भारत में इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) जैसी पाचन संबंधी समस्या उतनी कम नहीं है जितना आप शायद सोचते हैं। भारत में हुए कई अध्ययनों के अनुसार लगभग 4% से 7.9% लोगों को IBS के लक्षणों का सामना करना पड़ता है, यानी हर 100 में लगभग 4 से 8 लोग समय-समय पर पेट दर्द, गैस, दस्त या कब्ज़ जैसी समस्याओं से जूझते हैं। इस आँकड़े को Indian Society of Gastroenterology की एक बड़ी शोध रिपोर्ट में भी दर्शाया गया है, जिसमें IBS की उपस्थित दर औसतन करीब 4.2% तक पाई गई है।
ये प्रतिशत सिर्फ एक संख्या नहीं है। इसका मतलब यह है कि आप, आपके परिवार के सदस्य या आपके परिचितों में से कई लोग समय-समय पर इस समस्या का सामना कर रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद अक्सर दवाइयाँ आपको लम्बे समय तक आराम नहीं देतीं और समस्या बार-बार लौट आती है।
अगर आप खुद IBS से परेशान हैं या किसी परिचित को इसका सामना करते देखते हैं, तो यह लेख आपके लिए महत्वपूर्ण है। यहाँ हम यह समझेंगे कि IBS में दवाइयाँ क्यों हमेशा काम नहीं करतीं, और आयुर्वेद इसे कैसे अलग तरीके से देखता है तथा इसका उपचार क्यों कुछ मामलों में बेहतर काम कर सकता है।
IBS में दवाइयाँ लेने के बाद भी आपको पूरा आराम क्यों नहीं मिलता?
अगर आप आईबीएस से परेशान हैं, तो आपने यह ज़रूर महसूस किया होगा कि दवा लेने से कुछ समय के लिए आराम तो मिलता है, लेकिन पूरी तरह राहत नहीं मिलती। कई बार तो ऐसा भी होता है कि दवा बंद करते ही पेट की परेशानी फिर से शुरू हो जाती है। इससे आपके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब आप नियमित दवाइयाँ ले रहे हैं, तो फिर समस्या खत्म क्यों नहीं हो रही।
असल में आईबीएस में दी जाने वाली ज़्यादातर दवाइयाँ लक्षणों को दबाने का काम करती हैं।
जैसे:
इनसे आपको तुरंत राहत मिलती है, लेकिन यह राहत अस्थायी होती है। दवाइयाँ उस वजह को नहीं सुधारतीं, जिसकी वजह से यह समस्या बार-बार पैदा हो रही है। इसलिए जब तक आप दवा लेते रहते हैं, तब तक स्थिति संभली रहती है, लेकिन दवा छूटते ही शरीर फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आता है।
यहीं से आईबीएस और दवाइयों के बीच एक ऐसा रिश्ता बन जाता है, जिसमें:
- दवा → थोड़ी राहत
- दवा बंद → समस्या वापस
इस स्थिति में आपको लगने लगता है कि शायद आपकी बीमारी बहुत गंभीर है, जबकि असल में समस्या यह है कि इलाज जड़ तक नहीं पहुँच पा रहा।
IBS में बार-बार समस्या लौटने का असली कारण क्या है?
आईबीएस में समस्या बार-बार लौटने का सबसे बड़ा कारण यह है कि इसका एक चक्र बन जाता है। यह चक्र अक्सर आपको दिखाई नहीं देता, लेकिन शरीर के अंदर लगातार चलता रहता है।
यह चक्र कुछ इस तरह होता है:
- पाचन ठीक से काम नहीं करता
- पेट में गैस, जलन, दस्त या कब्ज़ होता है
- आप दवा लेते हैं
- लक्षण कुछ समय के लिए दब जाते हैं
- दवा बंद होती है
- पाचन फिर से गड़बड़ाता है
इस चक्र को तोड़े बिना आईबीएस से स्थायी राहत मिलना मुश्किल हो जाता है।
इसके अलावा एक और अहम बात है, शरीर की आदत। जब आप लंबे समय तक दवाइयाँ लेते रहते हैं, तो शरीर बाहरी सहारे का आदी हो जाता है। जैसे ही वह सहारा हटता है, शरीर खुद से संभल नहीं पाता और परेशानी और ज़्यादा महसूस होने लगती है।
कई लोग यह भी कहते हैं कि: “पहले इतनी परेशानी नहीं थी, दवा छोड़ते ही अब ज़्यादा हो जाती है।”
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मूल कारण वहीं का वहीं रहता है, बल्कि समय के साथ और गहरा हो जाता है। दवाइयाँ केवल ऊपर-ऊपर से समस्या को ढकती रहती हैं, अंदर चल रही गड़बड़ी को ठीक नहीं करतीं।
तनाव भी इस चक्र को और बिगाड़ देता है। जब आप मानसिक रूप से परेशान रहते हैं, तो पाचन तंत्र पर उसका सीधा असर पड़ता है। ऐसे में दवा का असर और कम हो जाता है और आईबीएस जल्दी भड़क उठता है।
आयुर्वेद IBS को ग्रहणी क्यों मानता है?
