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5 साल से कब्ज की दवा ले रहे हैं? दवा बंद करते ही समस्या वापस क्यों आ जाती है – स्थायी उपचार

Information By Dr. Keshav Chauhan

आज के समय में कब्ज़ एक बहुत आम समस्या बन चुकी है। कई लोग इसे हल्की परेशानी समझकर सालों तक सिर्फ दवाइयों या लैक्सेटिव (पेट साफ करने वाली दवाओं) के सहारे मैनेज करते रहते हैं। शुरुआत में दवा लेने से राहत मिलती है, लेकिन धीरे-धीरे शरीर उसी दवा पर निर्भर होने लगता है। नतीजा यह होता है कि जैसे ही दवा बंद की जाती है, कुछ ही दिनों में पेट फिर से भारी लगने लगता है, गैस बनने लगती है और मल त्याग में परेशानी वापस आ जाती है।

कई लोगों के साथ ऐसा होता है कि 2–3 दिन दवा न लें तो पेट ठीक से साफ नहीं होता। इसके साथ सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, भूख कम लगना और पूरे दिन सुस्ती महसूस होना भी शुरू हो जाता है। ऐसे में लोग फिर से वही दवा लेना शुरू कर देते हैं और यह चक्र सालों तक चलता रहता है।

लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि बार-बार लौटने वाली कब्ज़ केवल “पेट साफ न होने” की साधारण समस्या नहीं होती। यह संकेत हो सकता है कि पाचन तंत्र की कार्यप्रणाली कहीं न कहीं असंतुलित हो चुकी है। जब तक इस असंतुलन के असली कारण को समझकर उसे ठीक नहीं किया जाता, तब तक दवा से मिलने वाली राहत केवल अस्थायी रहती है। अगर आप भी कई सालों से कब्ज़ की दवा ले रहे हैं और दवा बंद करते ही समस्या वापस आ जाती है, तो यह समय है समस्या की जड़ को समझने का ताकि सिर्फ अस्थायी राहत नहीं, बल्कि स्थायी समाधान मिल सके।

कब्ज़ क्या है?

बहुत लोग सोचते हैं कि अगर रोज़ मल त्याग नहीं हुआ तो कब्ज़ है।
लेकिन कब्ज़ के असली संकेत हैं:

  • मल त्याग में ज़ोर लगाना
  • सूखा और सख्त मल
  • अधूरा पेट साफ होने का अहसास
  • 3 दिन या उससे अधिक रुकावट
  • गैस, एसिडिटी
  • मुंह कड़वा रहना

लंबे समय तक यह स्थिति रहे तो शरीर में और समस्याएँ भी शुरू हो सकती हैं।

कब्ज़ क्यों होती है?

कब्ज़ एक आम पाचन समस्या है, लेकिन इसके पीछे कई छोटे-छोटे कारण होते हैं। सबसे बड़ा कारण है गलत खानपान। जब हम फाइबर कम और मैदा, तला-भुना या प्रोसेस्ड खाना ज्यादा खाते हैं, तो मल सख्त हो जाता है और आसानी से बाहर नहीं निकलता। पानी कम पीना भी एक बड़ी वजह है, क्योंकि शरीर में पानी की कमी से मल सूख जाता है। दूसरा कारण है शारीरिक गतिविधि की कमी। जो लोग लंबे समय तक बैठे रहते हैं और रोजाना व्यायाम नहीं करते, उनका पाचन धीमा पड़ सकता है। आंतों की गति कम हो जाती है, जिससे मल रुकने लगता है।

कई बार मल त्याग की इच्छा को बार-बार रोकना भी कब्ज़ की वजह बनता है। जब हम शरीर के संकेतों को नजरअंदाज करते हैं, तो धीरे-धीरे आंतों की प्राकृतिक लय बिगड़ जाती है। तनाव और चिंता भी पाचन पर असर डालते हैं। ज्यादा स्ट्रेस से पाचन तंत्र ठीक से काम नहीं कर पाता। हार्मोनल बदलाव, खासकर महिलाओं में, कब्ज़ को बढ़ा सकते हैं। कुछ दवाइयाँ, जैसे आयरन की गोलियाँ, दर्द निवारक या कुछ एंटीडिप्रेसेंट, भी कब्ज़ का कारण बन सकती हैं। उम्र बढ़ने के साथ भी पाचन शक्ति थोड़ी कमजोर हो सकती है।

