Diseases Search
Close Button
 
 

Seasonal infection से बचने के लिए hygiene habits क्या रखें?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 06 Jul, 2026
  • category-iconUpdated on 06 Jul, 2026
  • category-iconImmunity
  • blog-view-icon5007

अक्सर हम सोचते हैं कि सुबह उठकर नहा लेना और साफ़ कपड़े पहन लेना ही 'हाइजीन' है। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि जैसे ही सर्दियां खत्म होकर गर्मियां आती हैं या मानसून की पहली बारिश होती है, आपके घर में अचानक सर्दी, खांसी और बुखार की लाइन क्यों लग जाती है? दरअसल, 'सामान्य साफ़-सफाई' और 'मौसमी बीमारियों (Seasonal Infections) से बचने वाली साफ़-सफाई' दोनों दिखने में भले ही एक जैसे लगें, लेकिन दोनों का शरीर को बचाने का तरीका बिल्कुल अलग होता है। सिर्फ किसी के कहने पर दिन भर हाथों में सैनिटाइज़र रगड़ लेने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि आपकी त्वचा की प्राकृतिक सुरक्षा कमज़ोर हो सकती है। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि मौसम बदलने पर बीमार पड़ना कोई आम बात नहीं है, बल्कि आपके शरीर की बाहरी और अंदरूनी साफ़-सफाई के बीच बिगड़ते संतुलन का मामला है।

शरीर के संपर्क में आकर ये Seasonal Infections असल में करते क्या हैं?

जब मौसम बदलता है (जैसे सर्दी से गर्मी या गर्मी से बारिश), तो तापमान में होने वाला यह अचानक उतार-चढ़ाव वायरस और बैक्टीरिया को पनपने के लिए सबसे बेहतरीन माहौल देता है। जब आप बाहर से घर आते हैं, तो ये कीटाणु आपके हाथों, जूतों और कपड़ों के ज़रिए आपके घर में प्रवेश करते हैं। एक बार जब ये आपकी आंख, नाक या मुंह के ज़रिए शरीर के अंदर चले जाते हैं, तो ये आपकी कोशिकाओं पर हमला करके तेज़ी से अपनी संख्या बढ़ाने लगते हैं। अगर आपकी बाहरी हाइजीन कमज़ोर है, तो आप इन्हें अंदर जाने का खुला रास्ता दे रहे हैं, और अगर आपकी अंदरूनी इम्यूनिटी कमज़ोर है, तो ये अंदर जाकर आपको हफ्तों के लिए बिस्तर पर डाल देंगे।

क्या सिर्फ दिन भर सैनिटाइज़र लगाने का मतलब पूरी सुरक्षा है?

जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। कई बार लोग बाज़ार से महंगे हैंड सैनिटाइज़र ले आते हैं और साबुन-पानी से हाथ धोना ही छोड़ देते हैं। सैनिटाइज़र सिर्फ कुछ खास तरह के कीटाणुओं को मारता है, लेकिन अगर आपके हाथों पर धूल, मिट्टी, पसीना या ग्रीस लगा है, तो सैनिटाइज़र बिल्कुल बेअसर हो जाता है। साबुन और पानी का झाग वायरस की बाहरी परत (Lipid layer) को तोड़कर उसे जड़ से खत्म कर देता है और पानी के साथ बहा ले जाता है। अगर आप मौसम बदलने पर सिर्फ सैनिटाइज़र के भरोसे बैठे हैं, तो फायदे की जगह आप उन ढीठ वायरसों को दावत दे रहे हैं जो सिर्फ साबुन से ही मरते हैं। समस्या कीटाणुओं में नहीं, बल्कि साफ़-सफाई की हमारी आधी-अधूरी जानकारी में है।

गलत हाइजीन (Hygiene) के तरीकों से आपकी सेहत पर क्या असर पड़ता है?

जब हम बिना सोचे-समझे विज्ञापनों को देखकर गलत साफ़-सफाई करते हैं, तो शरीर के बाहरी कवच पर अजीबोगरीब बदलाव होते हैं:

  • त्वचा का फटना (Dryness and Cracks): दिन में 20 बार केमिकल वाले साबुन से हाथ धोने से त्वचा का प्राकृतिक तेल (Natural oil) खत्म हो जाता है, जिससे दरारें पड़ जाती हैं और बैक्टीरिया वहीं से शरीर में घुस जाते हैं।
  • गुड बैक्टीरिया का खात्मा: हमारी त्वचा पर कुछ 'अच्छे बैक्टीरिया' भी होते हैं जो हमें फंगस से बचाते हैं। हार्श एंटी-बैक्टीरियल साबुन इन्हें भी मार देते हैं।
  • नाखूनों के इन्फेक्शन: नाखून बड़े रखना और उन्हें ठीक से साफ़ न करना, पेट के इन्फेक्शन का सबसे बड़ा कारण बनता है।
  • आंखों में एलर्जी: गंदे हाथों से बार-बार आंखें मलने से कंजंक्टिवाइटिस (Pink Eye) और आंखों में भारीपन की शिकायत तेज़ी से बढ़ती है।

क्या लापरवाही और गलत इस्तेमाल शरीर में किसी बड़ी परेशानी का संकेत बन सकता है?

