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क्या लंबे समय तक लैक्सेटिव का उपयोग आपकी कब्ज़ को और जटिल बना रहा है? आयुर्वेदिक समाधान जानें

Information By Dr. Keshav Chauhan

सुबह का समय है, आप शौच के लिए बैठते हैं… लेकिन पेट साफ नहीं होता। थोड़ी देर रुकते हैं, ज़ोर लगाते हैं, फिर भी अधूरापन बना रहता है। मन में झुंझलाहट आती है और वही पुराना ख्याल—आज भी दवा लेनी पड़ेगी। अगर यह स्थिति आपके साथ बार-बार हो रही है, तो आप अकेले नहीं हैं।

कब्ज़ धीरे-धीरे आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाती है। शुरुआत में यह कभी-कभार होती है, फिर हफ्ते में कई बार और एक दिन ऐसा आता है जब बिना लैक्सेटिव के शौच की कल्पना भी मुश्किल लगती है। बाहर से देखने पर यह एक छोटी-सी समस्या लगती है, लेकिन अंदर ही अंदर यह आपकी पाचन शक्ति और आँतों की स्वाभाविक कार्यक्षमता को प्रभावित करती रहती है।

यह ब्लॉग आपको यह समझाने के लिए है कि लंबे समय तक लैक्सेटिव लेने से शरीर के साथ क्या होता है और आयुर्वेद आपको ऐसा रास्ता कैसे दिखाता है, जहाँ पेट ज़ोर से नहीं, संतुलन से साफ होता है।

लंबे समय तक लैक्सेटिव लेने से आपकी आँतों के साथ क्या होता है?

जब आप बार-बार या लंबे समय तक लैक्सेटिव लेते हैं, तो शुरुआत में आपको ऐसा लगता है कि समस्या हल हो रही है। पेट साफ हो जाता है, हल्कापन महसूस होता है और आपको तुरंत राहत मिलती है। लेकिन अंदर ही अंदर आपकी आँतें धीरे-धीरे अपनी स्वाभाविक क्षमता खोने लगती हैं।

हमारी आँतें अपने आप काम करने के लिए बनी होती हैं। जब मल जमा होता है, तो आँतें संकेत देती हैं कि शौच का समय हो गया है। लेकिन जब आप बार-बार लैक्सेटिव लेते हैं, तो यह संकेत दबने लगते हैं। आपकी आँतें यह मान लेती हैं कि उन्हें अब खुद मेहनत करने की ज़रूरत नहीं है।

धीरे-धीरे क्या होता है?

  • आँतों की गतिशीलता कम हो जाती है

  • शौच का प्राकृतिक दबाव महसूस होना कम होने लगता है

  • बिना दवा के पेट साफ न होने की आदत बन जाती है

आप शायद यह भी महसूस करने लगें कि पहले जो मात्रा काम करती थी, अब उतनी से असर नहीं हो रहा। फिर आप मात्रा बढ़ाते हैं। यही वह स्थिति है जहाँ आँतें सुस्त होने लगती हैं और पूरी व्यवस्था दवा पर निर्भर हो जाती है।

इसका मतलब यह नहीं कि आपकी समस्या बढ़ गई है, बल्कि यह संकेत है कि आपकी आँतें अब अपने प्राकृतिक तरीके से काम करना भूल रही हैं।

क्या लैक्सेटिव आपकी कब्ज़ की जड़ को ठीक करते हैं या सिर्फ़ लक्षण दबाते हैं?

यह समझना बहुत ज़रूरी है। लैक्सेटिव समस्या की जड़ पर काम नहीं करते, वे सिर्फ़ ऊपर-ऊपर दिखाई देने वाले लक्षण को दबा देते हैं।

इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। 

मान लीजिए आपके घर की नाली में गंदगी जमा हो गई है। पानी रुक-रुक कर निकल रहा है। अगर आप ऊपर से ज़ोर से पानी डालें, तो कुछ देर के लिए नाली साफ लगने लगेगी। लेकिन अगर अंदर जमी गंदगी को नहीं हटाया गया, तो समस्या फिर लौट आएगी।

कब्ज़ के साथ भी यही होता है।

अक्सर कब्ज़ की जड़ में ये कारण होते हैं:

लैक्सेटिव इन कारणों को नहीं सुधारते। वे बस मल को जबरन बाहर निकाल देते हैं। न तो वे पाचन शक्ति को मज़बूत करते हैं, न ही आँतों को सही तरीके से काम करना सिखाते हैं।

आपको लग सकता है कि आप ठीक हो रहे हैं, लेकिन असल में आपकी समस्या अंदर ही अंदर बनी रहती है। इसलिए जैसे ही दवा बंद होती है, कब्ज़ फिर से सामने आ जाती है।

क्या यही वजह है कि आपकी कब्ज़ बार-बार लौट आती है?