इसके अलावा, यात्रा के दौरान दिनचर्या बदलना, समय पर खाना न खाना या नींद की कमी भी कब्ज को जन्म दे सकती है। यानी कब्ज़ सिर्फ पेट की समस्या नहीं, बल्कि हमारी पूरी जीवनशैली से जुड़ी हुई स्थिति है।

कब्ज़ होने के लक्षण क्या हैं? 

कब्ज़ का सबसे मुख्य लक्षण है नियमित रूप से साफ पेट न होना। अगर हफ्ते में तीन बार से कम मल त्याग हो रहा है, तो यह कब्ज़ का संकेत हो सकता है। मल त्याग करते समय जोर लगाना पड़े, यह भी एक सामान्य लक्षण है। मल का सख्त और सूखा होना भी कब्ज़ की पहचान है। कई बार मल छोटे-छोटे कंकड़ जैसे निकलता है। इससे गुदा में दर्द या जलन भी हो सकती है। पेट में भारीपन और सूजन महसूस होना आम बात है। ऐसा लगता है जैसे पेट पूरी तरह साफ नहीं हुआ। कुछ लोगों को गैस, डकार या पेट में ऐंठन की शिकायत भी रहती है।

भूख कम लगना भी कब्ज़ से जुड़ा लक्षण हो सकता है। जब पेट भरा-भरा लगता है, तो खाने का मन नहीं करता। मुंह का स्वाद खराब होना या बदबू आना भी कभी-कभी दिखाई देता है। लंबे समय तक कब्ज़ रहने पर सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और थकान जैसी समस्याएँ भी हो सकती हैं। कुछ मामलों में मल त्याग के दौरान खून आना या गुदा में दरार (फिशर) भी हो सकती है, जो ज्यादा जोर लगाने से होती है। अगर ये लक्षण बार-बार हो रहे हैं या कई हफ्तों तक बने रहते हैं, तो इसे सामान्य मानकर टालना सही नहीं है। समय रहते खानपान और जीवनशैली में बदलाव करना जरूरी होता है, ताकि समस्या बढ़ने न पाए।

दवा बंद करते ही कब्ज़ वापस क्यों आता है?

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

1. आंतों की प्राकृतिक गति कमजोर हो जाना

लंबे समय तक लैक्सेटिव लेने से आंतें “आदत” डाल लेती हैं। वे खुद से काम करने के बजाय दवा पर निर्भर हो जाती हैं।

जैसे:

  • बिना चाय के सिरदर्द
  • वैसे ही बिना दवा के मल त्याग नहीं

2. पाचन शक्ति कमजोर रहना

अगर कब्ज़ का मूल कारण — जैसे कमजोर पाचन, कम पानी, कम फाइबर, तनाव — ठीक नहीं किया गया,
तो दवा केवल लक्षण दबाती है, कारण नहीं हटाती।

3. आंतों की नसों की संवेदनशीलता कम होना

कुछ stimulant laxatives आंतों को जबरदस्ती संकुचित करते हैं। लंबे समय में इससे प्राकृतिक संकेत कमजोर हो सकते हैं।

4. पानी की कमी

कई लोग दवा लेते हैं लेकिन पर्याप्त पानी नहीं पीते। इससे मल फिर से सूखने लगता है।

क्या कब्ज़  पूरी तरह ठीक हो सकता है?

हाँ, अगर जड़ कारण समझकर काम किया जाए।

कब्ज़ 3 कारणों से होती है:

  1. खान-पान गलत
  2. जीवनशैली असंतुलित
  3. मानसिक तनाव

जब ये तीनों सुधरते हैं, तो शरीर की प्राकृतिक क्रिया वापस आ सकती है।

आयुर्वेद के अनुसार कब्ज़ क्यों होती है?

