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48 वर्ष की उम्र में HbA1c 8.5 से 5.5 कैसे हुआ? डायबिटीज में आयुर्वेद का असर जानिए

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अक्सर ज़िंदगी भागती रहती है और अचानक एक दिन हमारा अपना शरीर ही हमें ब्रेक लगाने पर मजबूर कर देता है। आप सुबह सोकर उठें और फिर भी थके-थके लगें, पानी पीते रहें लेकिन गला सूखता ही रहे, और दिन भर एक अजीब सी बेचैनी बनी रहे। ऐसे में लगने लगता है कि क्या अब बाकी की लाइफ ऐसे ही कटेगी?

48 साल की उम्र, जब सिर पर घर-परिवार की ढेरों जिम्मेदारियां होती हैं, उस वक्त अचानक पता चले कि आपको डायबिटीज हो गई है, तो सच में पैरों तले जमीन खिसक जाती है। HbA1c का 8.5 तक पहुंच जाना कोई छोटा-मोटा झटका नहीं था। ये वो डर था जहाँ खाने की थाली और मीठे को देखकर ही मन में घबराहट होने लगती है।

अभिषेक जी के साथ भी बिल्कुल यही हुआ। लेकिन उन्होंने इस बीमारी के आगे घुटने टेकने के बजाय एक ऐसा देसी और पुराना रास्ता चुना, जिसने उनकी जिंदगी बदल दी। ये कहानी उसी भरोसे की है जिसने उनके HbA1c को 8.5 से घटाकर सीधे 5.5 पर ला खड़ा किया।

48 की उम्र और चुपचाप बढ़ता डायबिटीज का तूफान

48 साल की उम्र में अभिषेक जी की ज़िंदगी बाहर से बिल्कुल सामान्य दिख रही थी। काम, घर, परिवार सब कुछ ठीकठाक चल रहा था। लेकिन शरीर के अंदर शर्करा (sugar) का स्तर धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था और उन्हें खबर तक नहीं थी। यही डायबिटीज की सबसे बड़ी समस्या है। यह बीमारी शुरुआत में कोई बड़ा संकेत नहीं देती। बस छोटी-छोटी तकलीफें होती हैं जिन्हें हम आसानी से नज़रअंदाज़ कर देते हैं। और तब तक यह शरीर में अपनी जड़ें जमा लेती है। अभिषेक जी के साथ भी यही हुआ। जब तक रिपोर्ट आई तब तक डायबिटीज काफी समय से शरीर में थी। 

बीमारी की वो पहली दस्तक और शरीर के इशारे 

शुरुआत में अभिषेक जी को जो दिक्कतें हो रही थीं, उन्हें उन्होंने बिल्कुल सीरियसली नहीं लिया। बार-बार प्यास लगना, कितना भी पानी पी लो गला सूखा ही रहता था। रात भर अच्छी नींद लेने के बाद भी सुबह उठकर शरीर टूटा-टूटा सा लगता था। बीच-बीच में आंखों के सामने धुंधलापन सा भी आने लगा था।

उन्होंने यही सोचा कि शायद ऑफिस का काम ज्यादा है या मौसम बदल रहा है, वीकेंड पर थोड़ा सो लूंगा तो सब ठीक हो जाएगा। लेकिन हफ्ते बीत गए और आराम मिलने के बजाय हालत खराब होती गई। घर वालों ने भी टोकना शुरू कर दिया कि आजकल आप इतने सुस्त क्यों रहने लगे हो। तब जाकर उन्हें लगा कि अब तो डॉक्टर को दिखाना ही पड़ेगा।

HbA1c 8.5 का सच जो डराता भी था और जगाता भी

रिपोर्ट में HbA1c 8.5 देखकर अभिषेक जी थोड़े घबरा गए। डॉक्टर ने समझाया कि यह नंबर बताता है कि पिछले तीन महीनों से शरीर में शर्करा का स्तर लगातार बढ़ा हुआ है। नॉर्मल HbA1c 5.7 से नीचे होनी चाहिए और 8.5 का मतलब था कि शरीर में शर्करा काफी ज़्यादा और काफी लंबे समय से बेकाबू थी। डॉक्टर ने यह भी बताया कि अगर इसे समय रहते काबू नहीं किया तो धीरे-धीरे आँखों की रोशनी, गुर्दों की कार्यक्षमता और दिल की सेहत पर भी बुरा असर पड़ सकता है। यह सुनकर अभिषेक जी के मन में हलचल सी हुई।