अगर आपकी कब्ज़ कुछ दिन ठीक रहती है और फिर वापस आ जाती है, तो यह कोई संयोग नहीं है। यह उसी चक्र का हिस्सा है जो लैक्सेटिव के लगातार उपयोग से बनता है।

यह चक्र कुछ इस तरह चलता है:

  • कब्ज़ होती है

  • आप लैक्सेटिव लेते हैं

  • पेट साफ हो जाता है

  • आप राहत महसूस करते हैं

  • दवा बंद करते हैं

  • कुछ दिन बाद कब्ज़ फिर शुरू हो जाती है

हर बार यह चक्र थोड़ा और बिगड़ता जाता है। आँतें और ज़्यादा सुस्त होती जाती हैं। शौच के लिए ज़ोर बढ़ता है। पेट साफ न होने का डर मन में बैठ जाता है। फिर आप दोबारा दवा की ओर लौटते हैं।

धीरे-धीरे यह स्थिति बन जाती है कि:

यहाँ समस्या सिर्फ़ कब्ज़ नहीं रहती, बल्कि शरीर और मन दोनों की आदत बन जाती है। यही वजह है कि बहुत से लोग सालों तक लैक्सेटिव लेते रहते हैं, लेकिन फिर भी कहते हैं कि “कब्ज़ तो ठीक ही नहीं होती।”

असल में, कब्ज़ ठीक इसलिए नहीं हो रही क्योंकि उसकी जड़ को कभी ठीक ही नहीं किया गया।

लैक्सेटिव और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में मूल अंतर क्या है?

आयुर्वेद कब्ज़ को सिर्फ़ “पेट साफ न होना” नहीं मानता। आयुर्वेद के अनुसार यह संकेत है कि आपके शरीर का अंदरूनी संतुलन बिगड़ रहा है। इसलिए आयुर्वेद लैक्सेटिव की तरह जबरदस्ती मल बाहर निकालने पर ध्यान नहीं देता, बल्कि यह समझने की कोशिश करता है कि समस्या शुरू कहाँ से हुई।

आयुर्वेद में पाचन को अग्नि कहा गया है। जब आपकी अग्नि सही होती है, तो भोजन ठीक से पचता है, मल सही बनता है और सही समय पर बाहर निकल जाता है। लेकिन जब आप अनियमित समय पर खाते हैं, जल्दी-जल्दी खाते हैं या भारी भोजन करते हैं, तो अग्नि कमज़ोर पड़ने लगती है।

इसके साथ ही वात का असंतुलन भी कब्ज़ की बड़ी वजह बनता है। वात में रूखापन होता है। जब शरीर में रूखापन बढ़ता है, तो मल भी सूखा और कठोर हो जाता है। ऐसे में मल का प्रवाह धीमा हो जाता है और शौच में कठिनाई होती है।

लैक्सेटिव क्या करते हैं? 

वे अग्नि या वात को नहीं सुधारते। वे बस आँतों को उत्तेजित कर देते हैं ताकि मल बाहर निकल जाए। आयुर्वेद ऐसा नहीं करता। आयुर्वेद मानता है कि जब तक पाचन शक्ति और वात संतुलन में नहीं आएँगे, तब तक स्थायी राहत संभव नहीं है।

आयुर्वेद के अनुसार कब्ज़ में असली समस्या कहाँ होती है?

अक्सर आप सोचते हैं कि समस्या आँतों में है, लेकिन आयुर्वेद कहता है कि कब्ज़ की असली शुरुआत आपकी दिनचर्या और आदतों से होती है।

सबसे पहली समस्या होती है पाचन शक्ति का कमज़ोर होना। जब भोजन ठीक से नहीं पचता, तो मल भारी, चिपचिपा या सख्त बनने लगता है। यही मल आगे चलकर कब्ज़ की वजह बनता है।

दूसरी बड़ी समस्या है शरीर में रूखापन। यह रूखापन तब बढ़ता है जब:

  • आप बहुत कम पानी पीते हैं

  • सूखा और गरम भोजन ज़्यादा खाते हैं

  • लंबे समय तक बैठे रहते हैं

  • देर रात तक जागते हैं

रूखापन बढ़ने से मल में नमी कम हो जाती है और वह आसानी से बाहर नहीं निकल पाता।

तीसरी समस्या होती है गलत दिनचर्या। अगर आप शौच की इच्छा को बार-बार रोकते हैं, कभी सुबह तो कभी दोपहर में शौच जाते हैं, या रोज़ अलग-अलग समय पर खाते हैं, तो शरीर भ्रमित हो जाता है। धीरे-धीरे शौच का प्राकृतिक समय खत्म होने लगता है।

आयुर्वेद कहता है कि कब्ज़ सिर्फ़ पेट की समस्या नहीं है, बल्कि यह आपके पूरे जीवन की गति को दर्शाती है। जब जीवन असंतुलित होता है, तो पाचन भी असंतुलित हो जाता है।

क्या आयुर्वेदिक उपाय बिना आँतों को कमज़ोर किए राहत दे सकते हैं?

यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है, खासकर अगर आप लंबे समय से लैक्सेटिव ले रहे हैं। जवाब है—हाँ, आयुर्वेदिक उपाय बिना आँतों को कमज़ोर किए राहत दे सकते हैं, लेकिन उनका तरीका अलग होता है।

लैक्सेटिव आँतों पर ज़ोर डालते हैं। 

आयुर्वेदिक उपाय आँतों को सहारा देते हैं।

आयुर्वेदिक उपायों का उद्देश्य होता है:

  • पाचन शक्ति को धीरे-धीरे मज़बूत करना

  • मल को स्वाभाविक रूप से नरम बनाना

  • आँतों को खुद से काम करने के लिए प्रेरित करना

इसलिए आयुर्वेद में दिए गए उपाय अचानक तेज़ असर नहीं दिखाते, लेकिन उनका असर गहरा और स्थायी होता है। आप यह महसूस करने लगते हैं कि बिना ज़ोर लगाए, बिना डर के शौच हो रहा है।

सबसे बड़ी बात यह है कि आयुर्वेद शरीर को आलसी नहीं बनाता। वह शरीर को उसकी प्राकृतिक समझ वापस लौटाने में मदद करता है। जब आप सही समय पर खाते हैं, पर्याप्त पानी पीते हैं और हल्के आयुर्वेदिक उपाय अपनाते हैं, तो आँतें दोबारा खुद संकेत देने लगती हैं।

आपकी रोज़मर्रा की कौन-सी छोटी आदतें कब्ज़ को बिगाड़ रही हैं?

अक्सर आपको लगता है कि आपकी कब्ज़ की वजह कोई बड़ी बीमारी या गंभीर समस्या है, लेकिन सच यह है कि छोटी-छोटी रोज़मर्रा की आदतें मिलकर कब्ज़ को जन्म देती हैं। जब ये आदतें रोज़ दोहराई जाती हैं, तो धीरे-धीरे पाचन तंत्र कमज़ोर होने लगता है

सबसे पहली आदत है पानी कम पीना। 

अगर आप दिन भर में बस कुछ गिलास पानी पीते हैं, तो शरीर में रूखापन बढ़ता है। इसका सीधा असर मल पर पड़ता है। मल सूखा और कठोर हो जाता है, जिससे उसे बाहर निकलने में कठिनाई होती है। कई लोग प्यास लगने पर ही पानी पीते हैं, लेकिन तब तक शरीर पहले ही सूख चुका होता है।

दूसरी आदत है लंबे समय तक बैठे रहना। 

अगर आप घंटों एक ही जगह बैठे रहते हैं और चलना-फिरना बहुत कम है, तो आँतों की गति भी धीमी पड़ जाती है। शरीर को हरकत चाहिए। जब शरीर चलता है, तभी पाचन भी सक्रिय रहता है।

तीसरी आदत है गलत तरीके से खाना। 

बहुत तेज़ खाना, ठीक से चबाए बिना निगलना, या हर दिन अलग-अलग समय पर भोजन करना—ये सब पाचन को भ्रमित कर देते हैं। जब शरीर को यह समझ ही नहीं आता कि भोजन कब आएगा, तो अग्नि कमज़ोर पड़ने लगती है।

चौथी और सबसे आम आदत है शौच की इच्छा को रोकना। 

कई बार आप काम, यात्रा या आलस की वजह से शौच की इच्छा को टाल देते हैं। यह आदत सबसे ज़्यादा नुकसान करती है। बार-बार इच्छा दबाने से शरीर धीरे-धीरे संकेत देना बंद कर देता है, और यही कब्ज़ की मज़बूत नींव बन जाती है।

इन आदतों में कोई भी अकेले बड़ी नहीं लगती, लेकिन जब ये रोज़ होती हैं, तो कब्ज़ स्थायी रूप ले लेती है।

लंबे समय तक स्वस्थ पाचन के लिए आयुर्वेद आपको क्या सिखाता है?