आयुर्वेद आईबीएस को केवल आँतों की बीमारी नहीं मानता। आयुर्वेद के अनुसार यह समस्या ग्रहणी से जुड़ी होती है। ग्रहणी उस स्थान को कहा जाता है, जहाँ भोजन का पाचन, अवशोषण और शरीर के लिए उपयोगी तत्वों का निर्माण होता है।
सरल शब्दों में समझें तो:
- ग्रहणी शरीर का पाचन केंद्र है
- अगर ग्रहणी ठीक है, तो पेट भी ठीक रहता है
- अगर ग्रहणी कमज़ोर है, तो पाचन गड़बड़ाता है
आयुर्वेद के अनुसार आईबीएस तब होता है, जब आपकी पाचन अग्नि कमज़ोर हो जाती है। कमज़ोर पाचन की वजह से खाना ठीक से नहीं पचता और शरीर में अपचित पदार्थ जमा होने लगते हैं। यही स्थिति आगे चलकर गैस, सूजन, दस्त, कब्ज़ और पेट दर्द का कारण बनती है।
आधुनिक दृष्टिकोण में आईबीएस को अलग-अलग लक्षणों के रूप में देखा जाता है, जबकि आयुर्वेद इसे एक मूल पाचन गड़बड़ी मानता है। इसलिए आयुर्वेद का ध्यान इस बात पर रहता है कि:
- पाचन को कैसे सुधारा जाए
- शरीर के अंदर जमा गड़बड़ी को कैसे निकाला जाए
- और पाचन तंत्र को दोबारा मज़बूत कैसे बनाया जाए
जब इलाज इस दृष्टि से होता है, तब समस्या को केवल दबाया नहीं जाता, बल्कि उसे धीरे-धीरे जड़ से सुधारने की कोशिश की जाती है। इसी कारण आयुर्वेद में आईबीएस को ग्रहणी कहा गया है और उसका उपचार भी उसी आधार पर किया जाता है।
आयुर्वेद IBS के इलाज को अलग तरीके से कैसे देखता है?
अगर आप अब तक आईबीएस के लिए इलाज कराते रहे हैं, तो आपने देखा होगा कि ज़्यादातर ध्यान पेट के लक्षणों पर रहता है। कहीं दर्द है, कहीं दस्त है, कहीं कब्ज़ है, और उसी हिसाब से दवा दी जाती है। लेकिन आयुर्वेद इस समस्या को केवल पेट तक सीमित नहीं मानता।
आयुर्वेद का मानना है कि आईबीएस जैसी समस्या शरीर, मन और पाचन, तीनों के आपसी संतुलन से जुड़ी होती है। अगर इनमें से एक भी गड़बड़ होता है, तो उसका असर सीधे पाचन पर पड़ता है।
आप खुद महसूस कर सकते हैं—
- जब मन शांत होता है, तो पेट भी हल्का लगता है
- जब तनाव बढ़ता है, तो गैस, जलन या दस्त भी बढ़ जाते हैं
आयुर्वेद इसी आपसी जुड़ाव को समझकर इलाज करता है। यहाँ केवल यह नहीं देखा जाता कि आज आपको दस्त है या कब्ज़, बल्कि यह देखा जाता है कि:
- आपकी पाचन अग्नि कैसी है
- आपका मन कितना स्थिर या अशांत है
- आपकी दिनचर्या और खान-पान कैसा है
इसलिए आयुर्वेद में इलाज का तरीका पूरा व्यक्ति होता है, न कि सिर्फ बीमारी। जब शरीर और मन दोनों को साथ लेकर चला जाता है, तब पाचन तंत्र को भी सही तरह से संभलने का मौका मिलता है।
शोधन और शमना IBS में शरीर को अंदर से कैसे ठीक करते हैं?