दवाइयाँ खाईं, परहेज़ किया, फिर भी राहत नहीं मिली

डॉक्टर की सलाह पर अभिषेक जी ने दवाएँ लेना शुरू कर दिया। मीठा बंद किया, बाहर का खाना छोड़ा, सुबह थोड़ा टहलने भी लगे। शुरुआत में लगा कि सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन कुछ महीनों बाद जब दोबारा जाँच हुई तो शर्करा का स्तर उतना नहीं गिरा जितना गिरना चाहिए था। दवाओं की मात्रा बढ़ाई गई। फिर भी नतीजा संतोषजनक नहीं था। ऊपर से दवाओं के कुछ साइड इफेक्ट भी महसूस होने लगे थे जैसे पेट की गड़बड़ी, कभी-कभी कमज़ोरी और भूख का अजीब सा उतार-चढ़ाव।

अंग्रेजी दवाइयों से निराशा और जीवा आयुर्वेद की तरफ मुड़ना

अंग्रेजी (एलोपैथिक) दवाइयां खाने के बाद भी जब उन्हें कोई खास आराम नहीं मिला, तो अभिषेक जी काफी परेशान हो गए। तभी घर में बातों-बातों में किसी ने जीवा आयुर्वेद का जिक्र किया। शुरुआत में तो उन्हें थोड़ा डाउट हुआ कि क्या सच में जड़ी-बूटियों या आयुर्वेद से शुगर (HbA1c) जैसी जिद्दी बीमारी कम हो सकती है? लेकिन जब बाकी दवाइयों से बात नहीं बन रही थी, तो उन्होंने सोचा कि एक बार इसे भी आजमाकर देख लेते हैं।

उन्होंने बिना देरी किए +91 9266714040 पर कॉल घुमाया और घर बैठे ही डॉक्टर से बात की। सबसे अच्छी बात ये रही कि जीवा के डॉक्टरों ने उनकी प्रॉब्लम बहुत इत्मीनान से सुनी। उन्होंने सिर्फ ब्लड रिपोर्ट देखकर पर्चा नहीं थमाया, बल्कि ये भी पूछा कि उनका रूटीन क्या है, वो खाते क्या हैं, नींद कैसी आती है और पेट का क्या हाल है। सालों बाद अभिषेक जी को ऐसा महसूस हुआ कि कोई डॉक्टर उन्हें सिर्फ एक 'मरीज' या 'केस' की तरह नहीं, बल्कि एक इंसान की तरह समझ रहा है और बीमारी को जड़ से पकड़ने की कोशिश कर रहा है।

वो गलतियाँ जो अभिषेक जी अनजाने में कर रहे थे

जीवा के डॉक्टरों ने जब अभिषेक जी की पूरी दिनचर्या और खानपान को ध्यान से समझा, तो कुछ ऐसी आदतें सामने आईं जो चुपचाप शर्करा को बढ़ावा दे रही थीं। अभिषेक जी को खुद नहीं पता था कि यही छोटी-छोटी चीज़ें उनकी HbA1c को ऊँचा रखे हुए थीं।

  • देर रात खाना खाना: रात को देर से खाने की आदत थी जिससे शरीर को खाना पचाने का वक्त नहीं मिलता था और शर्करा का स्तर बढ़ा रहता था।
  • शारीरिक गतिविधि न के बराबर: दिनभर बैठे रहने वाला काम और शाम को भी कोई कसरत नहीं, जिससे शरीर शर्करा को सही तरह से उपयोग नहीं कर पा रहा था।
  • सफेद चावल और मैदे का ज़्यादा सेवन: रोज़ के खाने में ऐसी चीज़ें थीं जो तेज़ी से शर्करा बढ़ाती हैं और अभिषेक जी को इसका अंदाज़ा भी नहीं था।
  • नींद पूरी न होना: रात को देर तक जागना और सुबह जल्दी उठना, यह भी शर्करा के असंतुलन की एक बड़ी वजह बन रहा था।
  • तनाव को नज़रअंदाज़ करना: काम और घर की ज़िम्मेदारियों का तनाव अंदर ही अंदर जमा होता रहा जो शर्करा को और बढ़ाता रहा।