आयुर्वेद में कब्ज़ को मुख्य रूप से “वात असंतुलन” से जोड़ा जाता है।

कारण हो सकते हैं:

  • सूखा भोजन
  • अनियमित दिनचर्या
  • देर रात जागना
  • मानसिक तनाव
  • पाचन अग्नि की कमजोरी

अगर अग्नि कमजोर है, तो भोजन पूरी तरह नहीं पचता। यह “आम” बनाता है, जो आगे चलकर कब्ज़ को बढ़ाता है।

स्थायी उपचार का सही तरीका

1. पाचन शक्ति सुधारना

जब तक digestion मजबूत नहीं होगा, कब्ज़ वापस आता रहेगा।

  • सुबह गुनगुना पानी
  • भोजन समय पर
  • ज्यादा ठंडा या बहुत भारी भोजन न लें

2. प्राकृतिक फाइबर बढ़ाना

  • फल
  • सलाद
  • साबुत अनाज
  • इसबगोल (विशेषज्ञ की सलाह से)

3. पानी की मात्रा बढ़ाना

दिन में 2.5–3 लीटर (व्यक्ति अनुसार)
सुबह खाली पेट पानी बहुत लाभकारी।

4. नियमित व्यायाम

30 मिनट तेज चाल से चलना हल्का योग पेट की मांसपेशियों को सक्रिय करता है।

5. तनाव कम करना

तनाव से पाचन धीमा हो सकता है। ध्यान और गहरी सांस मदद कर सकते हैं।

क्या अचानक दवा बंद करनी चाहिए?

नहीं। अगर आप 5 साल से दवा ले रहे हैं, तो अचानक बंद करने से समस्या बढ़ सकती है।

सही तरीका:

  • धीरे-धीरे मात्रा कम करें
  • साथ में प्राकृतिक उपाय शुरू करें
  • विशेषज्ञ से सलाह लें

सुबह पेट साफ होने की प्राकृतिक दिनचर्या

  • सुबह उठते ही 1–2 गिलास गुनगुना पानी
  • 5 मिनट टहलना
  • निश्चित समय पर शौचालय जाना (भले ही तुरंत न हो)
  • मोबाइल से दूर रहें

शरीर को नियमित संकेत मिलना जरूरी है।

किन स्थितियों में डॉक्टर से मिलना जरूरी है?

  • मल में खून
  • बहुत तेज पेट दर्द
  • अचानक वजन घटना
  • 50 साल के बाद नई कब्ज़ समस्या
  • 1 सप्ताह से अधिक मल त्याग न होना

इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें।

क्या केवल घरेलू उपाय काफी हैं?

हल्की और हाल की कब्ज़ में हाँ। लेकिन 5 साल पुरानी समस्या में विशेषज्ञ मार्गदर्शन बेहतर होता है।

पुरानी कब्ज़ से शरीर पर क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकते हैं?

कई लोग कब्ज़ को हल्की समस्या समझते हैं। लेकिन अगर यह 3–5 साल या उससे ज्यादा समय से चल रही है, तो इसका असर पूरे शरीर पर पड़ सकता है।

1.  बार-बार गैस और पेट फूलना

जब मल आंतों में लंबे समय तक रुका रहता है, तो उसमें किण्वन (fermentation) होने लगता है। इससे गैस बनती है, पेट फूलता है और भारीपन महसूस होता है।

2. एसिडिटी और मुंह का कड़वापन

कब्ज़ के कारण पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है। इससे एसिड रिफ्लक्स और सीने में जलन बढ़ सकती है।

3. त्वचा पर असर

आंतों की सफाई ठीक न हो तो कई लोगों में:

4. सिरदर्द और चिड़चिड़ापन

जब शरीर में अपशिष्ट समय पर बाहर नहीं निकलता, तो सुस्ती और मानसिक असहजता बढ़ सकती है।

5. बवासीर और फिशर का खतरा

सख्त मल और बार-बार ज़ोर लगाने से:

  • बवासीर
  • गुदा में दर्द
  • हल्का रक्तस्राव हो सकता है।

6. आंतों की मांसपेशियों की कमजोरी

लंबे समय तक दवा के सहारे रहने से आंतों की प्राकृतिक गति कमजोर पड़ सकती है। यही कारण है कि पुरानी कब्ज़ को हल्के में नहीं लेना चाहिए। जितनी जल्दी कारण पर काम शुरू होगा, उतना बेहतर परिणाम मिलेगा।

बिना दवा के प्राकृतिक रूप से पेट साफ रखने की 10 प्रभावी आदतें

अगर आप सच में स्थायी राहत चाहते हैं, तो इन आदतों को धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बनाना जरूरी है।

1. सुबह का रूटीन फिक्स करें

हर दिन एक ही समय पर शौचालय जाएँ — चाहे तुरंत इच्छा न भी हो। शरीर को संकेत मिलना जरूरी है।

2. गुनगुना पानी से शुरुआत

सुबह खाली पेट 1–2 गिलास गुनगुना पानी आंतों को सक्रिय करता है।

3. फाइबर संतुलन बनाएँ

बहुत ज्यादा फाइबर भी अचानक लेने से गैस हो सकती है।
धीरे-धीरे बढ़ाएँ:

  • सलाद
  • मौसमी फल
  • ओट्स या दलिया

4.बैठने की सही मुद्रा

घुटनों को थोड़ा ऊँचा रखने से मल त्याग आसान हो सकता है।

5. चबाकर खाना

जल्दी-जल्दी खाने से पाचन कमजोर होता है। हर कौर अच्छे से चबाएँ।

6. पानी पूरे दिन पिएँ

सिर्फ सुबह नहीं — पूरे दिन में पर्याप्त पानी जरूरी है।

7. हल्की शारीरिक गतिविधि

30 मिनट की सैर आंतों की गति को प्राकृतिक रूप से बढ़ाती है।

8. रात का भोजन हल्का रखें

भारी और तला हुआ भोजन कब्ज़ बढ़ा सकता है।

9. तनाव कम करें

आंत और दिमाग का गहरा संबंध है। ज्यादा चिंता से कब्ज़ बढ़ सकता है।

10. धीरे-धीरे दवा कम करें

अगर लंबे समय से दवा ले रहे हैं, तो विशेषज्ञ की सलाह से ही मात्रा कम करें।

Jiva Ayunique™ उपचार दर्शन – 5 साल पुरानी कब्ज के लिए एक समग्र दृष्टिकोण

लंबे समय से कब्ज़ की दवा लेना यह संकेत हो सकता है कि समस्या केवल “पेट साफ न होना” नहीं है।
जब दवा बंद करते ही कब्ज़ वापस आ जाती है, तो समझना जरूरी है कि शरीर की प्राकृतिक पाचन क्रिया कमजोर हो चुकी है।

पुरानी कब्ज़ में अक्सर ये समस्याएँ साथ होती हैं:

  • आंतों की धीमी गति
  • पाचन शक्ति की कमी
  • शरीर में सूखापन
  • गैस और सूजन
  • मानसिक तनाव

ऐसे में केवल लैक्सेटिव या तात्कालिक दवा स्थायी समाधान नहीं देती। जरूरत होती है ऐसे उपचार दृष्टिकोण की जो पाचन तंत्र को अंदर से मजबूत करे और आंतों की प्राकृतिक गति को फिर से सक्रिय करे।

Jiva Ayunique™ Treatment Philosophy इसी समग्र सोच पर आधारित है — जहाँ लक्ष्य केवल मल त्याग करना नहीं, बल्कि पाचन प्रणाली को संतुलित करना और शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को पुनर्जीवित करना है।

क्यों ज़रूरी है Holistic Approach?