अगर आप रोज़ाना हाइजीन के नाम पर गलत तरीके अपना रहे हैं या बुनियादी साफ़-सफाई को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, तो इसे बिल्कुल हल्के में न लें। यह कई गंभीर दिक्कतें पैदा कर सकता है:

  • एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (Antibiotic Resistance): हर छोटी चीज़ के लिए बहुत ज़्यादा एंटी-बैक्टीरियल केमिकल इस्तेमाल करने से कीटाणु इतने ढीठ हो जाते हैं कि फिर कोई दवा उन पर असर नहीं करती।
  • क्रॉनिक स्किन डिसीज़ (Skin Diseases): त्वचा की ऊपरी परत डैमेज होने से एग्जिमा और खुजली की समस्या स्थायी रूप से घर कर सकती है।
  • गंभीर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन: खांसते या छींकते समय हाथ न रखने या गंदे रुमाल का इस्तेमाल करने से फेफड़ों में निमोनिया (Pneumonia) तक का संक्रमण हो सकता है।

प्राचीन आयुर्वेद इस मौसम के बदलाव और साफ़-सफाई को किस नज़रिए से देखता है?

आयुर्वेद में मौसम बदलने के समय को 'ऋतु संधि' (Ritu Sandhi) कहा जाता है। यानी जब एक मौसम जा रहा हो और दूसरा आ रहा हो। आयुर्वेद के अनुसार, इस दौरान शरीर के वात, पित्त और कफ तीनों दोष अचानक बेकाबू हो जाते हैं और शरीर की जठराग्नि (पाचन) कमज़ोर पड़ जाती है। आयुर्वेद सिर्फ 'बाहरी शौच' (नहाना या हाथ धोना) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 'आंतरिक शौच' (शरीर के अंदर की सफाई) को भी उतना ही महत्व देता है। जब आपके शरीर में 'आम' (Toxins/ज़हरीले तत्व) भरा होता है, तो वह कीटाणुओं के लिए चुंबक का काम करता है। इसका सीधा मतलब है कि जब तक आप मौसम के हिसाब से अपनी बाहरी सफाई के साथ-साथ खानपान सुधारकर अंदरूनी सफाई नहीं करेंगे, आप बीमार पड़ते रहेंगे।

मौसमी इन्फेक्शन को दूर रखने वाले प्रकृति के बेहतरीन साथी

प्रकृति ने हमें कीटाणुओं से बचने के लिए कुछ बेहतरीन चीज़ें दी हैं, जो महंगे केमिकल्स से कहीं ज़्यादा असरदार हैं:

  • नीम और फिटकरी (Neem & Alum): नहाने के पानी में उबले हुए नीम के पत्ते या थोड़ी सी फिटकरी मिलाने से यह शरीर के सारे फंगल और बैक्टीरियल इन्फेक्शन को जादू की तरह खींच लेता है।
  • नमक और हल्दी के गरारे (Gargles): मौसम बदलते ही गले में खराश होना आम है। रात को सोने से पहले गुनगुने पानी में चुटकी भर हल्दी और सेंधा नमक डालकर गरारे करने से वायरस गले में ही खत्म हो जाता है।
  • सरसों का तेल (Nasya): नहाने के बाद नाक के दोनों छेदों में एक-एक बूंद शुद्ध सरसों या अणु तेल लगाने से यह एक फिल्टर का काम करता है और धूल-वायरस को फेफड़ों तक नहीं जाने देता।

क्या कमज़ोर इम्यूनिटी और पाचन वालों के लिए मौसम का बदलना ज़्यादा खतरनाक है?