जीवा आयुर्वेद ने डायबिटीज और HbA1c को कैसे समझाया

अभिषेक जी के लिए सबसे पहले यह समझना ज़रूरी था कि आखिर आयुर्वेद इस बीमारी को देखता कैसे है। आयुर्वेद में डायबिटीज को 'मधुमेह' कहते हैं। डॉक्टरों ने उन्हें बहुत ही आसान भाषा में समझाया कि यह सिर्फ आपके खून में शुगर (शर्करा) बढ़ने की बीमारी नहीं है। असल में यह इस बात का अलार्म है कि आपका पाचन और शरीर का सिस्टम अंदर से बिगड़ चुके हैं।

जब शरीर में 'कफ दोष' बढ़ता है और पेट की मशीन (पाचन) सुस्त पड़ जाती है, तो आप जो भी मीठा या कार्ब्स खाते हैं, वो ठीक से पच नहीं पाता। वही बिना पचा हुआ खाना खून में शुगर बनकर घूमने लगता है। जीवा के डॉक्टरों ने उन्हें तसल्ली दी कि हम सिर्फ आपकी शुगर को 'कंट्रोल' नहीं करेंगे, बल्कि उस जड़ पर काम करेंगे जहाँ से ये बीमारी पैदा हुई है।

जीवा आयुर्वेद में अभिषेक जी की जाँच कैसे की गई?

आयुर्वेद की नज़र में डायबिटीज़ सिर्फ ब्लड में शुगर बढ़ने की बीमारी नहीं है। यह असल में एक सिग्नल है कि आपके शरीर का पूरा सिस्टम जैसे आपका पाचन, दोष और आपका रूटीन गड़बड़ा गया है। अभिषेक जी जब कॉल पर जीवा के डॉक्टरों से जुड़े, तो सिर्फ उनकी रिपोर्ट के नंबर नहीं देखे गए। असली वजह पकड़ने के लिए उनकी पूरी सेहत का बारीकी से हिसाब-किताब समझा गया।

  • सबसे पहले तो यह देखा गया कि वे पिछले कुछ सालों से कौन-कौन सी दवाइयां खा रहे हैं और उनके पुराने इलाज का तरीका क्या रहा है।
  • शुगर लेवल दिन में किस वक्त सबसे ज़्यादा उछाल मारता है? खाना खाने के बाद पेट में भारीपन तो नहीं रहता? और वो कौन सा समय है जब थकान सबसे ज्यादा हावी होती है? इन सब पर गहराई से बात हुई।
  • उनका सुबह से रात तक का रूटीन क्या है। खान-पान की आदतें कैसी हैं और दिनभर में कितनी भागदौड़ या शारीरिक मेहनत होती है।
  • उम्र बढ़ने के साथ शरीर में जो कमज़ोरी आ रही थी और हाज़मे का जो हाल था, उस पर भी गौर किया गया।
  • क्या ऑफिस का ज़्यादा टेंशन है? रात को नींद कैसी आती है? मानसिक थकान को भी इस बीमारी के पीछे का एक बड़ा कारण माना गया।
  • जांच में सामने आया कि उनके शरीर में कफ और वात दोष का बैलेंस बिगड़ा हुआ था, जिसका सीधा असर उनकी सेहत पर पड़ रहा था।

इन सब छोटी-बड़ी बातों को समझने के बाद, अभिषेक जी के लिए एक ऐसा ट्रीटमेंट प्लान तैयार हुआ जो सिर्फ उन्हीं के शरीर की ज़रूरतों के हिसाब से था।

जीवा आयुर्वेद में अभिषेक जी का पर्सनल ट्रीटमेंट प्लान

जीवा में उनके शुगर को सिर्फ एक 'नंबर' की तरह नहीं देखा गया, जिसे किसी भी तरह कम करना हो। असली टारगेट था उनके शरीर की उस अंदरूनी मशीन को रिपेयर करना, जो खराब हो चुकी थी। इसके लिए ये खास कदम उठाए गए:

  • पाचन दुरुस्त करना और 'आम' की सफाई: अभिषेक जी का पाचन बहुत कमज़ोर था। जो वे खाते, वो पचता नहीं था बल्कि पेट में ही सड़कर एक विषैला तत्व बन जाता था। आयुर्वेद इसे 'आम' कहता है और यही शुगर को सबसे ज़्यादा ट्रिगर करता है। इसलिए सबसे पहला काम इसी गंदगी को शरीर से बाहर फेंकना था।
  • कफ-वात का बैलेंस: शरीर में कफ का बढ़ना शुगर की एक बहुत बड़ी जड़ है। अभिषेक जी के केस में भी यही था। कुछ खास देसी जड़ी-बूटियों की मदद से उनके दोषों को शांत किया गया, ताकि उनका शरीर खुद-ब-खुद शुगर को मैनेज करना सीख जाए।
  • जठराग्नि (पेट की आग) को जगाना: आयुर्वेद के हिसाब से पेट की आग (अग्नि) ही अच्छी सेहत का इंजन है। अभिषेक जी की यह अग्नि एकदम सुस्त पड़ गई थी। इसे दोबारा चालू करने के लिए कुछ विशेष औषधियां दी गईं, ताकि खाना सही से पचे और शरीर को सही ऊर्जा मिले।
  • रूटीन की रिपेयरिंग: सिर्फ दवाइयों से काम नहीं चलता। उन्हें रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए एक बेहद आसान रूटीन समझाया गया। क्या खाना है, किस वक्त खाना है और सबसे बड़ी बात किन चीज़ों से बिल्कुल दूरी बनाकर रखनी है।
  • नींद और टेंशन फिक्स: आपको शायद पता हो कि हद से ज़्यादा टेंशन और अधूरी नींद सीधे शुगर बढ़ाते हैं। अभिषेक जी के इलाज में कुछ ऐसे सिंपल टिप्स भी शामिल किए गए जिनसे दिमाग शांत रहे और रात को वे एक सुकून भरी, गहरी नींद ले सकें।

क्या आयुर्वेदिक दवाइयाँ वाकई सुरक्षित हैं?

अभिषेक जी के मन में भी यही सवाल था। वो पहले से ही एलोपैथिक दवाइयों के साइड इफेक्ट झेल चुके थे, तो स्वाभाविक था कि आयुर्वेदिक दवाइयों को लेकर भी थोड़ा संदेह हो। कहीं इससे शर्करा और न बढ़ जाए, कहीं कोई और तकलीफ न हो जाए।

लेकिन जीवा आयुर्वेद के डॉक्टरों ने उन्हें समझाया कि आयुर्वेदिक दवाइयाँ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों पर आधारित होती हैं और यह शरीर पर ज़बरदस्ती असर नहीं करतीं, बल्कि शरीर की अपनी ताकत को धीरे-धीरे बढ़ाती हैं। सही जाँच और सही diagnosis के बाद दी गई दवाइयाँ शरीर के पाचन, दोषों के संतुलन और शर्करा को नियंत्रित करने पर मूल स्तर से काम करती हैं, बिना किसी अतिरिक्त नुकसान के।

अभिषेक जी के उपचार में अपनाई गई आयुर्वेदिक थेरेपीज़

दवाइयों के अलावा अभिषेक जी को कुछ असरदार आयुर्वेदिक थेरेपीज़ (पंचकर्म) भी दी गईं, जिन्होंने उनके शरीर की अंदरूनी सफाई की:

  • उद्वर्तन (हर्बल पाउडर से सूखी मालिश): खास जड़ी-बूटियों के सूखे पाउडर से उनके पूरे शरीर की मालिश की गई। इससे शरीर में जमा कफ कम हुआ, एक्स्ट्रा फैट पिघला और मेटाबॉलिज़्म तेज़ हो गया। शुगर के मरीजों के लिए यह किसी जादू से कम नहीं है।
  • विरेचन (पेट की डीप क्लीनिंग): शरीर के अंदर के ज़हरीले तत्वों (टॉक्सिन्स) को बाहर निकालने के लिए विरेचन किया गया। इससे पेट के सारे टॉक्सिन साफ हो गए और शरीर में शुगर पचाने की ताकत वापस लौट आई।
  • अभ्यंग (गुनगुने तेल की मालिश): औषधीय तेलों से की गई इस मालिश ने उनके शरीर का ब्लड सर्कुलेशन सुधारा, सारी थकावट और स्ट्रेस को जैसे निचोड़ कर बाहर निकाल दिया।
  • स्वेदन (हर्बल भाप): मालिश के बाद जब उन्हें जड़ी-बूटियों वाली भाप (Steam) दी गई, तो रोमछिद्रों से पसीने के ज़रिए शरीर की सारी गंदगी बाहर आ गई और वे एकदम हल्का महसूस करने लगे।

अभिषेक जी की दिनचर्या और आहार में किए गए बदलाव

डॉक्टरों ने उन्हें जो बदलाव बताए, वो कोई बहुत मुश्किल डाइटिंग नहीं थी, बल्कि आम ज़िंदगी के छोटे-छोटे सुधार थे:

  • मीठे और मैदा से तौबा: सफेद चावल, मैदा और चीनी को धीरे-धीरे उनकी थाली से हटा दिया गया। उनकी जगह जौ, बाजरा और फाइबर वाले मोटे अनाज ने ले ली।
  • टाइमिंग का खेल: रात को 10-11 बजे खाने की आदत को बदलवाया गया। सूरज ढलने के तुरंत बाद या जल्दी डिनर करने की आदत डाली गई, ताकि सोने से पहले खाना पच सके।
  • सादा और घर का खाना: भारी और तली-भुनी चीज़ों की जगह दालें, हरी सब्जियां और हल्के मसाले वाले खाने को तरजीह दी गई, जो पेट में कफ न बनाए।
  • रोज़ का थोड़ा सा वर्कआउट: बहुत भारी जिम नहीं, बल्कि सुबह की खुली हवा में सैर, हल्के योगासन और अनुलोम-विलोम जैसी सांसों की एक्सरसाइज़ को रूटीन बनाया गया। इससे शरीर को एनर्जी मिली और शुगर कंट्रोल में आने लगी।
  • नींद से समझौता नहीं: रात को टाइम पर सोना और फोन को दूर रखना। साथ ही, दिन भर के स्ट्रेस को कम करने के लिए कुछ मिनट शांति से बैठकर लंबी-गहरी सांसें लेने की आदत डाली गई।

रिकवरी का सफर: कैसे आयुर्वेद ने अभिषेक जी को धीरे-धीरे राहत दी

आयुर्वेद कोई जादू की छड़ी नहीं है कि आज दवा खाई और कल चमत्कार हो गया। यह बीमारी की जड़ पर काम करता है, इसलिए इसका असर धीरे-धीरे लेकिन पक्का होता है। अभिषेक जी के साथ भी बिल्कुल यही हुआ। उन्हें रातों-रात बदलाव तो नहीं दिखा, लेकिन हर बीतते हफ्ते के साथ उनके शरीर में कुछ ऐसा हो रहा था जो उन्हें सुकून दे रहा था।

  • शुरुआती कुछ हफ्तों में: जैसे ही अभिषेक जी ने जीवा की दवाइयां लेनी शुरू कीं और अपने खान-पान में थोड़े बदलाव किए, उन्हें सबसे पहला फर्क अपने शरीर के भारीपन में दिखा। शरीर एकदम हल्का लगने लगा। दिनभर जो एक अजीब सी थकावट छाई रहती थी, वो कम होने लगी। पेट खुलकर साफ होने लगा और बार-बार गला सूखने या प्यास लगने वाली दिक्कत में भी काफी आराम आ गया।
  • 1 से 3 महीनों के दौरान: अब तक उनके ब्लड शुगर के आंकड़े भी सुधरने लगे थे। पहले जहां सुबह उठते ही उन्हें सुस्ती घेर लेती थी, अब वे एकदम फ्रेश और तरोताज़ा उठते थे। रातों की नींद गहरी हो गई थी और दिनभर काम करने की एनर्जी बनी रहती थी। अभिषेक जी खुद अंदर से महसूस कर पा रहे थे कि उनकी सेहत ट्रैक पर लौट रही है।
  • 3 से 6 महीनों में: छह महीने बाद जब उन्होंने अपना टेस्ट दोबारा करवाया, तो रिपोर्ट देखकर उन्हें खुद अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। उनका HbA1c लेवल 8.5 से गिरकर सीधा 5.5 पर आ चुका था! महीनों से गायब शरीर की असली ताकत लौट आई थी। जो इंसान बीमारी की वजह से अंदर से मायूस रहने लगा था, वो अब पूरी तरह से पॉजिटिव, फुर्तीला और आत्मनिर्भर बन चुका था।