आयुर्वेद आपको कोई जादुई उपाय नहीं सिखाता। वह आपको अपने शरीर की भाषा समझना सिखाता है। आयुर्वेद मानता है कि जब आप अपने शरीर की ज़रूरतों का सम्मान करते हैं, तो शरीर खुद ठीक होने लगता है।

सबसे पहली सीख है नियमितता। 

एक ही समय पर खाना, एक ही समय पर शौच जाना और एक ही समय पर सोना। जब शरीर को दिनचर्या मिलती है, तो पाचन अपने आप संतुलन में आने लगता है।

दूसरी सीख है धीरे चलना। 

धीरे खाना, ठीक से चबाना, जल्दी-जल्दी सब कुछ न करना। पाचन को समय चाहिए, और जब आप समय देते हैं, तो वह आपको राहत देता है।

तीसरी सीख है शरीर को दबाना नहीं। 

लैक्सेटिव या ज़बरदस्ती के उपाय शरीर को संकेतों से दूर कर देते हैं। आयुर्वेद कहता है कि शरीर को सहयोग चाहिए, आदेश नहीं।

जब आप पानी सही मात्रा में पीते हैं, भोजन सही समय पर करते हैं और हल्के आयुर्वेदिक उपाय अपनाते हैं, तो आपकी आँतें फिर से खुद काम करना सीखती हैं। शौच बोझ नहीं रहता, बल्कि रोज़ की सहज क्रिया बन जाती है।

निष्कर्ष

कब्ज़ कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे सिर्फ़ एक दवा लेकर हमेशा के लिए खत्म किया जा सके। जब आप बार-बार लैक्सेटिव का सहारा लेते हैं, तो शायद उस दिन राहत मिल जाती है, लेकिन आपका शरीर धीरे-धीरे अपनी स्वाभाविक ताकत खोने लगता है। सच यह है कि आपका पेट आपसे ज़ोर नहीं, समझ चाहता है।

जब आप अपनी दिनचर्या, खान-पान और पाचन संकेतों पर ध्यान देना शुरू करते हैं, तब असली बदलाव आता है। आयुर्वेद आपको यह सिखाता है कि शरीर को दबाकर नहीं, बल्कि संतुलन देकर ठीक किया जाता है। जैसे-जैसे आपकी पाचन शक्ति सुधरती है, वैसे-वैसे शौच सहज होने लगता है और दवाओं पर निर्भरता कम होती चली जाती है।

अगर आप कब्ज़ या पेट से जुड़ी किसी अन्य समस्या से जूझ रहे हैं, तो आज ही हमारे प्रमाणित जीवा चिकित्सकों से व्यक्तिगत परामर्श लें। डायल करें: 0129-4264323

FAQs

  1. कब्ज़ ठीक होने में आयुर्वेदिक उपायों से कितना समय लग सकता है?

आमतौर पर 2–4 हफ्तों में शरीर संकेत देने लगता है। समय आपकी उम्र, दिनचर्या, खान-पान और समस्या की पुरानापन पर निर्भर करता है।

  1. क्या सुबह शौच का एक तय समय बनाना ज़रूरी है?

हाँ, रोज़ एक ही समय शौच जाने से शरीर को संकेत मिलते हैं। इससे आँतें सक्रिय होती हैं और धीरे-धीरे प्राकृतिक आदत बन जाती है।

  1. क्या तनाव और चिंता भी कब्ज़ बढ़ा सकते हैं?

बिल्कुल। ज़्यादा सोच, तनाव और बेचैनी पाचन को प्रभावित करती है। मन शांत रहने पर पाचन बेहतर काम करता है।

  1. क्या चाय या कॉफी कब्ज़ में नुकसान कर सकती है?

ज़्यादा मात्रा में लेने पर ये शरीर में रूखापन बढ़ा सकती हैं। सीमित मात्रा बेहतर है, खासकर खाली पेट लेने से बचना चाहिए।

  1. कब्ज़ में फल कब और कैसे खाना सही रहता है?

फल दिन में अलग समय पर और अच्छी तरह चबाकर खाना बेहतर होता है। देर रात फल खाने से कुछ लोगों में समस्या बढ़ सकती है।

  1. बार-बार कब्ज़ होने पर जाँच कराना कब ज़रूरी हो जाता है?

अगर वज़न घटे, खून आए, तेज़ दर्द हो या महीनों तक राहत न मिले, तो जाँच और विशेषज्ञ सलाह ज़रूरी हो जाती है।

  1. क्या यात्रा के दौरान कब्ज़ होना सामान्य है?

हाँ, समय और खान-पान बदलने से ऐसा होता है। पानी पर्याप्त पिएँ और शौच की इच्छा को न रोकें।

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