पुरानी कब्ज़ में तीन मुख्य समस्याएँ देखी जाती हैं:

  1. आंतों की प्राकृतिक गति का कमजोर होना
  2. पाचन अग्नि का मंद होना
  3. शरीर में “आम” (अधपचा तत्व) का जमा होना

अगर केवल दवा से मल त्याग कराया जाए, तो समस्या अस्थायी रूप से कम हो सकती है, लेकिन जड़ कारण बने रहते हैं। Jiva Ayunique™ दर्शन में उपचार व्यक्ति-विशेष की प्रकृति, दोष असंतुलन (विशेषकर वात), पाचन शक्ति और जीवनशैली को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। यही व्यक्तिगत दृष्टिकोण इसे अलग और प्रभावी बनाता है।

Jiva Ayunique™ उपचार दर्शन के मूल सिद्धांत (पुरानी कब्ज के संदर्भ में)

1. HACCP-प्रमाणित आयुर्वेदिक औषधियाँ

वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप तैयार की गई आयुर्वेदिक औषधियाँ पाचन तंत्र को अंदर से संतुलित करने में सहायता करती हैं।

इनका उद्देश्य हो सकता है:

  • पाचन अग्नि को सक्रिय करना
  • वात दोष को संतुलित करना
  • आंतों की प्राकृतिक गति को समर्थन देना
  • गैस और सूजन को कम करना
  • मल को मुलायम बनाने में मदद करना

यह दृष्टिकोण केवल तुरंत राहत देने के लिए नहीं, बल्कि धीरे-धीरे शरीर को दवा पर निर्भरता से बाहर लाने के लिए होता है। 

स्थायी राहत का लक्ष्य — प्राकृतिक मल त्याग की पुनर्स्थापना।

2. योग, ध्यान और मानसिक संतुलन

आंत और दिमाग का गहरा संबंध है।
तनाव, चिंता और अनियमित दिनचर्या से कब्ज बढ़ सकती है।

Jiva Ayunique™ पद्धति में शामिल हो सकते हैं:

  • सौम्य योगासन
  • प्राणायाम
  • गहरी श्वास तकनीक
  • ध्यान अभ्यास

ये अभ्यास:

  • आंतों की मांसपेशियों को सक्रिय करने में सहायक
  • तनाव कम करने में मददगार
  • पाचन प्रक्रिया को संतुलित करने में उपयोगी

शांत मन, संतुलित पाचन।

3. आयुर्वेदिक शुद्धिकरण और चिकित्सीय समर्थन

जब शरीर में लंबे समय तक अपशिष्ट जमा रहता है, तो पाचन तंत्र की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।

विशेष परिस्थितियों में चिकित्सकीय सलाह से:

  • सौम्य शोधन प्रक्रियाएँ
  • औषधीय अभ्यंग (मेडिकेटेड मसाज)
  • पाचन-सहायक उपचार

इनका उद्देश्य है:

  • शरीर से जमा विषैले तत्वों को हटाना
  • आंतों की कार्यक्षमता सुधारना
  • प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को पुनः सक्रिय करना

यह प्रक्रिया हमेशा विशेषज्ञ की देखरेख में की जाती है।

4. व्यक्तिगत आहार और जीवनशैली में सुधार

पुरानी कब्ज में गलत खान-पान सबसे बड़ा कारण हो सकता है।

विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए बदलावों में शामिल हो सकते हैं:

आहार संबंधी सुझाव:

  • हल्का और सुपाच्य भोजन
  • पर्याप्त फाइबर (धीरे-धीरे बढ़ाना)
  • गुनगुना पानी
  • अत्यधिक सूखा और प्रोसेस्ड भोजन से बचाव
  • समय पर भोजन

जीवनशैली सुधार:

  • रोज़ एक ही समय पर मल त्याग की आदत
  • 30 मिनट हल्की सैर
  • देर रात तक जागने से बचना
  • पर्याप्त नींद
  • नियमित दिनचर्या

जब दिनचर्या संतुलित होती है, तो आंतें भी लय में काम करने लगती हैं।

पर्सनलाइज्ड अप्रोच क्यों जरूरी है?