बिलकुल! आप जितनी भी बाहरी साफ़-सफाई कर लें, अगर आपका शरीर अंदर से कमज़ोर है, तो एक मामूली सा वायरस भी आपको हफ्तों बीमार कर सकता है। अगर आपका हाज़मा पहले से कमज़ोर है (यानी जठराग्नि मंद है), तो आपका शरीर भोजन से ताकत (ओजस) नहीं बना पाएगा। ऐसे लोगों में ज़रा सी सर्द हवा या बारिश की एक बूंद भी सीधा सर्दी-ज़ुकाम कर देती है। कमज़ोर पाचन वालों के लिए सिर्फ हाथ धोना काफी नहीं है, उन्हें मौसम बदलते ही अपने खाने को हल्का (दलिया, खिचड़ी, सूप) कर देना चाहिए ताकि शरीर की सारी ऊर्जा खाना पचाने की बजाय वायरस से लड़ने में लगे।

वो आम गलतियाँ जो साफ़-सफाई के फायदों को नुकसान में बदल देती हैं

हम अक्सर जाने-अनजाने में अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कुछ ऐसा कर बैठते हैं जो इन्फेक्शन को घर में न्यौता देता है:

  • हथेलियों पर छींकना: खांसते या छींकते समय लोग अक्सर अपनी हथेलियों का इस्तेमाल करते हैं और फिर उसी हाथ से दरवाज़े, टेबल और बर्तन छूते हैं। हमेशा अपनी कोहनी (Elbow) पर छींकें।
  • गीले तौलिये का बार-बार इस्तेमाल: नम और सीलन भरा तौलिया फंगस और बैक्टीरिया का सबसे बड़ा घर है। इसे हर इस्तेमाल के बाद धूप में सुखाना चाहिए।
  • जूते-चप्पल घर के अंदर लाना: बाहर की सारी गंदगी, जानवरों का मल और कीटाणु जूतों के ज़रिए सीधे आपके बेडरूम और किचन तक पहुँच जाते हैं।
  • मोबाइल फोन को साफ़ न करना: हम हाथ तो धो लेते हैं, लेकिन उसी मोबाइल को टॉयलेट से लेकर डाइनिंग टेबल तक इस्तेमाल करते हैं, जो कीटाणुओं का सबसे बड़ा अड्डा है।
  • चेहरे को बार-बार छूना: गंदे हाथों से बार-बार नाक, आंख और मुंह को छूना वायरस को सीधे शरीर के अंदर एंट्री देना है।

किन दूसरी बीमारियों में बिना सोचे-समझे लापरवाही मुसीबत बन सकती है?

कई बार आप अपनी तरफ से साफ़-सफाई रख रहे होते हैं, फिर भी कुछ दूसरी अंदरूनी बीमारियों की वजह से एक छोटा सा इन्फेक्शन भारी पड़ सकता है:

  • अस्थमा (Asthma): मौसम बदलते ही हवा में पराग (Pollen) और धूल बढ़ जाती है। अगर घर में जाले या डस्ट हैं, तो अस्थमा का अटैक आना तय है।
  • डायबिटीज़ (Diabetes): शुगर के मरीज़ों में घाव बहुत देर से भरते हैं। अगर पैरों की सही सफाई न हो, तो बारिश के मौसम में फंगल इन्फेक्शन जानलेवा रूप ले सकता है।
  • लो ब्लड प्रेशर और एनीमिया: खून की कमी वालों का शरीर मौसम का बदलाव बर्दाश्त नहीं कर पाता और वे बहुत जल्दी वायरल फीवर की चपेट में आ जाते हैं।

बाज़ार में मिलने वाले एंटी-बैक्टीरियल सोप्स का रोज़ाना इस्तेमाल कब बन जाता है खतरा?

आजकल लोग विज्ञापनों से डरकर बाज़ार से कड़क एंटी-बैक्टीरियल साबुन या बॉडी वॉश ले आते हैं कि इससे 99.9% कीटाणु मर जाएंगे। ये चीज़ें तुरंत इस्तेमाल में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन रोज़ाना इनका भरोसा करना खतरनाक है। इन साबुनों में 'ट्राइक्लोसन' जैसे हैवी केमिकल्स होते हैं, जो हमारी त्वचा के 'एसिड मेंटल' (सुरक्षा कवच) को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं। प्रकृति ने हमारी त्वचा को जिस रूप में बनाया है, वह खुद कई कीटाणुओं से लड़ सकती है। अगर आप रोज़ केमिकल रगड़ेंगे, तो शरीर की अपनी ताकत खत्म हो जाएगी और आपको रूखेपन के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।

महंगे इलाजों की जगह इन आसान तरीकों से लें संपूर्ण हाइजीन का असली मज़ा

आप कुछ बहुत ही आसान और घरेलू आदतें अपनाकर मौसमी बीमारियों से खुद को और परिवार को बचा सकते हैं:

  • 20 सेकंड का नियम: खाना खाने से पहले, टॉयलेट के बाद और बाहर से आने पर हाथों को साबुन से कम से कम 20 सेकंड तक अच्छी तरह रगड़कर धोएं (उंगलियों के बीच और नाखूनों के नीचे भी)।
  • सोने से पहले पैर धोना: रात को बिस्तर पर जाने से पहले अपने पैरों को गुनगुने पानी से धोकर पोंछ लें। यह न सिर्फ गंदगी हटाता है, बल्कि दिन भर की थकान और स्ट्रेस को भी खत्म करता है।
  • गर्म पानी का सेवन: मौसम बदलते समय (खासकर सुबह उठकर) एक गिलास हल्का गर्म पानी पिएं। यह गले और पेट में पनप रहे इन्फेक्शन को फ्लश आउट कर देता है।

हमेशा फिट और इन्फेक्शन-फ्री रहने के लिए इन्हें अपनी रूटीन में कैसे ढालें?

अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कुछ छोटे-छोटे बदलाव करके आप इसका बहुत बड़ा फायदा देख सकते हैं:

  • तौलिया और कंघी अलग रखें: परिवार में हर सदस्य का तौलिया, कंघी और टूथब्रश बिल्कुल अलग होना चाहिए। बीमार पड़ने पर इन्हें तुरंत बदल दें।
  • नाखून छोटे रखें: नाखूनों के अंदर सबसे ज़्यादा खतरनाक बैक्टीरिया छुपते हैं, इसलिए इन्हें हमेशा छोटा और साफ़ रखें।
  • हाइड्रेशन (Hydration): शरीर में पानी की कमी न होने दें। खूब पानी पीने से यूरिन और पसीने के ज़रिए शरीर के टॉक्सिन्स लगातार बाहर निकलते रहते हैं।

आयुर्वेद शरीर की रिकवरी के लिए 'दिनचर्या' पर इतना भरोसा क्यों करता है?

आयुर्वेद सिर्फ बीमारी का इंतज़ार नहीं करता, बल्कि उसे आने से पहले ही रोक देता है। आयुर्वेद में बताई गई 'दिनचर्या' (Daily Routine) में सुबह उठकर जीभ साफ़ करना (Tongue Scraping), ऑयल पुलिंग (मुंह में तेल भरकर कुल्ला करना) और नाक में तेल डालना शामिल है। यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि कोई भी मौसमी वायरस सबसे पहले नाक और गले (EENT) के रास्ते ही शरीर में अपनी जगह बनाता है। आयुर्वेद का यह नियम शरीर के इन दरवाज़ों (Entry points) को इतना मज़बूत और साफ़ कर देता है कि इन्फेक्शन अंदर टिक ही नहीं पाता, और आपकी इम्यूनिटी फौलाद बन जाती है।

लापरवाही के दौरान डॉक्टर के पास जाने की नौबत कब आ सकती है?

घरेलू उपाय और साफ़-सफाई रखने के बाद भी अगर कुछ अजीब और गंभीर लक्षण दिखें, तो आपको डॉक्टर के पास ज़रूर जाना चाहिए:

  • अगर बुखार 102 डिग्री से ऊपर चला जाए और तीन दिन (72 घंटे) के बाद भी कम होने का नाम न ले।
  • साँस लेने में भयंकर दिक्कत होने लगे, या सीने में भारीपन और घरघराहट (Wheezing) की आवाज़ आए।
  • लगातार उल्टी या दस्त की वजह से शरीर में पानी की इतनी कमी हो जाए (डिहाइड्रेशन) कि पेशाब का रंग गहरा पीला हो जाए या आना बंद हो जाए।
  • त्वचा पर अचानक से बहुत सारे लाल चकत्ते (Rashes) पड़ जाएं और खुजली शुरू हो जाए।

सही हाइजीन और गलत हाइजीन के बीच के सबसे बड़े अंतर क्या हैं?

तुलना का आधार सही हाइजीन (Right Hygiene Habits) गलत या अधूरी हाइजीन (Wrong Hygiene Habits)
हाथ धोने का तरीका बाहर से आने पर साबुन और पानी से 20 सेकंड तक हाथ धोना सिर्फ जल्दबाज़ी में पानी से हाथ धो लेना या केवल सैनिटाइज़र पर निर्भर रहना
खांसने/छींकने का तरीका हमेशा अपनी कोहनी (Elbow) को मोड़कर या टिश्यू पेपर पर छींकना सीधे अपनी हथेलियों पर छींकना और फिर उसी से हर जगह छूना
तौलिये का इस्तेमाल हर व्यक्ति का अपना अलग तौलिया होना और उसे रोज़ धूप में सुखाना पूरे परिवार का एक ही तौलिया इस्तेमाल करना और उसे बाथरूम में ही गीला छोड़ देना
चेहरे को छूना गंदे हाथों से आंख, नाक और मुंह को बिल्कुल न छूना काम करते-करते बार-बार चेहरे को मलना या उंगलियां मुंह में डालना
बीमारी के समय इन्फेक्शन होने पर घर पर आराम करना और दूसरों से दूरी बनाए रखना बीमार होने पर भी भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाना और इन्फेक्शन फैलाना