आईबीएस में अक्सर शरीर के अंदर एक ऐसी गंदगी जमा हो जाती है, जो बाहर से दिखाई नहीं देती, लेकिन अंदर लगातार परेशानी बढ़ाती रहती है। आयुर्वेद इसे आम कहता है। यह अधपचे भोजन और गलत पाचन का परिणाम होती है।
यह आम धीरे-धीरे:
- पाचन को और कमज़ोर करती है
- गैस और सूजन बढ़ाती है
- आँतों को संवेदनशील बना देती है
इसी वजह से आयुर्वेद में इलाज की शुरुआत केवल दवा से नहीं, बल्कि शोधन से की जाती है।
शोधन का मतलब है शरीर की अंदरूनी सफ़ाई। सरल शब्दों में कहें तो:
- जो बेकार और नुकसानदेह चीज़ें शरीर में जमा हो गई हैं
- उन्हें धीरे-धीरे बाहर निकालना
जब शरीर हल्का होता है, तब दवाइयाँ भी बेहतर काम करती हैं और पाचन तंत्र को राहत मिलती है।
इसके बाद आता है शमना। शोधन के बाद शरीर को संभालने और संतुलन में लाने का काम शमना करता है। इसमें:
- पाचन को स्थिर किया जाता है
- शरीर की प्राकृतिक ताकत को बढ़ाया जाता है
- दोबारा गड़बड़ी होने से रोका जाता है
आप इसे ऐसे समझ सकते हैं— पहले घर की सफ़ाई की जाती है, फिर उसे ठीक से सजाया और संभाला जाता है। केवल सजावट से काम नहीं चलता, जब तक गंदगी साफ़ न हो।
IBS में आयुर्वेदिक उपचार क्यों ज़्यादा स्थायी माना जाता है?
आईबीएस में सबसे बड़ी परेशानी यही होती है कि समस्या बार-बार लौट आती है। आज आराम है, कुछ समय बाद फिर वही हालत। इससे आप मानसिक रूप से भी थक जाते हैं।
आयुर्वेदिक उपचार को ज़्यादा स्थायी इसलिए माना जाता है क्योंकि इसका उद्देश्य तुरंत राहत नहीं, बल्कि लंबे समय का सुधार होता है।
आयुर्वेद में:
- पाचन अग्नि को मज़बूत किया जाता है
- शरीर से जमा आम को निकाला जाता है
- मन को शांत करने पर भी ध्यान दिया जाता है
जब ये तीनों चीज़ें साथ-साथ सुधरती हैं, तब:
- पाचन धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है
- पेट हर छोटी बात पर प्रतिक्रिया देना बंद करता है
- दवाइयों पर निर्भरता कम होती जाती है
यही फर्क है अस्थायी राहत और स्थायी सुधार में। जहाँ केवल लक्षणों को दबाया जाता है, वहाँ समस्या लौटती रहती है। जहाँ जड़ को संभाला जाता है, वहाँ शरीर खुद को संभालना सीखता है।
अगर आप आईबीएस से लंबे समय से परेशान हैं, तो यह समझना ज़रूरी है कि आपका शरीर क्या संकेत दे रहा है। आयुर्वेद इन संकेतों को समझकर धीरे-धीरे संतुलन बनाता है, ताकि आप बार-बार उसी परेशानी में न फँसें।
IBS में दवाइयों के साथ जीवनशैली बदलना क्यों ज़रूरी है?