निष्कर्ष

अभिषेक जी की ये कहानी सिर्फ एक टेस्ट रिपोर्ट के नंबर कम होने की कहानी नहीं है। ये कहानी है उस पक्के भरोसे की, जो उन्होंने अपने शरीर की ताकत, आयुर्वेद की सच्चाई और एक सही इलाज पर दिखाया।

डायबिटीज़ कोई ऐसा हौवा नहीं है जिससे डरकर या हार मानकर बैठ जाना पड़े। अगर सही समय पर सही रास्ता मिल जाए, तो हमारे शरीर के अंदर खुद को रिपेयर करने की गज़ब की ताकत छिपी है। जीवा आयुर्वेद ने अभिषेक जी को सिर्फ दवाइयों के सहारे नहीं छोड़ा, बल्कि उन्हें जीने का एक ऐसा नया तरीका सिखाया, जो उन्हें उम्र भर सेहतमंद रखेगा।

अगर आप भी लंबे समय से डायबिटीज़ झेल रहे हैं और हर कुछ महीनों में दवाइयां बदल-बदल कर थक चुके हैं, तो एक बार आयुर्वेद का प्राकृतिक रास्ता अपनाकर देखिए। आज ही +91 9266714040 पर कॉल करें और घर बैठे जीवा के डॉक्टरों से अपना कंसल्टेशन लें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, आयुर्वेद सिर्फ शर्करा को काबू नहीं करता बल्कि पाचन और दोषों के असंतुलन को ठीक करके शरीर की शर्करा को नियंत्रित करने की क्षमता को बेहतर बनाता है। अभिषेक जी की HbA1c 8.5 से 5.5 पर आना इसका जीता-जागता उदाहरण है।

यह हर व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है। आमतौर पर शुरुआती बदलाव कुछ हफ्तों में महसूस होने लगते हैं और 3 से 6 महीनों में अच्छे नतीजे सामने आते हैं।

जीवा के डॉक्टर पहले आपकी पूरी स्थिति समझते हैं और उसी के हिसाब से इलाज तय करते हैं। दवाइयों में कोई भी बदलाव डॉक्टर की सलाह से ही किया जाता है।

आयुर्वेद में दवाइयों के साथ-साथ खानपान और दिनचर्या में बदलाव भी उतना ही ज़रूरी है। दोनों मिलकर ही असरदार नतीजे देते हैं।

आयुर्वेदिक दवाइयाँ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों पर आधारित होती हैं और सही जाँच के बाद दी जाती हैं। इसलिए इनके साइड इफेक्ट न के बराबर होते हैं।

आयुर्वेद का लक्ष्य डायबिटीज को जड़ से काबू करना और शरीर को इतना मज़बूत बनाना है कि शर्करा का स्तर सामान्य बना रहे। सही इलाज और जीवनशैली से इसे पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।

बिल्कुल। आयुर्वेद में हर उम्र के मरीज़ के लिए अलग और व्यक्तिगत इलाज तैयार किया जाता है। उम्र के हिसाब से दवाइयाँ और थेरेपी तय की जाती हैं।

सबसे पहले मीठा, मैदा और तला-भुना खाना कम करें। समय पर खाएं, रात का खाना जल्दी खाएं और खाने में मोटे अनाज और हरी सब्ज़ियाँ शामिल करें।

 योग और सही खानपान बहुत ज़रूरी हैं लेकिन अकेले काफी नहीं होते। इनके साथ सही आयुर्वेदिक दवाइयाँ और डॉक्टर की निगरानी भी उतनी ही ज़रूरी है।

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