हमेशा याद रखें कि प्रकृति के मौसम का बदलना तय है और कीटाणुओं का काम शरीर पर हमला करना है, इसके पीछे एक गहरा विज्ञान छिपा है। आप जो भी हाइजीन की आदतें अपनाते हैं, उसका सीधा असर आपकी इम्यूनिटी और आपके परिवार के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसलिए सिर्फ सैनिटाइज़र लगा लेने और संपूर्ण साफ़-सफाई को एक ही चीज़ मानकर लापरवाही करने की गलती न करें। अपनी इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में अपने शरीर की सुरक्षा के बुनियादी नियमों को समझें। मौसम के हिसाब से अपनी आदतों को बदलें, सही जानकारी जुटाएँ और सिर्फ विज्ञापनों में दिखने वाले केमिकल्स पर आँख बंद करके भरोसा न करें। जब आपका शरीर बाहर से साफ़ और अंदर से संतुलित रहेगा, तो यकीनन आप हर बदलते मौसम में पूरी तरह से तंदुरुस्त और खुश रहेंगे।

References:

Seasonal infectious disease epidemiology - PMC

Seasonality of viral infections: mechanisms and unknowns - ScienceDirect

Seasonality of respiratory viruses and bacterial pathogens - PMC

Influenza (seasonal)

Infection Prevention and Control Strategies for Seasonal Influenza in Healthcare Settings

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

मौसम बदलने पर हाथों की सही सफाई, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, पर्याप्त पानी पीना और भीड़भाड़ वाली जगहों पर सावधानी बरतना संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है।

नहीं। अगर हाथों पर धूल, मिट्टी या चिकनाई लगी हो, तो सिर्फ सैनिटाइज़र पर्याप्त नहीं होता। ऐसे में साबुन और पानी से कम से कम 20 सेकंड तक हाथ धोना अधिक प्रभावी माना जाता है।

समय-समय पर हाथ धोना, चेहरे को गंदे हाथों से न छूना, खांसते या छींकते समय कोहनी या टिश्यू का उपयोग करना, नाखून साफ़ रखना और व्यक्तिगत सामान साझा न करना सबसे महत्वपूर्ण आदतें हैं।

हर समय एंटीबैक्टीरियल साबुन का उपयोग आवश्यक नहीं होता। सामान्य परिस्थितियों में साधारण साबुन और पानी ही पर्याप्त होते हैं। अत्यधिक केमिकल वाले साबुन त्वचा की प्राकृतिक सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।

हाँ। लंबे समय तक गीला रहने वाला तौलिया बैक्टीरिया और फंगस के बढ़ने का कारण बन सकता है। इसलिए तौलिये को हर उपयोग के बाद अच्छी तरह सुखाना और व्यक्तिगत तौलिया इस्तेमाल करना बेहतर है।

कमज़ोर इम्यूनिटी, बुज़ुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएँ, मधुमेह, अस्थमा या अन्य पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोगों में मौसमी संक्रमण का जोखिम अधिक हो सकता है।

हाँ। मोबाइल फोन, कीबोर्ड, दरवाज़ों के हैंडल और अन्य बार-बार छुई जाने वाली सतहों पर कई तरह के कीटाणु जमा हो सकते हैं। इन्हें नियमित रूप से साफ़ रखना अच्छी हाइजीन का हिस्सा है।

आयुर्वेद ऋतु संधि के दौरान हल्का और सुपाच्य भोजन, गुनगुना पानी, नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद और शरीर की बाहरी व आंतरिक स्वच्छता बनाए रखने पर ज़ोर देता है ताकि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बेहतर बनी रहे।

यदि तेज़ बुखार 2–3 दिनों से अधिक बना रहे, सांस लेने में कठिनाई हो, बार-बार उल्टी या दस्त हों, शरीर में पानी की कमी हो, या गंभीर कमजोरी, दाने या लगातार बिगड़ते लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

अच्छी स्वच्छता की आदतें संक्रमण का जोखिम काफी कम कर सकती हैं, लेकिन वे 100% सुरक्षा की गारंटी नहीं देतीं। मजबूत प्रतिरक्षा, संतुलित आहार, पर्याप्त आराम और समय पर चिकित्सकीय सलाह भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us