हर व्यक्ति की कब्ज का कारण अलग हो सकता है:

  • किसी में पानी की कमी
  • किसी में तनाव
  • किसी में हार्मोनल बदलाव
  • किसी में लंबे समय की दवा निर्भरता

इसलिए एक ही उपाय सबके लिए कारगर नहीं होता।

Jiva Ayunique™ मॉडल में व्यक्ति की पूरी जीवनशैली, भोजन आदतें, मानसिक स्थिति और पाचन क्षमता को समझकर योजना बनाई जाती है।

निष्कर्ष

अगर आप 5 साल से कब्ज़ की दवा ले रहे हैं और दवा बंद करते ही समस्या लौट आती है,
तो यह शरीर का संकेत है कि जड़ कारण अभी भी मौजूद है।

केवल दवा बदलने से नहीं —
पाचन शक्ति, आहार, दिनचर्या और मानसिक संतुलन सुधारने से स्थायी राहत मिल सकती है।

References 

https://www.nhp.gov.in/disease/digestive/constipation

https://www.nhp.gov.in/healthlyliving

https://www.mohfw.gov.in

https://nhm.gov.in

https://www.aiims.edu

https://www.niddk.nih.gov/health-information/digestive-diseases/constipation

https://www.cdc.gov

FAQs

1. क्या रोज़ पेट साफ न होना हमेशा कब्ज कहलाता है?

नहीं। अगर 1 दिन मल त्याग न हो लेकिन कोई असुविधा नहीं है तो जरूरी नहीं कि वह कब्ज हो। कब्ज तब मानी जाती है जब मल सख्त हो, ज़ोर लगाना पड़े या अधूरा महसूस हो।

2. क्या रोज़ लैक्सेटिव लेना सुरक्षित है?

लंबे समय तक बिना डॉक्टर की सलाह के रोज़ लैक्सेटिव लेना सुरक्षित नहीं माना जाता। इससे आंतें दवा पर निर्भर हो सकती हैं।

3. कितने दिन तक मल न आए तो चिंता करनी चाहिए?

अगर 3–4 दिन तक मल त्याग नहीं हुआ और पेट दर्द, सूजन या उलझन हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

4. क्या ज्यादा चाय या कॉफी से कब्ज बढ़ सकती है?

कुछ लोगों में ज्यादा चाय या कॉफी से पानी की कमी हो सकती है, जिससे कब्ज बढ़ सकती है। संतुलित मात्रा में ही सेवन करें।

5. क्या देर रात खाना कब्ज का कारण बन सकता है?

हाँ। देर रात भारी भोजन करने से पाचन धीमा हो सकता है, जिससे सुबह पेट साफ होने में दिक्कत हो सकती है।

6. क्या यात्रा के दौरान कब्ज होना सामान्य है?

हाँ। दिनचर्या बदलने, पानी कम पीने और खान-पान बदलने से यात्रा के दौरान कब्ज हो सकता है।

7. क्या बच्चों और बुजुर्गों में कब्ज के कारण अलग होते हैं?

हाँ। बच्चों में पानी और फाइबर की कमी कारण हो सकती है, जबकि बुजुर्गों में शारीरिक गतिविधि कम होना और दवाइयाँ कारण बन सकती हैं।

8. क्या तनाव और चिंता से भी कब्ज हो सकता है?

हाँ। आंत और दिमाग का सीधा संबंध है। ज्यादा तनाव से आंतों की गति प्रभावित हो सकती है।

9. क्या रोज़ इसबगोल लेना सुरक्षित है?

हल्के मामलों में सीमित मात्रा में लिया जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक लेने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।

10. क्या हार्मोनल बदलाव से कब्ज बढ़ सकती है?

हाँ। खासकर महिलाओं में पीरियड्स से पहले या गर्भावस्था के दौरान हार्मोन बदलाव से कब्ज हो सकती है।

11. क्या कब्ज से वजन बढ़ सकता है?

सीधे तौर पर नहीं, लेकिन पेट भरा-भरा रहने से भारीपन महसूस हो सकता है जिससे वजन बढ़ा हुआ लगे।

12. क्या कब्ज से भूख कम लग सकती है?

हाँ। पेट साफ न होने पर गैस और भारीपन के कारण भूख कम लग सकती है।

13. क्या हर दिन एनीमा लेना सही है?

नहीं। बार-बार एनीमा लेने से आंतों की प्राकृतिक क्रिया प्रभावित हो सकती है। इसे नियमित आदत नहीं बनाना चाहिए।

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