अगर आप आईबीएस के इलाज के लिए सिर्फ दवाइयों पर निर्भर हैं और आपकी दिनचर्या वही की वही है, तो सुधार सीमित ही रहेगा। इसका कारण यह है कि आईबीएस केवल पेट की बीमारी नहीं है, बल्कि यह आपके खाने के समय, रोज़मर्रा की आदतों और जीवन की गति से गहराई से जुड़ी होती है।
सबसे पहले बात करें भोजन के समय की।
जब आप कभी बहुत देर से खाते हैं, कभी जल्दी, कभी भूख न होने पर भी खाना खा लेते हैं, तो पाचन तंत्र भ्रमित हो जाता है। पाचन को एक तय लय चाहिए। अगर यह लय बार-बार टूटे, तो पेट ठीक से काम नहीं कर पाता, चाहे आप कितनी ही दवाइयाँ क्यों न ले लें।
दूसरी ज़रूरी बात है दिनचर्या।
देर रात तक जागना, सुबह देर से उठना, समय पर शौच न जाना और बिना आराम के दिन काटना—ये सब पाचन पर सीधा असर डालते हैं। आपका शरीर एक घड़ी की तरह काम करता है। जब आप इस घड़ी को बार-बार बिगाड़ते हैं, तो सबसे पहले पाचन ही प्रभावित होता है।
अब बात करते हैं आदतों की।
तेज़ी से खाना, खाना ठीक से चबाए बिना निगल जाना, खाते समय मोबाइल या तनाव में रहना—ये छोटी लगने वाली आदतें आईबीएस को लगातार बढ़ावा देती हैं। ऐसे में दवा केवल अस्थायी सहारा बनकर रह जाती है।
इसलिए आईबीएस में सही सुधार तभी आता है, जब:
- आप समय पर खाना शुरू करें
- दिनचर्या को थोड़ा अनुशासित बनाएं
- और अपने शरीर की सुनना सीखें
जब जीवनशैली सुधरती है, तब दवाइयों को भी सही तरह से काम करने का मौका मिलता है।
निष्कर्ष
अगर आप आईबीएस से जूझ रहे हैं, तो अब तक आपने यह समझ लिया होगा कि यह समस्या सिर्फ पेट तक सीमित नहीं है। बार-बार दवा बदलना, थोड़े समय का आराम और फिर वही परेशानी, यह सब आपको थका देता है। असल सवाल यह नहीं है कि दवा कौन-सी ली जाए, बल्कि यह है कि आपका शरीर बार-बार संकेत क्यों दे रहा है।
जब पाचन, मन और दिनचर्या एक-दूसरे के साथ तालमेल में नहीं होते, तब आईबीएस जैसी समस्या बनी रहती है। आयुर्वेद इसी तालमेल को वापस लाने की कोशिश करता है, ताकि शरीर खुद को संभालना सीखे, न कि हर समय बाहरी सहारे पर टिका रहे।
अगर आप चाहते हैं कि परेशानी सिर्फ कुछ दिनों के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय के लिए शांत हो, तो आपको अपने शरीर को समझने और उसे सही दिशा देने की ज़रूरत है।
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FAQs
- आईबीएस का सही पता कैसे लगाया जाता है?
आईबीएस का पता आमतौर पर लक्षणों के आधार पर लगाया जाता है। डॉक्टर कुछ जाँच इसलिए करवाते हैं ताकि अन्य गंभीर आँत्र रोगों को पहले बाहर किया जा सके।
- क्या आईबीएस किसी उम्र में भी हो सकता है?
हाँ, आईबीएस किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन यह ज़्यादातर युवाओं और मध्यम उम्र के लोगों में देखा जाता है, खासकर जब जीवनशैली अनियमित हो।
- क्या आईबीएस छूने से या खाने से फैलता है?
नहीं, आईबीएस न तो छूने से फैलता है और न ही किसी के साथ खाने से। यह संक्रमण नहीं, बल्कि पाचन से जुड़ी समस्या है।
- क्या आईबीएस में वज़न कम होना सामान्य है?
कुछ लोगों में भूख कम लगने या खाने से डर के कारण वज़न घट सकता है, लेकिन हर आईबीएस मरीज़ में ऐसा होना ज़रूरी नहीं होता।
- क्या आईबीएस में व्यायाम करना सुरक्षित है?
हाँ, हल्का और नियमित व्यायाम आईबीएस में फायदेमंद होता है। यह पाचन को बेहतर करता है और तनाव कम करने में भी मदद करता है।
- क्या आईबीएस में यात्रा करने से परेशानी बढ़ सकती है?
लंबी यात्रा, अनियमित खाना और नींद की कमी से आईबीएस के लक्षण बढ़ सकते हैं, इसलिए यात्रा के दौरान दिनचर्या का ध्यान रखना ज़रूरी है।
- आईबीएस में सुधार दिखने में कितना समय लग सकता है?
आईबीएस में सुधार धीरे-धीरे होता है। सही इलाज और अनुशासन के साथ कुछ हफ्तों में फर्क दिख सकता है, लेकिन स्थिरता आने में समय लगता है।
- आईबीएस में तुरंत डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?
अगर पेट दर्द बहुत ज़्यादा हो, खून आए, अचानक वज़न घटे या रात में लक्षण बढ़ें, तो बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।






















































































































