अपने आप सुधरने लगता है।

इसलिए अगर आप सच में बैठकर काम करने वाली कब्ज़ से राहत चाहते हैं, तो आपको दवा के साथ-साथ अपनी जीवनशैली पर भी ध्यान देना होगा। छोटे-छोटे बदलाव, जैसे समय पर उठना, थोड़ा चलना, गुनगुना पानी पीना और शौच की इच्छा को न रोकना, लंबे समय में बड़ा असर दिखाते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार बैठकर काम करने वालों को कब्ज़ से राहत कैसे मिल सकती है?

आयुर्वेद के अनुसार कब्ज़ कोई अचानक होने वाली बीमारी नहीं है, बल्कि यह आपके रोज़मर्रा के व्यवहार का परिणाम होती है। जब आप लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं, तो शरीर की स्वाभाविक गति कम हो जाती है और वात दोष बढ़ने लगता है। आयुर्वेद का मानना है कि जब आप शरीर को ज़बरदस्ती नहीं, बल्कि स्वाभाविक तरीक़े से संतुलन में लाते हैं, तभी स्थायी राहत मिलती है।

आपको यह समझना ज़रूरी है कि आयुर्वेद कब्ज़ को सिर्फ पेट तक सीमित नहीं मानता। यह आपकी दिनचर्या, खानपान, मानसिक स्थिति और शारीरिक गतिविधि से जुड़ी समस्या है। इसलिए समाधान भी प्राकृतिक और धीरे-धीरे असर करने वाला होता है।

जब आप समय पर भोजन करते हैं, पर्याप्त पानी पीते हैं और शरीर को हल्की-फुल्की गति देते हैं, तो पाचन तंत्र खुद को सुधारने लगता है। आयुर्वेद में गुनगुना पानी, चिकनाई वाले पदार्थ और सरल भोजन को प्राथमिकता दी जाती है, ताकि आँतों की रूखापन कम हो और मल त्याग आसान बने।

दिनभर कुर्सी पर बैठने वालों के लिए कौन से आयुर्वेदिक उपाय सबसे असरदार हैं?

अगर आप दिनभर कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं, तो कुछ आसान आयुर्वेदिक उपाय आपकी कब्ज़ को काफी हद तक सुधार सकते हैं। ये उपाय न तो मुश्किल हैं और न ही समय लेने वाले, बस नियमितता ज़रूरी है।

  • गुनगुना पानी पीना: सुबह उठते ही और दिनभर थोड़े-थोड़े अंतराल पर गुनगुना पानी पीने से आँतों में नमी बनी रहती है। इससे मल सख़्त नहीं होता और आसानी से बाहर निकलता है।

  • सुबह खाली पेट घी का सेवन: एक चम्मच घी सुबह खाली पेट लेने से आँतों को चिकनाहट मिलती है। यह उपाय विशेष रूप से बैठकर काम करने वालों के लिए लाभकारी माना जाता है।

  • त्रिफला का नियमित उपयोग: त्रिफला आयुर्वेद का प्रसिद्ध मिश्रण है, जो पाचन को साफ़ करता है। रात को हल्के गुनगुने पानी के साथ लेने से सुबह पेट साफ़ होने में मदद मिलती है।

  • हल्की शारीरिक गतिविधि: लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने के बजाय बीच-बीच में उठकर थोड़ा चलना, पाचन को सक्रिय करता है। इससे वात संतुलन में रहता है और कब्ज़ की संभावना कम होती है।

  • शौच की इच्छा को न रोकना: यह सबसे ज़रूरी नियम है। जब भी शरीर संकेत दे, तुरंत शौच जाएँ। बार-बार इच्छा को रोकना कब्ज़ को और बढ़ा देता है।

  • मानसिक तनाव कम करना: कुछ मिनट गहरी साँस लेना या शांत बैठना मन को आराम देता है। जब मन शांत होता है, तो पाचन भी बेहतर होता है।

इन सरल आयुर्वेदिक उपायों को अपनाकर आप धीरे-धीरे महसूस करेंगे कि आपकी कब्ज़ कम हो रही है और पेट हल्का रहने लगा है। आगे हम जानेंगे कि खानपान और दिनचर्या में कौन-से छोटे बदलाव आपकी समस्या को जड़ से सुधार सकते हैं।

निष्कर्ष

दिनभर कुर्सी पर बैठकर काम करना आज आपकी मजबूरी हो सकता है, लेकिन इसके असर को नज़रअंदाज़ करना ज़रूरी नहीं है। अगर आपकी कब्ज़ धीरे-धीरे लगातार बढ़ रही है, तो यह सिर्फ पेट की परेशानी नहीं, बल्कि आपकी जीवनशैली का आईना है। शरीर आपको रोज़ संकेत देता है, बस ज़रूरत है उन्हें समय पर समझने की।

आपने देखा कि कैसे बैठकर काम करना, गलत दिनचर्या और वात दोष का असंतुलन मिलकर पाचन को बिगाड़ देता है। अच्छी बात यह है कि इसका समाधान भी आपके रोज़ के छोटे-छोटे बदलावों में ही छुपा है। सही समय पर भोजन, थोड़ा चलना, गुनगुना पानी पीना और शरीर की बात सुनना, यही आयुर्वेद का सरल रास्ता है।

अगर आप कब्ज़ या पाचन संबंधी किसी भी समस्या से जूझ रहे हैं, तो हमारे प्रमाणित जीवा डॉक्टरों से आज ही व्यक्तिगत परामर्श के लिए संपर्क करें। 0129-4264323

FAQs

  1. क्या गलत बैठने का तरीका भी कब्ज़ को बढ़ा सकता है?

हाँ, लगातार झुककर या एक ही मुद्रा में बैठने से पेट पर दबाव पड़ता है, जिससे पाचन धीमा हो सकता है और कब्ज़ की समस्या बढ़ सकती है।

  1. सुबह कितनी देर में पेट साफ़ होने की आदत डालनी चाहिए?

सुबह उठने के 30 से 45 मिनट के भीतर शौच की कोशिश करना शरीर की प्राकृतिक लय बनाता है और लंबे समय में कब्ज़ से राहत दिलाने में मदद करता है।

  1. ठंडा पानी पीने से कब्ज़ पर क्या असर पड़ता है?

ठंडा पानी पाचन को और सुस्त कर सकता है, जबकि गुनगुना पानी आँतों को सक्रिय करता है और मल त्याग को आसान बनाता है।

  1. सफ़र के दौरान कब्ज़ क्यों बढ़ जाती है?

सफ़र में दिनचर्या, भोजन का समय और पानी पीने की आदत बिगड़ जाती है, जिससे शरीर का संतुलन बिगड़ता है और कब्ज़ की शिकायत बढ़ सकती है।

  1. चाय या कॉफी पीने से कब्ज़ ठीक होती है या बिगड़ती है?

ज़्यादा चाय या कॉफी पीने से शरीर में सूखापन बढ़ सकता है, जो कब्ज़ को और खराब कर सकता है, खासकर अगर पानी कम पिया जाए।

  1. शौच के समय सही बैठने की मुद्रा कैसी होनी चाहिए?

पैर थोड़े ऊँचे रखकर बैठने से मल त्याग का रास्ता सीधा होता है, जिससे ज़ोर कम लगाना पड़ता है और पेट साफ़ होना आसान होता है।

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